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बीएचयू में एनेस्थीसिया सेवा बंद थीं, लेकिन प्रशासन का दावा कि ऑपरेशन हुए !

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ऐसा लगता है कि बीएचयू और विवादों का चोली-दामन का साथ है। बीएचयू वालों के कारनामे ही ऐसे हैं। नया विवाद है एक मंत्री जी के स्वागत में बीएचयू के अस्पताल में ऑपरेशन टाले जाने का। दरअसल, एक कार्यक्रम के मद्देनज़र 27 और 28 अक्टूबर को एनेस्थीसिया सेवाएं बंद करने का फ़ैसला किया गया था। लेकिन जब इस सिलसिले में अख़बारों में ख़बर छपी तो बीएचयू ने खंडन कर दिया। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या बीएचयू में बिना एनेस्थीसिया के ऑपरेशन हुए ?

इस दिलचस्प क़िस्से या बीएचयू में जारी उलटबाँसी की शुरुआत होती है 20 अक्टूबर को। विभागाध्यक्ष की ओर से 27 ,28 और 29 अक्टूबर को बीएचयू में इंडियन कॉलेज ऑफ एनेस्थेसियोलॉजिस्ट्स की नवीं वार्षिक कान्फ्रेंस का हवाला देते हुए  27 एवं 28 अक्टूबर को एनेस्थीसिया सेवाएँ बंद करने का निर्देश जारी किया गया । निर्देश में साफ़ कहा गया कि उस दिन तय ऑपरेशनों को पहले या बाद की तारीख़ दे दी जाए।

27 अक्टूबर को अख़बारों ने लिखा कि मंत्री के स्वागत की वजह से बीएचयू में तमाम ऑपरेशन टाल दिए गए हैं। उन्होंने लिखा कि एनेस्थीसिया विभाग के कार्यक्रम की वजह से मरीज़ों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। 26 अक्टूबर को ऑपरेशन के लिए बीएचयू अस्पताल पहुँचे मरीज़ों को नई डेट देकर लौटा दिया गया है।

लेकिन बीएचयू प्रशासन ने अख़बारों को झूठा क़रार दिया। शाम होते-होते उसने खंडन के साथ 27 अक्टूबर को हुए ऑपरेशनों का ब्योरा जारी किया ।

 

ऐसे में सवाल ये है कि ये ऑपरेशन किस तरह किए गए ? अगर एनेस्थीसिया सेवाएँ बंद थीं तो फिर ये ऑपरेशन हुए कैसे ? बिना एनेस्थीसिया ऑपरेशन तो चमत्कार ही हैं। या फिर बीएचयू ने कोई जुगाड़ टेक्नोलॉजी ईजाद की है कि बिना संज्ञाशून्य किए ही मरीज़ की चीर-फाड़ कर दी जाए। अगर ऐसा है तो बीएचयू को इसकी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।

वरना ये सवाल तो बना ही रहेगा कि आख़िर बिना एनेस्थीसिया के 27 अक्टूबर को बीएचयू में ऑपरेशन हुए कैसे ?



 

2 COMMENTS

  1. पहली सूचना में लिखा है कि इमरजेंसी, ओटी, आईसीयू और ओपीडी सर्विसेज चलेंगी। अगर कई लोगों की टीम हो, सब किसी आयोजन में लगे हों तो इस तरह की पूर्व सूचना देना व्यावहारिक है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि कोई ड्यूटी पर रहेगा ही नहीं। एक एनेथथेसिस्ट कई ऑपरेशन में सहायक हो सकता है और अस्पताल के विभिन्न विभागों में जाकर काम कर सकता है। मुमकिन है अस्पताल का दावा सही हो। या खबर बहुत बढ़ा-चढ़ाकर लिखी गई हो। बगैर किसी भुक्तभोगी या चश्मदीद के अटकल ही लगाई जा सकती है। मैंने खबर नहीं पढ़ी।

  2. अखबार की खबर भी इस मामले में चुप है। एक भी मरीज, भुक्तभोगी का नाम नहीं है. ना खबर में पहले वाली चिट्ठी का हवाला है ना खबर में किसी अधिकारी का पक्ष लिया गया है। यह अस्पताल की आपसी रणनीति का नतीजा लगता है।

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