Home पड़ताल RSS का सबसे बड़ा झूठ है कि वह धर्मांध संगठन नहीं !

RSS का सबसे बड़ा झूठ है कि वह धर्मांध संगठन नहीं !

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पाठकों को बताते हुए अतीव प्रसन्नता हो रही है कि अपनी सामाजिक और न्याय-दृष्टि के लिए मशहूर चिंतक कँवल भारती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों पर एक विस्तृत समीक्षा लिख रहे हैं जो मीडिया विजिल में हफ़्तावार प्रकाशित होगी। प्रस्तुत है इस सिलसिले की पहली कड़ी- संपादक


आरएसएस और राष्ट्रजागरण का छद्म-1

कँवल भारती

 

कई साल पहले की बात है, मैं मुरादाबाद में अपनी रिश्तेदारी में गया हुआ था. वहाँ राष्ट्र जागरण अभियान की कुछ पुस्तिकाएं मेज पर रखी हुई थीं. मैंने उनको उठाकर उलटपुलट कर देखा, और सारा माजरा समझ में आ गया. मैंने जब अपने रिश्तेदार से पूछा, ‘ये किताबें कहाँ से आयीं?’ तो पता चला, पूरी बस्ती में बांटी गई हैं. उन्होंने यह भी बताया कि बाकायदा एक सज्जन यहाँ दलित युवकों को शाखा में ले जाते हैं. खैर, मैं उन पुस्तिकाओं को अपने साथ ले आया. एक-दो दिन में मैंने उन्हें पढ़कर कुछ नोट्स बनाये, और बाद में विस्तार से कुछ लिखने के इरादे से उन्हें प्लास्टिक की थैली में बंद करके रख दिया, क्योंकि उस वक्त कुछ और जरूरी काम हाथ में थे. उन कामों में मैं ऐसा व्यस्त हुआ कि उस पैकेट का कुछ ख्याल ही नहीं रहा. कई साल गुजर गए, और इस तरह वह स्मृति से भी निकल गया. पर इधर जब आरएसएस-भाजपा की केन्द्र और उत्तरप्रदेश में सरकार बनी, और आरएसएस के राष्ट्र जागरण अभियान ने फिर से जोर पकड़ना शुरू किया, तो मुझे उन पुस्तिकाओं की याद आई. दिन भर की खोज के बाद वह पैकेट किताबों के एक ढेर में दबा हुआ मिल गया. उसमें ये आठ किताबें हैं—

  1. गर्व से कहो हम हिन्दू हैं—क्यों?
  2. अथातो तत्व जिज्ञासा : प्रश्नोत्तरी
  3. राष्ट्रीय आन्दोलन और संघ
  4. आदर्श हिन्दू घर
  5. हिन्दू संस्कृति और पर्यावरण
  6. गोवंश : रक्षण, पालन तथा संवर्धन
  7. नारी जागरण और संघ
  8. स्वदेशी : देश का प्राण

इनके अतिरिक्त एक अन्य किताब ‘संघ गाथा’ भी है, जो एक स्वयंसेवक के लिए लिखी गयी है. ये सारी किताबें एक चार पेज के फोल्डर में रख कर बांटी गई थीं, जिसके ऊपर लिखा है—‘राष्ट्र जागरण अभियान’.

पहले इस फोल्डर पर ही बात करते हैं. जिस पर गुरु गोलवरकर और डा. हेडगेवार के चित्र छपे हुए हैं. सबसे नीचे लिखा है— ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मेरठ प्रान्त’.

इस फोल्डर का आरम्भ इन पंक्तियों से होता है—

‘विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन, जिसके महत्व को समझने वाले उसके हितैषी उसको देश की शक्ति समझकर आवश्यक मानते हैं, तो विरोधी साम्प्रदायिक और धर्मान्ध. देश के शत्रुओं को वह आक्रामक लगता है. आखिर संघ है क्या? क्यों और कैसे शुरू हुआ? इसकी विचारधारा, प्रेरणा और जीवनमूल्य क्या हैं?’

आगे, डा. हेडगेवार के हवाले से कहा गया है कि उनके ‘मन में एक प्रश्न उभरता था कि अपना देश सभी गुणों से युक्त है, तो क्या कारण है कि बार-बार विदेशियों के सम्मुख हम अपमानित होते हैं, यदि सबके प्रयासों से स्वतंत्रता मिली तो क्या उसकी रक्षा संभव हो सकेगी?’ यह सवाल सचमुच महत्वपूर्ण है.

इस सवाल के क्रम में पत्रक आगे कहता है—

‘इतिहास का अध्ययन और तत्कालीन महापुरुषों से संपर्क कर वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भारत एक सनातन और पुरातन राष्ट्र है. परम्परा से रहता चला आ रहा इसका पुत्रवत समाज हिन्दू है, जिसके प्रयास और परिश्रम से इस राष्ट्र की उन्नति हुई और भारतमाता जगद्गुरु कहलाई. इसकी वीरता, ज्ञान और समृद्धि ने विश्व को चमत्कृत किया था. इसी हिन्दू समाज ने इस देश की रक्षा के लिए अनेक बलिदान किये. विश्व में इस राष्ट्र की पहचान हिन्दू के साथ जुड़ी हुई है.’

भारत के पराभव पर पत्रक कहता हैं, ‘परन्तु जब स्वार्थवश आपस में फूट पड़ी, राष्ट्रीयता की सही पहचान स्मरण न रहने से अपने-पराये का अंतर भूल गए, तब शत्रु ने इसका लाभ उठाया. मुसलमान और अंग्रेज देश को अपमानित करते रहे. हिन्दू समाज बारह सौ वर्षों से स्वतंत्रता के लिए अनवरत संघर्षरत रहा. भारत को दुर्दशा से मुक्त कर फिर से सम्माननीय राष्ट्र बनाने के लिए हिन्दू समाज को सभी भेदभावों से ऊपर उठकर देशभक्ति के आधार पर संगठित होना आवश्यक है.’

और इसके बाद दलितों को लक्ष्य करके लिखी गयीं ये पंक्तियाँ—

‘संघ संस्थापक डा. हेडगेवार ने लक्ष्य रखा, ‘अपना कार्य सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करना है. किसी की उपेक्षा नहीं, सबसे स्नेहपूर्ण व्यवहार चाहिए. जातिगत ऊँच-नीच का भाव हमारे मन को कभी स्पर्श न करे. हिन्दुस्थान के प्रति भक्ति रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू है, और प्रत्येक हिन्दू मेरा भाई है.’ संघ ने प्रथम दिन से इस समरसता के आदर्श को व्यवहार में लाया है. 1935 में वर्धा के संघ शिविर में महात्मा गाँधी ने संघ की भूरी-भूरी प्रशंसा की थी. भारतरत्न डा. आंबेडकर ने भी संघ को जातिभेद और अस्पृश्यता से मुक्त माना था. तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस ने तो कहा था, ‘यदि अस्पृश्यता पाप नहीं, तो कुछ भी पाप नहीं.’

‘परिचय’ के अंतर्गत हम कुछ इन्हीं विषयों पर चर्चा करेंगे. संक्षेप में विचार के बिंदु कुछ ये बनते हैं—

  1. साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता
  2. विदेशियों के सम्मुख बार-बार अपमानित होना
  3. हिन्दू समाज की पुत्रवत परम्परा
  4. जगद्गुरु
  5. राष्ट्र की पहचान हिन्दू के साथ
  6. आपस की फूट और शत्रु की विजय
  7. भारत की बारह सौ वर्षों की गुलामी
  8. हिन्दू समाज का संगठन
  9. आंबेडकर द्वारा संघ की प्रशंसा, और
  10. संघ और दलित

आइये, इन बिंदुओं पर विचार करते हैं.

साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता :

आरएसएस कहता है कि उसके विरोधी उस पर साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता का आरोप लगाते हैं, जो गलत है. चलिए, मान लेते हैं. फिर उसे यह बताना होगा कि वह :

  1. धर्मान्तरण का विरोध क्यों करता है?
  2. जिन दलितों ने धर्मान्तरण किया, वहाँ उसके संगठनों ने उपद्रव क्यों किया? और उनकी घर वापसी क्यों कराई?
  3. उसने भाजपा की सरकारों पर दबाव डालकर धर्मान्तरण के खिलाफ कानून क्यों बनवाया?
  4. उसके संगठनों ने आदिवासी इलाकों में चर्चों और ईसाई पादरियों पर हिंसक हमले क्यों करवाए? कई चर्चों को तोड़ा गया, कई पादरियों की हत्याएं की गयीं, और उड़ीसा में ग्राहम स्टेंस और उसके बेटे को जिंदा जलाया गया, जो आदिवासी समुदायों में शिक्षा प्रचार का काम कर रहे थे.
  5. आदिवासियों के द्वारा ईसाई धर्म अपनाने के खिलाफ आक्रामक प्रदर्शन क्यों किये गए?

आरएसएस के किसी भी नेता ने साम्प्रदायिकता और धर्मांधता की इन शर्मनाक घटनाओं की निंदा नहीं की. इसका कारण यह है कि ये सारी वारदातें ‘हिन्दू जागरण मंच’ ने की थीं, जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ आरएसएस का संगठन है, और जो 17 राज्यों में विभिन्न नामों से सक्रिय है, जैसे दिल्ली में ‘हिन्दू मंच’, तमिलनाडु में ‘हिन्दू मुनानी’, महाराष्ट्र में ‘हिन्दू एकजुट’, आदि. आरएसएस ने इसका नाम मंच इसलिए रखा है, ताकि इससे जुड़ने के लिए सदस्यता लेने की जरूरत न पड़े. इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ यह कितना बेलगाम मंच है. इसीलिए पिछले दिनों गाय को लेकर आरएसएस के गोभक्तों ने दलितों और मुसलमानों की जितनी हत्याएं कीं, उन पर संघ के किसी भी नेता ने दुःख व्यक्त नहीं किया. जब पिछले वर्ष हरियाणा के झज्झर में गोहत्या के शक में पांच दलितों को थाने के सामने ही पीट-पीट कर मार दिया गया था, तो संघ के किसी नेता ने बयान दिया था कि ‘मनुष्य के मुकाबले गाय का जीवन महत्वपूर्ण है.’ इस बयान ने जहाँ अल्पसंख्यकों को आतंकित किया था, वहाँ हिन्दू मंच और गोभक्तों को खुला संरक्षण दिया था. इसी के फलस्वरूप ऊना जैसी घटनाएँ हुईं, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात में जाकर घड़ियाली आंसू बहाने पड़े, वह भी इसलिए कि मामला दलितों से जुड़ा था और दलितों ने गुजरात की सड़कों पर मृत गायों को फेंक दिया था. इस घटना पर गुजरात के दलितों ने पूरे देश की राजनीति को उद्वेलित कर दिया था. यह मुद्दा अगर आगे बढ़ता तो आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र के लिए घातक हो सकता था, इसलिए संघ के निर्देश पर प्रधानमंत्री को न केवल दुःख व्यक्त करना पड़ा, बल्कि गुजरात की मुख्यमंत्री को भी हटाना पड़ा. लेकिन अगर यह मामला मुसलमानों से जुड़ा होता, तो निश्चित रूप से न प्रधानमंत्री विरोध करते, और न मुख्यमंत्री हटाई जातीं. क्योंकि सब जानते हैं कि अख़लाक़ और पहलू खान की हत्याओं का प्रधानमंत्री ने कोई विरोध नहीं किया था. यह भी सच है कि दलितों की तरह मुसलमानों ने कोई व्यापक आन्दोलन भी इन घटनाओं को लेकर नहीं किया था, जिसका कारण यही हो सकता है कि भारत का मुसलमान भयभीत है और हिन्दू राष्ट्र की राजनीति से आतंकित है. वह आरएसएस के खिलाफ अपनी सक्रियता का परिणाम जानता है.

क्या इन घटनाओं में साफ-साफ साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता दिखाई नहीं देती है? फिर भी अगर किसी को उसे साम्प्रदायिक और धर्मांध संगठन मानने में परेशानी है, तो वह इसे राम मन्दिर के मुद्दे से समझ सकता है. यह राम लला का मुद्दा क्या है? क्या कोई इतिहासकार या पुराविद ही यह साबित कर सकता है कि राम का जन्म उसी जगह हुआ था, जहाँ बाबरी मस्जिद थी? इतिहास क्या, विज्ञान और पुरातत्व भी यह साबित करने में सक्षम नहीं है कि राम वहीँ पैदा हुए थे. और यह इसलिए कि बुद्ध और महावीर की तरह राम इतिहास से नहीं आते हैं, वह लोक परम्परा से आते हैं. लेकिन आरएसएस के नेता कहते हैं कि राम लला वहीँ पैदा हुए थे, जहां बाबरी मस्जिद है. इसलिए आरएसएस ने हजारों की उन्मादी भीड़ से 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वस्त करवा दी.  उसके नेता कहते हैं कि ‘यह हिन्दुओं की आस्था का सवाल है, इतिहास और पुरातत्व का नहीं है. किन हिन्दुओं की आस्था का सवाल है? तो उत्तर है, आरएसएस के हिन्दुओं की. अब वे फिर मुसलमानों को उत्तेजित करने वाले बयान दे रहे हैं कि ‘मन्दिर बनकर रहेगा, जिसे रोकना है, रोक कर दिखाए’.

1987 में इस तर्क के आधार पर कि हिन्दू शिव तक पहुँच सकते हैं, तो मुसलमान आदम तक क्यों नहीं पहुँच सकते, सैय्यद इमाम बुखारी ने ‘शिव सेना’ के मुकाबले में ‘आदम सेना’ का निर्माण किया था. ‘विश्व हिन्दू परिषद’ की तर्ज पर ‘विश्व मुस्लिम परिषद’ भी 1990 में बना था. आज ये मुस्लिम संगठन कहीं नहीं हैं. क्यों नहीं हैं, इसका जवाब योगी सरकार द्वारा ‘भीम आर्मी’ के किये गए दमन से मिल सकता है.

देशराज गोयल बीती सदी के आठवें दशक में आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्त्ता थे, पर मुस्लिम-विरोध पर उनका मोह भंग हुआ, और शीघ्र ही वह उससे अलग हो गए. उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : साम्प्रदायिकता का गढ़’ नाम से एक पुस्तिका लिखी. उसमें वह लिखते हैं—

‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अवधारणा का मूलाधार ही मुसलमान-विरोध है, वह भी एक उग्र रूप में. मुसलमानों को नृशंस हत्यारे और बलात्कारी बताया गया. हिन्दुओं में उत्तेजना पैदा करने के लिए सारे देश में इस प्रकार की अफवाहें फैलाई गयीं. यदि कभी यह तरीका असफल रहा, तो मुसलमानों द्वारा संभावित हमलों की अफवाहें फैलाई गयीं. एक स्थान पर, जहां लोग इस प्रकार की अफवाहों से उत्तेजित नहीं हो रहे थे, वहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वालों ने खास-खास जगहों पर हाथ से लिखे उर्दू के पोस्टर चिपकाये, ताकि ज्यादा से ज्यादा तादाद में लोग उन्हें पढ़ सकें. इनमें मुसलमानों को भडकाने वाली बातें लिखी गयी थीं और उनसे कहा गया था कि उन्हें हिन्दुओं को मारकर खुदाई नियामत प्राप्त करनी चाहिए.’

     इसके बाद अगर किसी की नजर में आरएसएस साम्प्रदायिक और धर्मांध संगठन नहीं है, तो उसे आरएसएस की उड़ीसा योजना-2008 को याद करना चाहिए, जिसमें कंधमाल जिले में उसके संगठन—विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के हिन्दुओं ने हजारों ईसाई घरों को आग लगाकर राख कर दिया था, जिसमें तीस जानें गयी थीं, और हजारों लोग घर से बेघर हो गए थे. दलितों और मुसलमानों के घरों और लोगों को जलाने की किसी भी प्रतियोगिता में आरएसएस के हिन्दुओं का मुकाबला नहीं किया जा सकता. इस बर्बर काम में वे दुनिया के सबसे ऊँचे ‘सिद्धहस्त पुरुष’ हैं. उड़ीसा के ईसाईयों पर यह वैसा ही बर्बर हमला था, जैसा 2000 में गुजरात में मुसलमानों पर किया गया था. गुजरात में 2000 मुसलमानों का कत्लेआम हुआ था, जिसमें बलात्कार से लेकर गर्भवती महिलाओं के पेट फाड़कर गर्भस्थ शिशुओं तक को भी तलवार से काट दिया गया था. गुजरात में गोधरा का बदला लिया गया था, और कंधमाल में हिन्दू नेता स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती और उनके चार शिष्यों की हत्या का बदला लिया गया था. बदला लेने का विधान सिर्फ आरएसएस के हिन्दुओं के लिए ही बना है, अन्य किसी समुदाय के लिए नहीं. इसलिए आरएसएस की सारी सेनाएं बदला लेने का काम कर सकती हैं, पर ‘भीम आर्मी’ और ‘आदम सेना’ नहीं.

इसलिए यह आरएसएस का सबसे बड़ा झूठ है कि वह साम्प्रदायिक और धर्मांध संगठन नहीं है? (आगे जारी….)