Home पड़ताल पद्मावत: सहजबुद्धि के दुष्‍काल में भांग की अनिवार्यता को स्‍थापित करती फिल्‍म

पद्मावत: सहजबुद्धि के दुष्‍काल में भांग की अनिवार्यता को स्‍थापित करती फिल्‍म

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व्यालोक

‘पद्मावत’ फिल्म दरभंगा के एकमात्र मल्टीप्लेक्स में लगी है।

इस लेख का यह पहला वाक्‍य दो मूर्खताओं से युक्‍त है। अव्‍वल तो फिल्‍म का यह बदला हुआ नाम जायसी की कृति का नाम है, जो अत्‍यंत मूर्खतापूर्ण बात है क्‍योंकि दोनों का एक-दूसरे के साथ कोई लेना-देना नहीं है। सेंसर बोर्ड की कानूनी मजबूरी ने हम सब को इस मूर्खता का भागी बना दिया है। दूसरी मूर्खता दरभंगा का एकमात्र मल्‍टीप्‍लेक्‍स है। यह दरभंगा की मौलिक खोज होनी चाहिए। असल में यहां एक पुराना सिंगल-स्क्रीन थिएटर था लाइटहाउस। उसी के ऊपरी हिस्से को अब 70 सीटों के ऑडिटोरियम में बदल दिया गया है- नाम है ‘रजनीश’। नीचे सिंगल स्क्रीन चल रहा है- 70 रुपए के टिकट के साथ। ऊपर दिल्ली जैसा माहौल लेने के लिए 250 रुपए देने होते हैं। इसे कहते हैं मल्‍टीप्‍लेक्‍स।

यह रिलीज के दो दिन बाद की स्थिति है। 25 जनवरी को जनता ने भारी भीड़ के साथ इकट्ठा होकर माहौल बना दिया था, लेकिन चालाक व्यापारी ने फिल्म लगायी ही नहीं। भारतीय मानस को बिल्कुल सही तरह से ‘रीड’ कर के फिल्म 3 दिन बाद 28 को इस हॉल में रिलीज़ हुई। 29 को रात के शो के बाद कुछ ‘भटके नौजवानों’ ने रात में बाइक पर सवार होकर ईंट चला दी। मालिक ने फूटे हुए शीशे को दीपिका पादुकोण के चेहरे से ढंक दिया है।

इस फिल्म के साथ भी यही हुआ है। संजय लीला भंसाली ने इतिहास के साथ बलात्कार की हद तक तोड़फोड़ की है, फिल्मकारी की कला के साथ नायाब छेड़खानी की है और उस पर भव्यता और विशालता का पैबंद टांक दिया है। एकदम फूटे हुए कांच पर दीपिका के चेहरे जैसा। टाट के परदे पर जहां-तहां मखमल और रेशम के पैबंद।

फिल्म देखकर निकलने के साथ मेरे मित्र का कमेंट ही सार रूप है, ‘ऐ भाई, स्वरा भास्कर को फिल्म देखने के बाद महसूस हुआ कि महिलाएं योनि-मात्र बनकर रह गयीं। हमको तो लगा हम पुरुष गदहा बन कर रह गए।’ इस लेखक को भाई साब की बात याद आती है, ‘अगर बहुत समय से फिल्म नहीं देख रहे हो हॉल में जाकर तो इससे शुरुआत मत करो। तुम्हारी हिंदी फिल्मों में अनास्था पैदा हो जाएगी।‘ यह बात 100 फीसदी सच है।

फिल्‍म से पहले दो बार डिस्क्लेमर देकर भंसाली ने इस देश के हरेक आदमी को खुश करने का प्रयास किया है। दूसरे डिस्क्लेमर में उन्होंने सती का समर्थन न करने की कसम खायी है और इस तरह यह तय करने की कोशिश की है कि वह ‘सती’ और ‘जौहर’ को एक ही मानते हैं। चमकदार फिल्मी सेट्स पर भारत की मिट्टी नहीं मिला करती, इसमें भंसाली की कोई गलती नहीं है। फिल्म से अगर किसी को परेशानी होनी चाहिए, तो आज के अशराफ़ मुसलमानों को, क्योंकि जो भी मुगलों, तुर्कों की रही-सही इज्जत थी उसे भंसाली ने अलाउद्दीन को मंदबुद्धि मनोरोगी दिखाकर पूरा मिट्टी में मिला दिया है। जिन्‍हें मन हो, वे अलाउद्दीन के कुछ प्रशासनिक मामलों का हवाला देते हुए अपनी भावनाएं आहत कर सकते हैं। अपनी बला से। करणी सेना के नुमाइंदों पर बाद में आएंगे।

अपने अतीत से कटे भारत का युवा यानी कूल ड्यूड इस बात से कतई बेख़बर है कि खिलजी या पद्मिनी का क्या मसला था। एक युवा ने अपनी दोस्त से कहा, ‘रणवीरवा का क्या तो नाम था- अलाउद्दीन। लेकिन ऊ इ सब काम भी किया है, नै पता था। साला हिस्ट्री-फिस्ट्री कहियो पढ़बे नै किए।’ एक नैरेटिव तो इस फिल्म ने बना ही दिया है। जिसने इतिहास नहीं पढ़ा, वो इससे ज्ञान लेगा। आप उसकी वैधता या अवैधता पर विशेषज्ञों की राय लेते रहिए।

यह फिल्म इसलिए भी याद की जानी चाहिए कि इसने करणी सेना को अनचाहे ही ख्याति दिला दी और दूसरे यह एक बार फिर से स्थापित कर दिया कि इस देश में कौआ के पीछे भाग जाने की परंपरा का पूरे अनुशासन और मर्यादा के साथ पालन किया जाता है, बिना अपना कान देखे कि वह सलामत है या नहीं। जिनके कान दुरुस्‍त थे, उनमें से एक की आवाज़ फिल्‍म खत्‍म होने के बाद सुनाई दी, ”हौ, सब त बुझलियै, मुदा एतेक बवाल कियै भेलै, स्यैह पता नै चलत….(भई, सब बात तो ठीक है, लेकिन फिल्म पर इतना बवाल हुआ किसलिए)।”

फिल्म सीधा और घुमा-फिराकर राजपूती शान को स्थापित करती है, हिंदुओं को रेट्रोग्रेसिव और बंटी हुई कौम दिखाती है और संतुलन स्थापित करने के क्रम में खिलजी को मांसल प्रेम को उद्यत जुनूनी के तौर पर पेश करती है।

ज़ाहिर है, तरक्कीपसंद लोगों को खुसरो का चित्रण पसंद नहीं आएगा, जो खिलजी के पागलपन को, उसके विश्वसाघात को वक्ती जरूरत बताता है, खिलजी के शेर सुनता है और उसके बहाने भंसाली विकृत इतिहास-चित्रण की जड़ों को भी तलाशते हैं।

यह समाज भारत का है, जो हमेशा से सौम्य रहा है, अतियों से बचा है और लोग आज भले पोस्ट-मॉडर्निस्ट हों, भारतीय समाज हमेशा से स्यादवादी रहा है। यही वजह है कि दरभंगा जैसे कस्बे में लड़कियां अगर रणवीर सिंह की एंट्री पर सीटी और तालियां बजा रही हैं, तो वे हरेक जातिवादी (और अनिवार्य तौर पर राजपूती) डायलॉग पर भी उतनी ही ज़ोर से ताली भी बजाती हैं, उछलती हैं। इस हद तक कि मेरे ठीक पीछे बैठे एक मैथिल ब्राह्मण खुद को रोक न सके,, ‘बुझाइ छै, एकरा सबसं बेसी फिलिम बुझाइ छै…(यानी, इन्हीं को सबसे अधिक फिल्म समझ आ रही है)’।

दिलचस्‍प ये है कि पंडित राघव चेतन जब रतन-पद्मावती के अंतरंग क्षण को ताड़ रहा होता है, तो पीछे से वही ब्राह्मण भाई मौज लेते हैं, ‘इ जरूर पंडितबे के काज हेतइ…’। ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण का फ़र्क समझना हो तो दरभंगा आइए। इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिलेगा।

फिल्म का हासिल क्या है? कुछ भी नहीं? एक सजग दर्शक की टिप्पणी को पढ़िए, ‘भंसाली फंस गया। पंचमेल बना दिया। उसको समझ ही नहीं आया कि वह क्या बनाना चाहता है- डॉक्यु-ड्रामा, भव्य इतिहास, केवल फंतासी, प्रेम-कहानी या कुछ और… फंस गया बेचारा।’ यह बात ठीक भी है। फिल्म को देखकर हमेशा लगता है कि आप गुज़ारिश से लेकर बाजीराव-मस्तानी के सेट पर घूमते हुए पद्मावती के फ्रेम में अचानक घुस गए। कई सीन में तो रणवीर की पगड़ी भी बाजीराव-मस्तानी की मस्तानी से उधार ली हुई प्रतीत होती है। सुधी समीक्षक की मानें तो फिल्म में भंसाली को बहुत खर्च नहीं हुआ होगा। मस्तानी के ड्रेसेज और सेट्स भी काम आए हैं। यानी, इस हद तक पुनरावृत्ति है।

फिल्म में राजपूती शान है, तो एक चिह्नित शत्रु भी है। राजपूत का सिर सोलह साल तक सिर पर न रहे, ऐसा आल्हा सुनकर बड़ा राजपूत क्या करेगा? वह शत्रु चुनेगा। देश तो आजाद हो ही गया है, बेरोजगारी भी चरम पर है, खाली युवा अपने शत्रु तलाश रहा है, इसीलिए आपको हैदराबाद यूनिवर्सिटी से जेएनयू और मालदा से कासगंज तक युवा सड़कों पर मिलेंगे- किसी के भी हाथों इस्तेमाल हो जाने के लिए। राजपुताने की शान अब राजपूतों की बपौती नहीं रह गई। मामला राजपूत जाति से आगे जा चुका है। अब हर बेरोज़गार युवा स्‍वयंभू है, राजपूत है जो गली-गली दुश्‍मन तलाश रहा है।

जिस फिल्‍म से ब्राह्मणों को आहत होना चाहिए था और राजपूतों को गर्वोन्‍नत, उस फिल्‍म पर राजपूत आक्रोशित हैं जबकि ब्राह्मण मौज ले रहे हैं। हमारे दौर की मूर्खताओं का सिरा लंबा होता जा रहा है। सहजबुद्धि का अकाल पड़ गया है। इसलिए फिल्म देखनी है तो भांग खाकर देखिए। इसकी विशाल दृश्यावलियां, शानदार सिनेमेटोग्राफी और एकाध गीतों की तान अगर द्रुत तक टिकी रह जाए (जैसी भंग की तरंग में टंगती है) तो शायद इस फिल्म की मूर्खताओं पर आपकी निगाह न जाए।


लेखक दरभंगा स्थित स्‍वतंत्र पत्रकार हैं, फिल्‍मप्रेमी हैं और अपनी दक्षिणपंथी टिप्‍पणियों के लिए कुख्‍यात हैं। कवर फोटो अनम खान की ट्विटर टाइमलाइन से साभार है.