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चारों ओर मीडिया का बुना हुआ एक तंत्र है जो ची़ज़ों को भुलाने में हमारी मदद कर रहा है!

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आवेश तिवारी

गोरखपुर में बच्चों की मौत की वजहों पर से अब पर्दा उठ चुका है। सब कुछ ट्रांसपेरेंट है, बेहद ट्रांसपेरेंट। 11 अगस्त को जब पहले स्थानीय मीडिया में 30 बच्चों की मौत से जुड़ी खबर आई तो उसके बाद देश के लगभग सभी टीवी चैनल और अखबारों के लिए यह खबर हॉट केक बन गई। 2016 में 600 से ज्यादा बच्चों की मौत और 40 साल में 20 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत की खबर पर खामोश रहने वाली मीडिया के लिए सब कुछ ब्रेकिंग बन गया। हॉट केक को और स्वादिष्ट बनाने के लिए माइक्रोवेव पर उसको और गरम किया गया। कहानी में एक मुस्लिम डॉक्टर को डॉक्टर डेथ बनाया गया, अस्पताल को चर्चयार्ड।

केवल इतना ही नहीं, अब तक जिस व्यक्ति की सरकार का प्राइम टाइम में बखान ऐसे किया जाता था जैसे साक्षात ब्रह्मा आकर एक प्रदेश को शासित करने लगे हैं, वो अचानक एक पूरी तरह से फेल सीएम बन गया। इस हॉट केक को रवीश कुमार ने भी गरमाया, अर्णब गोस्वामी ने भी और सरदाना-सुधीर की जोड़ी ने भी गरमाया। जो सबसे बड़ी बात थी, वो यह कि सब कुछ बेहद हड़बड़ी में रहा। तेज़- बहुत ही तेज़।

फिर अचानक सब ठंडा हो गया। 10 अगस्त के बाद मरे 70 से ज्यादा बच्चों की कहानियां कहीं नहीं थीं। आज भी कुछ मरे हैं। उनकी भी नहीं होगी। मीडिया में सब कुछ इंस्टेंट है और उन्हें इंस्टेंट की दरकार है। उन्हें बेचना भी है और सत्ता के साथ हमजोली भी बने रहना है। कल रात अलग-अलग चैनल देखा तो लगा भी कि अब योगी फिर से मैन आफ द प्राइम टाइम बन चुके हैं। बस दो या तीन दिन मीडिया इन मौतों को हमारे दिमाग से हमारे दिल से विस्मृत कराने में सफल हो जाएगा।

मुझसे कहा जाता रहा कि हिंदुस्तानी जल्दी भूल जाते हैं लेकिन सच यह है कि मीडिया के नेतृत्व में एक सिस्टम हमारे चारों ओर खड़ा है। इसका काम ही चीजों को विस्मृत करने में हमारी मदद करना है। हम आजादी की लड़ाई भूल गए, दिल्ली में सिक्खों का नरसंहार भूल गए, मुलायम के द्वारा मजदूरों की हत्याएं भूल गए, गोधरा भूल गए, नरोदा पाटिया भूल गए।

मुझे याद है मैं गोरखपुर से लौटकर वापस बनारस पहुंच चुका था। 15 अगस्त को सब आजादी मना रहे थे। अचानक मेरे एडिटर का फोन आया- ‘तीन दिन के लिए आप फिर जाओ।’ मैं अवाक् था। सोचा, कैसे जाऊं? खीझा भी। बच्चे और मां की तबियत ठीक नहीं। पिछले 18 दिनों से शहर दर शहर दौड़ रहा हूं। कैसे जाऊं? फिर मैं आया। यकीन मानें, जब आया तो पाया कि यही सही वक्त था।

स्लो न्यूज़ के अपने फायदे हैं। पहले जहां तक नहीं पहुंच पाया था इस बार पहुंचा। अब लौट रहा हूं। गोरखपुर के साथियों से कहकर लौट रहा हूं कि देखना एक हफ्ते, दस दिन, एक महीने या साल भर बाद कोई खबरनवीस किसी विदेशी या फिर सरोकारी अखबार से आएगा बिल्कुल अकेले। और कुछ ऐसी खबर ढूंढ लेगा जिस पर यकीन कर पाना कठिन होगा- जिस पर मैं भी यकीन नहीं कर पाऊंगा। लेकिन ऐसा होगा!

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