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मोदी का डंका बजाकर नीति आयोग के बॉस बने राजीव कुमार से कब होंगे सवाल ?

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गिरीश मालवीय

एक क्लास में टीचर बच्चों को पढ़ा रही है …….

टीचर बच्चों से कहती हैं बताओ बच्चों हमारे नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया जी कौन सी किताब लिखी थी ?

एक बच्चे ने जवाब दिया- मैडम उन्होंने ‘इंडियाज ट्रस्ट विद् डेस्टिनी : डिबंकिंग मिथ्स दैट अंडरमाइन प्रोग्रेस एण्ड एड्रसिंग न्यू चैलेंजिज’,

मैडम कहती हैं– वेरी गुड बेटा,….बच्चों …इस किताब में मोदी जी की तारीफ करते हुए पहली बार ‘गुजरात मॉडल’ का जिक्र किया गया था … अच्छा बच्चों बताओ, हमारे नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष का नाम क्या है ?

बच्चे समवेत स्वर में बोले-  मैडम राजीव कुमार..

मैडम बोली –  अरे वाह, तुम लोग तो बहुत अपडेट रहते हो, बताओ उन्होंने कौन सी किताब लिखी है?

बच्चे बोले– मैडम उन्होंने ‘मोदी एंड हिज चैलेंजेज’, ‘रिसर्जंट इंडियाः आइडियाज एंड प्राइरिटीज’ तथा एक्सप्लोडिंग एसपिरेशंजः अनलोकिंग इंडियाज फ्यूचर’ जैसी किताबे लिखी हैं.

मैडम- अरे वाह बच्चों! तुम्हे तो सब पता है.. अच्छा बताओ इन बातों से तुम्हे क्या सीख मिली ?

एक बच्चा बोला– मैडम इस से यही सीख मिलती है कि नीति आयोग का उपाध्यक्ष बनने के लिए किताब लिख कर मोदी जी तारीफ करनी होगी !

इतना सुनते ही मैडम बेहोश हो गईं!

मैडम तो बेहोशी से होश में आ जायेगी लेकिन हमारे देश का कारोबारी मीडिया बेहोश ही बना रहेगा । उसे कब होश आएगा कि एक दिन अपनी झुकी हुई रीढ़ की हड्डी सीधी करते हुए वह सरकार से सवाल करे कि नोटबन्दी का आखिर नतीजा क्या निकला ?

राजीव कुमार को नीति आयोग का अध्यक्ष बना दिया जाता है। राजीव जी, अब शायद इकलौते अर्थशास्त्री बचे हैं जो शुरू से नोटबन्दी जैसे निर्णय में सरकार के साथ खड़े हुए है।  इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार नोटबन्दी के बाद वित्त सम्बन्धी संसदीय समिति की बैठक में मनमोहन सिंह ने नोट बंदी के फैसले में आरबीआई की स्वायत्तता पर सवाल उठाया।  इस बैठक में मनमोहन सिंह ने आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल की हाजिरी पर भी जोर दिया था और उन्होंने यह भी कहा था कि इस बैठक में कोई सरकारी अफ़सर मौजूद न रहे।

इसके बाद 19 जनवरी की बैठक मे चार स्वंतत्र विशेषज्ञों को भी बुलाया गया।  विशेषज्ञों में अर्थशास्त्री राजीव कुमार और महेश व्यास, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एंड पॉलिसी की कविता राव और पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणव सेन शामिल थे। खबर ये आयी थी कि चार में से तीन विशेषज्ञों ने नोट बंदी के खिलाफ अपना पक्ष रखा था ओर जो नोटबन्दी के समर्थन में था वह आज देश के नीति आयोग का उपाध्यक्ष बन गया है। नोटबन्दी के समर्थन में राजीव कुमार मार्च 2017 में एक लेख लिखते हैं जिसमे वह कहते हैं–

‘मोदी और उनकी नीतियों के विरूद्ध की गई हर भविष्यवाणी ना सिर्फ गलत साबित हुई है बल्कि सच्चाई से उनका दूर-दूर तक कोई रिश्ता दिखाई भी नहीं पड़ता। मेरे अनुमान के हिसाब से 2017-18 में जीडीपी विकास दर, 2016-17 के मुकाबले अधिक ही रहेगा क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था फिर से उठ रही है और घरेलू निवेश भी बढ़ेगा। निर्यात के क्षेत्र में असंगठित क्षेत्र का योगदान महत्वपूर्ण होता है और अक्टूबर 2016 से निर्यात में बढ़ोतरी हो रही है।’

आज उनके दावों की ओर देश के बाजार की स्थिति किसी से छुपी हुई नही है साफ बात यह है कि स्वंतत्र रूप से सोचने वालो की जगह ऐसे लोगो को सरकार में महत्वपूर्ण पद दिए जा रहे हैं, जो येन केन प्रकारेण अपने पक्ष को सही साबित कर सके हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ अंधो की जगह अंधेरो की जय बोली जा रही है



लेखक इंदौर मध्यप्रदेश से है, ओर सोशल मीडिया में सम-सामयिक विषयों पर अपनी कलम चलाते रहते हैं .



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