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अडानी के घपले की जाँच भी ना होगी ! ये ‘मोदी-कृपा’ की इंतेहा है !

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गिरीश मालवीय

आप को याद होगाकि कुछ दिनों पहले ब्रिटिश अखबार द गॉर्डियन ने अडानी समूह के विषय में एक बड़ा खुलासा किया था , उन्होंने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि भारतीय कस्टम विभाग के (डीआरआई) ने मशहूर कारोबारी घराने अडानी समूह पर फर्जी बिल बनाकर करीब 1500 करोड़ रुपये टैक्स हैवेन देश में भेजने का आरोप लगाया है, गॉर्डियन के पास मौजूद डीआरआई के दस्तावेज के अनुसार अडानी समूह ने महाराष्ट्र की एक बिजली परियोजना के लिए शून्य या बहुत कम ड्यूटी वाले सामानों का निर्यात किया और उनका दाम वास्तविक मूल्य से कई गुना बढ़ाकर दिखाया ताकि बैंकों से कर्ज में लिया गया पैसा विदेश भेजा जा सके

एक स्वतंत्र मीडिया समूह की इस रिपोर्ट से  कायदे से तो भारत में हंगामा मच जाना चाहिए था लेकिन मामला मोदी जी के सबसे करीबी कारोबारी घराने का था इसलिए इस मामले की नये सिरे से जांच करना तो दूर रहा बल्कि जो कार्यवाही  चल रही थी उसे भी रोक दिया गया है ताकि किसी भी तरह से अडानी समूह को बचाया जाए

ताजा खबर आयी है कि डॉयरेक्टरेट ऑफ रेवन्यू इंटलीजेंस  (डीआरआई) ने कर चोरी के मामले में अडानी ग्रुप के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रोक दिया है। डीआरआई के अतिरिक्त महानिदेशक के वी एस सिंह ने एक आदेश जारी कर अडाणी ग्रुप के खिलाफ चल रही जांच को रोकने का निर्देश दिया है अडानी ग्रुप पर बिजली और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए आयात किए गए सामानों का कुल मूल्य बढ़ाकर 3974.12 करोड़ रुपये घोषित करने और उस पर शून्य या कम 5% से कम टैक्स देने के आरोप हैं।

राजस्व खुफिया निदेशालय के मुंबई क्षेत्राधिकार के एडीजी के वी एस सिंह ने 280 पन्नों के अपने रिपोर्ट में 22 अगस्त को लिखा है, “मैं विभाग के उस मामले से सहमत नहीं हूं जिसमें कहा गया है कि एपीएमएल (अडानी पावर महाराष्ट्र लिमिटेड) और एपीआरएल (अडानी पावर राजस्थान लिमिटेड) ने अपनी संबंधित इकाई यानी ईआईएफ (इलेक्ट्रॉजन इन्फ्रा होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड) को कथित विवादित सामान आयातित मूल्य से अधिक अधिक मूल्य पर दिया है।”इस आदेश की समीक्षा  30 दिनों के अंदर मुंबई और अहमदाबाद के चीफ कस्टम कमिश्नर्स की एक कमिटी करेगी लेकिन इस आदेश से सरकार की नीयत का तो पता चल ही जाता है

आप समझने की कोशिश कीजिये कि अदानी समूह पर आज देश भर सरकारी जांच एजेंसियों व्दारा ही कितने मामलो की जांच चल रही है और उन सभी जांचो को अलग अलग कर के दबाया जा रहा है एक आम व्यक्ति के बैंक संव्व्यहवार के संदर्भ में बैंक कितनी आसानी से सुचनाए सरकारी विभागों को दे देते है लेकिन बात जब बड़े घरानों की आती है तो यह बैंक सारे नियम कायदे बताने लगते है

साल 2016 में तीन सरकारी बैंकों ने डीआरआई को कोयला आयात के मामले में अग्रणी बिजली कंपनियों के लेनदेन की जानकारी देने से इंकार कर दिया था।  इसके पीछे बैंकों ने गोपनीयता मानदंडों का हवाला दिया था। इन मामलों में राजस्व सचिव हसमुख अधिया ने जाँच में सहयोग करने की अपील भी की थी लेकिन तब भी बैंक नहीं माने लेकिन इसके बाद भी डीआरआई ने इनका पीछा नहीं छोड़ा और उसने  सिंगापुर, दुबई और हांगकांग में एलआरएस जारी किए . जिसमे शीर्ष बिजली कंपनियों द्वारा लेन-देन से संबंधित सरकारी बैंकों की विदेशी शाखाओं के साथ दस्तावेजों के सम्बन्ध में मदद मांगी थी. ये दस्तावेज ज्यादातर सिंगापुर शाखाओं से संबधित थे. पिछले साल डीआरआई अधिकारियों की एक टीम ने एलआरएस में तेजी लाने के लिए सिंगापुर का दौरा किया था, इस सन्दर्भ में डीआरआई की जाँच से परेशान होकर अडानी ग्रुप की सिंगापुर स्थित कंपनी, अडानी ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड ने सिंगापुर की हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अदालत में अडानी ग्रुप ने दरख्वास्त दी कि वह उन दस्तावेजों के उपलब्ध कराने पर रोक लगाए जो डायरेक्टरेट ऑफ़ रेवेन्यू इंटेलीजेन्स (DRI) द्वारा मांगे गए थे। डीआरआई ने अडानी ग्रुप की इंडोनेशिया स्थित कंपनियों के कोल इम्पोर्ट से सम्बंधित बैंकों के लेनदेन के दस्तावेजों की जानकारी मांगी थी. सूत्रों के अनुसार सिंगापुर की निचली अदालत ने डीआरआई से मिले पत्र (एलआर) के बाद इन दस्तावेजों के लिए कहा था

आखिर में जेसे ही फँसने की बारी आती है हमेशा से अडानी ग्रुप को एक सेफ पैसेज दे दिया जाता है क्योकि मोदी सरकार में उसकी तूती बोलती है और अडानी को यह पोजीशन मोदीराज में आज से नही मिली है नरेन्द्र मोदी जब 2002 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो गौतम अडानी का लगभग 3,750 करोड़ रुपये का कारोबार था. मोदी ने जब 2014 में केन्द्र की सत्ता संभाली तो अदानी का कारोबार 20 गुना बढ़कर लगभग 75,660 करोड़ रुपये पर पहुंच चुका था. एक जगह अडानी ने  खुद दावा किया था  कि इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में बड़ा कारोबार करने के लिए सरकार का करीबी होना बेहद जरूरी है अब इसे अडानी समूह की 12 साल की कड़ी मेहनत कह लें या फिर राज्य के इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में सरकार का बेहद करीबी होने का फायदा, जैसा अदानी खुद दावा करते हैं गुजरात सरकार पर अडानी समूह को भारत के सबसे बड़े बंदरगाह मुंदड़ा के लिए बड़े पैमाने पर कौड़ियों के भाव जमीन देने के भी आरोप लगते रहे हैं लेकिन कभी ढंग से जांच ही नहीं की गयी

साल 2013 में 13 सितंबर को जब बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को अपना पीएम उम्मीदवार घोषित किया था, तब से साल 2014 के शुरुआती महीनों में ही अडानी ग्रुप की 3 लिस्टेड कंपनियों- अडानी इंटरप्राइजेज, अडानी पोर्ट, और अडानी पावर का टोटल मार्केट कैपिटलाइजेशन 85.35 पर्सेंट बढ़कर 95,925 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का हो गया था

पत्रकार जोसी जोसेफ़ ने ‘अ फीस्ट आॅफ वल्चर्स’ नाम से एक किताब लिखी  हैं. इस किताब में बताया गया है कि बिजनेस घराने किस तरह से भारत के लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं

जोसेफ़ एक जगह लिखते है कि, सुप्रीम कोर्ट की बनाई एसआईटी के सामने भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा मामला अडानी ग्रुप का आया है. और उसे प्रत्यर्पण निदेशालय के विश्वसनीय सूत्रों ने बताया है कि अगर सही जांच हो जाए तो अडानी समूह को 15 हज़ार करोड़ रुपये का जुर्माना भरना पड़ सकता है

लेकिन इस देश में कुछ नही होता



लेखक इंदौर (मध्यप्रदेश )से हैं , ओर सोशल मीडिया में सम-सामयिक विषयों पर अपनी क़लम चलाते रहते हैं ।



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