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MP: राजधानी में चढ़ता सियासी पारा और मीडिया हाउसों के बाहर सड़क पर ठिठुरते ‘अनागरिक’!

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अमन कुमार / भोपाल से

भोपाल के मौसम में अबकी गर्मी अपेक्षा से कुछ ज्‍यादा है। एक तो मौसम ऐसा गर्म कि दस मिनट तेज धूप में खड़े रहना असहनीय है, दूसरे विधानसभा चुनाव के बढ़ते पारे ने इस ठंड में कई के पसीने छुड़ा दिए हैं। यहां मतदान 28 तारीख को है और प्रचार के केवल पांच दिन बचे हैं। ऐसे में सभी कयास लगा रहे हैं कि अबकी बार कौन? मध्य प्रदेश के चुनाव कुछ इसलिए भी दिलचस्प हैं कि इनसे 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों का पता भी निकलेगा।

प्रदेश में जीत सुनिश्चित हो इसके लिए आवश्यक है कि पहले राजधानी के किले को सुरक्षित किया जाए। मध्य प्रदेश की विधानसभा में भोपाल के सात विधायक बैठते हैं, जिनमें से छह भारतीय जनता पार्टी के हैं, जो यहां पिछले 15 साल से सरकार में है। शहर की सातों सीटों पर हर पार्टी जोर आजमाइश कर रही है। भाजपा जहां 15 साल की एंटी-इंकमबेंसी से जूझ रही है, वहीं कांग्रेस के पक्ष में माहौल होते हुए भी वह उसको भुना पाने में नाकाम दिखती है। कांग्रेस ने एकाध सीटों को छोड़कर अपने प्रत्याशियों का क्षेत्र बदल दिया है, जिससे उन्‍हें नए क्षेत्र में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा भितरघात सबसे बड़ा डर है, जो कांग्रेस की परंपरा रही है।

मध्‍य क्षेत्र का चुनाव कांग्रेस के लिए जीवन-मरण जैसा है, जिसे वह हर हाल में जीतना चाहती है। कांग्रेस का उत्साह उसके कार्यकर्ताओं में भी दिखने लगा है, लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा सामने न होना उसके लिए अब भी चिंता का विषय बना हुआ है। इसके बावजूद कार्यकर्ता जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। मध्य क्षेत्र के कांग्रेसी प्रत्याशी आरिफ मसूद कहते है- ‘कांग्रेस कार्यकर्ता आधारित पार्टी है। मुख्यमंत्री कौन बनेगा, यह आलाकमान पर निर्भर है, लेकिन जो भी होगा, सभी को स्वीकार्य होगा। फिर चाहे कमलनाथजी हों या सिंधियाजी या फिर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयजी ही क्यों न हों। अभी हमारा काम पार्टी के लिए सीटें जीतना है, बाकी बातें बैठकर तय कर ली जाएंगी।’

भोपाल शहर की छह सीटों पर भाजपा के विधायक होने के बाद भी एक सीट ऐसी है जो भाजपा की जीत के जायके को हर बार फीका कर देती है। शहर उत्तरी विधानसभा (पुराना भोपाल) पिछले 25 साल से कांग्रेस का गढ़ है। वर्तमान में आरिफ अकील यहां से विधायक हैं जो पिछले पंद्रह साल से प्रदेश के इकलौते मुस्लिम विधायक हैं। इस सीट पर कब्जा करने के लिए भाजपा की छटपटाहट इतनी है कि वह यहां हर दांव लगाने के लिए तैयार है। उसकी तलब का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पूरे प्रदेश में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी न उतारने वाली भाजपा, टिकट बंटवारे के एक दिन पहले तक कांग्रेसी रहीं फातिमा रसूल अहमद सिद्दीकी को चट मंगनी पट ब्याह की तर्ज पर टिकट थमा देती है। फातिमा रसूल कांग्रेस के पूर्व विधायक रसूल अहम सिद्दीकी की बेटी हैं, जो यहां से दो बार विधायक रह चुके हैं।

इस तरह शहर उत्तरी विधानसभा भोपाल की सबसे हाइ-प्रोफाइल सीट बन जाती है। इस बार यहां मुकाबला तगड़ा है। अपनी जीत के प्रति आश्वस्त आरिफ अकील कहते हैं- ’25 साल से विधायक हूं। क्षेत्र के लोगों को प्रति कभी भेदभाव नहीं किया। हर समय साथ रहता हूं, क्षेत्र के लोगों के लिए दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं, बाकी देखिए, क्या होता है।’

पिछले साल भर से मेहनत कर रहे कार्यकर्ताओं में इसको लेकर थोड़ा गुस्सा है। मध्य प्रदेश मदरसा बोर्ड के चेयरमेन राशिद खान कहते हैं कि वे खुद इस सीट के लिए दावेदार थे। विधायक बनने का सपना पाल रहे खान का मानना है कि आलाकमान ने कुछ अच्छा ही सोचा होगा। ‘’अब जब सब हो ही गया है, तो पूरे जी-जान के साथ लगे हैं। बाकी सब वोटर पर है।‘’ हाइ प्रोफाइल बन चुकी इस सीट पर भाजपा को भी भितरघात का डर सता रहा है।

कांग्रेस के चुनाव कार्यालय में बैठे अंजुम बताते हैं- ‘यहां से तो पिछले पच्चीस साल से जीत रहे हैं। पूरी विधानसभा में अकेले मुस्लिम विधायक हैं। इस बार मुकाबला कड़ा है। हमें भाजपा से नहीं, फातिमा से लड़ना है। वे हमारे कांग्रेस परिवार की ही हैं।’ आसिफ तन्हा का कहना है- ‘दुश्मन से ज्यादा दर्द अपने दे जाते हैं। फातिमा जी ने हमें वही दर्द दिया है। अब जब सामने हैं, तो मुकाबला तो करना ही पड़ेगा।’

मध्य प्रदेश भाजपा का गढ़ है, तो भोपाल उत्तरी (पुराना भोपाल) आरिफ अकील का, जो अभी कांग्रेस में हैं। यहां अकील के नाम का नाम का सिक्का चलता है। इस बात को यहां के मतदाता भी मानते हैं। पीर गेट के दरवाजे से थोड़ी दूरी पर कपड़े की दुकान पर बैठे राजेश कहते हैं- ‘’मैं कट्टर भाजपाई हूं, चाहता हूं कि सरकार बने, लेकिन अपने इलाके में मेरा वोट आरिफ भाई को जाएगा। उन्होंने क्या नहीं किया! भोपाल गैस कांड के बाद पीड़ितों की मदद के लिए आरिफ भाई ने आरिफ़ नगर नाम की बस्ती बसा दी, जहां पर गैस कांड के पीड़ितों को घर मुहैया कराये गए हैं। चालीस साल पहले गुना से भोपाल आए हरिप्रसाद यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के बाहर चाय का ठेला लगाते थे। गैस कांड के बाद उनका सब बर्बाद हो गया। ऐसे में उनके मददगार बने आरिफ अकील।’’

गैस कांड के पीड़ित श्यामलाल

भोपाल की दूसरी महत्वपूर्ण विधानसभा है दक्षिण पश्चिम, जहां से विधायक हैं उमाशंकर गुप्ता। वह मध्य प्रदेश सरकार के राजस्व मंत्री हैं। इस सीट पर एंटी-इंकमबेंसी काफी देखने को मिलती है। इसके लिए विधायक का व्यवहार जिम्मेदार है। इसका नतीजा तब भोगना पड़ा, जब वे प्रचार के लिए भ्रमण पर निकले और उन्हें खदेड़ दिया गया।

विधायक उमाशंकर गुप्ता अपने प्रचार के दौरान अपने और सरकार के कामकाज को बताने से ज्यादा दिग्विजय सरकार की कमियां गिना रहे हैं। यहां कांग्रेस ने पीसी शर्मा को मैदान में उतारा है, जो वर्तमान में भोपाल कांग्रेस के अध्यक्ष है। आखिरी बार 1998 में कांग्रेस इस सीट पर जीती थी। तब पीसी शर्मा ही विधायक बने थे। वोटर में पनप रही नाराजगी को कांग्रेस कितना भुना पाएगी, इसका पता तो नतीजों के बाद ही चलेगा लेकिन 28 दिसम्बर के पहले की समस्याओं से पार पाना कांग्रेस के लिए मुश्किल हो रहा है।

मतदाताओं का कहना है कि पहले कांग्रेस होने वाले मुख्यमंत्री का नाम तो बताए, तब तो पता चलेगा कि हम वोट किसको दे रहे हैं। रोशनपुरा में मोटरसाइकिल का गैराज चलाने वाले सतवीर और उनके यहां काम करने वाले जाकिर कहते हैं- ‘कांग्रेस में लोग हैं, जो मुख्यमंत्री के दावेदार हैं, लेकिन मुख्यमंत्री कौन होगा, यह पता ही नहीं!’ बर्तन भंडार में बैठे राजकुमार का कहना है- ‘घर का कोई सामान खराब होने पर सामान बदलते हैं, घर थोड़ी छोड़ देते हैं… आप ऐसा करते हों, तो हमें नहीं पता!’

इस सीट पर जातिगत समीकरण के हिसाब से 35 हजार ब्राह्मण और 28 हजार के लगभग कायस्थ हैं, तो मुस्लिमों की संख्या भी 30 हजार के करीब है। यहां पर सिंधी व्यापारी और वैश्य वोट भी है, जिसके सहारे उमाशंकर अपनी नैया पार लगाने की सोच रहे हैं। उमाशंकर मध्य प्रदेश के राजस्व विभाग के मंत्री हैं और पानी, सफाई और जाम यहां पर बड़ी समस्याएँ हैं। रोशनपुरा के महेंद्र सिंह का कहना है कि मंत्री जी अगर अपनी थोड़ी-सी अंटी खोल देते तो काम हो जाता।

मध्य प्रदेश चुनाव में हिस्‍सा ले रही आम आदमी पार्टी, भाजपा और कांग्रेस पर प्रदेश को बर्बाद करने का आरोप लगा रही है। आप के प्रदेश महामंत्री पंकज कहते हैं कि ‘आप’ यहां बदलाव के लिए चुनावी मैदान में है। यहां पर भी यह दिल्ली जैसे ही वादे करते हुए मैदान में है। शिवराज की तमाम योजनाओं पर तंज कसते हुए वे कहते हैं- ‘सरकार कर्ज लेकर वेतन दे रही है, लेकिन बड़ी घोषणाएं ऐसे कर रही है जैसे शिवराज खुद के पैसे से इसकी भरपाई करेंगे। ये अंधे द्वारा रेवड़ी बांटने जैसा है।’

आम आदमी पार्टी ने मध्य प्रदेश का घोषणापत्र 100 रुपए के स्टाम्प पेपर पर छपवाया है जिसमें दिल्ली की ही तरह लोकलुभावन वादे किये हैं। मध्य प्रदेश में आप के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है और दिल्ली से गोपाल राय के अलावा आप का कोई बड़ा नेता यहां प्रचार करने के लिए नहीं पहुंचा है जिससे उसकी चुनावी राजनीति की गम्भीरता पर सवाल उठ रहे हैं।

स्वास्थ्य और रोजगार मध्य प्रदेश के दो बड़े मुद्दे हैं, जो प्रदेश की राजधानी की भी समस्या हैं। राजीव गांधी प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग कर रहे मयंक कहते हैं- ‘सरकार रोजगार देने में नाकाम है, पिछले बैच के आधे से ज्यादा लोग बेरोजगार घूम रहे हैं और सरकार विकास का दावा कर रही है। बड़े मॉल, अच्छी सड़कें, विकसित कॉलोनियां ही विकास नहीं होतीं। इन सुविधाओं का उपयोग पैसे वाले कर पाते हैं। विकास तब होगा, जब सभी इनका उपयोग कर पाएं।’ आशीष इस सब के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही जिम्मेदार मानते हैं। उनके हिसाब से ये केवल पैसेवालों के लिए काम करती हैं, जिनका आम लोगों से कोई वास्ता नहीं है।

सड़क किनारे खिलौने बेचने वाले मोहन-कमला

शहर मध्य भाजपा का गढ़ है। यहां से विधायक हैं सुरेंद्रनाथ सिंह (मम्मा)। एमपी नगर उनके क्षेत्र के बेहतरीन इलाके में से आता है। अधिकतर मीडिया हाउस के दफ्तर भी इसी इलाके में आते हैं। ऊपर की तस्वीर उसी इलाके की है। तीस के लगभग लोगों का एक परिवार सड़क किनारे है जो खिलौने बेच कर अपना गुजारा करता है। रात के दो बजे के लगभग एक पेड़ के नीचे लेटे इन लोगों का ठंड में क्या हाल होता है, इसकी कल्‍पपना करना भी मुश्किल है। ये लोग भोपाल के अलग-अलग इलाकों में 15 साल से ज्यादा समय से रह रहे हैं लेकिन इनके पास एक छत तक नहीं है। इन्हें किसी सरकारी योजना का नाम तक नहीं पता सरकारी दस्तावेज के नाम पर आधार, राशन कार्ड, वोटर कार्ड जैसा कुछ भी नहीं है।

क्यों नहीं बनवाया, यह पूछने पर वे जवाब देते हैं कि पहले पता तो चले कि ये दस्तावेज किस काम आते हैं?


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