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वर्गीकरण को OBC एकता तोड़ने की साज़िश बताने वाले बौद्धिक पसमांदा विरोधी और सवर्णवादी हैं!

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दिल्ली की पसमांदा रैली, अप्रैल 2016, साभार raiot.in
अमर उजाला दैनिक में 13 मई को पत्रकार दिलीप मंडल का एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसका शीर्षक है, “जातियों के नए बंटवारे से पहले ठहरिये”. इसमें लेखक ने दलील दी थी कि जातियों की संख्या और राजकाज में उनकी हिस्सेदारी के आधिकारिक आंकड़ों के बिना जातियों के संतुलन को छेड़ना उचित नहीं होगा. फेसबुक पर पोस्ट किये गए इस लेख के जवाब में कई प्रतिक्रियाएं आयीं जिनमें एक जेएनयू के शोध छात्र विश्वम्भर नाथ प्रजापति की भी थी. प्रजापति बहुजन साहित्य संघ से जुड़े हैं और उन्होंने मंडल के लेख का सन्दर्भ लेते हुए एक स्वतंत्र लेख मीडियाविजिल को भेजा है जिसमें उन्होंने यूपी की अतिपिछड़ा जातियों और पसमांदा मुसलमानों पर चिंता जताते हुए जातियों के वर्गीकरण को वक़्त की ज़रूरत करार दिया है. (संपादक)

विश्वम्भर नाथ प्रजापति 


उत्तर प्रदेश में ओबीसी वर्गीकरण एक बहुत बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा रहा है. वर्तमान सरकार ओबीसी को तीन हिस्सों में विभाजित करके उन सभी जातियों तक रिजर्वेशन पहुंचना चाहती है जिसको इसका लाभ कम मिला या फिर बिलकुल ही नहीं मिला. उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है. संख्यागत रूप से उत्तर प्रदेश में ओबीसी की संख्या करीब 54% मानते हुए 27% रिजर्वेशन दिया गया. अभी सरकार इसको तीन हिस्सों में बांटना चाहती है: पिछड़ी, अतिपिछड़ी और सर्वाधिक पिछड़ी जाति. अब ऐसे में तथाकथित सामाजिक न्याय के झंडाबरदारों को बहुत दिक्कत हो रही है. ऐसे लोगो का मानना है कि ओबीसी की एकता तोड़ने की यह साजिश है. कुछ ऐसा ही तर्क ओबीसी रिजर्वेशन के वक़्त सवर्ण दे रहे थे.

उत्तर प्रदेश की ओबीसी की जाति संरचना बिहार से ही मिलती जुलती है. बिहार में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व 1978  में ही ओबीसी का वर्गीकरण दो हिस्सों में कर दिया गया. उत्तर प्रदेश में यह अभी होना बाकी है. ओबीसी में कम से कम तीन वर्ग तो साफ़-साफ़ दीखते हैं- एक वो जातियां जिनके पास जमीनें रही हैं और जिनको मज़दूरी करने की कोई ज़रूरत नहीं थी और सामाजिक प्रस्थति में कृषक का जो स्थान है वही था. दूसरी वे जातियां जिनके पास जमीन या तो बिल्कुल कम थी या थी ही नहीं लेकिन उनके पास परम्परागत कौशल जैसे कि बुनकर का काम, बर्तन बनाने का काम, लोहे-लकड़ी का काम, मछली पकड़ने, बालू निकालने का काम, घर बनाने का काम था. उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के दौर में उन्होंने अपना कौशल खो दिया. तीसरी एक और श्रेणी जो काफी अदृश्य है, वह उन दलित मुसलमानों की थी जो काम तो दलितों का ही करते थे लेकिन राजनीतिक और धार्मिक भेदभाव के चलते दलित में न शामिल करके ओबीसी में ही धकेल दिए गए. बाकी की दो श्रेणियों की हालत सबसे ज्यादा ख़राब है क्योंकि न तो इनके पास पर्याप्त जमीनें थीं न ही बदलते परिवेश में  ये अपने कौशल को बचा पाए और सत्ता से तो ये हमेशा से ही दूर रहे.

दिलीप मंडल का लेख, अमर उजाला, 13 मई 2018

अब ऐसे में एक हल ये हो सकता था कि मुख्यधारा में इन्हें लाने के लिए ओबीसी आरक्षण का विभाजन किया जाय. हालाँकि यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि जब तक बुनाई और रंगाई का पूरा कारोबार  बुनकरों और रंगरेजों के हाथ में, कुम्हारों कला को कॉर्पोरेट के हाथ से बचाकर कुम्हारों के हाथ में, मत्स्यपालन का कारोबार मल्लाह के हाथ में लाने के लिए राज्य जब तक नीतियां नहीं बनाता है तब तक केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं होगा. तीसरा समाधान यह कि दलित मुसलमानों को 1950 के प्रेजिडेंट आर्डर को बदलते हुए अनुसूचित जाति में लाया जाय क्योंकि दलित मुसलमानों को दोहरी मार पड़ रही है. एक तो दलित होने का दूसरा मुसलमान  होने का. इसलिए इनके साथ न्याय तभी होगा जब इनको बाकी धर्म के दलितों के समान ही अधिकार मिले. लेकिन यहाँ पर हम अपने आप को ओबीसी  वर्गीकरण तक सीमित रखते हैं.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओबीसी में भी कम से कम तीन श्रेणियाँ हैं : एक वह श्रेणी जो सत्ता में ठीक-ठाक संख्या में पहुंची, जिसने अपने मंत्री-विधायक, थानेदार, पुलिस बनाए और सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों व मेडिकल संस्थानों में पहुंची और जिनके स्तर में भी काफी सुधार आया. दूसरी वे जातियां जो सरकारी नौकरियों में पहुंचीं, शिक्षण संस्थानों में भी पहुंचीं, जिनके कुछ लीडर भी होने लगे लेकिन अपेक्षाकृत कम. तीसरी  जातियां जिनका कोई नेतृत्व नहीं था सरकारी नौकरियों में, खासकर ए श्रेणी की नौकरियों में स्थिति नदारद थी, जो डिसीजन-मेकिंग से बाहर थे,  जिनके यहाँ थानेदार मिलना मुश्किल था और जीवनस्तर में जिनके कोई सुधार भी नहीं आया था. यह तीसरी श्रेणी ही पसमांदा मुसलमानों को भी अपने में जोड़ती है. इन सब तथ्यों को ध्यान में रखकर कई कमीशन भी बने और उन्होंने अपने सुझाव भी दिए. यह ध्यान देने योग्य बात है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की आबादी 19% के आसपास है जिसमें 15%आबादी पसमांदा मुसलमानों की है जिनका धार्मिक विश्वास तो इस्लाम का रहा लेकिन उनकी हालत हिन्दुओं की अन्य दबी कुचली जातियों के ही समान रही.

1975 में छेदीलाल साथी कमीशन बना जिसके अध्यक्ष छेदीलाल साथी थे. मलखान सिंह सैनी और सीताराम निषाद इसके सदस्य थे. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 17 मई 1977 को सरकार को दी जिसमें बताया कि करीब 41 जातियां ‘मोस्ट बैकवर्ड कास्ट’ जो कि उत्तर प्रदेश की जनसंख्या का 26 प्रतिशत है, उनके लिए सरकारी नौकरियों में 17 प्रतिशत आरक्षण का सुझाव दिया. कमीशन ने ‘अपर बैकवर्ड कास्ट’ जिसमें  12 जातियां थीं और राज्य की जनसंख्या का 20 प्रतिशत, उनके लिए सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण का सुझाव दिया. इसी कमिटी ने ‘मुस्लिम बैकवर्ड कास्ट’ के लिए 2.5 प्रतिशत आरक्षण के लिए भी कहा. इतना ही नहीं, इस कमीशन ने फ्री एजुकेशन, फ्री हॉस्टल, स्कालरशिप, शिक्षण संस्थानों में आरक्षण और लघु उद्योगों को स्थापित करने के लिए सरकारी सहयोग की भी वकालत की. इसके साथ ही पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व को लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधानपरिषद और सरकारी आयोगों में सुनिश्चित करने के लिए कहा. इस कमीशन का क्या हुआ? इस पर सरकारों ने क्या कार्रवाई की, यह कभी भी चर्चा का विषय नहीं रहा.

28 जून 2001 को उत्तर प्रदेश सरकार में संसदीय मामलों के मंत्री हुकुम सिंह के नेतृत्व में एक सोशल जस्टिस कमिटी बनी जिसके सदस्य रमापति शास्त्री (स्वास्थ्य मंत्री) और दया राम पाल (सदस्य यूपी विधानपरिषद) थे. 15 सितम्बर 2001 को उत्तर प्रदेश सरकार इस कमिटी की रिपोर्ट को  एक्स्ट्राऑर्डिनरी गजट के रूप में लेकर आयी. इस कमिटी ने भी ओबीसी वर्गीकरण का सुझाव दिया ताकि रिजर्वेशन का फायदा निचले तबके तक पहुंचे, जिसने बताया कि तीन शेडूल (ए,बी,सी) को विभाजित किया जाय. पहले शेडूल ‘ए’ (अदर बैकवर्ड कास्ट) में एक जाति थी जिसके लिए 5% रिजर्वेशन, शेडूल ‘बी’ (मोर बैकवर्ड कास्ट) में 8 जातियां थीं जिनके लिए 8% रिजर्वेशन और शेडूल ‘सी’ (मोस्ट बैकवर्ड कास्ट) में सबसे ज्यादा 70 जातियां रखी गयीं जिसके लिए 14% रिजर्वेशन का प्रावधान किया गया. इसी शेडूल ‘सी’ में मुस्लिमों की 22 जातियां थीं. यानी पसमांदा मुसलमानों को शेडूल ‘सी’ में रखा गया जिसमें सर्वाधिक पिछड़ी जातियां शामिल थीं. सोशल जस्टिस कमिटी रिपोर्ट में ही बताया गया कि कुछ जातियों का प्रतिनिधित्व सरकारी नौकरियों में उनके अनुपात से ज्यादा था जैसे अहीर/यादव, जो कि ओबीसी की जनसंख्या का 19% था. सरकारी नौकरियों में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत थी. कुर्मी, जो कि ओबीसी की जनसँख्या के कुल 7.46 प्रतिशत थे, उनका प्रतिनिधित्व 12.49 प्रतिशत था जबकि शेडूल ‘सी’ में शामिल  जातियों का प्रतिनिधित्व ओबीसी में उनकी संख्या से कम था- जैसे केवट/मल्लाह की जनसंख्या 4.33 प्रतिशत थी जबकि सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व केवल 1.36 प्रतिशत, मोमिन/अंसार की जनसंख्या 4.15 थी लेकिन सरकारी नौकरी में उनका प्रतिनिथित्व केवल 2.28 प्रतिशत था. यही हालत शेडूल ‘सी’ की सभी जातियों की थी.

वर्तमान समय में इस वर्गीकरण का सबसे उग्र विरोध ओबीसी का ही एक सेक्शन कर रहा है जिसका मानना है कि बीजेपी ओबीसी को तोड़ने की साजिश कर रही है. ये सबसे बेतुका तर्क है क्योंकि जब 1931 की जातिगत जनगणना के आधार पर ही ओबीसी को रिजर्वेशन मिल सकता है तो अतिपिछड़ा और पसमांदा को क्यों नहीं मिल सकता है. यह बात भी हमें ध्यान रखने की ज़रूरत है कि बिहार और तमिलनाडु जैसे सामाजिक न्याय के अग्रणी राज्यों ने यह वर्गीकरण पहले से ही कर रखा है. खासकर कर्पूरी जी के नेतृत्व में अतिपिछड़ों को एक पहचान मिली जिनके फॉर्मूले को बाद के कई राज्यों ने अपनाने की कोशिश की.

दूसरी बात इस वर्गीकरण का विरोध करने वाले ज्यादातर वह लोग हैं जो शेडूल ‘ए’ में हैं जिनको रिजर्वेशन का फायदा मिला और अब इस पोजीशन में है कि सत्ता का स्वाद ले सकें, लेकिन उन्हें अब डर है कि कहीं वर्गीकरण से उनका दबदबा कम न हो जाए! तीसरी बात, छेदीलाल साथी कमीशन तो हेमवती नंदन बहुगुणा के सरकार में बना था जिसने ओबीसी को दो हिस्सों में विभाजित कर प्रतिनिधित्व की बात की. चौथी बात, 2001 से 2017 के बीच लम्बे समय तक सपा-बसपा का शासन रहा है जो अपने आप को दलित-पिछड़ा-मुसलमान का नुमाइंदा मानते हैं तो क्या इनको कभी इन जातियों की फ़िक्र नहीं हुयी? पांचवीं बात, 17 अतिपिछड़ी जातियों (मुख्यता मछुआ की उपजातियां) के साथ 1950 से ही धोखा हुआ है जिन्हें अनुसूचित में शामिल करने का बेमन से प्रयास सपा, बसपा, कांग्रेस कर चुके हैं और अब बीजेपी कर रही है.

अंतिम और सबसे अहम बात ये कि अगर बीजेपी इस मुद्दे को तूल दे रही है तो क्या अतिपिछड़ों और पसमांदा को चुपचाप बैठ जाना चाहिए और इंतज़ार करना चाहिए कि सपा-बसपा सत्ता में आये और फिर इस मुद्दे को अगले 20 साल के लिए दफ़न कर दे? सपा-बसपा तो वोट हमेशा दलित-पिछड़ा-पसमांदा का लेते रहे हैं लेकिन एक बार भी यह जानने की इन्होंने कोशिश नहीं की कि इन अतिपिछड़ी और पसमांदा जातियों का हाल क्या है. यह कहने की बात नहीं है कि अभी भी सपा-बसपा का गठबंधन अपने अस्तित्व को बचाने के लिए है. इस गठबंधन में कांशीराम, कर्पूरी ठाकुर या आंबेडकर का विज़न कही नहीं है. जब इस गठबंधन में विज़न ही नहीं है तो अतिपिछड़ों और पसमांदा को कुछ भी  इनसे मिलने वाला नहीं है.

जातिगत जनगणना के पक्ष में अतिपिछड़ा और पसमांदा हमेशा साथ में है लेकिन इसकी कीमत वर्गीकरण को रोककर या देरी करके होती है तो हमें स्वीकार नहीं है! जो ओबीसी वर्गीकरण के साथ नहीं है वह अतिपिछड़ों और पसमांदा के खिलाफ है. शासन-प्रशासन, सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में अतिपिछड़ा और पसमांदा का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए ओबीसी वर्गीकरण अतिआवश्यक है.


लेखक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर साइंस पालिसी में रिसर्च स्कॉलर हैं और बहुजन साहित्य संघ के
केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं 

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