Home काॅलम संसद चर्चा: संवैधानिक संस्थाओं को ‘सरकारी’ बनाने के लिए संसद में झूठ!

संसद चर्चा: संवैधानिक संस्थाओं को ‘सरकारी’ बनाने के लिए संसद में झूठ!

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राजेश कुमार


हालांकि यह सच नहीं था, लेकिन वित्त एवं कारपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि ‘जिन-जिन पदों पर नियुक्तियां कालेजियम करती हैं, उनके बारे में सभी कानूनों में, चाहे वे कानून यू.पी.ए. ने बनाये हों या एन.डी.ए. ने, इस तरह के प्रावधान हैं। उदाहरण के लिये केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और विपक्ष के नेता करते हैं।’

लेकिन किस तरह के प्रावधान?

जेटली ने कहा था कि उसी तरह का, जैसा ‘डेलही स्पेशल पुलिस एस्टैबेलिशमेंट ऐक्ट 1946 में संशोधन के दौरान प्रस्तावित किया गया, पहला नहीं, दूसरा प्रावधान। उन्होंने कहा था, ”माननीय सदस्यों में जिसको लेकर चर्चा है,वह दूसरे प्रावधान के बारे में है। द सेकंड प्रोविजन विद इट इज दैट नो अप्वाइंटमेंट आफ अ डायरेक्टर शैल बी इनवैलिड मेयरली बाई रीजन ऑफ एनी वैकेंसी ऑर ऐबसेंस ऑफ अ मेम्बर ऑफ द कमेटी।’’

मोदी सरकार के गठन के केवल छह महीने बाद 27 नवम्बर 2014 को वह सी.बी.आई. के गठन और संचालन संबंधी कानून में संशोधन का यह विधेयक राज्यसभा में पेश कर रहे थे, और इस दूसरे प्रावधान का तात्पर्य यह था कि ‘सी.बी.आई. के निदेशक की नियुक्ति केवल इस आधार पर अवैध नहीं हो जायेगी कि नियुक्ति करनेवाली कमेटी में कोई जगह रिक्त है या किसी सदस्य ने नियुक्ति के लिये हुई बैठक में शिरकत नहीं की।’’

जाने माने वकील के.टी.एस. तुलसी ने किसी और समय, कहीं और नहीं, बल्कि विधेयक पर चर्चा में तभी इस असत्य की शिनाख्त की थी। उन्होंने अपनी संक्षिप्त टिप्पणी में कहा था, “मैं केवल तथ्यों को दुरुस्त कर देना चाहता हूँ। अगर मैंने सुनने में गलती नहीं की है तो सदन के नेता ने कहा कि दूसरा प्रावधान ठीक उसी तरह का है] जैसा लोकपाल कानून और केन्द्रीय सतर्कता आयोग कानून में है। दोनों कानूनों की प्रतियाँ मेरे पास हैं और केवल तथ्य सुधार की खातिर मैं कहना चाहता हूँ कि दोनों में से किसी में ‘ऐबसेंस’ शब्द नहीं हैं। लोकपाल कानून का उक्त प्रावधान कहता है कि नो अप्वाइंटमेंट ऑफ चेयरपर्सन ऑर अ मेम्बर शैल बी इनवैलिड मेयरली बाई रीजन ऑफ एनी वेकेन्सी इन द सेलेक्शन कमेटी। तो ‘ऐबसेंस’ शब्द वहां नहीं है। यह जोड़ा गया है…’’

तुलसी ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग का भी प्रावधान पढ़कर सुनाया और कहा कि ‘ऐबसेंस’ शब्द उसमें भी नहीं है। दिलचस्प यह कि चर्चा का उत्तर देते हुये विद्वान वित्तमंत्री ने तथ्यों में तोड-मरोड़ के इस आरोप को निराधार बताना तो दूर, इसका जिक्र तक नहीं किया। अलबत्ता यह सच है कि सी.बी.आई. डायरेक्टर के एक अपवाद को छोड़ कॉलेजियम द्वारा नियुक्ति के सी.वी.सी, लोकपाल और रद्द किये जा चुके एन.जी.सी. जैसे तमाम मामलों में ‘कोई वेकेंसी या किसी सदस्य के ऐबसेंस की बिना पर नियुक्ति अवैध नहीं माने जाने का समरूप प्रावधान होने’ का दावा करने के साथ अगली ही सांस में

जेटली ने इनके जो ब्योरे दिये उनमें ‘ऐबसेंस’ नदारद थ, लेकिन व्याख्या में फिर पुराने दावे की बहाली। देखिये -’’दिस इज द कन्सीस्टेंट प्रोवीजन ह्विच एक्जिस्ट। द रीजन इज, आउट ऑफ थ्री मेम्बर्स, इफ वन मेम्बर सेज दैट ही ऑर शी वोंट अटेंड द मीटिंग, दैन द कॉलेजियम लूजेज इट्स परपस।’’

यह झूठ को सच की तरह कहना है, खूब पर्दा है के चिलमन से लगे बैठे हैं/ साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं। कार्मिक, जन-शिकायत और पेंशन विभाग के प्रभारी मंत्री जितेन्द्र सिंह ऐसी महीन कताई कर भी नहीं सकते थे। शायद इसीलिये विधेयक पेश करने से लेकर चर्चा का जवाब देने तक का दारोमदार उनके स्थान पर जेटली को सौंपा गया था।

यह नहीं कह सकते कि वित्तमंत्री और उनकी सरकार का संदेह ठीक था कि जब तक ‘वह एक सदस्य जायेगा नहीं, तब तक नियुक्ति हो नहीं सकती।’ लेकिन कौन सदस्य\ प्रधानमंत्री तो जायेगा, मुख्य न्यायाधीश भी जायेगा, नहीं जायेगा तो वह जिसके लिये 25 नवम्बर 2014 को लोकसभा में पारित इस संशोधन के प्रथम प्रावधान में ‘लोकसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष के नेता और जहाँ विपक्ष का मान्यता प्राप्त नेता न हो, वहाँ सबसे बडी विपक्षी पार्टी का नेता’ करने का प्रस्ताव किया गया था।

लेकिन उस संशोधन के बाद सबसे बडी विपक्षी पार्टी के पास नहीं जाने का तर्क क्या बचता, बल्कि लेाकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की राय बस इतनी थी कि वह बैठक में भाग लेने, अपनी राय और वोट दर्ज कराने के अधिकार से रहित ‘विषेष आमंत्रित’ के तौर पर लोकपाल समिति की बैठकों में शिरकत नहीं करेंगे। उनकी मांग थी कि लोकपाल समिति में उन्हें पूर्णस्तरीय सदस्य बनाने के लिये सरकार या तो संसद में विधेयक लाकर लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून 2013 में संशोधन करे या इसके लिये अध्यादेश लाये। अन्ना आंदोलन के ताप के बीच पांच साल पहले मनमोहन सिंह सरकार के समय बने लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून में लोकपाल समिति में लोकसभा अध्यक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश और एक नामजद प्रतिष्ठित न्यायविद के साथ-साथ लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी शामिल करने का प्रावधान है। लेकिन लोकसभा में कुल सदस्य संख्या का एक दहाई सदस्य नहीं होने के कारण सरकार ने कांग्रेस को विपक्ष के नेता का पद देने से इंकार कर दिया, गो 70 सदस्यों वाली दिल्ली विधानसभा में केवल तीन सदस्य भेज सकी भाजपा को विपक्ष के नेता का पद प्राप्त है।

तो खड़गे के बहिष्कार के बीच ही आखिरकार अभी महीना भर पहले, सितम्बर के आखिरी सप्ताह में समिति ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व में 8 सदस्योंवाली ‘सर्च कमेटी’ का गठन कर दिया तो इसलिये नहीं कि  अप्रैल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया था कि लोकपाल कानून की धारा 4@2 के तहत विपक्ष के नेता के बिना भी लोकपाल समिति ‘सर्च कमेटी’ का गठन और लोकपाल की नियुक्ति कर सकती है। उस दिन सुनवाई में दी गयी केन्द्र सरकार की यह दलील खालिस झूठ थी कि विपक्षी नेता के बहिष्कार के कारण इस मामले में प्रगति नहीं हो रही क्योंकि संसद के दोनों सदन जब तक लोकपाल कानून में ‘डेलही स्पेशल पुलिस एस्टैबेलिशमेंट ऐक्ट 1946 की तरह का संशोधन कर निचले सदन में सबसे बडी विपक्षी पार्टी के नेता को समिति में शामिल करने का प्रावधान नहीं कर देते, तब तक उनके बहिष्कार का मामला ‘ऐबसेंस’ का होता नहीं] यह केवल ‘वेकेंसी’ का होता है। और यह बात सरकार को भी मालूम थी, एटार्नी जनरल को भी। बल्कि अरुण जेटली ने 27 नवम्बर 2014 के उसी भाषण में कहा भी था कि लोकपाल कानून के मौजूदा प्रावधानों के तहत समिति में कोई ‘वेकेंसी’ होने से लोकपाल या किसी अन्य सदस्य की नियुक्ति अवैध नहीं हो जायेगी।

झूठ वही नहीं था, जेटली ने जब सी.बी.आई. डायरेक्टर की नियुक्ति के लिये उच्च सदन में ‘डेलही स्पेशल पुलिस एस्टैबेलिशमेंट ऐक्ट 1946 में संशोधन विधेयक पेश करते हुये कहा था कि ‘जो लोकपाल ऐक्ट है,और जो सी.वी.सी. ऐक्ट है, उनमें भी इसी प्रकार का संशोधन हमे लाना पडेगा’ तो वह भी सच नहीं था। बस वह ‘‘शायद हमें, शायद मैं कह रहा हूं’’ जैसा वाक्यांश जोडकर उसे सच जैसा बना दे रहे थे। वरना लोकपाल की नियुक्ति और संबंधित कानून में संशोधन कर सबसे बडी विपक्षी पार्टी को इस नियुक्ति में भूमिका देने की सरकार की शायद कोई मंशा ही नहीं थी – सरकार ने एक संसदीय समिति की सिफारिश के बावजूद यह नहीं किया, लोकसेवकों के पति/पत्नी और आश्रित बच्चों की सम्पत्ति एवं देनदारियां सार्वजनिक करने का सांविधिक प्रावधान हटाने के लिये 2016 में लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून संशोधन पारित करते हुऐ यह नहीं किया, लोकपाल समिति की बैठकों के खड़गे के बहिष्कार के बावजूद यह नहीं किय। याद कीजिये, “न खाउंगा न खाने दूंगा’’ का जुमला उछाल रहे प्रधान सेवक ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुये वर्षों लोकायुक्त नहीं नियुक्त किया और 2003 में एस.एम. सोनी के अवकाश-ग्रहण के सात साल बाद अंततः जब राज्यपाल कमला बेनीवाल ने उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त जज आर.ए. मेहता को लोकायुक्त नियुक्त कर दिया तो सरकार और राज्यपाल के बीच भारी विवाद छिड़ गया था।

हड़बडी केवल इतनी थी कि सी.बी.आई के तत्कालीन डायरेक्टर रंजीत सिन्हा 2 दिसम्बर 2014 को अवकाश-ग्रहण कर रहे थे और ‘‘डेलही स्पेशल पुलिस एस्टैबेलिशमेंट ऐक्ट’ में संशोधन किये बिना नये डायरेक्टर की नियुक्ति मुश्किल हो जाती। अरुण जेटली ने इसे छिपाया भी नहीं, साफ कहा कि लोकपाल और सी.वी.सी. के संदर्भ में ‘अभी अर्जेंसी नहीं है, क्योकि नियुक्ति तुरन्त नहीं होनी, लेकिन सी.बी.आई. डायरेक्टर की नियुक्ति तुरन्त होनी है।’

तत्कालीन डायरेक्टर रंजीत सिन्हा 2 दिसम्बर 2014 को सेवानिवृत हो रहे थे और ‘अर्जेन्सी’ की दलील तो तब यही थी कि सप्ताह भर में नया डायरेक्टर नियुक्त किया जाना है। विशेष निदेशक और नम्बर-टू अनिल सिन्हा नियुक्त किये भी गये, लेकिन उनके अवकाश-ग्रहण पर तो नियुक्ति की ऐसी अर्जेन्सी दिखी नहीं। बल्कि अनिल सिन्हा के रिटायर होने से चंद दिन पहले डायरेक्टर पद के दावेदार विशेष सचिव आर.के. दत्ता को गृह मंत्रालय में पहली बार दूसरे विशेष सचिव का पद सृजित कर वहां भेज दिया गया और उनके स्थानांतरण से नम्बर-टू हुये प्रधानसेवक के करीबी, गुजरात काडर के राकेश अस्थाना को अनिल सिन्हा की सेवानिवृति पर 3 दिसम्बर 2016 को अंतरिम डायरेक्टर बना दिया गया। दस साल में यह पहला अवसर था, जब डायरेक्टर की सेवानिवृति के बाद पूर्णकालिक डायरेक्टर नहीं नियुक्त किया गया। कारण संभवतः यह कि उसके लिये तो कॉलेजियम की मंजूरी की दरकार होती। जो लोग अस्थाना के खिलाफ आरोपों के बीच पहले उनके पर कतरे जाने और फिर डायरेक्टर आलोक वर्मा को जबरिया छुट्टी पर भेजे जाने के सरकारी कदम से उपजे मौजूदा विवाद को फिलहाल भूल भी जाना चाहें, वे मुलायम, मायावती और समय-समय पर तमाम विपक्षी दलों और नेताओं के खिलाफ सी.बी.आई. मामले ऑन-ऑफ होते रहने, राजद नेता लालू प्रसाद के खिलाफ उसके लगातार हमलावर रहने और फर्जी मुठभेड मामले में भाजपा अध्यक्ष को दोषमुक्त करार देने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं देने के सी.बी.आई. के फैसले जैसे संदर्भों में इस अर्जेन्सी को और बेहतर समझ सकते हैं।

 

 ‘संसद चर्चा’ स्‍तंभ के लेखक राजेश कुमार वरिष्‍ठ पत्रकार हैं और संसद की रिपोर्टिंग का इन्‍हें लंबा अनुभव है