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हांगकांग : चीन के खिलाफ किसी स्‍वतंत्रता संग्राम की आहट तो नहीं है हालिया प्रदर्शन?

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हांगकांग के संकट को समझने के लिए हमें ब्रिटेन और चीन के बीच पहले अफीम युद्ध से शुरुआत करनी होगी। यह 19वीं शताब्दी की बात है। इस समय के पहले विश्व व्यापार में चीन का दबदबा था। उसकी सिल्क की मांग पूरी दुनिया में थी। और इस वजह से सभी बड़े व्यापारिक रास्ते चीन की तरफ जाते थे, जिन्हें सिल्क रूट कहा गया।

सिल्क के अलावा उन दिनों पश्चिमी देश चीन की चाय के दीवाने थे। ब्रिटेन समेत यूरोप के देश चीन से सिल्क और चाय का आयात करते थे, पर चीन उनसे कुछ नहीं खरीदता था। बदले में उन्हें चीन को चांदी देनी पड़ती थी जो महंगा सौदा था। व्यापार घाटे को पूरा करने के लिए ब्रिटेन ने अपने कारखानों में बना माल चीन में खपाने की कोशिश की, पर कामयाब ना हो सका। तब उन्होंने षड्यंत्रपूर्वक चीनियों को अफीम की लत लगवा दी। वे भारत से अफीम खरीद कर चीन को देने लगे।

एक वक्त ऐसा आया कि चीन में हर वर्ग और उम्र के लोग अफीम की लत का शिकार हो गए। ऐसा माना जाता है कि उस दौरान सवा करोड़ से अधिक चीनी अफीम की लत का शिकार हो गए थे। चीन के आर्थिक सामाजिक जीवन पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। ऐसे में 1840 में कैंटोन के एक मंत्री ने पहली बार अफीम के जहाजों के आने पर रोक लगाई और अफीम के व्यापार को अवैध घोषित किया। ब्रिटेन इससे चिढ़ गया और उसने चीन पर हमला कर दिया। इस युद्ध में चीन की शर्मनाक हार हुई। इस युद्ध को अफीम युद्ध कहा जाता है जिसने चीन के इतिहास को बदल दिया। इसके बाद चीन ने ब्रिटेन और पुर्तगाल से अपमानजनक संधि की और उसे 1842 में अपने दो बंदरगाह शहर हांगकांग और मकाउ, क्रमश: ब्रिटेन और पुर्तगाल को लीज़ पर देने पड़े।

हांगकांग को लेकर ब्रिटेन और चीन में 1 जुलाई 1898 को एक और संधि हुई जिसमें तय किया गया कि अगले सौ साल तक हांकांग ब्रिटेन के अधीन रहेगा और उसके बाद चीन को लौटा दिया जाएगा। इन सौ वर्षों में हांगकांग ने हर तरह से तरक्की की। वह दुनिया का एक बड़ा ट्रेड सेंटर बना। आर्थिक रूप से ही नहीं खुला, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी बदल गया। अंग्रेज़ों ने पूर्व की परम्परावादी रूढ़िवादी जनता को पश्चिमी संस्कृति के खुलेपन और आज़ादी का स्वाद चखा दिया। साथ आया नागरिक-बोध। इतना, कि सभ्य और अनुशासित नागरिक बनने के मामले में हांगकांग वाले अपने गुरु अंग्रेजों से भी आगे निकल गए।

सौ साल खत्म होने के बाद 1998 में ब्रिटेन ने हांगकांग को चीन को लौटाने की प्रक्रिया शुरू की  मगर इस बीच हांगकांग के लोग सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से मैनलैंड चीन से बहुत  अलग हो चुके थे। उन्होंने प्रजातंत्र और खुलेपन का स्वाद चख लिया था। वे कम्युनिस्ट चीन को  पिछड़ा, पुरातनपंथी मानते थे और उसके बंद और घुटे हुए वातावरण में जाने को तैयार नहीं थे।

इसलिए जब 1998 में ब्रिटेन ने हांगकांग चीन को लौटाया तो उसे पूरी तरह चीन के अधीन करने के बजाय उसे विशेष प्रशासनिक क्षेत्र का दर्जा दिया गया, जिसमें विदेशी मामलों और  सेना को छोड़कर हांगकांग खुदमुख्तार था। तय हुआ कि चीन में शामिल होने के बाद भी  हांगकांग का झंडा, उसकी मुद्रा, उसके कानून, अदालत, पुलिस व्यवस्था, लोकतांत्रिक सरकार और सबसे बड़ी बात स्वतंत्र प्रेस बनी रहेगी। यह एक जटिल व्यवस्था थी जिसे वन नेशन टू सिस्टम कहा गया, हालांकि चीन ने हांगकांग के सबसे बड़े पद सीईओ के उम्मीदवार खुद तय करने की शर्त रखी। इस तरह कुछ हद तक वहां की सरकार पर अपना नियंत्रण रखा।

हांगकांग को विशेष प्रशासनिक क्षेत्र का यह दर्जा 1998 से पचास साल के लिए मिला था, जिसमें से बीस साल गुजर चुके हैं। चीन अब वहां अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहता है। मौजूदा संकट की जड़ यही है। हांगकांग की जनता आशंकित है और चीन की हर कोशिश के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के लिए उतर आती है। ऐसा ही एक प्रदर्शन 2012 में हुआ था जिसे अंब्रेला प्रोटेस्ट कहा गया। इस आंदोलन का नेतृत्व 22 साल के एक कॉलेज छात्र ने किया था जिसका नाम बाद में नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी प्रस्तावित हुआ।

फिलहाल चल रहे प्रदर्शन की शुरुआत एक बिल के प्रस्ताव से हुई, जिसकी वजह एक लड़की की हत्या है। हुआ यूं कि हांगकांग में रहने वाले एक लड़के ने अपनी मित्र को ताइवान ले जाकर उसकी हत्या कर दी और वापस आ गया। चूंकि ताइवान और हांगकांग के बीच कोई अपराधी प्रत्यर्पण संधि नहीं है इसलिए लड़के पर मुकदमा चलाना संभव नहीं था। इस बात को आधार बनाकर हांगकांग के सीईओ ने एक नए बिल का मसौदा पेश किया जिसके तहत किसी भी अपराधी को हांगकांग से चीन ले जाकर वहां की अदालत में मुकदमा चलाया जा सकेगा। हांगकांग के निवासी इसके पीछे छुपा मकसद समझ रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो सबसे पहला हमला हांगकांग की प्रेस पर होगा। चीन में स्वतंत्र प्रेस नहीं है जबकि हांगकांग में लोग अपनी बात कहने के लिए आजाद हैं। यदि यह बिल कानून बनता है तो किसी भी हांगकांग निवासी  खास तौर पर पत्रकार या एक्टिविस्ट को झूठा इल्जाम लगाकर चीन ले जाया जाएगा। चीन में सवाल पूछने की आजादी नहीं है। वहां उस व्यक्ति का क्या होगा कोई नहीं जान पाएगा।

इस पूरे मामले में एक दिलचस्प बात हांगकांग वालों का विरोध प्रदर्शन का तरीका है। पिछले दिनों लगभग बीस लाख से अधिक लोग सड़क पर थे लेकिन पूरा प्रदर्शन अनुशासित और शांतिपूर्ण रहा। प्रदर्शन के लिए वे आधी सड़क घेरते हैं ताकि आने जाने वालों को असुविधा ना हो। प्रदर्शन अक्सर वीकेंड यानी छुट्टी के दिन किए जाते हैं। महिलाएं, पुरुषों के बराबर संख्या में प्रदर्शन में शामिल होती हैं और यहां तक कि लोग ट्रॉली में अपने बच्चे लेकर भी आते हैं। वे रातभर भर सड़कों पर बैठते हैं। सुबह खुद सड़क की सफाई करते हैं और तब घर जाते हैं। प्रदर्शनकारी न सिर्फ अपने साथियों बल्कि पुलिस और सरकारी अधिकारियों को पानी पिलाते, खाना खिलाते और उनका ख्याल रखते हैं। प्रदर्शन का मार्च इतना लंबा होता है और लोग इतने ज्यादा कि कई लोगों को मार्च शुरू होने की जगह 6 से 8 घण्टे इंतजार करना होता है। इस पूरे आंदोलन का कोई एक नेता नहीं है, अधिकांश लोग स्वप्रेरणा से शामिल होते हैं।

भारत भी ब्रिटेन की एक कॉलोनी था और हम आमतौर पर अपनी तमाम मुश्किलों के लिए अंग्रेजी राज को दोष देते हैं लेकिन हांगकांग वालों का मामला हमसे उलट है। ब्रिटेन ने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार ने उनके सोच विचार को बदल दिया है। वे आज़ादी, समानता, नागरिक-बोध और सभ्य होने का अर्थ जान चुके हैं। अपने मुकाबले चीन को असभ्य और पिछड़ा हुआ मानते हैं। यही वजह है कि हांगकांग वाले चीन में शामिल होने के विचार मात्र से सिहर जाते हैं, लेकिन तीस साल बाद उन्हें चीन का हिस्सा होना तय है।

क्या 2012 का अंब्रेला प्रोटेस्ट ओर ताजा विरोध प्रदर्शन किसी बड़े स्वतंत्रता संग्राम की आहट है? महाशक्ति चीन इससे कैसे निपटेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।

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