Home पड़ताल फ्राँस में ‘मज़दूर क्रांति’, कॉरपोरेट मीडिया के लिए यह ख़बर नहीं !

फ्राँस में ‘मज़दूर क्रांति’, कॉरपोरेट मीडिया के लिए यह ख़बर नहीं !

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इन दिनों फ्रांस में मज़दूरों का अभूतपूर्व आंदोलन चल रहा है। लाखों लोग सड़क पर है और सरकार से लोहा ले रहे हैं। समाज और राजनीतिक उथल-पुथल पर बारीक़ नज़र रखने वालों की नज़र में फ्राँस के 200 साल के इतिहास में ऐसा नहीं हुआ। यह 1789 में हुई फ्राँसीसी क्रांति जितना ही महत्वपूर्ण है जिसने ‘स्वाधीनता’ ’समता’ और ‘बंधुत्व’ के मूल्य स्थापित किये थे। इस आंदोलन से तय होगा कि मज़दूर वर्ग सदियों के संघर्ष से अर्जित अपने अधिकारों की रक्षा कर पायेगा या नहीं। लेकिन भारतीय मीडिया में इस ऐतिहासिक उथल-पुथल की ख़बर न के बराबर है। बीफ़ के मुद्दे पर अहर्निश चर्चा को युगधर्म बनाने में जुटा क़ारपोरेट मीडिया फ्राँस की इस क्रांति से काँप रहा है। या कहें कि ख़बर देने में भी उसकी फूँक सरका रही है, क्योंकि वह जानता है कि भारतीय मज़दूरों के साथ भी वे सारे ‘पाप’ हो रहे हैं, जिन्हें लेकर फ्राँस में आग लगी है।

france 2आइये पहले बात करें फ्राँस की। दरअस्ल फ्राँस्वा ओलाँद के नेतृत्व वाली सोशलिस्ट पार्टी ने 2012 में सत्ता संभालने के साथ ही मज़दूरों से जुड़े क़ानूनों में बदलाव करने का प्रयास शुरू कर दिया था। ये बदलाव ऐसे हैं जिनसे कंपनियों के प्रबंधन के लिए किसी भी मज़दूर को नौकरी से निकालना आसान हो जाएगा। यानी अब तक फ्राँस के मज़दूरों के पास सेवा सुरक्षा का जो क़ानूनी कवच है, वह हट जाएगा। इस साल में मार्च में सरकार की इस प्रस्तावित नीति के ख़िलाफ लाखों लोग सड़क पर उतरे और फिर पेरिस समेत तमाम शहरों में यह आग फैल गई। 1 मई यानी मज़दूर दिवस को कई शहरों में मज़दूरों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पे हुईं।

फ्राँस के मज़दूर हायर एंड फ़ायर (जब चाहे किसी को नौकरी पर रखो और जब चाहे निकाल दो) से जुड़े प्रस्तावित विधेयक को तुरंत वापस लेने की माँग कर रहे हैं जिससे फ्राँस का जनजीवन अस्तव्यस्त होता जा रहा है। इस विधेयक के ज़रिये मज़दूरों के काम के घंटे एक हफ़्ते में 35 से बढ़ाकर 48, और विशेष परिस्थिति में 60 तक करने का अधिकार नियोक्ताओं को दिया जा रहा है। यही नहीं, विधेयक के क़ानून की शक्ल लेते ही नियोक्ता को वेतन घटाने का अधिकार भी प्राप्त हो जाएगा।

राष्ट्रपति ओलाँद का कहना है कि सरकार के इस कदम से रोज़गार बढ़ेगा, लेकिन मज़दूर यूनियनें इसे ग़लत बता रही हैं। ख़ुद सोशलिस्ट पार्टी के अंदर इस मुद्दे पर फूट पड़ गई है औऱ कई महत्वपूर्ण नेताओं ने अलग राह चुन ली है। उनका साफ़ कहना है कि यह बाज़ारवादी नीति ‘फ्रेंच सोशल कांट्रैक्ट’ के साथ विश्वासघात है। यूनियनों का रुख़ सख़्त है और वे सरकार की ओर से विधेयक के कुछ प्रावधानों को हल्का करने के प्रस्ताव को भी ख़ारिज कर चुकी हैं।

नतीजा यह है कि रेलवे से लेकर रिफ़ाइनरियों तक में कामकाज प्रभावित है। देश भर में मज़दूर आंदोलन के नारे गूँज रहे हैं। पेरिस जैसे सैलानियों के स्वर्ग में भी अनिश्चितता का माहौल है और उसकी तमाम सड़कों पर ख़ून के धब्बे नज़र आते हैं, जो पुलिसिया कार्रवाई के शिकार मज़दूरों के बदन से बहा है। फ्राँस के इस माहौल का असर यूरोप के तमाम देशों पर पड़ रहा है। ख़बर है कि जर्मनी में भी खदबदाहट शुरू हो गई है और ”कर लो दुनिया मुट्ठी में” वाले कारपोरेट जगत को रास्ता नहीं सूझ रहा है।
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लेकिन दिलचस्प बत यह है कि इस ख़बर को भारत का मीडिया लगभग पचा गया है। आप गूगल में भी इसे आसानी से नहीं खोज पायेंगे, कम से कम भारतीय समाचार समूहों का ऐसा कोई प्रकाशन, जिसमें फ्राँस के मज़दूरों की बात हो, आपको आसानी से नहीं दिखेगा। और यह संयोग नहीं है। भारत का पूरा कारपोरेट मीडिया, वर्षों से श्रम सुधारों के लिए माहौल बनाने में जुटा है। जिसका एकमात्र अर्थ भारत के मज़ूदरों को मिले तमाम क़ानूनी अधिकार छीनना है। यही नहीं, गाहे-बगाहे मीडिया, इस मुद्दे पर मोदी सरकार की सुस्ती को कोसता भी नज़र आता है। मीडिया के अंदर सेवा सुरक्षा, काम के घंटे, समान वेतनमान जैसे मुद्दों को बेमानी बना दिया है। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के मुताबिक़ किसी पत्रकार से छह घंटे से ज़्यादा काम नहीं लिया जा सकता, लेकिन 10 से 12 घंटे पिसना तो आम बात है, फिर चाहे पत्रकार अख़बार का हो, या टीवी का। आख़िर शोषण की चक्की चलाने वाला कॉरपोरेट मीडिया फ्राँस की ख़बरें दिखा भी कैसे सकता है ?

बहरहाल, फ्राँस की ख़बर रोकी जा सकती है, पर वह आग कैसे रुकेगी जो फ्राँस के मज़दूरों के दिलों में लगी है। वह तो महाद्वीपों और महासागरों को पार कर फैलती ही जाएगी। फ्राँस, पूँजीवाद के गहरे संकट में फँसे होने की मुनादी है। ध्यान रहे कि भारत के मज़दूर भी सुलग रहे हैं जिनके शोषण को ‘विकास’ और हक़ माँगने को ‘अराजकता’ बताना कॉरपोरेट मीडिया की नीति रही है। यह सुलगन कब शोला बनकर धधक पड़े, कहना मुश्किल है।

सावधान संपादकों ! इतिहास तुमसे भी हिसाब लेगा !