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एक और ऐतिहासिक भूल : RTI पर बीजेपी/ कांग्रेस के साथ हो गए वाम दल !

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विष्णु राजगढ़िया

भारत की राजनीति एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है। वर्ष 2019 तक का जनादेश लेकर आई सरकार 2022 की बात कर रही है। विपक्ष-मुक्त भारत का फासिस्ट सपना पूरा करने के लिए सारे हथकंडों का उपयोग हो रहा है। कई बुनियादी अवधारणाओं और प्राथमिकताओं पर गहरी चिंताएं हैं। अच्छे दिन का उन्माद ऐसा, कि परिजनों और दोस्ती के रिश्तों में दरार आ रही है।

लेकिन हर तरफ गहरे विभाजन के इस दौर में छह राजनीतिक दलों का आरटीआई के खिलाफ एक होना हैरान करता है। जनहित के हर मामले में गहरे वैचारिक मतभेद रखने वाले सारे राजनीतिक दलों की ऐसी गहरी वैचारिक एकता क्या इनके एक अलग वर्गीय चरित्र का द्योतक है? क्या वामदल भी सत्ताचरित्र के मामले में उसी वर्गहित के साथ हैं ? क्या कोई भी एक अन्य मामला ऐसा है जिस पर काँग्रेस, भाजपा, एनसीपी, बसपा, सीपीआई और सीपीएम के बीच ऐसी गहरी वैचारिक एकता हो ?

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत राजनीतिक दलों की पारदर्शिता का मामला नाजुक मुकाम पर है। केंद्रीय सूचना आयोग का तीन जून 2013 का आदेश चार साल बाद भी अब तक लागू नहीं हो पाया है। कांग्रेस, भाजपा, बसपा, एनसीपी,सीपीएम और सीपीआइ को लोक प्राधिकार के तौर पर सूचना देने के मामले की विशेष सुनवाई 16 से 18 अगस्त 2017 से रखी गई थी। लेकिन तकनीकी कारण से उसे स्थगित कर दिया गया।

सूचना कानून का मकसद सभी संस्थाओं को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। जीवन के सभी पहलुओं को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले राजनीतिक दल भला इससे अलग कैसे रह सकते हैं ? यह कैसे संभव है कि हम प्रशासनिक मशीनरी से ईमानदारी और उत्तरदायित्व की मांग करें, लेकिन राजनीतिक दलों को मनमानी की छूट दें? हमारा प्रतिनिधित्व करने के नाम पर हमारे वोट से इतनी ताकत लेने वाले राजनीतिक दल आखिर नागरिकों के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं होना चाहते?

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में सरकारी और प्राइवेट सभी संस्थाओं की सूचना देने का प्रावधान है। इसमें गोपनीय और व्यक्तिगत सूचना पर रोक भी है। किसी राजनीतिक दल को इसमें अलग से लाने की जरूरत नहीं। वे तो खुद ही पहले दिन से उसमें हैं। यह कानून भी खुद उन्हीं पार्टियों ने बनाया है। अब उसे नहीं मानना, उनकी दादागीरी है। चुनाव आयोग और आयकर विभाग में चंदे की सूचना देते ही हैं। वही चीज कोई नागरिक भी मांगे तो क्या दिक्कत है?

कांग्रेस, भाजपा, बसपा और एनसीपी जैसी शासकवर्गीय मानसिकता वाली पार्टियों का आरटीआई से परहेज समझ में आता है,क्योंकि उन्हें अपनी विभिन्न अनियमितताओं को छुपाना है। लेकिन सीपीएम और सीपीआई जैसी वामपंथी पार्टियों का आरटीआई से डरना समझ से परे है क्योंकि आम तौर पर इन पार्टियों के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है। आरटीआई पर वामदलों में अजीब सी भय-ग्रंथि है। इसके कारण वाम कार्यकर्तार्ओं के एक बड़े हिस्से ने आरटीआई का सदुपयोग नहीं किया। उल्टे, सीपीआई और सीपीएम ने इसके दायरे में आने से बचने का प्रयास किया है। इसके कारण वामदलों ने इस कानून का लाभ उठाने का शानदार अवसर गँवा दिया।

वर्ष 2010 एवं 2011 में एडीआर की ओर से अनिल बैरवार तथा वरिष्ठ नागरिक सुभाष चंद्र अग्रवाल ने राजनीतिक दलों से विभिन्न सूचना मांगी थी। सूचना नहीं मिलने पर मामला केंद्रीय सूचना आयोग में गया। आयोग ने तीन जून 2013 को आपसभी छह दलों को ‘लोक प्राधिकार‘ का दरजा दिया था। इस फैसले का आधार यह था कि राजनीतिक दलों को आयकर में भारी छूट, कार्यालयों हेतु सस्ती दर पर जमीन और भवन, चुनाव प्रचार हेतु रेडियो-टीवी पर निशुल्क प्रचार का अवसर इत्यादि दिये जाते हैं। साथ ही, राजनीतिक दलों के पास अपने सांसदों, विधायकों इत्यादि के माध्यम से विभिन्न संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप के महत्वपूर्ण अधिकार हैं। इस तरह इन दलों के संचालन में सरकार के संसाधनों का पर्याप्त हिस्से का उपयोग होता है।  लिहाज़ा, इन्हें ‘लोक प्राधिकार‘ समझा जाना चाहिए। इसका आशय यह है कि इन दलों को अपने कार्यालय में जनसूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी नियुक्त करने होंगे। लेकिन सब दलों ने उस आदेश पर चुप्पी साध ली। उस आदेश का न तो पालन किया, न उसे अदालत में चुनौती दी और न ही सूचना कानून में कोई बदलाव करके खुद को इससे बाहर करने की हिम्मत दिखाई। इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि जिन राजनीतिक दलों ने संसद में सूचना कानून बनाया, उसका पालन वे स्वयं नहीं करेंगे तो आखिर देश में कानून का राज कैसे स्थापित होगा?

सूचना का अधिकार कानून के अनुसार ‘लोक प्राधिकार‘ से तात्पर्य ऐसे संस्थान से है, जिसकी स्थापना संविधान द्वारा अथवा संसद या विधानसभा के कानून द्वारा हुई हो, अथवा जो सरकारी संसाधनों से चलता हो। इसमें ऐसी गैर-सरकारी संस्थाएं भी शामिल हैं, जो सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से वित्तपोषित हों।

सूचना कानून पर सभी दलों का एक हो जाना सबके सत्ताकेंद्रित और जनविरोधी चरित्र का उदाहरण है। हैरानी की बात है कि 16 से 18 अगस्त 2017 तक केंद्रीय सूचना आयोग में सोनिया गांधी, राजनाथ सिंह, मायावती, शरद पवार तथा सीपीआइ, सीपीएमके केंद्रीय नेताओं की सुनवाई संबंधी नाटिस की बड़ी खबर को मीडिया ने पूरी तरह से गायब कर दिया। इस सुनवाई को अचानक स्थगित करना भी मीडिया के लिए खबर नहीं बना। इतने बड़े मामले पर मीडिया की चुप्पी का कारण भी समझना होगा। दरअसल यह आरटीआई को खत्म करने का कारपोरेट का खेल है। उनकी सूचनाएं उजागर न हो, इसके लिए राजनीतिक दलों को ढाल बनाया गया है। मीडिया का कारपोरेट हितों से रिश्ता भी जगजाहिर है।

सच यह है कि वामदलों के पास छुपाने के लिये कुछ भी नहीं। आरटीआई में उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। लेकिन अभी उनकी भयग्रंथि का लाभ अन्य दल उठा रहे हैं। काँग्रेस और भाजपा ने खुद के साथ ही कारपोरेट एवं निजी घरानों, खेल संघों,एनजीओ, ट्रस्ट, कोपरेटिव, मीडिया, धार्मिक न्यास इत्यादि को भी आरटीआई से बाहर निकालने का रास्ता खोजा है।

इस प्रसंग में चुनाव आयोग के साथ सूचना आयोग की तुलना करना भी प्रासंगिक होगा। गत दिनों चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने राजनीतिक दलों को खरी खोटी सुनाई। दिल्ली के एक कार्यक्रम में उन्होंने चुनाव जीतने के हथकंडों पर नेताओं की क्लास ली। सारे नेता भीगी बिल्ली बने सुनते रहे।

चुनाव आयोग के हर आदेश को सभी पार्टियां तुरंत मानती हैं। गुजरात में राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के दो विधायकों का वोट रद्द करने का चुनाव आयोग का आदेश तत्काल लागू हो गया। इस आदेश का व्यापक प्रभाव पड़ा। लेकिन चुनाव आयोग के आगे थर-थर कांपने वाली पार्टियां सूचना आयोग को ठेंगा दिखा रही हैं। जबकि दोनों की वैधानिक स्थिति समान है। कारण यह है कि सूचना आयोग के माध्यम से आम नागरिकों को सूचना देनी होगी। यह सत्ताधारियों के लिए ज्यादा तकलीफदेह बात लगती है।

दिलचस्प बात यह है कि आज राजनीतिक दलों की कारपोरेट फंडिंग पर सभी पार्टियां शासकवर्गीय पार्टियां एकजुट हैं। उनका अलोकतांत्रिक चरित्र भी जगजाहिर है। ऐसे मामलों में आरटीआई का उपयोग करके इन दलों की अलोकतांत्रिक कार्यशैली,भ्रष्टाचार, अनैतिक चरित्र, अवसरवाद, भाई-भतीजावाद इत्यादि का खुलासा करने का काफी अवसर है। लेकिन खुद को आरटीआई से बाहर रखने की जिद में वाम दल अपने कार्यकर्ताओं को आरटीआई के उपयोग की प्रेरणा नहीं दे पाते। इसलिए वे बड़े अवसरों से भी वंचित हैं। वामदल अपने संकुचित दायरे से निकलकर ऐसे मामले उठाएं, तो वैकल्पिक राजनीति संभव है।

इसी तरह, बीसीसीआई तथा खेल संघों को जवाबदेह बनाने में भी आरटीआई को अच्छा उपयोग संभव है। लेकिन लेफ्ट ने लोक प्राधिकार की परिभाषा को संकुचित करके यह मौका गंवा रखा है। अगर वामपंथ ने आरटीआई से इसी तरह परहेज रखा, तो केंद्रीय और राज्यों के सूचना आयोगों में भी लिजलिजे लोगों को सदस्य बनाकर इस कानून को कमजोर करना जारी रखा जाएगा।

फिलहाल यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि  क्या सीपीआई और सीपीएम ने देश में वैकल्पिक राजनीति का एजेंडा पूरी तरह छोड़दिया है? दिलचस्प यह है कि सीपीआई ने पहले भी आरटीआई में सूचना दी है। अब भी वह इसके दायरे में आने के लिए तैयार है। लेकिन कह रही है कि हम सांगठनिक सूचना नहीं देंगे।

एक वाम बुद्धिजीवी के अनुसार वाम दलों को भ्रम है कि उन्हें पार्टी की गोपनीय सूचना देनी होगी। संभवतः सीपीआई ने आरटीआई एक्ट में सूचना नहीं देने संबंधी प्रावधान पर गौर नहीं किया है। एक्ट की ‘धारा आठ‘ में व्यक्तिगत अथवा गोपनीय सूचना लेने पर स्पष्ट रोक है। ‘धारा 11‘ में भी तीसरे पक्ष की सूचना पर रोक के नियम हैं। इसलिए कोई दल अपने किसी सदस्य की सूचना नहीं देना चाहें, तो कोई दिक्कत नहीं आएगी। चंदे की भी उतनी ही सूचना देनी पड़ेगी, जितनी आयकर विभाग को देते हैं।

ध्यान रहे कि सारे एनजीओ और सरकारी ऑफिस अपनी सूचना दे रहे हैं। किसी को परेशानी नहीं हो रही। ऐसे में सीपीआई,सीपीएम को भी इस भयग्रंथि से बाहर निकलना चाहिए। कोई भी ऐसी अनुचित सूचना नहीं, जो वह नहीं देना चाहें तो उन्हें बाध्य किया जाएगा। इसलिए वामदलों को तत्काल आरटीआई एक्ट के तहत सूचना देने की घोषणा करनी चाहिए। एक नागरिक ने सीपीआई और सीपीएम के केंद्रीय कार्यालय के पते पर 19.8.17 को स्पीड पोस्ट से एक आरटीआई आवेदन भेजा है। इसमें बेहद मामूली सूचना मांगी है। यह सूचना देने से मामले का पटाक्षेप हो सकता है। सीपीआई और सीपीएम की एक पहल से यह सारा खेल खत्म हो जाएगा। वामपंथ को एक नई इज्जत मिलेगी। वाम दलों को जब यह पूरा मामला समझ में आएगा, तो खुद हैरानी होगी कि अब तक इससे इतना डर क्यों रहे थे।

लिहाजा, वाम दलों को स्पष्ट स्टैंड लेना होगा कि अपनी पार्टी की सूचना देने की कतिपय उलझन से बचने के लोभ में सूचना कानून को कमजोर करने की साजिश का में शामिल हों, अथवा नहीं। दूसरी ओर, आरटीआई का जोरदार उपयोग करते हुए देश भर में बड़े पैमाने पर भंडाफोड़ तथा आम नागरिकों व कार्यकर्ताओं के सशक्तिकरण का शानदार अवसर भी वाम दलों के सामने है।



 

विष्णु राजगढ़िया

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और आरटीआई विशेषज्ञ हैं।)



 

1 COMMENT

  1. वर्गीय संघर्ष छोड़कर बुर्जुआ राजनीती करने का नतीजा.
    अपनी ‘आमदनी’ को छुपाने की चाहत में कौंग्रेस, भाजपा, राजद, सपा, बसपा, आदि के बुर्जुआ राजनीती के झंडा को ही बुलंद किया. 2012 के जन आन्दोलन में केवल माध्यम वर्ग ही नहीं थे, बल्कि किसान और मजदुर भी थे! यह कर्तव्य बनता था कि वाम उसमे शामिल होता और पूरी समर्थन देता!
    आज का वाम का नेत्रित्व सुविधा परस्त हो चूका है और अब उसके वश की बात नहीं है की वह किसी भी वर्ग संघर्ष को नेत्रित्व दे सके. और इसीका नतीजा है वैचारिक भटकाव, नहीं पूर्णतः संशोशाधनवाद, मजदूर वर्ग के साथ गद्दारी!
    फासीवाद के खिलाफ इनके साथ मोर्चा, जिन्होंने फासीवाद को उभरने का जमीन तैयार किया? निचले स्तर के काडर के साथ तो संभव है पर इनके शीर्ष और माध्यम स्तर के नेता के साथ? हरगिज नहीं!

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