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“बालिका वधू” के लिए आँसू बहाने वाले “ब्राह्मणवादी” मीडिया को डेल्टा मेघवाल की मौत नहीं दिखती !

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बीकानेर में दलित छात्रा डेल्टा मेघवाल की संदिग्ध मौत के ख़िलाफ़ बंगलुरु तक में धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन बालिका वधू की आनंदी की ख़ुदकुशी पर आकाश-पाताल एक कर देने वाले कथित मुख्धारा के मीडिया के लिए तो जैसे यह ख़बर ही नहीं है। नतीजा यह है कि मीडिया के जातिवादी चरित्र पर हर तरफ उंगलियाँ उठ रही हैं। कहा जा रहा है कि यह ब्राह्मण-बनिया मीडिया है जिसकी नज़र में दलितों पर अत्याचार कोई ख़बर ही नहीं है।

आगे बढ़ने से पहले ख़बर जान लें —

बीकानेर के नोखा कस्बे में 29 मार्च को 17 साल की डेल्टा मेघवाल का शव जैन आदर्श बीएड कालेज की पानी की टंकी में मिला। बाडमेर जिले की निवासी डेल्टा के परिजनों ने इसे हत्या और दुष्कर्म का मामला बातते हुए कालेज संचालकों और पीटी मास्टर तथा हॉस्टल की वार्डन के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराई है।

रिपोर्ट के मुताबिक होली के बाद जब डेल्टा गांव से लौटी तो हॉस्टल में सिर्फ चार लड़कियां मौजूद थीं। हॉस्टल वॉर्डन प्रिया शुक्ला ने छात्रा को पीटी मास्टर वीजेंद्र सिंह के कमरे में सफाई के लिए भेज दिया, जहां पर पीटीआई ने उसके साथ रेप किया। इसकी शिकायत छात्रा ने अपने पिता से फोन पर की और कॉलेज संचालक व पीटीआई सहित हॉस्टल वार्डन से अपनी जान के खतरे का अंदेशा जताया। मामले का राज खुलने के भय से इस छात्रा की हत्या कर दी गई। अगले ही दिन छात्रा की लाश कॉलेज परिसर में स्थित पानी की टंकी में मिली। हद तो यह की पुलिस डेल्टा के शव को कचरागाड़ी में डालकर ले गई। आरोप है कि पुलिस मामले की लीपापोती और अपराधियों को बचाने में जुटी है। परिजनों पर यह भी दबाव है कि वे लिखकर दे दें https://www.viagrasansordonnancefr.com/ कि जो कुछ हुआ, वह सहमति से हुआ।

डेल्टा बेहद होनहार लड़की थी। केवल सात साल की उम्र में उसकी पेंटिंग को राजस्थान सचिवालय की मैग्जीन में छापा गया था। 12 वीं क्लास में आर्ट कंप्टीशन में उसने राजस्थान में टॉप किया था। डेल्टा की पेंटिंग को मुख्यमंत्री ने भी सराहा था तथा पत्र लिखकर तारीफ की थी। यही नहीं राजस्थान के जहाज़ कहे जाने वाले ऊँट को लेकर बनाई गई उसकी तस्वीर को मुख्यमंत्री कार्यालय में जगह दी गई थी।

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लेकिन बड़े-बड़े तुर्रम खां अखबारों और चैनलों के लिए डेल्टा का जीना क्या और मरना क्या। पुलिस कार्रवाई करे तो ठीक, न करे तो ठीक। इस बेगानगी की प्रतिक्रिया यह है कि दलित, वंचित और इंसाफ़पसंद तबके की ओर से सोशल मीडिया के ज़रिये मुख्यधारा की मीडिया की बखिया उधेड़ी जा https://www.acheterviagrafr24.com/viagra-definition/ रही है। वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक दिलीप मंडल ने बालिका वधू की आनंदी यानी प्रत्यूषा बनर्जी की ख़ुदकुशी को मिले कवरेज से तुलना करते हुए फेसबुक पर लिखा है–

 

‘डेल्टा अगर बनर्जी होती और प्रत्युषा होती मेघवाल!

फिर देखते ब्राह्मणवादी मीडिया, चैनल, अखबारों का कवरेज. शर्म करो! “

 

वहीं लेखक-आलोचक हिमांशु पांड्या ने भी इसे मानवता को शर्मसार करने वाली घटना बताते हुए फेसबुक पर अपील की है कि डेल्टा को न्याय दिलाने की लड़ाई में सब साथ आयें। हिमांशु पांड्या https://www.acheterviagrafr24.com/achat-viagra-en-ligne-sans-ordonnance/ ने लिखा है–

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“यह चित्र डेल्टा मेघवाल का है. एक मेधावी छात्रा, अद्भुत चित्रकार, एनसीसी की कैडेट डेल्टा के सामने सुनहरे जीवन के सपने थे. उसकी प्रतिभा का आलम ये था कि मुख्यमंत्री की उसके नाम चिठ्ठी आयी थी और उसका चित्र आज भी मुख्यमंत्री कार्यालय में शान से लगा है.उसके ही छात्रावास के वार्डन की मिलीभगत से उसके विद्यालय के पीटीआई ने उसके साथ बलात्कार किया.जिस गुरु को उसके सपनों को पूरा करने के लिए पंख देने थे, उसने उसे बेरहमी से कुचल डाला. स्कूल प्रधान ने पूरी बेशर्मी से बलात्कारी का बचाव और बच्ची को बदनाम किया, मानो यह भी काफी नहीं था तो उसकी निर्मम हत्या भी कर दी. उसकी मृत देह को कचरागाडी में घसीटकर रही सही कसर भी पूरी कर दी….इससे हमारा राज्य ही नहीं, पूरी मानवता शर्मसार हुई है. डेल्टा को न्याय दिलाने की लड़ाई में साथ आयें.”

अगर कथित राष्ट्रीय मीडिया इसे लोकल घटना मानकर अनदेखी कर रहा है तो उसे देखना चाहिए कि पूरे देश में डेल्टा के मुद्दे पर प्रदर्शन आयोजित हो रहे हैं और मीडिया की असंवेदनशीलता पर सवाल उठाये जा रहे हैं। सिर्फ़ दलित संगठन नहीं, तमाम वामपंथी और मानवाधिकार संगठ भी इस मुद्दे पर देश के तमाम शहरों में प्रदर्शन आयोजित कर रहे हैं। नीचे बैंगलुरु टाउन हॉल पर हुए प्रदर्शन की कुछ तस्वीरें देखने लायक हैं।

 

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संगठनों ने डेल्टा प्रकरण के कवरेज को मीडिया के ब्राह्मणवादी होने का सबूत बताते हुए मोर्चा खोल दिया है। जातिवाद का अंतिम संस्कार  नाम के फेसबुक समूह की अक्टूबर 11, 2015 की पोस्ट खूब शेयर की जा रही है जिसमें बताया गया है कि भारत का मीडिया पूरी तरह बनियों के हाथ में है (और संपादक और पत्रकारों में 95 फीसदी से ज़्यादा सवर्ण हैं। ) समूह के पेज पर कुछ यूँ लिखा गया  है–

भारतीय मीडिया तंत्र के मालिक और उनकी हकीकत

1=टाइम्स ऑफ इंडिया=जैन(बनिया)
2=हिंदुस्तान टाइम्स=बिरला (बनिया)
3=दि.हिंदू=अयंगार (ब्राम्हण)

4=इंडियन एक्सप्रेस=गोयंका (बनिया)
5=दैनिक जागरण=गुप्ता (बनिया)
6=दैनिक भास्कर=अग्रवाल (बनिया)

7=गुजरात समाचार=शाह (बनिया)
8=लोकमत =दर्डा (बनिया)
9=राजस्थान पत्रिका=कोठारी (बनिया)

10=नवभारत=जैन (बनिया)
11=अमर उजाला=माहेश्वरी (बनिया)

वैसे, यह बात ठीक है कि मीडिया ट्रायल के ज़रिये किसी नतीजे पर नहीं पहुँचना चाहिए, लेकिन यहाँ सवाल ख़बरों के चुनाव का है। जिस मीडिया के लिए आनंदी की ख़ुदकुशी राष्ट्रीय स्तर की ख़बर है, वह डेल्टा के लिए चंद लाइनें भी छापने के लिए तैयार नहीं तो मसला उसकी मानसिक बुनावट का है। मीडिया में पैठी डेल्टा की उपेक्षा की वजह समझना बरमूडा ट्रैगिल रहस्य बूझने जैसा नहीं है। देश का बहुसंख्यक समाज इसे अच्छी तरह समझ रहा है। पर क्या मुख्यधारा का मीडिया भी इस सुलगते आक्रोश को समझ पायेगा या फिर उसे किसी बड़े विस्फोट का इंतज़ार है।