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मोदी का जीएसटी की तुलना देशी रियासतों के विलय से करना ख़तरनाक है !

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प्रभात पटनायक

‘हिंदुत्ववादी तत्व जिस तानाशाही तथा एकरूपता से प्यार करते हैं, उन्हें जीएसटी में मूर्त हुए कर प्रस्तावों में अभिव्यक्ति मिली है। जीएसटी के संबंध में यह नुक्ता और किसी ने नहीं, खुद मोदी ने अपनी उपमा के माध्यम से  पेश किया है। इसे किसी बाहरी व्यक्ति का आरोप नहीं कहा जा सकता है। विडंबना यह है कि राज्यों की शक्तियों को सिकोड़ने के जरिए, जीएसटी के ‘अराजकता’ पर काबू  पाने का बखान करते हुए नरेंद्र मोदी ने जो भाषण दिया, जीएसटी के आलोचकों की बात को ही सही साबित करता है। जीएसटी के आलोचक जनतंत्र में ऐसी ‘अराजकता’ की ही अनिवार्यता  पर ज़ोर देते आए हैं। ‘

गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स का उद्घाटन करते हुए 1 जुलाई को संसद के सैंट्रल हॉल में मध्य-रात्रि में अपना भाषण देकर, नरेंद्र मोदी ने जिस तरह जवाहरलाल नेहरू की नकल करने की कोशिश की है, उसे शायद एक  हास्यास्पद मूर्खता मानकर छोड़ा जा सकता है। उन्होंने जिस तरह से महज एक कर सुधार को, भारत के आजादी  प्राप्त करने की महान घटना के समकक्ष बताने की या उसके बराबर में खड़ा करने की कोशिश की है,  उसे शायद इस कर सुधार का प्रणेता होने का दावा करने वाले व्यक्ति के हानिरहित आत्मप्रचार के तौर  परर छोड़ा जा सकता है। लेकिन,  इस मौके पर दिए अपने भाषण में उन्होंने एक ऐसी उपमा का सहारा लिया है, जो बहुत ही खतरनाक  है। इसे चुनौती दिए बिना नहीं जाने दिया जा सकता है क्योंकि यह उपमा एक  ऐसे मानस को दिखाती है, जो हमारे भविष्य के लिए खतरा पैदा कर रहा है।

 

देसी रियासतों का विलय और जनतांत्रिक क्रांति

मोदी ने अप ने भाषण में जवाहरलाल का सिर्फ एक  बार ज़िक्र किया है। जिस शख्श का उन्होंने विस्तार से जिक्र किया, वह थे वल्लभ भाई  पटेल। और उनके भाषण का मुख्य जोर यह बताने  पर था कि आज भारत को एकीकृत करने में जीएसटी की वही भूमिका है, जो भूमिका किसी जमाने में  पटेल द्वारा देसी रियासतों के भारतीय संघ में विलय ने अदा की थी।

जहां तक  देसी रियासतों के भारतीय संघ के साथ विलय का सवाल है, यह भारत की जनतांत्रिक क्रांति का हिस्सा था। अगर देश की जनता को स्वतंत्रता तथा जनतंत्र का स्वाद चखना था, तो उनके लिए सामंती शोषण के जुए को उतार फेंकना जरूरी था, जिसका शिकार देसी रियासतों के शासकों द्वारा जनता को बनाया जा रहा था। इस सामंती शोषण के खिलाफ जनता ने शानदार विद्रोह किए थे और ये विद्रोह तब भी हुए थे जब ‘‘ब्रिटिश भारत’’ में उपनिवेशविरोधी संघर्ष चल रहा था। देसी रियासतों का विलय न होना एक बिलकुल बेतुकी बात होती क्योंकि उस सूरत में ऐसी स्थिति  पैदा की जा रही होती जहाँ कुछ भारतीयों को तो कुछ मौलिक  अधिकार हासिल होते तथा वे वयस्क मताधिकार के जरिए अपनी मर्जी की सरकार चुन रहे होते, जबकि उनकी बगल में अन्य भारतीय मध्ययुगीन बर्बरता को झेल रहे होते, जो कि ज्यादातर देसी रिसायतों की विशेषता थी।

उस स्थिति में हमारे संविधान में सभी भारतीयों की समानता की जो घोषणा की गयी है, उसे इस तथ्य के जरिए छोटा किया जा रहा होता कि बहुत से भारतीय, जिनका जन्म कुछ ऐसे क्षेत्रों में हुआ था जिन्हें अंगरेजों ने अपने राज में नहीं मिलाया था, सामंती व्यवस्था की भयावह संस्थागत असमानता को ही झेलते रहें।

बेशक, ऐसा होना खुद को मजाक की चीज बनाना होता। लेकिन, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि अगर देसी रियासतों का भारतीय संघ के साथ विलय नहीं किया गया होता, तो ये रियासतें जिस बुनियादी असमानता  पर टिकी हुई थीं उसने, भारतीय संविधान के अंतर्गत शेष हिस्से को जो बराबरी हासिल होनी थी, उसे भी खोखला कर दिया होता। दूसरे शब्दों में नुक्ते की बात सिर्फ यह नहीं है कि उस सूरत में देसी रियासतों में जनतांत्रिक क्रांति नहीं आयी होती। नुक्ते की बात यह है कि इसने समग्रता में भारत में ही, समूची भारतीय जनता के लिए ही, जनतांत्रिक क्रांति को विफल कर दिया होता। इसलिए, स्वतंत्र भारत के गृहमंत्री के तौर  पर  पटेल के कदम  पूरी तरह से एक  जनतांत्रिक क्रांति के एजेंडे के अनुरूप थे।

पूरी तरह से गलत तुलना

अब जहां तक  गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स का सवाल है, वह तो सिर्फ एक कर  प्रणाली की जगह, दूसरी को लाए जाने का ही मामला है। इसके जरिए, एक कर को लागू किया गया है, वह भी ऐसे अन्य करों की जगह पर, जो हमारे संविधान के आधार  पर, अब तक  देश में लागू रहे थे। इसका भारत की जनतांत्रिक क्रांति को आगे बढ़ाने से कुछ लेना-देना ही नहीं है। इसके  पैरोकारों तक  ने इससे लाभ गिनाते हुए उसकी  ‘कार्य-कुशलता’, उसकी  ‘सरलता’, उसके ‘आर्थिक वृद्घि में योग’ आदि, आदि की तो दुहाइयां दी हैं, लेकिन इसकी जनतांत्रिकता की दुहाई तो उन्होंने भी नहीं दी है।

सचाई यह है कि उसके विरोधी, जिनमें मैं खुद को भी मानता हूं (इस मामले में मैं अमर्त्य सेन के साथ हूं) और जिनमें सबसे मुखर अशोक मित्र रहे हैं, लंबे अर्से से यह तर्क  पेश करते आए हैं कि जीएसटी एक  बहुत ही जनतंत्रविरोधी कदम है। यह राज्य सरकारों के संवैधानिक अधिकारों को छीनता है और केंद्र सरकार के हाथों में शक्तियों का केंद्रीयकरण करता है और इस तरह देश के संघीय ढांचे  पर एक भारी  प्रहार करता है। याद रहे कि संघीय ढांचा, हमारे जनतंत्र का एक आवश्यक घटक है। पहले के बिक्री कर की जगह पर, जिसे लगाने का अधिकार हमारे संविधान द्वारा राज्यों को दिया गया था और जिसकी दरें तय क·रने के मामले में राज्य पूरी तरह से स्वतंत्र थे, अब जीएसटी को लागू कर दिया गया है, जिसकी दरें सिर्फ जीएसटी  परिषद ही बदल सकती है, जिसमें केंद्र के साथ हरेक  राज्य सरकार का भी  प्रतिनिधित्व होगा और हरेक  राज्य सरकार का एक  ही वोट होगा।

बहरहाल, आइए हम यह भूल जाते हैं कि जीएसटी के आलोचकों का क्या कहना है ? हम इस तथ्य को भी अनदेखा कर देते हैं कि जीएसटी संघीय व्यवस्था के विरुद्घ और इसलिए जनतंत्रविरोधी है। तब भी नुक्ते की बात यह है कि यह ऐसा कदम तो किसी भी तरह से नहीं है जिसे जनतांत्रिक कहा जा सके और जो भारत की जनतांत्रिक क्रांति को आगे बढ़ाता हो। और इसलिए, यह तय है कि इसे भारतीय संघ के साथ देसी रियासतों के विलय के समकक्ष तो किसी भी तरह से नहीं ठहराया जा सकता है। इसलिए, मोदी ने जो उपमा दी है पूरी तरह से गलत है। ऐसी उपमा तो वही व्यक्ति दे सकता है, जिसे देश की जनतांत्रिक क्रांति की कोई समझ ही नहीं हो।

केंद्रीयकरण को एकता का पर्याय बनाया

किन, वास्तव में यह उपमा तो उससे भी बुरी है। वास्तव में मोदी जो इशारा कर रहे हैं और जो उन्होने साफ-साफ शब्दों में कहा भी है, वह केंद्रीयकरण और देश की एकता को, एक समान दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। देसी रियासतों का उनका विरोध और इन राज्यों का पटेल द्वारा एकीकरण की उनकी  प्रशंसा, इसी तर्क पर आधारित है कि ऐसे राज्यों की  प्रचुरता, अराजक  हालात का  प्रतिनिधित्व करती है। वह  पटेल की  प्रशंसा कोई इसलिए नहीं करते हैं कि उनके कदमों का अर्थ था भारत की जनतांत्रिक क्रांति को आगे बढ़ाना। वह तो पटेल की प्रशंसा इसलिए करते हैं कि उन्होंने अराजक बहुलता की स्थिति अवस्था का उसी तरह से अंत किया था, जैसे उनकी समझ के हिसाब से जीएसटी कर के मामले में ऐसी ही अवस्था का अंत अब करने जा रही है। इस  परिप्रेक्ष्य में केंद्रीयकृत एकरूपता तो वांछनीय है जबकि बहुलता, जो कि अनिवार्य रूप से संघात्मक  व्यवस्था की  पहचान है, बहुत ही अवांछनीय है। ‘राष्ट्र’’ को ऐसी ऐसी केंद्रीयकृत एकरूपता के आधार  पर ही एकजुट किया जा सकता है।

इस तरह का विचार गंभीर रूप से आपत्तिजनक है। इसमें एकरूपता तथा केंद्रयकरण का जैसा दैवीकरण किया गया है, इसे अंतर्निहित रूप से किसी भी विकेंद्रीकरण का, राज्यों के पक्ष में शक्तियों के हरेक वितरण का विरोधी बना देता है। अगर कर की दरों की बहुलता या इन दरों में एकरूपता के अभाव को बुरा माना जाना है, तो  पंचायतों के लिए शक्तियों के किसी हस्तांतरण का भी कोई मतलब नहीं बनता है। अगर बिक्री कर की दरों की अपनी बहुलता के साथ राज्य सरकारों को ‘अनुशासित’ करना जरूरी है ताकि वे कर की दरें तय करने के अपने अधिकार का त्याग कर दें, तो वही तर्क पंचायतों  पर भी लागू होना चाहिए। बहरहाल, पंचायतों के इस मामले में अपनी ओर खास ध्यान ही नहीं खींचने की एक ही वजह हो सकती है कि उनके द्वारा लगाए जाने वाले करों  का कारपोरेट वित्तीय कुलीनतंत्र पर शायद ही कोई असर  पड़ता होगा। लेकिन, इसका अर्थ यह हुआ कि  पंचायतों की कर लगाने की शक्तियों से  पैदा हो रही कथित ‘अराजकता’ को लेकर मोदी अगर आंदोलित नहीं हैं, तो यह किन्हीं निरपेक्ष सिद्घांतों का नतीजा नहीं है बल्कि इस सच्चाई से निकला है कि उन्हें चिंता सिर्फ कॉर्पोरेट-वित्तीय कुलीनतंत्र के स्वार्थों की है। दूसरी तरह से कहें तो यह कहा जा सकता है कि मोदी की विश्वदृष्टि को एक सूत्र में घटाया जा सकता है: केंद्रीयकरण सदा अच्छा और यह तब और भी अच्छा जब यह कॉरपोरेट-वित्तीय कुलीनतंत्र के हित में हो।

मोदी की उपमा में खतरनाक  संभावनाएं छुपी हुई हैं क्योंकि विमर्श के उनके मैदान में जनतंत्र और जनतांत्रिक क्रांति की कोई जगह ही नहीं है। यह इस बात से स्वत: स्पष्ट है कि देसी रियासतों के भारतीय संघ में विलय के पटेल के कदमों की उनकी सराहना में, इन मुद्दों की  पहचान का ही सरासर अभाव है।

ऐसी ‘अराजकता’ तो जनतंत्र में जरूरी है

यह दिलचस्प  है कि अमरीका तक  में, जो कि दुनिया का सबसे ‘‘खांटी’’ पूँजीवादी देश है, जहां कॉरपोरेट हितों को अक्सर ही बड़े आदर के साथ शासन की नीतियों के सूत्रीकरण में स्थान दिया जाता है, संघीय व्यवस्था के लिए  प्रतिबद्धता इतनी मजबूत है कि वहां एक समान गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स लगाने कभी कोई चर्चा तक  नहीं चली है। वास्तव में संघात्मकता उस देश के संस्थापक सिद्घांतों में से रही है, जिसके चलते अमरीका दशकों से विभिन्न राज्यों द्वारा लगायी गयी अलग-अलग कर दरों की ‘अराजकता’ को सहन करता आया है। और वहां तो कभी इसका कोई इशारा तक  नहीं किया गया कि उक्त कथित अराजकता अमरीका की वृद्घि दर को या एक  राष्ट के रूप में उसकी एकता को कमजोर कर रही है। उल्टे अमरीका में तो व्यापक रूप से यही माना जाता है कि इस एकरूपता के अभाव से,  इस तथ्य से कि अलग-अलग राज्यों को अपनी मर्जी से कर लगाने तथा इसलिए, संघ का हिस्सा बनने के लिए स्वतंत्रतापूर्वक  राजी होने का अधिकार है, उसकी एकता मजबूत ही हुई है।

हिंदुत्ववादी तत्व जिस तानाशाही तथा एकरूपता से प्यार करते हैं, उन्हें जीएसटी में मूर्त हुए कर  प्रस्तावों में अभिव्यक्ति मिली है। जीएसटी के संबंध में यह नुक्ता और किसी ने नहीं खुद मोदी ने अपनी उपमा के माध्यम से  पेश किया है। इसे किसी बाहरी व्यक्ति का आरोप नहीं कहा जा सकता है। विडंबना यह है कि राज्यों की शक्तियों को सिकोडऩे के जरिए, जीएसटी के ‘अराजकता’  पर काबू  पाने का बखान करते हुए नरेंद्र मोदी ने जो भाषण दिया, जीएसटी के आलोचकों की बात को ही सही साबित करता है। जीएसटी के आलोचक  जनतंत्र में ऐसी ‘अराजकता’ की ही अनिवार्यता पर जोर देते आए हैं क्योंकि जनतंत्र में भिन्न-भिन्न विचारधाराओं वाली, भिन्न-भिन्न पार्टियों द्वारा चलायी जा रही भिन्न-भिन्न राज्य सरकारों के लिए इसका मौका होना चाहिए कि किसी राज्य की अर्थ व्यवस्था किस तरह चलनी चाहिए, इस संबंध में अपनी अलग-अलग धारणाओं को अमल में ला सकें। इसके लिए गुंजाइश बनाना ही उस तरह की ‘अराजकता’ पैदा करेगा, जो मोदी को सख्त नापसंद है, लेकिन जो जनतंत्र का अविभाज्य हिस्सा है।

केंद्रीयकरण तथा एकरूपता के प्रति हिंदुत्ववादी ताकतों का जो उत्कट प्रेम है, जिसे खुद मोदी ने 1 जुलाई को सैंट्रल हॉल में अपने भाषण में जीएसटी के लिए, देसी रिसायतों के विलय की अपनी उपमा के जरिए स्वर दिया है, उससे भारत में जनतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। यह ऐसी मानसिकता है जिसका प्रतिरोध किए जाने की जरूरत है।

यह लेख मूल रूप से पीपुल्स डमोक्रेसी में छपा। प्रभात पटनायक, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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