Home पड़ताल तीन दिन की सियासी और पत्रकारीय करामात ने बच्‍चों के साथ तथ्‍यों...

तीन दिन की सियासी और पत्रकारीय करामात ने बच्‍चों के साथ तथ्‍यों को भी दफ़ना डाला!

SHARE

गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में लगातार जारी बच्‍चों की मौत के साये में राजधानी के पत्रकारों का जमघट लगा हुआ है, लेकिन वहां से जो रिपोर्टें राष्‍ट्रीय मीडिया में छन कर आ रही हैं उनके बीच ‘तथ्‍यात्‍मक’ फ़र्क नज़र आता है। यह फ़र्क एंसेफलायटिस वार्ड के प्रमुख डॉ. कफ़ील अहमद के संदर्भ में बिलकुल साफ़ देखा जा सकता है जो राज्‍य सरकार द्वारा नोडल अफ़सर के पद से हटाए जाने के बाद से अब तक मीडिया के सामने नहीं आए हैं। अटकलें लगाई जा रही हैं कि वे जल्‍द ही पत्रकारों के समक्ष अपना पक्ष प्रस्‍तुत करेंगे।

इस बीच डॉ. कफ़ील- जिन्‍हें पहले इस घटना का संकटमोचक बनाकर पेश किया गया और बाद में सरकार ने जिन्‍हें बलि का बकरा बना दिया- के संबंध में मीडिया ने जो सवाल उठाए हैं, उनका जवाब भी खुद पत्रकारों की ओर से ही आ रहा है जिसने मामले को तथ्‍यों और कुतथ्‍यों के जाल में उलझा दिया है। इस संदर्भ में दैनिक भास्‍कर में मौके से छपी संवाददाता अजय प्रकाश की रिपोर्ट को देखा जाना चाहिए जिसमें डॉ. कफ़ील पर कुछ गंभीर आरोप मढ़े गए हैं।

रिपोर्ट कहती है कि डॉ. कफ़ील अपने अस्‍पताल में सरकारी अस्‍पताल के ऑक्‍सीजन सिलिंडर का इस्‍तेमाल करते थे। रिपोर्ट कहती है कि जब संवाददाता ने उनके अस्‍पताल में जाकर पड़ताल की, उसके बाद अस्‍पताल के बाहर लगे बोर्ड पर उनके नाम पर सफेदी पोत दी गई। इसकी तस्‍वीर भी रिपोर्ट में है। इसके अलावा यह भी लिखा है कि मार्च 2015 में कफ़ील और उनके भाई पर दुष्‍कर्म का एक केस दर्ज हो चुका है।

इस बारे में पड़ताल करने पर मीडियाविजिल को मौके पर मौजूद दूसरे पत्रकारों से जो सूचना मिली है, वो निम्‍न है:

  1. डॉ. कफ़ील सरकारी मेडिकल कॉलेज में दिसंबर 2016 तक कॉन्‍ट्रैक्‍ट पर थे। उन्‍हें नियमित हुए केवल आठ महीने हुए हैं। कॉन्‍ट्रैक्‍ट पर काम करने वाले चिकित्‍सक को अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस करने की छूट होती हे। इसका मतलब यह बनता है कि दिसंबर 2016 तक डॉ. कफ़ील का निजी अस्‍पताल सवालों के घेरे में वैसे भी नहीं आ सकता था और जाहिर है कि यह अस्‍पताल उनके नियमित होने से काफी पहले का है। भास्‍कर की रिपोर्ट में जो नाम पर सफेदी पोतने वाली बात है, वह इस संदर्भ में समझी जा सकती है।

2. रिपोर्ट कहती है कि डॉ. कफ़ील अपने अस्‍पताल में सरकारी गैस सिलिंडर का इस्‍तेमाल करते थे। इस बारे में गोरखपुर न्‍यूज़लाइन पर छपी और मीडियाविजिल द्वारा साभार प्रकाशित रिपोर्ट देखी जानी चाहिए जिसमें साफ़ बताया गया है कि ”10 अगस्त की रात लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई बाधित होने के पहले एंसेफलायटिस वार्ड सहित मेडिकल कालेज से सम्बद्ध नेहरू अस्पताल में लिक्विड मेडिकल आक्सीजन प्लांट से आक्सीजन सप्लाई हो रही थी और यह आक्सीजन सप्लाई पाइप लाइन से हो रही थी। आक्सीजन सिलेण्डर सिर्फ संकट की स्थिति में रखा जाता था। भला पाइप लाइन से आक्सीजन की कैसे चोरी हो सकती है।”

3. डॉ. कफ़ील और उनके भाई पर दुष्‍कर्म के आरोप की बात सामने आई है। इस बारे में पत्रकार आवेश तिवारी ने तफ़सील से मामला साफ़ किया है। वे लिखते हैं, ”डॉ. कफील अहमद पर रेप के आरोप झूठे साबित हुए हैं। उन पर कल से तमाम आरोप लगाए जा रहे हैं। एक खबरनवीस होने के नाते मेरे लिए यह बिल्कुल ठीक नहीं था कि एक मिनट में आरोप को मान लूं या आरोप को न मानूं । खैर यह खबर मानवीय मूल्यों पर विश्वास को डगमगाने से रोकती है कि डॉ. कफील पर रेप के आरोप झूठे हैं। यह रिपोर्ट आपको दे रहा हूं। आप भी पढ़ें और खुदा के लिए मासूमों की मौत पर गंदे खेल न खेलें, न किसी पर भी झूठे आरोप लगायें।”

इसके अलावा, ऑक्‍सीजन सिलिंडरों की लोडिंग और अनलोडिंग करने वाले कर्मचारियों ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर एक स्‍थानीय पत्रकार को बताया है कि 10 अगस्‍त की रात डॉ. कफ़ील ने अपनी जेब से पैसे खर्च कर के उन कर्मचारियों को कहीं से भी सिलिंडर लाने को कहा था। न सिर्फ डॉ. कफ़ील के अस्‍पताल से बल्कि दूसरे अस्‍पतालों से भी 100 गैस सिलिंडर उस रात आपात स्थिति में मंगवाए गए। भास्‍कर की रिपोर्ट में योगी आदित्‍यनाथ के बयान के हवाले से कहा गया है कि ”दिन में 21 सिलिंडर चाहिए होते हैं और तुम 3 लाकर हीरो बन रहे हो?” कुछ दूसरी मीडिया रिपोर्टों में डॉ. कफ़ील द्वारा इंतज़ाम किए गए सिलिंडरों की संख्‍या 12 बताई गई थी।

अब चूंकि जिलाधिकारी ने अपनी जांच रिपोर्ट मुख्‍य सचिव को सोंप दी है और उसमें भी यही कहा गया है कि भले ही दो बार ऑक्‍सीजन की आपूर्ति बाधित हुई हो, लेकिन मौतें उसके कारण नहीं हुईं, तो जाहिर है यह मुख्‍यमंत्री की ली हुई लाइन के अनुकूल ही है। कोई भी प्रशासनिक अधिकारी मुख्‍यमंत्री की ली हुई पोज़ीशन के खिलाफ़ नहीं जा सकता। चूंकि मुख्‍यमंत्री खुद इस मामले में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर के कह चुके हैं कि ऑक्‍सीजन का इन मौतों से कोई लेना-देना नहीं, इसलिए कायदे से सिलिंडर लाने, ले जाने या चोरी पर कोई भी बहस नहीं बनती है। दिलचस्‍प यह है कि इसके बावजूद जो जांच कमेटी बनाई गई है, उसका क्‍या होगा क्‍योंकि जब ऑक्‍सीजन की कमी कहीं मौतों के परिदृश्‍य में छोड़ी ही नहीं गई, तो जांच किस बात की होगी।

इस तरह यही साबित होता है कि जिस सरकार ने डॉ. कफ़ील को बलि का बकरा बनाया, उसने खुद अपने बयान से उसे दोषमुक्‍त भी कर दिया। शायद यही वजह है कि कफ़ील को नोडल अफ़सर के पद से हटाने के पीछे कोई लिखित कारण नहीं दिया गया है, न ही उन्‍हें निलंबित या कार्यमुक्‍त किया गया है। इसी वजह से यह सवाल भी उठ रहा है कि कहीं वे अब तक कॉन्‍ट्रैक्‍ट पर तो नहीं हैं। यदि ऐसा हुआ, तब तो निजी प्रैक्टिस का सारा आरोप भी हवा हो जाएगा।

इस भ्रामक कहानी में एक बात और सामने आई है कि मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने पत्रकारों को अस्‍पताल के भीतर जाकर रिपोर्ट करने की सलाह दी है और आ रही ख़बरों को ‘फेक’ बताया है। यह दिलचस्‍प है। पत्रकार जो देख पा रहे थे, उसे रिपोर्ट कर रहे थे। योगी का कहना है कि वो सब फर्जी था। अब हम जो दिखा रहे हैं उसे देखो।

पत्रकार अजय प्रकाश कहते हैं कि गोरखपुर की घटना ने रिपोर्टरों को योगी-विरोधी और योगी-समर्थक में बांट दिया है और इसी की वजह से रिपोर्टों का सच प्रभावित हो रहा है। आवेश तिवारी इस बात से कड़े शब्‍दों में इनकार करते हैं। वे लिखते हैं:

”गोरखपुर में बच्चों की मौत के लिए भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा,वामदल सभी बराबर के जिम्मेदार हैं। पिछले 40 साल से कहर बरपा रहे इंसेफेलाइटिस के खात्मे के लिए जमीन पर कुछ भी गंभीर करने की कोशिश नही की गई। कांग्रेस के अपने दम्भ रहे हैं। बसपा के शासनकाल में यह मेडिकल कालेज वसूली का अड्डा बन गया। सपा का हाल यह था कि 2016 में मेडिकल कालेज को असाध्य रोगों के लिए आवंटित की गई 3 करोड़ से ज्यादा की राशि को वापस करना पड़ा क्योंकि सरकार इंसेफेलाइटिस को असाध्य रोग नही मानती थी। अब जबकि इस रोग को असाध्य रोगों की श्रेणी में शामिल कर लिया गया और प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार है फिर भी मेडिकल कालेज के पास आक्सीजन सिलेंडर खरीदने के लिए पैसे नहीं है ।इस बात में कोई दो राय नही कि पूरी मशीनरी लूट खसोट में लगी हुई है सरकार बदलती है सरकार का चरित्र नही बदलता।”

एक तथ्‍य जिसे उतनी प्रमुखता नहीं दी गई है, वो यह है कि जो कंपनी लिक्विड ऑक्‍सीजन की आपूर्ति कर रही थी उसका अनुबंध मार्च में ही खत्‍म हो गया था और इलाहाबाद की एक और कंपनी को यह ठेका दे दिया गया था। सवाल उठे हैं कि आखिर इतनी दूर स्थित कंपनी को ठेका क्‍यों दिया गया और पिछली कंपनी का बकाया भुगतान क्‍यों नहीं किया गया। अगर कायदे से इलाहाबाद की कंपनी के बारे में पड़ताल की जाए, तो शायद गोरखपुर हत्‍याकांड की सारी परतें खुल जाएंगी क्‍योंकि इस घटना के तार पिछले महीने बनारस में ज़हरीली नाइट्रस ऑक्‍साइड से हुई 17 मौतों के साथ जाकर जुड़ते हैं। वहां इस गैस की आपूर्ति करने वाली कंपनी भी इलाहाबाद की ही है और आश्‍चर्यजनक रूप से भारतीय जनता पार्टी के एक नेता की है।

इस बारे में मीडियाविजिल जल्‍द ही एक खोजी रिपोर्ट अपने पाठकों के सामने रखेगा। फिलहाल इतना जानिए कि बच्‍चों की लाशों के साथ गोरखपुर में सच तो दफन हो ही गया था, अब अपने-अपने तरीके से तथ्‍यों को भी दफन किया जा रहा है। जिन मौतों की वजह प्रथम दृष्‍टया बिलकुल साफ़ थी, वह चार दिन के सियासी और पत्रकारीय कारनामे के चलते धुंधली कर दी गई है।

अब कोई भी बड़ी आसानी से यह सवाल पूछ सकता है कि गोरखपुर के बच्‍चों को किसने मारा? इसका जवाब अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से सबके पास है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वो सच हो।