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मोदी साथ हैं तो क्या अडानी ग्रुप ज़मीन न देने वाले किसानों को वहीं गाड़ने की धमकी देगा!

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल लखनऊ में ऐलान किया कि वे उद्योगपतियों के साथ खड़े होने पर शरमाते नहीं हैं। उनकी नीयत साफ़ है। लेकिन ऐसा क्यों है कि पूरे देश में आदिवासी में इलाक़ों तमाम नियम क़ानूनों की अनदेखी करके बीजेपी सरकारें उद्योगपतियों के लिए ज़मीन लूटने में जुटी हैं।  क्या यह बदनीयती नहीं है। मोदी का साथ पाकर उद्योगपतियों ने भी शरमाना छोड़ दिया है। मोदी जी ने उन्हें चोर न होने का सर्टिफिकेट दे ही दिया है तो वे लूट से क्यों शरमाएँ। पढ़िए और सुनिए कि झारखंड की बीजेपी सरकार किसानों पर क़हर बरपाने के लिए किस तरह अडानी के साथ खड़ी है- संपादक

 

 

प्रवीण कुमार

 

झारखंड के गोड्डा जिले में अडानी पावर प्लांट के काम तेज गति से चल रहा है. लेकिन जिन किसानों ने अपनी जमीन अडानी पावर प्लांट को नहीं दिया है, उनके समक्ष आजिविका का संकट खड़ा हो गया है. किसान जब भी अपने खेत में खेती-बारी का काम करने जाते हैं, कंपनी और जिला प्रशासन के लोग उन्हे रोक देते हैं. बताया जाता है कि करीब 85 फीसदी किसानों ने अपनी जमीन पावर प्लांट को दे दी है, लेकिन 15 फीसदी किसान अब भी जमीन देने का विरोध कर रहे हैं. आरोप है कि विरोध करने वाले किसानों को तरह-तरह से परेशान किया जा रहा है. उन्हे अपनी जमीन पर खेती करने से भी रोका जा रहा है.

 

क्या कहते है अडानी पावर प्लांट को जमीन नही देने वाले किसान ?

किसानों का आरोप है कि कंपनी ने पावर प्लांट लगाने के लिए चार मौजा की जमीन की घेराबंदी शुरु कर दी है. इसमे वैसे किसानों की जमीन की भी घेराबंदी की जा रही है जो अपनी जमीन नहीं देना चाहते और उन्होने कंपनी या सरकार से किसी तरह का मुआवजा भी नहीं लिया है. किसानों का ये भी आरोप है कि जमीन नहीं देने वाले किसानों को कंपनी के लोग जमीन में गाड़ देने की धमकी दे रहे हैं. इतना ही नहीं जमीन न देने वाले किसानों को फर्जी मुकदमें में फंसाने की कोशिशें की जा रही है.

बांग्लादेश को दी जाएगी बिजली

कंपनी का लक्ष्य है कि साल 2021 तक अडानी पावर प्लांट से बिजली का उत्पादन शुरु हो जाए. केन्द्र सरकार के उर्जा मंत्रालय ने 2014 में बांग्लादेश सरकार के साथ बिजली आपूर्ति को लेकर समझौता किया था. इस समझौते के तहत संताल परगना में 800 मेगावाट क्षमता के दो प्लांट लगाने का काम केन्द्र सरकार ने दिया है. इस प्लांट से पैदा होने वाली बिजली बांग्लादेश को दी जाएगी.

अडानी पावर प्लांट के लिए राज्य की ऊर्जा नीति में किया गया था संशोधन

 

 

आरोप है कि झारखंड सरकार ने प्लांट लगाने के लिए कई नीतियों में बदलाव कर कंपनी को फायदा पहुंचाने का काम किया है. राज्य सरकार ने अडानी के पावर प्लांट के लिए उर्जा नीति 2012 में संशोधन किया था. प्लांट के विरोधियों का आरोप है कि इस संशोधन से झारखंड सरकार को हर वर्ष 294 करोड़ रुपये का नुकसान होगा. इस तरह 25 वर्षों में नुकसान की राशि लगभग 7 हजार 400 करोड़ हो जाएगी. इस मुद्दे पर महालेखाकार (एजी) ने भी सवाल खड़े किये हैं. सरकार ने एजी को भेजे जवाब में कहा था कि अडानी पावर प्लांट के साथ की गई एमओयू से राज्य को कोई नुकसान नहीं होगा.

जमीन अधिग्रहण के लिए की गई जनसुनवाई से ही रैयतो के साथ खेला जा रहा है खेल: चिंतामनी

पावर प्लांट के लिए जमीन नहीं देने वालों के नेता चिंतामनी का कहना है कि प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण की शुरुआत दलाल और बिचौलियो के माध्यम से की गई. भू-अर्जन की शुरुआत जनसुनवाई से होती है. 6 दिसंबर 2016 को दो स्थानों, पोडैयाहाट और मोतिया, में जनसुनवाई की गई. चिंतामन का आरोप है कि दोनों स्थानों पर सरकार और कंपनी के द्वारा कानून को ताक पर रखकर जनसुनवाई की प्रक्रिया संपन्न करायी गई. जनसुनवाई में फर्जी लोगों को बुलाया गया.

जहां की जा रही है घेराबंदी, वहां 15 प्रतिशत से अधिक रैयतों ने नहीं लिया है मुआवजा

आरोप है कि जमीन अधिग्रहण के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया जा रहा है. चिंतामनी बताते हैं कि आडानी पावर प्लांट के लिए कुछ बड़े किसानों ने स्वेच्छा से अपनी जमीन दी है, लेकिन छोटे और मंझोले किसान जमीन नहीं देना चाहते थे. ऐसे किसानों पर दलाल और बिचौलियों के माध्यम से दबाव डाला जा रहा है. उन्हे फर्जी मुकलमें में फंसाने की धमकी दी जा रही है. किसानों का आरोप है कि जिन्होने अभी तक कंपनी को अपनी जमीन नहीं दी है, उन किसानों की जमीन की भी घेराबंदी की जा रही है.

90 फीसदी लोग जमीन दे चुके हैं, प्लांट यहीं लगेगा- डीसी

गोड्डा के डीसी का कहना है कि 90 फीसदी लोगों ने कंपनी को जमीन स्वच्छा से दी है. 10 फीसदी लोग राजनीतिक कारणों से विरोध कर रहे हैं. इस दस फीसदी लोगों के विरोध करने से कुछ नहीं होगा. प्लांट यहीं पर लगेगा.

अडानी को कितनी जमीन की जरुरत, कितनी जमीन के अधिग्रहण के लिए निकाली गई अधिसूचना ?

अडाणी पावर प्लांट के लिए गोड्डा जिले के 9 मौजों में 1200 एकड़ जमीन ली जानी है. इसमें गोड्डा अंचल और पोड़ैयाहाट अंचल की जमीन शामिल थी. आडानी पावर प्लांट के लिए कुल 2280 एकड़ जमीन की जरूरत बताई गई थी. वर्तमान में 917 एकड़ में प्लाट लगाने की बात कही जा रही है.

अधिसूचना में किस मौजा की कितनी जमीन ?

गोडडा अंचल के चार गांव की जमीन

गंगटा- (थाना नंबर-305) की 275.20 एकड़ जमीन
मोतिया- (थाना नंबर 01) की 167.24 एकड़ जमीन
नयाबाद- (थाना नंबर 306) की 99.16 एकड़ जमीन
पौटवी- (थाना नंबर 304) की 59.70 एकड़
गायघाट- (थाना नंबर 26) की 192.58 एकड़
बलियाकिता- (थाना नंबर 12) की 152 .49 एकड़
सोनाडीह- (थाना नंबर 10) की 377.49 एकड़
पैटवी- (थाना नंबर 28) की 287.36 एकड़
रेगांनिया- (थाना नंबर 11) की 104.57 एकड़

घेराबंदी वाले इलाके में 100 से भी ज्यादा डीप बोरिंग

जमीन अधिग्रहण को लेकर हो रहे विरोध के बाद कंपनी ने अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट के लिए 600 एकड़ जमीन पर प्लांट बनाने का काम शुरु कर दिया है. घेराबंदी वाले इलाके में 100 से भी अधिक डीप बोरिंग की गई है. ग्रामीणों का आरोप है कि इससे इलाके का जलस्तर प्रभावित होगा. उनका कहना है कि कंपनी की डीप बोरिंग के कारण गर्मी के दिनों में आसपास के गांव के कुएं का पानी सूख गया था.

बिना मेरी सहमति के ही कंपनी ने मेरी जमीन का घेराबंदी कर लिया : चिंतामन

चिंतामन का आरोप है कि अडानी पावर प्लांट के द्वारा मेरे और मेरे भाइयों की 5 एकड़ जमीन कंपनी द्वारा घेराबंदी कर ली गई है. मैं जमीन आडानी को देने के पक्ष में नहीं हूं क्योंकि इससे ही हमारी अजीविका चलती है.

जमीन नहीं दोगे तो जमीन में गाड़ दिए जाओगे, अडानी का फरमान


प्लांट के लिए घेराबंदी के बाद अपनी जमीन पर निर्माण कार्य किये जाने का विरोध करने वाले किसान रामजीवन पासवान को अडानी के पावर प्लांट के कर्मचारियों ने धमकी दी थी. उन्हे कहा गया था कि आडानी पावर प्लांट के लिए जमीन नहीं दोगे तो उसी जमीन में गाड़ दिए जाओगे. जिससे किसानो और रैयतों के मन में कंपनी को लेकर भय व्याप्त हो गया है.

credit : newswing.com / संघर्ष संवाद