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‘मोब लिंचिंग’ के ज़रिए चरम ध्रुवीकरण की कोशिश ताकि जीत सकें 2019 का चुनाव!

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रामशरण जोशी

 

           गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में  भीड़ हिंसा पर बोलते हुए दिल्ली में 1984 के दंगों को याद किया जिसमें हजारों सिखों की जानें गयीं. इंदिरा गाँधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा की गयी हत्या से राजधानी दिल्ली में दंगे भड़के और  निर्दोष सिख नागरिकों की जान-माल को अपार क्षति पहुंची. बेशक इसे स्वत:स्फूर्त हिंसा नहीं कहा जा सकता। यह एक सीमा तक प्रायोजित थी जिसमें कथित रूप से कांग्रेस के बड़े नेता किसी स्तर पर लिप्त रहे. इस हिंसा के  हर स्तर पर भर्त्सना की जानी चाहिए.

          इसी सन्दर्भ में एक सवाल पैदा होता है. जब गृहमंत्री 34 साल पुरानी घटना याद रख सकते हैं तब 12 साल पुरानी  अहमदाबाद की भीड़ हिंसा को याद क्यों नहीं रख सके? क्या २००२ में मुसलमानों की मोब लिंचिंग नहीं हुई ? क्या भीड़ ने बिल्डिंग को नहीं जलाया ? क्या भीड़ ने एक पूर्व सांसद को जिंदा नहीं जला दिया था. इस  हिंसा में भी लोगों की जाने गयी थीं. हिंसा का रौद्र रूप देख कर तत्कालीन भाजपा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी को अपनी ही पार्टी की प्रदेश सरकार और तब के मुख्यमंत्री और आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी को “ राजधर्म पालन “ की नसीहत देनी पड़ी थी। राजनाथ सिंह जी इसे क्यों नहीं याद रख पाए ? इसका सीधा अर्थ यह है कि वे ‘ मोब लिंचिंग या हिंसा ‘ के प्रति पक्षपातपूर्ण दृष्टि अपनाना चाहते हैं,समदृष्टि नहीं. इसकी अपेक्ष देश के गृहमंत्री से नहीं की जाती है; भीड़ हिंसा में समाज का कोई भी समुदाय संलिप्त रहता है, तो वह गुनहगार है.

          माना सांप्रदायिक दंगे देश के लिए कोई नयी परिघटना नहीं है; आज़ादी के बाद से लगातार होते रहे हैं. लेकिन, मई 2014  के बाद से जिस प्रकार की भीड़ हिंसा का सिलसिला शुरू हुआ है,वह एक सीमा तक किसी नयी परिघटना या फेनोमेनन से कम नहीं है;लव जिहाद, गो रक्षा  व तस्करी, बालक चोरी, चुटिया काटना,चुड़ैल घोषित करना जैसी घटनाओं ने मोब लिंचिंग में नया आयाम जोड़ा है.देश के विभिन्न भागों में घटने वाली इस प्रकार की भीड़ हिंसा में एक ख़ास किस्म का  ‘पैटर्न ‘ नज़र आता है. देखिये, पशु तस्करी पहले भी होती रही है, अंतर जातीय व धार्मिक विवाह पहले से होते आ रहे हैं,पार्कों में प्रेमी जोड़ें पहले भी मिलते रहे हैं। लेकिन, इस पैमाने की मोब लिंचिंग पहले नहीं रही. मार-पीट ज़रूर रही, लेकिन, ऐसी  घटनाएँ ‘राष्ट्रीय स्तर ‘ का खतरा नहीं बनी थीं. इस खतरे की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा और केंद्र से कहना पड़ा की मोब लिंचिंग की रोकथाम के लिए कड़े क़ानून बनाये. सारांश में, मोब लिंचिंग किसी प्रदेश या क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है बल्कि उत्तरपूर्व से लेकर दक्षिण राज्य तक इसकी चपेट में आ चुके हैं. लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए ये घटनाएँ खतरा बन चुकी हैं. यदि  सवा अरब का देश ‘भीड़ इन्साफ ‘ की गिरफ्त में आता है तो ‘क़ानून-व्यवस्था के राज ‘ की क्या ज़रूरत है? कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का अस्तित्व ही संकटग्रस्त हो जाएगा. ज़ाहिर है, यह स्थिति देश को पहले अराजकता में धकेलेगी. इसके बाद तानाशाही या अधिनायकवाद और फासीवाद के दौर शुरू होंगे.

          पिछले दिनों  झारखंड में बंधुआ मुक्ति आन्दोलन के नेता स्वामी अग्निवेश पर  भाजपा समर्थक भीड़ ने हमला किया था.उन्हें अध नंगा बना दिया था. स्वामीजी ने इसे  भाजपा राज्य द्वारा प्रायोजित घटना बताया है. इसका अर्थ यह है कि ऐसी लिंचिंग के गर्भ में राज्य का हाथ रहता है. इसकी  पुष्टि अलवर की ताज़ा मोब लिंचिंग की घटना से भी उजागर होती है. गाय तस्करी के शक में पहले अकबर खां को चंद लोगों ने मारा पीटा और  घायल अवस्था में पुलिस अपने वाहन में तीन घंटे तक कथित रूप से घुमाती रही। अस्पताल ले जाने के स्थान पर भीड़ हिंसा से पीड़ित अकबर को थाना ले जाए गया. इसके बाद अस्पताल जहाँ उसे डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया. इससे पहले भी इसी  जिले में दो और घटनाएं हो चुकी हैं. राज्य सरकार ने इस मोब लिंचिंग के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखलाई. उत्तर प्रदेश के दादरी काण्ड में भी यही हुआ.गोमांस रखने के शक में भीड़ ने एक मुस्लिम की जान ली.झारखंड में भी ऐसा ही हुआ. हैरत तो यह रही कि जब मोब लिंचिंग के अपराधी  जेल से ज़मानत पर बाहर आये तो मोदी -सरकार के मंत्री ने उनका स्वागत किया। राजस्थान में भी यही हुआ. वसुंधरा -सरकार के मंत्री ने अलवर हिंसा को हलके में लिया. मोब लिंचिंग के प्रति हास्यास्पद नजरिया तो यह रहा है कि जब एक केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि प्रधानमन्त्री मोदी की लोकप्रियता  बढ़ने से इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि गो रक्षक या मोब लिंचक मोदीजी की लोकप्रियता से जलते हैं और अपना नज़ला गाय के बहाने मुसलमानों पर उतारते ! यदि बच्चा चोरी के नाम पर होनेवाली लिंचिंग का क्या मोदी -लोकप्रियता के साथ कौन सा रिश्ता हो सकता ? यही सवाल लव जिहाद पर लागू होता है.

असलियत में, इस तरह की फूहड़ प्रतिक्रियाएं और  अपराधियों को फूल मालाएं पहनाना दो ही बातों की गवाही देती हैं : एक , भाजपा या संघ परिवार के नेतृत्त्व का दिवालियापन;दो, भाजपा नेतृत्त्व को इस बात का  अहसास हो चूका है कि गठबंधन की राजनीति के माहोल और सामान्य परिस्थितियों में उसके लिए 2019 के आम चुनावों को जीतना आसान नहीं रहेगा. समाज के चरम ध्रुवीकरण या असाधारण परिस्थितियों  से ही वह वैतरणी पार उतर सकता है. इसलिए ऐसी जब-तब घटनाओं का सिलसिला चलते रहना चाहिए. 2015 का साल याद करें जब देश में ‘नॉन टॉलरेंस ‘ का माहौल बन गया था. समाज के ध्रुवीकरण के लिए मोब लिंचिंग या भीड़ हिंसा के  नए नए रूपों को गढ़ा जाता है.कुल माजरा समाज को गरमाए रखने और अफवाहों के हथियारों को ज़ंग लगने से बचाए रखने का है. नफरत की हिंसा को जिलाए रखने के लिए मोब लिंचिंग का ही आसरा है!

( देश के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रामशरण जोशी मीडिया विजिल सलहाकार मंडल के सम्मानित सदस्य हैं।)



 

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