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4 जून: कैराना से पलायन की फर्ज़ी ख़बरों की याद दिलाता इतिहास का काला दिन!

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विनीत कुमार

 

आपको याद हो तो दो साल पहले आज ही के दिन दैनिक जागरण और जी न्यूज ने कैराना को लेकर एक ऐसी कहानी तैयारी की कि हिन्दुस्तान के लोगों के बीच रातोंरात यह संदेश फैल गया कि उत्तरप्रदेश के कैराना से हिन्दू परिवार, मुसलमानों के डर से घर छोड़कर जा रहे हैं, उनका तेजी से पलायन हो रहा है. इस चैनल और अखबार ने इस इलाके की ऐसी भयावह तस्वीर पेश की कि इस देश के पाठक और दर्शकों को लगने लगा कि केन्द्र सरकार की महत्वकांक्षी योजना विफल हो जा रही है और कश्मीर के तनाव का एक दूसरा संस्करण हिन्दी पट्टी में तैयार हो गया है.

दरअसल भाजपा के हुकूम सिंह ने इसकी पूरी पृष्ठभूमि तैयार की थी. उन्होंने एक लिस्ट जारी करते हुए बताया कि इस तरह से हिन्दू परिवारों का कैराना से पलायन हो रहा है. घटना से पहले इस अखबार और चैनल का प्लॉट तैयार था. दैनिक जागरण के सुधीर और जी न्यूज के राहुल सिन्हा (दोनों भाजपा के करीब माने जाते हैं)  ऐसी हवा बनाने का काम किया.

अब आज से दो साल बाद जब हम कैराना के उपचुनाव के बहाने वहां के स्थानीय लोगों के बयान टीवी चैनलों पर देखते हैं तो सहज अंदाजा लग जाता है कि इस अखबार और चैनल ने पत्रकारिता के नाम पर दरअसल किया क्या था? आप कैराना की जीत को भले ही भाजपा के विपक्षियों के एकजुट हो जाने तक ले जाकर समेट दें लेकिन हिन्दी पत्रकारिता बुरी तरह पराजित हुई है. उसने बता दिया कि पत्रकारिता के नाम किस तरह का हिन्दुस्तान बनाने जा रहे हैं?

हां, इन सबके बीच ये जरूर है कि उस वक्त भी नागरिकों ने जनतंत्र की रक्षा के लिए अपने विवेक का परिचय दिया था. कैराना से लौटकर मीडिया विजिल पर तब अभिषेक ( Abhishek Srivastava) ने अपनी रिपोर्ट में लिखा- ” पंजीठ गांव- जहां सबसे ज्‍यादा कथित पलायन की बात हुकुम सिंह की फर्जी सूची में सामने आई थी- के ग्राम प्रधान ने कई लोगों के हस्‍ताक्षरों के साथ जून के पहले सप्‍ताह में पांच तारीख को शहर कोतवाल को एक प्रार्थना पत्र दिया था जिसमें 4 जून को दैनिक जागरण के पेज नंबर छह पर छपी फोटो और खबर को गलत बताते हुए कुछ लोगों का नाम लिया गया था जो वहां सांप्रदायिक दंगा भड़काने की कोशिश कर रहे थे। इस खबर को हुकुम सिंह के रिश्‍तेदार सुधीर ने ही अख़बार में लगाया था। इस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।”

दैनिक जागरण और जी न्यूज का ये कोई पहला मामला नहीं है जहां वो समाज के एक समुदाय विशेष को धर्म के नाम पर पैनिक करने का काम करते हैं बल्कि कहीं न कहीं ये उनकी पत्रकारिता की पैटर्न है. लेकिन इन सबके बीच अच्छी बात है कि पत्रकारिता से भले ही जनतांत्रिक मूल्य तेजी से गायब हो रहे हों, लोगों के बीच अभी वो जिंदा है.

 

(विनीत कुमार मीडिया समीक्षक और शिक्षक हैं)

 

पढ़ें मीडिया विजिल में छपी अभिषेक श्रीवास्तव की वह एक्सक्लूसिव रिपोर्ट  जिसका जिक्र विनीत कुमार ने किया है–

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