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दिल्‍ली असेंबली गवाह है कि संसद में विपक्ष का नेता ‘संवैधानिक पद’ है, 10 फीसद के अधीन नहीं

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मीडियाविजिल डेस्‍क


संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सबसे अहम होती है. संसद के भीतर सरकार के कामकाज और नीतियों पर नज़र रखना और जनता के मुद्दों को लेकर सत्ता से सवाल करना उसका कर्तव्य है. संसदीय अधिनियम 1977 के अनुसार संसद में सबसे बड़े विपक्षी दल या गठबंधन जिसके भी सदस्यों की संख्या ज्यादा हों, उसके सबसे वरिष्ठ नेता को संसद में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी जाती रही है.

अब जब नई लोकसभा का गठन हो चुका है ऐसे में लोकसभा में ‘नेता प्रतिपक्ष /विपक्ष का नेता’ का मुद्दा फिर से चर्चा का विषय बन सकता है क्योंकि पिछली लोकसभा के दौरान सबसे बड़ा विपक्षी दल कांग्रेस थी लेकिन स्पीकर ने उसके नेता को सदन में नेता प्रतिपक्ष की मान्यता देने से इंकार कर दिया था. इस मुद्दे पर हंगामा भी हुआ था.

अब 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद जब नई लोकसभा का गठन हो चुका है तो ऐसे में देखना यह है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी संसद में इस मुद्दे पर इस बार क्या रुख अपनाती है.

मीडिया में चर्चा है कि कांग्रेस लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद का दावा नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास 10 फीसदी सांसद नहीं हैं जबकि संसद के अधिनियम में ऐसा कोई कानून नहीं है.

इस मसले पर लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचारी का कहना है कि विपक्ष का नेता एक ‘वैधानिक पद’ है और 10 प्रतिशत का नियम कानून में नहीं है. उन्‍होंने यह बात ‘दि वायर’ पर लिखे एक लेख में समझायी है।

आचारी के अनुसार ‘विपक्ष का नेता’ उन प्रमुख संसदीय पदाधिकारियों में से एक है जिनकी भूमिका (हालांकि यह किसी भी नियम में परिभाषित नहीं है) विधायिका के कामकाज में बहुत महत्वपूर्ण होती है और मुख्य विपक्षी दल का वरिष्ठतम नेता ही विधायिका में प्रतिनिधित्व  करता है.

अपने लेख में आचारी ने ब्रिटिश संसद का उदाहरण देकर समझाया है कि वहां विपक्ष इतना महत्वपूर्ण है कि वहां विपक्ष के नेता को ‘शैडो प्राइम मिनिस्टर’ यानी छाया प्रधानमंत्री के रूप में जाना जाता है. अगर किसी सूरत में सरकार गिरती है तो वह सरकार संभालने की स्थिति में तैयार रहता है. इतना ही नहीं, वहां विपक्ष का नेता एक शैडो कैबिनेट या छाया मंत्रिमंडल भी बनाता है. इसी प्रकार वेस्टमिंस्टर परंपरा के तहत इस संसदीय पदाधिकारी की भूमिका न केवल सरकार का विरोध और आलोचना करना है, बल्कि मौजूदा सरकार के गिरने स्थिति में उसे एक वैकल्पिक सरकार बनाने की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार रहना होता है.

आचारी के अनुसार, ‘नेता प्रतिपक्ष’ एक वैधानिक पद है. पार्लियामेंट एक्ट 1977 के तहत विपक्ष के नेताओं के वेतन और भत्तों में इसे परिभाषित किया गया है. सरकार के विरोध में संख्यात्मक रूप से सबसे बड़ी पार्टी के नेता के रूप में और स्पीकर/अध्यक्ष द्वारा मान्यता दी जाती है.

संसद अधिनियम, 1977 के मुताबिक विपक्ष के नेताओं के वेतन और भत्ते के तहत, जब नेता प्रतिपक्ष का पद एक वैधानिक पद है तो ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष/स्पीकर का यह कर्तव्य है कि उचित और योग्य व्यक्ति को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दें. ऐसे में विपक्ष का नेता कौन बन सकता है और उसे कैसे पहचाना जाना चाहिए आदि के लिए कोई जगह नहीं है.

जब विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी से अनुरोध आता है, तो स्पीकर कानूनी रूप से उस पार्टी के नेता को विपक्ष के नेता के रूप में पहचानने के लिए बाध्य होता है.

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह क़ानून विपक्ष में संख्यात्मक रूप से सबसे बड़ी पार्टी को एक नेता को स्पीकर द्वारा विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने का अधिकार देता है.

नई लोकसभा में, 52 सदस्यों के साथ, कांग्रेस विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी है, और इसलिए कानून के तहत इस पद के लिए वही सही दावेदार है. इस बारे में कोई अस्पष्टता नहीं है क्योंकि इस बिंदु पर कानून बिल्कुल स्पष्ट है. इस ‘संवैधानिक कानून’ के पालन में स्पीकर अपनी निजी राय या विवेक से कोई निर्णय लेने का अधिकार नहीं रखता है.

सदन के एक सदस्य को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देना एक वैधानिक/क़ानूनी निर्णय है, यह कोई राजनीतिक या अंकगणितीय निर्णय नहीं है. जब कानून स्पष्ट है, तब भी इस विषय पर भ्रम और विघटन क्यों है?

आचारी ने लिखा है कि दिल्ली विधानसभा में विपक्षी दल बीजेपी के केवल 3 सदस्य होने पर भी विधानसभा स्पीकर राम निवास गोयल द्वारा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (वेतन और भत्ते) अधिनियम, 2001 के तहत भारतीय जनता पार्टी के नेता को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी गई थी.

दिल्ली स्पीकर ने भाजपा के तीन सदस्यीय विधायक दल के एक सदस्य को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दे कर सही फैसला लिया था क्योंकि विधानसभा में आम आदमी पार्टी की सरकार के विरोध में संख्यात्मक रूप से सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी कानूनी रूप से इस पद की हकदार थी.

जब दिल्‍ली में ऐसा कानूनन हुआ है तो केंद्र में क्‍या दिक्‍कत है।


पीडीटी आचारी के दि वायर पर प्रकाशित लेख के ऊपर आधारित

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