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बुलंदशहर हिंसा, पश्चिमी यूपी को दंगों में झोंकने की साज़िश थी- जाँच रिपोर्ट

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इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की जान लेने वाली बुलंदशहर हिंसा भीड़ का कोई स्वत:स्फूर्त कारनामा था या फिर इसके पीछे कोई साज़िश थी। इन जैसे तमाम सवालों का जवाब जानने एनसीएचआरओ, एआईपीएफ, आरटीएफ जैसे संगठनों का एक सम्मिलित तथ्यान्वेषी दल बुलंदशहर गया। आज इस टीम ने दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में अपनी जाँच रिपोर्ट जारी की जिसमें साफ़तौर से कहा गया कि यह घटना किसी साजिश का नतीजा है। इस मौके पर इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के बेटे श्रेय सिंह भी मौजूद थे। उन्होंने आश्चर्य जताया कि इस मामले का मुख्य आरोपी, बजरंग दल का जिला प्रमुख योगेश राज अभी तक गिरफ़्तार नहीं किया जा सका है।


बुलंदशहर में साम्प्रदायिक भीड़ द्वारा पुलिस अधिकारी और एक युवक की हत्या पर तथ्यान्वेषी रिपोर्ट


जांच टीम के सदस्य

1.किरण शाहीन (वरिष्ठ पत्रकार)
2.एड.अन्सार इन्दौरी(NCHRO)
3.मनोज सिंह (AIPF)
4.आयशा खान (RTF)
5.प्रो.भावना बेदी (दिल्ली यूनिवर्सिटी)
6.अज़ीम नावेद(सामाजिक कार्यकर्ता)


पृष्ठभूमि :

3 दिसम्बर 2018 की सुबह बुलंदशहर ज़िले के महाव गांव के पास एक खेत में गौकशी होते हुए देखे जाने और खेतों में गायों के कंकाल देखे जाने की बात को फैलते देर नहीं लगी। कुछ देर में ही लगभग दो सौ से ज़्यादा लोग खेतों में जमा हो गए।


कथित तौर पर गाय का कंकाल मिलने के बाद गांव वालों के अंदर ग़ुस्सा और उत्तेजना फैलने लगा, जिसमें हिंदू संगठनों के स्थानीय सदस्य और कार्यकर्ता योगेश राज और शिखर अग्रवाल आग में घी डालने का काम कर रहे थे। लोगों को उकसाया जा रहा था। धीरे धीरे आस पास के गांववाले भी वहां जमा होने लगे। साढ़े दस बजे तक इनकी तादाद तीन सौ से भी ज़्यादा हो गई। सैंकड़ो लोगों ने हाईवे पर स्थित चिंगरावठी पुलिस चौकी को घेर लिया। उस समय चौकी में केवल छह लोग थे। चौकी में मौजूद पुलिस वालों ने फ़ौरन पुलिस मुख्यालय से अतिरिक्त पुलिस बल भेजने का अनुरोध किया। स्याना थाने के पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह घटना स्थल से तीन किलोमीटर दूर थे।जैसे ही उन्हें ख़बर मिली उन्होंने अपने ड्राइवर राम आसरे को घटनास्थल पर चलने का आदेश दिया।
जब लगभग 11 बजे के आसपास वे घटनास्थल पर पहुंचे और योगेश राज के कहे अनुसार गौकशी का एफआईआर भी दर्ज़ किया और कार्रवाई का भरोसा दिया। उन्होंने नारे लगाती और सड़क जाम कर रही भीड़ के बीच जाकर भीड़ को आश्वस्त करने की कोशिश भी की और कहा कि इस मामले में उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने लोगों से शांति बनाये रखने की अपील की।

लेकिन लगातार उकसावे और योगेश राज के नेतृत्व में हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं के अड़ियल रवैये की वजह से भीड़ का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। उकसावे से जल्दी ही भीड़ अनियंत्रित हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि बीच-बीच में फायरिंग की आवाजें आ रही थीं। कइयों का कहना था कि बजरंग दल के योगेश राज और भारतीय जनता युवा मोर्चा के शिखर अग्रवाल लगातार लोगों को हिंसक होने के लिए उकसा रहे थे। गोली चलने की आवाज़ के बीच एक युवक सुमित की मौत भी हो गई। अनियंत्रित भीड़ ने पुलिस अधिकारी सुबोध सिंह की भी हत्या कर दी। सुबोध सिंह को न सिर्फ आँखों के पास गोली मारी गई बल्कि गोली लगने के बाद भी उन्हें बेरहमी से पीटा जाता रहा। उनके सर पर पथराव किया गया। उनके साथ पुलिस जीप में मौजूद अन्य पुलिसकर्मी अपनी जान बचा कर भाग खड़े हुए।

बजरंग दल के नेता योगेश राज द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी में गौकशी के आरोप में सात लोगों को नामज़द किया गया जिनमें दो बच्चे भी थे। बाद में पुलिस ने उनके नाम हटा लिए। चार लोग घटना के दूसरे दिन ही गिरफ्तार कर लिए गए। इन आरोपियों में कुछ ऐसे लोग भी नामजद किये गए थे, जो वर्षों पहले ही गाँव छोड़ कर जा चुके हैं। बीस दिन बाद पुलिस ने उन चारों को मामले में शामिल न मानते हए रिहा कर दिया और अन्य तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

दूसरी एफआईआर में इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या के मुख्य आरोपी योगेश राज को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। इस बीच सुबोध सिंह और सुमित के परिवार वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ बिष्ट से मिल चुके हैं। लेकिन अभी तक न तो आधिकारिक रूप से सुबोध सिंह के हत्यारों का पता पुलिस लगा पाई है और न ही सुमित के हत्यारों का। इस बात की भी आधिकारिक सूचना नहीं है कि खाली पड़े खेत पर गाय के कंकाल किसने डाले।

यहाँ इस बात का ज़िक्र करना भी जरूरी है कि एक से तीन दिसम्बर तक बुलंदशहर जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर दरियापुर में इस साल का इज्तेमा ( सुन्नी मुसलमानों की वार्षिक धर्मसभा ) हुआ था। दस लाख से ज्यादा भीड़ वाले इस इज्तेमा को बदनाम करने और देश भर में अंतर्धार्मिक तनाव पैदा करने की नीयत से महाव की वारदात को अंजाम दिया गया।

एनसीएचआरओ की पहल पर दिल्ली के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों की एक छह सदस्यीय जांच टीम ने 14 दिसम्बर 2018 को बुलंदशहर जाकर इस वारदात से जुड़े सारे घटनाक्रमों का जायजा लिया। जांच टीम उन सभी स्थानों पर गई जो घटना से सम्बंधित थे। उन सभी लोगों और अधिकारियों से टीम के सदस्यों ने विस्तृत बातचीत की जो घटना से जुड़े थे। बुलंदशहर उपद्रव और पुलिस अधिकारी सुबोध कुमार सिंह समेत एक स्थानीय युवक सुमित कुमार की हुई मौत के कारणों और परिस्थियों को भी टीम ने बारीकी से समझने की कोशिश की।

पुलिस का पक्ष :

सबसे पहले जांच टीम चिंगरावठी चौकी जहाँ यह पूरा उपद्रव हुआ था वहां पहुंची। यहाँ पिछले इंचार्ज सुरेश कुमार की जगह आये नए चौकी प्रभारी विजय कुमार ने पिछले दिन 13 दिसम्बर को ही यहाँ का कार्यभार संभाला था। हमारी जांच टीम जब वहां पहुंची तो पथराव और गोली चलने से टूटी फूटी चौकी की दीवारों की मरम्मत हो रही थी।राजमिस्त्री और मजदूर काम पर लगे हुए थे। पूछने पर नए चौकी प्रभारी विजय कुमार का कहना था कि चौकी को किसी भी बड़ी घटना के मद्देनज़र मज़बूत बनाया जा रहा है और उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।
विजय कुमार डासना जिला गाजियाबाद से ट्रांसफर हो कर आये थे और सुबोध कुमार सिंह से कभी नहीं मिले थे। उन्होंने हमारी जांच टीम को बताया कि :
– इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह ने उत्तेजित भीड़ को जांच और कार्रवाई का पूरा भरोसा दिया था फिर भी उपद्रव भड़काया गया।

महाव गाँव में घटनास्थल का जांच टीम ने मुआयना किय। मुआयना करने पर पाया कि गौकशी की संभावना कत्तई नहीं लगती, बल्कि किसी षड्यंत्र के तहत कई दिन पहले मर चुकी गायों के कंकाल वहाँ लाये गए लगते हैं।

पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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