Home पड़ताल राहुल गांधी के पास जनता को देने के लिए क्‍या है?

राहुल गांधी के पास जनता को देने के लिए क्‍या है?

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पंकज कुमार

चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन पकड़ना व भाजपा का राम मंदिर मुद्दे को तेजी से पब्लिक डिस्कोर्स में लेकर आना कांग्रेस व जनता के लिये चिंता व चिंतन का विषय है. राम मंदिर का मुद्दा भाजपा व संघ के लिए हमेशा ही विकट परिस्थितियों मे ट्रंप कार्ड की तरह काम करता है जिसमे कांग्रेस फंसती चली जाती है. शुरुआती दिनों से ही कांग्रेस धर्म के मुद्दे पर कोई साफ लाइन नहीं ले पाती और यही भाजपा के लिए संजीवनी का काम करता है. आज जो कुछ भी हो रहा है उसको समझने के लिए हमें राजीव गांधी के कार्यकाल को सिलसिलेवार तरीके से देखना होगा.

शाहबानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के बाद से ही राजीव सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगने लगे थे व कट्टर हिन्दू संगठनों ने सरकार पर लगातार दबाव बनाना शुरू कर दिया था. उसी दौरान 1986 में फैजाबाद जिला जज ने विवादित ढांचे का ताला खोलने का आदेश दे दिया. कहा जाता है कि बिना इंतजार किया प्रशासन ने 40 घंटे के अंदर फैसले को लागू कर दिया व इसका सीधा प्रसारण दूरदर्शन पर किया गया. 1989 में इलाहाबाद में कुम्भ मेला चल रहा था जिसमें देशभर के संतों ने एक मीटिंग कर ये कहा कि नौ महीने बाद यानी नवंबर 1989 मे मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास किया जाएगा. इस कार्य को पूरा करने के लिए विश्व हिंदू परिषद ने देश भर में हिन्दू भावनाओं को उकसाने के लिए शिला पूजन का आयोजन शुरू कर दिया जिसके दौरान ईंटों पर ‘राम’ लिख कर जुलूस निकाले जाने लगें जिसका इस्तेमाल बाद में राम मंदिर निर्माण में होना था.

विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं ने तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी से मिलकर बिना किसी रोक के शिलान्यास करने की इजाज़त मांगी जिसे दे दिया गया. पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी जिन्होंने अयोध्या आंदोलन को शुरू से कवर किया था, उनके अनुसार उस वक्त कांग्रेस भी मध्यममार्गीय हिंदुओं को ये दिखाना चाहती थी कि वो भी उनके साथ है. नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार शिलापूजन के बाद 1989 मे 706 दंगे हुए और इन दंगों मे लगभग 2000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई. दंगे की चपेट में सबसे पहले बिहार का भागलपुर आया, जहां शिलापूजन के दौरान दंगे भड़के थे. दंगों के दो दिन बाद प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने भागलपुर का दौरा किया था. 26 अक्टूबर 1889 में जब एक पत्रकार ने रामशिला जुलूस पर बैन न लगाने के पीछे का कारण पूछा तो राजीव गांधी ने सवाल को ये कहते हुए टाल दिया था कि अभी तक रामशिला जुलूस के कारण कानून व्यवस्था की कोई समस्या पैदा नहीं हुई है जबकि भागलपुर मे अगले दो महीनों तक दंगे होते रहे थे.

अब तक राजीव गाँधी संघ व भाजपा के हिंदूवादी एजेंडे में फस चुके थे. यहाँ से कांग्रेस का राजनीतिक पतन व भाजपा का उत्थान शुरू हो चुका था. 3 नवंबर 1989 को फैजाबाद में एक सभा को संबोधित करते हुए गाँधी ने कहा था कि “आप हमें वोट दीजिये, हम राम-राज्य वापस लाएंगे. मुझे भी हिंदू होने पर गर्व है”. ध्यान रखने वाली बात ये है कि उस वक्त उनका भाषण लिखने वाले मणिशंकर अय्यर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि राजीव जी अपना चुनावी अभियान पंचायती राज के मुद्दे पर राजस्थान से करने वाले थे लेकिन कांग्रेस के कुछ नेताओं के कहने पर उनका भाषण बदल दिया गया व चुनाव अभियान शुरू करने की जगह फैजाबाद को चुना गया, जहां उन्होंने सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन पकड़ी. यहीं से राजीव गाँधी की हार तय होने लगी थी। उनकी चुनावी किस्‍मत ताबूत में आखिरी कील का काम किया बोफोर्स घोटाले के आरोपों ने और कांग्रेस 1989 का आम चुनाव हार गई. इसी चुनाव में भाजपा की लोकसभा सीटों का आंकड़ा दो से बढ़कर 88 हो गया था.

इस राजनीतिक घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए अगर हम वर्तमान राजनीति को देखें तो आने वाले दिनों मे घटने वाली घटनाओं का हम ठीक-ठीक आकलन कर पाएंगे. 2019 के आम चुनाव से पहले कुम्भ मेले का आयोजन इलाहाबाद मे होना है, साधु-संत प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर मंदिर निर्माण की बात कर रहे हैं, संघ का एक धड़ा फिर से रथयात्रा निकालने की बात कर रहा है. मीडिया रिपोर्टों की मानें तो सांसद राकेश सिन्हा राम मंदिर निर्माण के लिए प्राइवेट बिल लाने की योजना बना रहे हैं. भाजपा ने कभी  धर्म के नाम पर, तो कभी इतिहास के नाम पर, तो कभी फेक न्यूज के सहारे, तो कभी सेना के नाम पर, शहरों के नाम बदलने के बहाने योजनाबद्ध तरीके से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को उकसाने का काम बहुत पहले ही शुरू कर दिया था. अब राहुल गाँधी व कांग्रेस के सामने ये चुनौती है कि भाजपा के बिछाए इस धार्मिक जाल में फंसने के बजाय इसकी काट कहां से लाएं।

दीपंकर गुप्ता अपनी किताब ‘मिस्टेकेन मॉडर्निटी’ में लिखते हैं कि जवाहरलाल नेहरू के अलावा देश के किसी भी प्रधानमंत्री के पास जनता को देने के लिए कुछ भी नही था. नेहरू के बाद की सरकारें लगभग एक ही तरह के वायदे जनता के सामने परोसती रहीं जो कभी पूरे नहीं किए जा सके और मौजूदा समय में हर समस्या का कारण राज्य व राज्य की संस्थाओं द्वारा डिलीवर करने में लगातार असफल होना है.

महात्मा गाँधी की हत्या के बाद जब पटेल द्वारा संघ को प्रतिबंधित करने का फैसला लिया गया तब संघ के नेताओं ने नेहरू पर ये कहते हुए दबाव डाला कि अगर ऐसा किया गया तो  देशभर के हिंदू सड़कों पर निकल आएंगे जिनको नियंत्रित करना सरकार के वश के बाहर होगा. दीपंकर गुप्ता लिखते हैं कि संघ पर प्रतिबंध लगने के बाद भी कोई सड़क पर इसलिये नही आया क्‍योंकि नेहरू के पास उनको देने के लिए स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, योजना आयोग द्वारा तैयार की गई योजनाएं, रिसर्च सेंटर इत्यादि के अलावा भी बहुत कुछ था.

असल सवाल आज यह है कि राहुल गांधी के पास जनता को देने के लिए क्‍या है?


स्वतंत्र लेखक व पूर्व छात्र, बनारस हिंदू युनिवर्सिटी