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टाटा की साख दाँव पर, ‘वैल्यू होम्स’ के नाम पर धोखाधड़ी का आरोप ! जाँच शुरू !

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टाटा वैल्यू होम्स। टाटा कंपनी का देश भर में रिहायश उपलब्ध कराने का नया नारा। लेकिन गुड़गाँव के क़रीब इस प्रोजेक्ट में फर्ज़ीवाड़ा हो रहा है, यह आरोप इस कंपनी के एक पूर्व प्रोजेक्ट हेड ने ही लगाया है। इस मामले की जाँच झज्झर के उपायुक्त ने डिस्ट्रिक्ट टाउन प्लानर को पिछले महीने ही सौंप दी थी। लेकिन कंपनी की ओर से कोई जवाब नहीं मिला तो 15 फ़रवरी को फिर रिमांइडर जारी हुआ है।

मामला दिलचस्प है और अगर आरोप सही है तो यह भी साफ़ होता है कि कैसे सुपर एरिया के नाम पर कंपनियाँ धोखाधड़ी करती हैं। आरोप टाटा समूह की कंपनी टाटा वैल्यू होम्स की एक सहयोगी कंपनी एचएल प्रमोटर्स पर है जो बहादुरगढ़ में आवासीय प्रोजेक्ट बना रही है। कंपनी के प्रोजेक्ट हेड रह चुके नित्यानंद सिन्हा का आरोप है कि कंपनी सेल एरिया के नाम पर फ़र्ज़ीवाड़ा कर रही है। उन्होंने इस संदर्भ में उन्होंने दिल्ली पुलिस के आर्थिक अपराध शाखा में शिकायत भी दर्ज कराई। जाँच के लिए मामला बाराखंबा थाने को कहा गया क्योंकि कंपनी का रजिस्टर्ड दफ्तर इसी क्षेत्र में आता है।

नित्यानंद सिन्हा ने जो दस्तावेज़ प्रशासन को सौंपे हैं वे काफ़ी गंभीर है। वैसे कंपनी ने उन्हें जून 2015 में निकाल दिया था और उसका तर्क यही है कि नित्यानंद निजी खुन्नस के तहत आधारहीन आरोप लगा रहे हैं, लेकिन दस्तावेज़ गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

नित्यानंद सिन्हा की लिखित शिकायतों में दर्ज है कि बतौर प्रोजेक्ट हेड उनके पास 24 फरवरी 2015 को आर्किटेक्ट की ओर से अंतिम वास्तविक क्षेत्र विवरण (फाइनल जेनुइन एरिया स्टेटमेंट ) आया था। इसके अनुसार 2 बीएचके फ्लैट का कारपेट एरिया 911 वर्गफिट एवं सेल एरिया 1185 वर्गफिट था। इस मेल के आठ दिन बाद दूसरा ईमेल कारपोरेट प्लानिंग डिपार्टमेंट,मुबंई से आया जिसमें सेल एरिया बढ़ाने का आदेश था। इसके अनुसार 2 बीएचके फ्टैल का कारपेट एरिया 916 वर्गफिट एवं सेल एरिया 1292 वर्गफिट था। यानी कारपेट एरिया में महज़ 5 वर्गफिट की बढ़ोतरी हुई लेकिन सेल एरिया बढ़ गया 107 वर्गफिट जिस पर कंपनी उपभोक्ताओं से पैसा लेती है। यानी दो बीएचके के इस छोटे से फ्लैट के लिए कंपनी 4.44 लाख रुपये की धोखाधड़ी कर रही है जिसमें न्यूनतम बिक्री मूल्य 4000 रुपये प्रति वर्गफिट है। बड़े फ्लैट के लिए यह धोखाधड़ी साढ़े छह लाख रुपये तक है।

वैसे भी सेल एरिया का सही-सही पता लगाना किसी उपभोक्ता के लिए मुश्किल होता है। कंपनी इसका फायदा उठाती है। इसमें लॉबी, लिफ्ट से लेकर सोसायटी का तमाम खुला एरिया होता है जिसकी गणना किसी के लिए भी मुश्किल है। लेकिन बिक्री सेल एरिया के नाम पर ही होती है।

बहरहाल, इस मामले में झज्झर उपायुक्त जाँच कर रहे हैं। 11 जनवरी को डिस्ट्रिक्ट टाउन प्लानर को जाँच का जिम्मा दिया गया था। एक महीने में जाँच रिपोर्ट आनी थी, लेकिन कंपनी ने कोई जवाब नहीं दिया। 15 फरवरी को फिर रिमाइंडर भेजा गया है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या टाटा जैसी कंपनी का नाम भी उपभोक्ताओं को आश्वस्त करने के लिए काफ़ी नहीं है। धोखा टाटा के नाम पर भी हो सकता है।