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लद्दाख : पश्‍मीना के धागों का कश्मीरी बंधन और 370 का ‘अदृश्‍य वरदान’!

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श्रीनगर से लेह जाते समय जैसे ही आप करगिल पार करते हैं, दो खास बदलाव दिखाई देते हैं। पहला कश्मीर की हरी-भरी वादियां बंजर पथरीले वीरानों (जिन्‍हें कोल्ड डेजर्ट कहा जाता है) में बदल जाती हैं। और दूसरा- लोग! लद्दाखी लोग!

सियासी नक्शे पर बेशक करगिल को लद्दाख का हिस्सा माना जाता है पर वहां के लोग कश्मीर की वादी के जैसे ही लगते हैं। मजहब, तहजीब सब कुछ कश्मीरी! असल लद्दाख शुरू होता है करगिल के बाद! जैसे ही आप करगिल से आगे बढ़ते हैं, लोगों का पहनावा, खान-पान, नाच-गाना, रीति-रिवाज, बोली और यहां तक कि शक्ल सूरत भी बदली नजर आती है। लद्दाखी लोग नस्ली तौर पर हिमाचल के और सांस्कृतिक व धार्मिक रूप से तिब्बत के ज्यादा करीब हैं। ज्यादातर लद्दाखी बौद्ध धर्म को मानते हैं। उनकी लद्दाखी बोली, तिब्बती भाषा का एक डायलेक्ट है। दिखने में भी हिमाचलियों जैसे छोटे कद, चपटी नाक वाले हैं। कश्मीर के ऊंचे-पूरे, गोरे-चिट्टे आर्य नाक-नक्श वालों से इनका कोई मेल नहीं है।

भारत की आजादी के समय सियासी तौर पर चूंकि लद्दाख जम्मू कश्मीर स्टेट का हिस्सा था, इसलिए हमने बगैर उनसे पूछे कि वह क्या चाहते हैं उन पर भी धारा 370 लागू कर दी। कश्मीर में धारा 370 लगाने की वाज़िब वजहें रही होंगी, परंतु लद्दाख बेवजह ही धारा 370 की चक्की में घुन की तरह पिस गया!

कश्मीर और लद्दाख की बेमेल शादी का इतिहास 200 साल पुराना है। इस कहानी की शुरुआत हुई थी पश्मीना ऊन से होने वाले मुनाफे के लालच में!

लद्दाख हमेशा सियासत से दूर रहा है। दरअसल, इस बंजर में ऐसा कुछ नहीं होता था जिसके लिए कोई राजा इस पर कब्जा करने की कोशिश करता, इसलिए इतिहास ने लद्दाखी लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया। वे आदिम तौर-तरीकों और जंगल के दिनों के औजारों से अपनी जिंदगी बसर करते रहे। विज्ञान का सबसे पहला अविष्कार पहिया भी इन पहाड़ी रास्तों पर बेकार था इसलिए सब कुछ आदिम ही बना रहा।

लद्दाख में पहली बार किसी राजा की दिलचस्पी हुई तो वे थे पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह, जिनका साम्राज्य कश्मीर तक फैल चुका था। सन् 1819 में कश्मीर के सिख दरबार में शामिल होने से पहले कश्मीर में अफगान राजाओं की हुकूमत थी। उस समय कश्मीर अपनी पश्मीना शॉलों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। अफगान राजाओं के अत्याचार और बदइंतजामियों से परेशान हो कश्मीर के कई शॉल बुनकर अमृतसर और लुधियाना जैसे मैदानी इलाकों में चले गए थे। मगर शॉल बनाने के लिए इन्हें पश्चिमी तिब्बत में पैदा होने वाली पश्‍मीना ऊन चाहिए थी। कश्मीर के खराब हालात की वजह से उन्होंने स्पीति और किन्नूर घाटी के रास्ते से ऊन मंगवाना शुरू की जिससे कश्मीर के व्यापार को दोहरा नुकसान होने लगा। इस नए रास्ते से व्यापार को बढ़ावा देने में अंग्रेजों का भी हाथ था। अंग्रेजों ने स्पीति के रास्ते दुरुस्त किए और तिब्बती व्यापारियों को कश्मीरियों के मुकाबले ज्यादा दाम देना शुरू किया।

महाराजा रणजीत सिंह के अधीन जम्मू के राजा डोगरा गुलाब सिंह इस पश्‍मीना व्यापार पर अपना कब्जा करना चाहते थे। इसके लिए जरूरी था पहले लद्दाख, फिर तिब्बत पर अपना कब्जा करना।

गुलाब सिंह ने अपने कमांडर जोरावर सिंह को 1834 में लद्दाख फतह करने के लिए भेजा। भोले-भाले आदिवासी लद्दाखी लोग जंग का मतलब भी ठीक से नहीं जानते थे। लद्दाख के पास कोई सेना नहीं थी। बताते हैं कि जब जोरावर सिंह अपनी सेना लेकर लद्दाख पहुंचा तो उससे लड़ने के लिए लद्दाखियों के पास लाठी के अलावा कोई हथियार नहीं था। उन्होंने जल्द हार मान ली। लद्दाख के राजा को संधि करनी पड़ी और जंग के बदले पचास हजार रुपए का दंड और बीस हज़ार रुपए सालाना लगान की शर्त मानना पड़ी। लद्दाख पर अब जम्मू रियासत की हुकूमत थी।

लद्दाख के राजा ने इस बीच कई बार अंग्रेजों से मदद की गुहार लगाई, पर अंग्रेज महाराजा रणजीत सिंह को नाराज नहीं करना चाहते थे। फिर लद्दाख के पास ऐसा था भी क्या जिसमे अंग्रेजों की दिलचस्पी होती! इस तरह लद्दाख डोगरा रियासत का हिस्सा बना रहा। सन् 1846 में गुलाब सिंह ने कश्मीर को अंग्रेजों से खरीद लिया और इस तरह लद्दाख जम्मू-कश्मीर स्टेट का हिस्सा बना। इसीलिए जब जम्मू कश्मीर रियासत को कुछ शर्तों के साथ भारत में शामिल किया गया तो वे तमाम बंधन लद्दाख पर भी लागू हो गए। सदियों से सियासी हाशिये पर खड़े लद्दाख से इस बार भी किसी ने नहीं पूछा कि आप  क्या चाहते हैं।

भारत की आजादी के बाद से लद्दाख के लोग खुद को जम्मू कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाने की लिए मांग करते रहे मगर कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हुआ। जहां जिंदा बचे रहने के लिए लगातार कुदरत के खिलाफ जंग लड़ना पड़ती हो, जहां छह महीनों के लिए आप दुनिया से कट जाते हों, वहां सियासत करने की हिम्मत कौन जुटाए।

अलग होने के बेशक अपने फायदे थे। सबसे बड़ा फायदा आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण का था जो उन्हें अब तक नहीं मिला। दूसरा बड़ा फायदा था व्यापार। धारा 370 की वजह से लद्दाख में भी बाहर के व्यापारी कोई इन्वेस्टमेंट नहीं कर सकते थे।

मगर कुछ लोगों की राय अलग है। वे धारा 370 को ‘ब्लेसिंग इन डिसगाइज’ यानी अदृश्‍य वरदान मानते हैं। उनका मानना है कि इस धारा से कुछ नुकसान जरूर हुए हैं, मगर बाहरी लोगों के नहीं आने की वजह से जो थोड़ा बहुत है इस पर उनका मालिकाना हक है। वे बाहरी लोगों के नौकर नहीं बने और दूसरे, इस वजह से उनकी संस्कृति अब तक बची हुई है।

मीलों तक फैले बर्फीले बंजर रेगिस्तान में जहां कुछ पैदा नहीं होता, गरीबी और अभाव के बीच संघर्ष कर रहे लद्दाख के इस हौसले को सलाम करने को जी चाहता है।

लद्दाख अपने इतिहास के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। पहली बार उसे मौका मिला है कि बेमेल बंधनों से छूटकर वह अपनी राह खुद तय कर सके। भोले-भाले लद्दाखियों को देश भर की दुआओं की ज़रूरत है।


संजय वर्मा यायावर और लेखक हैं। इंदौर में रहते हैं।

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