एयर स्ट्राइक की ‘मिस-रिपोर्टिंग’ से दुनिया की नज़र में जोकर बना भारतीय मीडिया !


दुनिया भर में भारतीय मीडिया की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयानबाज़ी और रिपोर्टिंग का मखौल उड़ रहा है.




दृष्टि शेखर

डोकलाम में भारत-चीन तनातनी के समय कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर चुटकी ली थी कि भारत सरकार देखती रह जाएगी और किसी दिन मीडियावाले चीन पर हमला कर देंगे. पाकिस्तान के साथ तनाव के मौजूदा दौर में भी मीडिया का यही रवैया है. यह एक स्थापित तथ्य है कि प्रोपेगैंडा सरकारों के लिए एक ताक़तवर और असरदार तरीक़ा होता है. इसमें उनका सबसे अहम हथियार मास मीडिया होता है. यहाँ कुछ सवाल उठाये जाने चाहिए- अगर पुलवामा आतंकी हमले और बाद के घटनाक्रम पर रिपोर्टिंग/विश्लेषण करते हुए मीडिया ने प्रोपेगैंडा किया है, तो उसका टारगेट क्या है, मीडिया किससे मुख़ातिब है और इसका फ़ायदा किसको हो रहा है? यदि हम मान लें, जैसा कि ‘द वाशिंगटन टाइम्स’ में वसुंधरा सिरनेट ड्रेनन और सुचित्रा विजयन ने अपने शानदार विश्लेषण में बताया है, मीडिया केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रोपेगैंडा कर रहा है, तो क्या उससे यह काम भी ठीक से हो पा रहा है? सबसे अहम सवाल यह है कि भारतीय मीडिया की कारस्तानी से क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार, सेना और रक्षा नीति और कूटनीति को फ़ायदा हो रहा है या नुक़सान हो रहा है!

हम याद करें कि जिस पल पुलवामा में आतंकी हमले की ख़बर आयी, ठीक उसी वक़्त हमारे ख़बरिया चैनलों ने यह भी बता दिया था कि आत्मघाती हमलावर वाहन में तीन सौ किलो बारूद लेकर आया था. तब और बाद में भी इस बाबत सरकार, सुरक्षाबलों और जाँच एजेंसियों ने बारूद के वज़न के बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की थी, पर यह कई दिनों तक चैनलों-अख़बारों में कहा जाता रहा. फिर बालाकोट में भारत की ओर से जवाबी कार्रवाई हुई. वायु सेना के लड़ाकू विमानों द्वारा नियंत्रण रेखा और पाक-अधिकृत कश्मीर को पार कर पाकिस्तानी धरती पर बने आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने पर विदेश सचिव विजय गोखले ने आधिकारिक बयान दिया था. उस बयान में मरनेवालों की ‘बड़ी संख्या’ का उल्लेख था, पर कोई तादाद नहीं बतायी गयी थी और न ही इस्तेमाल हुए बारूद की मात्रा की जानकारी दी गयी थी. लेकिन हमारी मीडिया ने तीन सौ आतंकियों के मारे जाने और हज़ार किलो बारूद का बम गिराने की ख़बरें चलायीं. दिलचस्प यह है कि मीडिया के साथ भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों ने शून्य से चार सौ तक के मारे जाने के बयान दिए. इसी बीच रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को फिर कहना पड़ा है कि विदेश सचिव का बयान ही सरकार का आधिकारिक बयान है. परंतु बालाकोट के आतंकी शिविर में मारे जानेवालों की संख्या के बारे में क़यास लगाने का यह सिलसिला अब भी जारी है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के 400 आतंकियों के मारे जाने के बयान के साथ गृह मंत्री राजनाथ सिंह का भी बयान आया कि नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन के हवाले से पता चला है कि उस शिविर की जगह पर क़रीब तीन सौ मोबाइल फ़ोन सक्रिय थे. 

मीडिया नेताओं-मंत्रियों के बयान उल्लिखित कर मरनेवालों की तादाद की बात और उसके बारे में विश्लेषण कर सकता था, लेकिन उसने भी उसी सुर में संख्या-राग अलापना शुरू कर दिया. ऐसा करते हुए मीडिया और सरकार दोनों ही एक अहम बात भूल गए थे. जब भी कोई ऐसी कार्रवाई होती है, तब दुनियाभर के रणनीतिक संस्थानों और विशेषज्ञों के साथ अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी पड़ताल में जुट जाता है. बालाकोट में भी यही हुआ. 

प्रतिष्ठित थिंक टैंक ‘ऑस्ट्रेलियन स्ट्रेटिजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट’ के ‘इंटरनेशनल साइबर पॉलिसी सेंटर’ के रिसर्चर नाथन रूसेर ने प्लेनेट लैब्स, गूगल अर्थ, डिजिटल ग्लोब और पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता के ट्वीट किए गए तस्वीरों के आधार पर बालाकोट हवाई हमले के दावों को ख़ारिज़ कर दिया. उन्होंने यह भी अंदेशा जताया कि यह घरेलू जनमानस की संतुष्टि के लिए किया गया था.

अमेरिका के प्रभावशाली थिंक टैंक ‘द अटलांटिक काउंसिल’ के ‘डिजिटल फ़ोरेंसिक रिसर्च लैब’ के माइकल शेल्डन ने उपलब्ध सबूतों का विस्तार से अध्ययन किया है. उनका निष्कर्ष है कि भारतीय विमानों ने बालाकोट के नज़दीक बम गिराए थे, उसके भीतर नहीं. उन्होंने यह भी कहा है कि जैशे-मोहम्मद के मदरसे से जुड़े भवनों तक ये बम पहुँचे, इसकी पुष्टि वे नहीं कर पा रहे हैं. शेल्डन ने आश्चर्य जताया है कि स्पाइस-2000 बम स्वायत्त होते हैं, फिर भी वे निशाने पर क्यों नहीं पहुँचे. इस रिपोर्ट में भी कहा गया है कि भवनों को नुक़सान नहीं पहुँचा है. यहाँ यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि दिल्ली के दक्षिणपंथी थिंक टैंक ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन’ के साथ ‘द अटलांटिक काउंसिल’ और दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास साझा कार्यक्रम कर चुके हैं. इन दोनों थिंक टैंकों में नज़दीकी संबंध है. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनने से पहले अजीत डोवाल ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन’ के मुखिया हुआ करते थे.      

इसी कड़ी में दुनिया की सबसे बड़ी न्यूज़ एजेंसियों में से एक रॉयटर का विश्लेषण है.सिमोन स्कार, क्रिस इंटोन और हान हुआंग ने मदरसे की जगह की फ़ोटो और सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण किया है. इस एजेंसी ने बालाकोट में अपने रिपोर्टर भी भेजा है, जिनके इनपुट का इस्तेमाल इस विश्लेषण में हुआ है. ‘एसोसिएट प्रेस’ ने भी बालाकोट जाकर वीडियो रिपोर्टिंग की, जिसमें हमले की पुष्टि थी, पर मामूली नुक़सान का उल्लेख किया गया.

यह कहा जाना चाहिए कि मीडिया, भाजपा और सरकार के वरिष्ठों के अपुष्ट दावों और बढ़-चढ़कर की गयी बयानबाज़ियों ने देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बालाकोट कार्रवाई को गंभीर जाँच का मुद्दा बना दिया. इसी कारण न सिर्फ़ विपक्ष, बल्कि सरकार में शामिल शिव सेना ने भी सरकार से सबूतों की माँग कर दी. इस माँग पर एक तरफ़ तो भाजपा के नेताओं और मंत्रियों ने विपक्ष को ही कोसना शुरू कर दिया, जबकि सत्ता पक्ष ख़ुद ही पूरे मामले का राजनीतिक लाभ लेने में जुटा हुआ है जिसकी अगुवाई ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कर रहे हैं. 

जैसा कि पहले बताया गया है कि रक्षा मंत्री ख़ुद कह रही हैं कि विदेश सचिव गोखले का बयान ही सरकार का आधिकारिक बयान है, पर सबूत देने और सरकार को बचाने की ज़िम्मेदारी मीडिया ने अपने ऊपर ले ली है और इस कोशिश में वह लगातार हास्यास्पद होता जा रहा है. ‘इंडिया टूडे’ की साइट पर एक कांग्रेसी नेता द्वारा सवाल उठाने की ख़बर देते हुए शीर्षक लगाया गया है कि उस नेता ने ‘फ़ॉरेन एजेंसी’ की रिपोर्ट को आधार बनाया है. यहाँ ‘फ़ॉरेन एजेंसी’ से इस रिपोर्ट का आशय ‘रॉयटर’ से है. मज़े की बात यह है कि ख़ुद ‘इंडिया टूडे’ और उसके अन्य चैनल आदि इन एजेंसियों से ख़बरें और इनपुट लेते रहे हैं. यह जगज़ाहिर है कि बाहर भारतीय मीडिया के अपने रिपोर्टर न के बराबर हैं और उसे एजेंसियों पर ही निर्भर रहना होता है. देश के अंदर भी यही हाल होता जा रहा है. इस मामले में मीडिया को समझना चाहिए कि उसकी ग़लती ने सबूत का सवाल पैदा किया है. संसद की स्थायी समिति ने भी सरकार से सबूत माँगा है. मीडिया अब एक बार फिर वही ग़लतियाँ दुहरा रहा है. फिर ‘सूत्रों’ के हवाले से कहा जा रहा है कि वायु सेना ने सरकार को बालाकोट कार्रवाई के सबूत दिए हैं. कुछ दिन पहले एक ऑडियो रिकॉर्डिंग देश को सुनाया गया और कहा गया कि इसमें जैश के किसी कमांडर की आवाज़ है, जिसमें भारतीय वायु सेना के हमले की बात कही गयी है. इसी कड़ी में मसूद अज़हर के मारे जाने या गंभीर रूप से घायल होने की अपुष्ट ख़बरें भी ख़ूब दिखायी गयीं.  

एनडीटीवी के अखिलेश शर्मा ने तो कमाल ही कर दिया. उन्होंने ‘रॉयटर’ द्वारा प्रकाशित सैटेलाइट तस्वीरों की व्याख्या करते हुए लिखा है कि इसमें नुक़सान नज़र आ रहा है. उसी रिपोर्ट के साथ चैनल का एक वीडियो है जिसमें उमाशंकर सिंह यही बात दुहरा रहे हैं. शर्मा की रिपोर्ट में एक जगह लिखा गया है कि वायु सेना ने सरकार को तस्वीरें दी हैं, जिनमें बम गिराने का असर दिख रहा है. तो, क्या अखिलेश शर्मा ने वो तस्वीरें देखी हैं, जो वायु सेना ने सरकार को दिया है? उसी रिपोर्ट में वे कहते हैं कि स्पाइस-2000 बम के सितंबर, 2016 में पोकरण में इस्तेमाल की तस्वीरें देखिए. पर तस्वीरें नहीं हैं! इस रिपोर्ट में एक जगह सिर्फ़ ‘रक्षासूत्रों’ का उल्लेख है. इसी रिपोर्ट में लिंक है कि आप इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ें. लिंक पर क्लिक करने पर जो रिपोर्ट सामने आती है, उसमें रिपोर्टर का नाम विष्णु सोम लिखा हुआ है. इस रिपोर्ट में बिल्डिंग की छत में छेद की बात तो है, पर शर्मा की रिपोर्ट के पोकरण का हवाला ग़ायब है. इसमें भी सूत्रों के हवाले से सरकार के पास सैटेलाइट तस्वीरें होने की बात है, पर शर्मा की तरह सोम यह नहीं बताते कि उनमें नुक़सान साफ़ दिख रहा है. सोम की रिपोर्ट में कुछ जानकारों के नाम के साथ बयान हैं, पर शर्मा की रिपोर्ट में नहीं. इस तरह की बातें अन्य कई चैनलों और साइटों पर हैं, जो बिना किसी ठोस आधार पर ‘रॉयटर’ और अन्य ऐसे अध्ययनों को ख़ारिज़ करने की कमज़ोर कोशिश है. रक्षा मामलों के जानकार अजय शुक्ला ऐसी रिपोर्टों को पूरी तरह नकारते हैं. उनका कहना है कि बम बिल्डिंग के भीतर जाकर फटेगा, तो बिल्डिंग को तबाह करा देगा.  

विंग कमांडर अभिनंदन के मामले में भी हमारी मीडिया का रवैया बेहद ख़तरनाक रहा था. जिन जानकारियों को वे पाकिस्तानी सेना को बताने से मना कर रहे थे, हमारे चैनल उन्हीं जानकारियों को विस्तार से दिखा-बता रहे थे. मीडिया की गुलाटी मारने की आदत से इस पूरे मामले में एक नया मोड़ आ गया है. भारतीय वायु सेना का कहना है कि अपने जहाज़ के तबाह होने से पहले विंग कमांडर ने पाकिस्तानी वायु सेना के एफ़-16 लड़ाकू विमान को मार गिराया था. बात यहीं तक रहती, तो कोई दिक़्क़त नहीं थी. पर, प्रवीण स्वामी जैसे धुरंधर पत्रकार ने ‘फ़र्स्ट पोस्ट’ पर एक थ्रिलर लिख दिया कि पाकिस्तानी जहाज़ के चालक को पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में भारतीय सैनिक समझकर पीट-पीटकर मार डाला गया. यह कहानी लंदन के एक वक़ील ख़ालिद उमर के फ़ेसबुक पोस्ट पर आधारित थी, जो उन्होंने एक मार्च को लिखा था. इस बात को अन्य कई भारतीय मीडिया के इदारों ने हू-ब-हू छापा. इस संदर्भ में ‘सूत्रों’ के हवाले से होती रही स्वामी की पत्रकारिता पर ‘द कैरेवान’ ने दिलचस्प विश्लेषण छापा है. इसे पढ़कर रक्षा और ख़ुफ़िया मामलों की ख़बरबाज़ी के बारे में समझ बनाने में मदद मिलती है. बाद में ख़बरें आयीं कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था और पाकिस्तानी एयर मार्शल का उस नाम को कोई बेटा नहीं है और उनके दोनों बेटों का पाकिस्तानी वायु सेना से कोई नाता नहीं है. ‘एशिया टाइम्स’ में सैकत दत्ता और कुंवर खुलदून शाहिद ने इस पर विस्तार से लिखा है.इस ख़बर को ‘फ़ेक न्यूज़’ के सेक्शन में रखा गया है. ‘सीएनएन’ के ब्रैड लेंडन ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि कुछ रिपोर्ट यह इंगित करते हैं कि पाकिस्तान ने अमेरिका से ख़रीदा गया एफ़-16 नहीं, बल्कि चीनी सहयोग से बना रहे एफ़-17 लड़ाकू का इस्तेमाल किया होगा.          

इस पूरे प्रकरण में भारतीय रक्षा नीति और कूटनीति पर नकारात्मक असर हो रहा है. दुनिया भर के मीडिया में भारतीय नेताओं और मीडिया की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयानबाज़ी और रिपोर्टिंग का मखौल उड़ रहा है. इसका फ़ायदा उठाने से पाकिस्तानी सरकार और मीडिया भी नहीं चूक रहे हैं. देश के भीतर राजनीतिक फ़ायदा उठाने और टीआरपी बटोरने की होड़ भारतीय हितों को ही नुकसान में डाल रही है. इस सिलसिले पर तुरंत रोक लगनी चाहिए.

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।