Home पड़ताल मोदी की “धार्मिक-सांस्कृतिक” नेपाल यात्रा के राजनीतिक निहितार्थ

मोदी की “धार्मिक-सांस्कृतिक” नेपाल यात्रा के राजनीतिक निहितार्थ

SHARE
नवम्बर 2014 में मोदी के स्वागत के लिए बना द्वार, 'नेपाली टाइम्स' से साभार

आनंद स्वरूप वर्मा 


प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने बड़े धूमधाम के साथ 3 अगस्त 2014 को नेपाल की यात्रा की थी। वह मोदी के चरम उत्कर्ष का दौर था। देश के अंदर वह जहां भी जाते थे ‘मोदी-मोदी’ की गूँज सुनाई देती। उस समय बड़े-बड़े वायदे थे, बड़ी-बड़ी घोषणाएं थीं और जनता को भी बेतहाशा उम्मीदें थीं। भूटान और नेपाल की यात्रा के बाद मोदी ने दुनिया के विभिन्न देशों की यात्राएं कीं और अधिकांश देशों में उनके दूत पहले से ही जाकर सारी व्यवस्था कर आते थे कि कब और कहां नारे लगने हैं, कहां किस तरह का स्वागत किया जाना है और किस कोण से कैमरों को मोदी को कवर करना है। खासतौर पर सितंबर 2014 में मेडिसन स्क्वायर की रैली से दो महीने पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से राम माधव और ओवरसीज बीजेपी के वैश्विक संयोजक विजय जॉली ने अमेरिका जा कर वहां बसे प्रवासी भारतीयों के बीच जिस तरह काम किया वह तो बड़ी-बड़ी विज्ञापन कंपनियों के लिए भी सीखने लायक है। देश के अंदर भी मीडिया को कैसे ‘मैनेज’ किया जाता है, इसका भी हुनर मोदी ने अपने लोगों को बखूबी सिखाया।

मोदी की दूसरी यात्रा 2014 में ही नवंबर में हुई जब वह सार्क देशों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए काठमांडो पहुंचे। यह यात्रा थोड़ी तल्खी भरी थी। इस यात्रा से पहले मोदी ने अपने एक भाषण के दौरान कहा था कि इस बार नेपाल में बहुत सारे अधूरे काम पूरे करने हैं ‘जो पिछले बीस-तीस वर्षों से रुके पड़े हैं।’ यह यात्रा इस लिए थोड़ी तकलीफदेह थी क्योंकि उन्होंने पहले से तय किया था कि सार्क सम्मेलन में भाग लेने के साथ ही वह जनकपुर, लुंबिनी तथा मुक्तिनाथ की यात्रा पर भी जाएंगे। प्रधानमंत्री कार्यालय ने तय किया था कि मोदी जी सड़क मार्ग से जनकपुर में प्रवेश करेंगे और जानकी धाम मंदिर में राम-सीता विवाह के अवसर पर वहां उपस्थित होंगे। जी न्यूज ने ‘मोदी चले राम के ससुराल’ शीर्षक से एक कार्यक्रम का भी प्रसारण शुरू कर दिया था जिसमें स्क्रीन पर राम, सीता और मोदी की तस्वीर एक साथ दिखायी देती थी और पृष्ठभूमि में एक गीत बजता था- ‘पड़न लागी भांवरिया पिया रघुवर जी के संग’। यह भी कार्यक्रम था कि जनकपुर में एक सार्वजनिक सभा होगी और उस सभा में नेपाल के विकास को ध्यान में रखते हुए कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएं की जाएंगी।

प्रसंगवश, अप्रैल 2014 में ही नेपाल के विराटनगर शहर में हिंदू कार्यकर्ताओं की एक सभा को संबोधित करते हुए विश्व हिंदू परिषद के नेता दिवंगत अशोक सिंघल ने ऐलान किया था कि ‘अगर नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन गए तो नेपाल फिर से हिंदू राष्ट्र बना दिया जाएगा।’ अशोक सिंघल तो एक गैर राजनीतिक संगठन के नेता थे लेकिन कुछ ही साल पहले नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला की अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए जब भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष और भारत के वर्तमान गृहमंत्री राजनाथ सिंह काठमांडो गए थे तो उन्होंने कहा था कि ‘हमें इस बात पर हमेशा गर्व होता रहा है कि नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र है। अगर नेपाल फिर से हिंदू राष्ट्र बन सके तो मुझे सबसे ज्यादा खुशी होगी।’ सत्ता में आने के बाद राजनाथ सिंह यह कहने लगे कि केवल उनके चाहने से नहीं बल्कि नेपाली जनता के चाहने से ही नेपाल फिर हिंदू राष्ट्र हो सकता है। उस समय तक नेपाल का संविधान बना नहीं था लेकिन बनने की प्रक्रिया से गुजर रहा था। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से लेकर अन्य नेताओं ने संविधान में ‘हिंदू राष्ट्र’ शब्दावली डालने के लिए कितना प्रयास किया इसकी एक अलग ही कहानी है। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने विशेष दूत के रूप में तत्कालीन विदेश सचिव जयशंकर को यह काम सौंपा कि वह नेपाल जाएं और नए संविधान की घोषणा करने से वहां के नेताओं को रोकें।

नेपाल स्थित भारतीय राजदूत मंजीव सिंह पुरी जनकपुर में मोदी के आगमन की तैयारी में, ‘नेपाली टाइम्स’ से साभार

बहरहाल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नेपाली शाखा ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ के अलावा ‘सीमा जागरण मंच’ और ‘हिंदू जागरण मंच’ जैसे बहुत सारे छोटे-बड़े संगठन मोदी के स्वागत की तैयारी में जुट गए थे। लेकिन नेपाल में इसका विरोध देखते हुए सड़क मार्ग से जनकपुर जाने के कार्यक्रम पर नेपाल सरकार ने रोक लगा दी। कारण बताया गया कि सुरक्षा को लेकर पर्याप्त तैयारी नहीं हो पा रही है। जनकपुर में होने वाली सार्वजनिक सभा को भी रद्द कर दिया गया क्योंकि माओवादी पार्टी और नेकपा(एमाले) का मानना था कि यह उचित नहीं है। उनकी दलील थी कि सार्क देश का और भी कोई राज्याध्यक्ष अगर यह मांग करने लगे तो क्या हम उसे पूरा करेंगे? मोदी ने सोचा था कि 2015 में बिहार विधानसभा का चुनाव होना है और जनकपुर की सभा से तराई में अपना दबदबा कायम करने के साथ ही बिहार चुनाव के लिए अपने पक्ष में माहौल बनाएंगे। यह भी योजना थी कि उस सभा के बाद छात्रों और नौजवानों को कुछ हजार साइकिलें और पाठ्य सामग्री उपहार में दी जाएगी। उस समय नेपाली कांग्रेस के सुशील कोइराला प्रधानमंत्री थे। कोइराला की मिली-जुली सरकार में एमाले के बामदेव गौतम उप प्रधानमंत्री थे जिन्होंने 13 नवंबर को बहुत साफ शब्दों में कहा कि मोदी की न तो कोई सार्वजनिक सभा होगी और न वह अपनी यात्रा के दौरान किसी तरह का उपहार बांटेंगे। मोदी के लिए यह बहुत तल्ख अनुभव रहा। नतीजतन वह हवाई मार्ग से काठमांडो गए और सार्क सम्मेलन में भाग लेने के बाद वापस दिल्ली लौट आए।

भारत-नेपाल संबंधों की जटिलता का अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव तब सामने आया जब नेपाल ने आंशिक तौर पर धर्मनिरपेक्ष लेकिन पूर्ण रूप से ‘हिंदू राष्ट्र’ शब्दावली को बाहर रखते हुए अपना संविधान जारी किया- मोदी सरकार के विरोध के बावजूद। मधेशी लोगों की मांग का बहाना लेकर किस तरह भारत ने प्रतिशोध की भावना से नेपाल के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी की, किस तरह मधेशी संगठनों ने इस काम में उसका साथ दिया और किस तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. ओली ने इस कठिन समय में नेपाली जनता के अंदर एक ऐसा राष्ट्रवाद पैदा किया जिसके निशाने पर भारत था – इसकी एक अलग ही दास्तान है। बेशक, इस नाकाबंदी ने के.पी. ओली को एक नया जीवन दिया और लोकप्रियता की लहर पर सवार होकर वह आज दो-तिहाई बहुमत के साथ प्रधानमंत्री पद पर आसीन हैं। मोदी ने एक महीने पहले ही भारत बुला कर के.पी. ओली का जबर्दस्त स्वागत किया लेकिन जनकपुर यात्रा रद्द होने की जो गांठ मन में पड़ चुकी थी वह दूर नहीं हो सकी। अब वह मौका आ गया है कि उस हादसे की यादों को समाप्त किया जाए। इस बार की यात्रा में वह सब कुछ होने जा रहा है जो होने से रह गया था। जनकपुर में विशाल सभा का आयोजन किया गया है और काठमांडो में भी नागरिक अभिनंदन की योजना है। मौसम ठीक रहा तो मुक्तिनाथ की भी तीर्थयात्रा हो जाएगी। के.पी. ओली और प्रचंड दोनों हाथ बांधे इस सम्राट की सेवा के लिए तत्पर रहेंगे। जुलाई 2016 में ओली की सरकार गिरा कर और मोदी के साथ अपनी ‘केमिस्ट्री’ मिलने की बात कह कर प्रचंड ने वफादारी का इजहार कर दिया था; अब ओली किसी माकूल अवसर की तलाश में हैं।

पचास साल तक सत्ता में बने रहने का जो भ्रमजाल मोदी ने खड़ा किया है उससे भारत की जनता तो उबरने लगी है लेकिन नेपाल के नेताओं की नींद नहीं टूट रही है। इन नेताओं को शायद इस बात का आभास न हो कि आज मोदी और उनकी पार्टी वह नहीं है जो 2014 में थी। गोरखपुर और फूलपुर में हाल के हुए लोकसभा उपचुनावों में भाजपा की करारी हार की खबर तो नेपाली जनता को भी मिल चुकी होगी लेकिन उन्हें शायद ही यह पता हो कि 2014 से आज तक लोकसभा के जो 23 उपचुनाव हुए हैं उनमें से 19 में भाजपा के उम्मीदवारों को पराजय का सामना करना पड़ा। अब मोदी की सभाओं में मोदी-मोदी चिल्लाने वालों का गला भी बैठ चुका है। भारत की जनता के साथ उन्होंने जितने वायदे किए थे वे सब झूठे साबित हो चुके हैं और यह बात लोगों की समझ में आने लगी है। लोग देख रहे हैं कि किसानों की आत्महत्या, बेरोजगारी का सवाल, काला धन, मंहगाई, पेट्रोल की बेतहाशा बढ़ती कीमतें आदि मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं पर पिछले चार वर्षों में सारी राजनीति लव जेहाद, गाय, बंदेमातरम, भारतमाता के इर्दगिर्द चक्कर लगाती रही। समूचे मुस्लिम समुदाय को राष्ट्रविरोधी चित्रित कर उन्हें दहशत में डाल दिया गया है। वैज्ञानिक सोच के खिलाफ  माहौल तैयार किया जा रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों की सभा में जब देश का प्रधानमंत्री गर्व से कह रहा हो कि गणेश के सूंड़ से पता चलता है कि प्राचीन काल में हमारे यहां प्लास्टिक सर्जरी थी और त्रिपुरा का नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री कहे कि संजय महाभारत युद्ध का विवरण अंधे धृतराष्ट्र को इसलिए बता सके क्योंकि उस समय ही हमारे यहां इंटरनेट था तो आप क्या कहेंगे! इसे जाहिलों की जमात कह कर हल्के में नहीं लिया जा सकता। इतिहास में दर्ज है कि प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन के खिलाफ हिटलर की नाजी पार्टी ने जिन दस आरोपों की सूची तैयार की थी उनमें पहला आरोप था कि उन्होंने सापेक्षता का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उस समय हिटलर समर्थक ‘आर्यन’ वैज्ञानिकों ने ‘यहूदी आइंस्टीन’ के समर्थकों को राष्ट्रविरोधी करार दिया था। उस समय भी यही लगता था कि समूचे कुएं में भांग पड़ी है। वहां हालात हिंसक तरीके से बदले क्योंकि जनतंत्र को हिटलर ने अगवा कर लिया था। भारत में अभी वैसी हालत नहीं है। पिछली बार उत्तर प्रदेश से मिली 70 सीटों ने भाजपा को प्रबल बहुमत दिला दिया था जो अब सपा-बसपा की एकजुटता से संभव नहीं है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी हालत खराब है। पचास साल की तो बात दूर, 2019 में भी सरकार बनाना मुश्किल है।

12 मई को कर्नाटक के चुनाव होने हैं और 10 मई के बाद चुनाव प्रचार रोक दिया जाएगा। 11 मई को जनकपुर में होने वाली अपनी सभा के माध्यम से टेलीविजन का सहारा लेकर मोदी कर्नाटक के चुनाव प्रचार के मौके का इस्तेमाल कर लेंगे। 2014 की बात ही कुछ और थी। आज नेपाल के लोग नाकाबंदी के दर्द को भूल नहीं सके हैं और जनता के एक बहुत बड़े हिस्से से यह मांग उठ रही है कि अपनी इस यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी नाकाबंदी के लिए नेपाल की जनता से माफी मांगें। वैसे, 2015 में जब नेपाल भीषण भूकंप की त्रासदी झेल रहा था उस समय भारत ने सहयोग तो किया लेकिन उस सहयोग का स्वरूप कुछ ऐसा था कि नेपाली जनता ने सोचा कि यह सहयोग नहीं मिला होता तो ज्यादा बेहतर रहता। भारत के एक टेलीविजन चैनल ने नेपाल को जा रही राहत सामग्री के साथ अपने स्क्रीन पर मोदी की तस्वीर दिखाई और बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा – ‘रक्षक’। एक अन्य चैनल ने मोदी की तस्वीर के साथ लिखा – ‘नेपाल का रक्षक’। जब हद हो गई तो नेपाल के कांतिपुर रेडियो ने एक रिपोर्ट जारी की जिसका शीर्षक था – ‘उद्धारभंदा प्रचार बढ़ी’ मतलब राहत के बहाने अपना प्रचार। 29 अप्रैल 2015 को नई दिल्ली से प्रकाशित ‘जनसत्ता’ में पुष्परंजन ने ‘ऐसी सहायता पर मुग्ध मत होइए’ शीर्षक लेख में भारत के रवैए की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि भाजपा के कुछ नेता इसे ‘विजय अभियान’ के रूप में भुनाने लगे हैं और इससे उनके सारे किए पर पानी फिरने का खतरा बना हुआ है।

ये सारी यादें नेपाली जनता के मन से गयी नहीं हैं और इन यादों को नाकाबंदी ने और भी ज्यादा जहरीला बना दिया है। नेपाल का व्यापक जनमत इस पक्ष में नहीं है कि ऐसे व्यक्ति का नागरिक अभिनंदन किया जाय जिसने नेपाल के नागरिकों को इतने बुरे दिन दिखाए हों। नेपाल के मौजूदा गृहमंत्री रामबहादुर थापा ने भले ही यह कहा हो कि मोदी की इस बार की यात्रा महज धार्मिक और सांस्कृतिक है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस यात्रा के दौरान कुछ जल विद्युत परियोजनाओं को भी अंतिम रूप दिया जाना है। सच्चाई क्या है यह दोनों देशों की सरकारें ही बता सकती हैं। लेकिन एक बात तय है कि भारत के धूर्त, निर्मम और कॉरपोरेट घरानों के हितों की रक्षा करने वाले सत्ताधारी वर्ग के प्रतिनिधि नरेंद्र मोदी से अगर नेपाल की जनता यह उम्मीद कर रही हो कि वह उन्हें आर्थिक तौर पर शक्ति संपन्न बनाएंगे तो यह एक बहुत बड़ा भ्रम साबित होगा।



लेखक वरिष्ठ पत्रकार और तीसरी दुनिया के मामलों के जानकार हैं तथा मीडियाविजिल के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य हैं 

LEAVE A REPLY