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बर्फ़ीले पहाड़ों पर सुलगता सवाल: ‘देश लुट रहा है तो उतरिये मैदान !’

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पुण्य प्रसून वाजपेयी

साल खत्म होने को है और सत्ताधारी जनता को मूर्ख मान कर फिर से सत्ता की दौड़ को ही नये बरस का एंजेडा बनाने पर तुले हैं। सौ वाट का बल्ब फ्यूज़ हो रहा है तो ज़ीरो वाट के कई वल्ब भी एकसाथ सोचने लगे हैं कि रोशनी तो वह भी दे देगें। हमने ही तो इन्हें अपने अधिकारों को खत्म करने का लाइसेंस दिया है, वर्ना इनकी क्या हैसियत।

ये गुस्सा है या बेबसी! या फिर देश के बिगडते हालात पर बोलने भर का अंदाज ! हो जो भी लेकिन हिमाचल की ठंडी वादियों में क्रिसमस और नये बरस के बीच सैलानियों के संमदर में घूमते-फिरते हर चर्चा दो ही मुद्दों पर आ कर टिक जाती है। पहला सियासत और दूसरा प्रकृति से छेड़छाड़।

शिमला, चैल, कुफरी,फागू में रात होते-होते तापमान जीरो से नीचे चला जाता है तो अहसास होता है कि बर्फ के रंग को बदरंग करती गाड़ियों का रेला कैसे शहर से पहाड़ के जीवन को रौंद रहा है। और दिन में धूप से बदन गर्म करते वक्त जुबां पर सिय़ासत के घाव हर किसी में बैचेनी पैदा कर देते हैं। हां, शिमला में दिल्ली वालों का जमघट जरुर इस अहसास को जगाता है कि सत्ताधारी कैसे खुद को जन-सेवक बताकर जनता के लिये न साफ पानी मुहैया करा पाते हैं और न साफ हवा।

शिमला से 40 किलोमिटर दूर चैल में चाहे आप पैलेस होटल में हों या देश के सबसे उपरी क्रिकेट ग्राउंड पर। या फिर पर्वत की चोटी पर काली मंदिर में। गाहे- बगाहे कोई ना कोई ये बात कह ही देता है कि हालात ऐसे बनाये जा रहे हैं कि 2019 में देश अस्त हो जायेगा या देश में कुछ उदय हो जायेगा ! और सीधे न कहते हुये उपमाओं के जरिये पहाड़ से दिल्ली की सियासत को समझते-समझाते हुये जो बात कह दी जाती है वह आपके दिल को भेद सकती है। बिजनेस फलों का है। बिजनेस फलों के रस का है। बिजनेस गर्म कपड़ों को लुधियाने से लाकर बेच मुनाफा बनाने का हो या मैगी की दुकान खोलकर जिन्दगी की गाड़ी खींचने का है, या फिर पहाड] पर दो-चार रात गुजारने वालों की भीड़ को सहूलियत देकर या कहें रास्ता बताकर जिन्दगी जीने का है.. जुबां पर सिर्फ दर्द है। और दर्द की निशानदेही उसी सत्ता और उसी लोकतंत्र के खिलाफ उठती आवाज है, जिसे चुनते वह खुद हैं। या फिर जो जनता ने खुद के लिये ही बनाया है।

80 बरस की बूढी मां की अधबूझी आंखो को दिखाकर 50 बरस का बेटा जब ये कहे कि इन आंखो ने तो देश को बनते हुये देखा पर लगता है अब दोनो एक साथ ही देश को बिगाड़ने वाले हालात देखते हुए चले जायेगें तो जवाब नहीं सूझता। पहाड़ों पर जमीन के पैसे वालों ने कब्जा कर लिया है। न जमीन बची न पहाड़। और पहाड़ भी जब तक पैसे उगल रहे हैं तब तक उन्हें घायल करते ही रहा जाएगा। कुल जमा चार महीने कमाई होती है पहाड़ों पर रहने वालों की। तीन महीने गर्मी। और महीने भर की ठंड। लेकिन पहाड़ों को खत्म कर मुनाफा बनाने का धंधा बारहों महीने चलता है।
“आप तो दिल्ली से आये हैं, पर क्या आप जानते है दिल्ली में कमाई करने वाले पहाड़ों के मालिक हो गये? किसी ने घर बना लिया। किसी ने होटल। कोई पहाड़ को ही खरीद लेने के लिये उतावला है।” तो कोई नीचे से खड़े होकर ये कहने से नहीं चूकता कि “जब तक पहाड़ साफ हवा दे रहे हैं तब तक तो कमाई हो ही सकती है। गुरुग्राम में रहने वाले पहाड़ में काटेज-होटल बनाकर गुरुग्राम से ही रेट तय करते हैं। और कमाई से दुनिया की सैर पर निकल जाते है। और हम खुद को ही घायल कर मलहम नहीं रोटी का जुगाड करते हैं। जरा समझने की कोशिश कीजिये हमारे पहाड़ों को बर्बाद करने वालो का इंतजार हम ही करते हैं जिससे हमारी घर का चुल्हा जल सके।”

संयोग ऐसा है कि कुफरी में माइनस पांच डिग्री के बीच भी देश में गर्म होती सियासत के केन्द्र में दिल्ली की सत्ता को फ्यूज होते बल्ब के तौर पर देखा तो जा रहा है, लेकिन जिस तरह जीरो और पांच-पांच वाट के बल्ब रोशनी देने के लिये मचल रहे हैं, उसपर खूब चर्चा होती है। कौन है राजभर? कौन है कुशवाहा? कौन है पासवान? कौन है यादव? कौन है मायावती? कौन है गडकरी? कौन है मोदी? कौन है शाह? कौन है ममता? कौन है तेजस्वी? कौन है चन्द्रबाबू? कौन है स्टालिन? क्या ये देश से बड़े हो चुके हैं?

इसलिये पहाड़ पर हर किसी के लिये परिभाषा है। हर किसी को एक नाम दिया जा चुका है। और साफ हवा, शुद्ध पानी, दाल-रोटी, सब कुछ कैसे इन्ही परिभाषित लोगों ने लूट लिया या लूटकर अपने उपर सभी को निर्भर करने की बेताबी दिखा रहे हैं। इसपर जितनी पैनी नजर संसद की बहस में नहीं हो सकती, उससे कहीं ज्यादा पैनापन पहाड़ के दर्द के साथ हर क्षण आपके सामने है। आंकड़े भी डराने वाले हैं। एक हजार करोड़ का मुनाफा एक महीने में और कई लाख करोड़ का घाटा सिर्फ इसी महीने में। जी, दुनिया भर में प्रकृति बचाने की ही होड़ है और हमारे यहाँ प्रकृति से खिलवाड़ कर या बर्बाद कर कमाने की होड़ है।

शिमला में रहने वाले पर्यावरणविद बेहद निराश दिखते हैं तो खुल कर बोलते हैं। लेकिन आम शख्स तभी खुलता है जब वह मान ले कि आप सत्ताधारी नहीं हैं। और इस तरह की चर्चा में मुद्दों को लेकर बैचेनी वाकई कुछ नये सवालो को जन्म दे ही देती है। बेहद सादगी से पहाड़ पर पीढ़ियों से जिन्दगी बिता चुके किसी भी परिवार से मिल लीजिये, बातचीत का लब्बोलुआब यही निकलेगा कि पत्रकार आखिर क्यों पत्रकारिता कर नहीं पा रहा है? सत्ताधारी आखिर क्यों जनता के दर्द को समझ नहीं पा रहे हैं? या फिर विपक्ष की सियासत करने वालों से भी जनता का कोई लगाव क्यो नहीं है? सभी फरेबी हैं । सभी अपनी जमीन को बचाये रखने के खेल में ही मशगूल हैं। सभी के आधार मुनाफा खोजते हैं। हर आम शख्स ने मान लिया है कि उसकी मौत ही इस खेल को मुनाफा दे सकती है। मरने वाले के लिये जिन्दा रहने का एकमात्र उपाय मौत देने वालों की बिसात को ही लोकतंत्र या सत्तातंत्र मान लेना है।

गजब की सोच फागू जैसे ढंडे इलाके में पर्यटन विभाग के होटल में जली हुई लकड़ियो को चुनते पति-पत्नी ने ये कह कर परोस दी कि “आप आये हैं तो रोजी रोटी चलेगी। चले जायेगें तो रोजी रोटी के लाले पड जायेगें। पर आपके आने और जाने से पहाड़ की उम्र एक बरस तो कम हो ही गई। गाड़ियों का रेला आता है। सड़क चाहिये। और शिमला से दिल्ली तक के सियासतदान लगे हुये हैं गाड़ियों वालों के लिये काली कारपेट बिछाने में। चाहे पेड़ कटें। चाहे पहाड़ धंसें। चाहे पानी खत्म हो। बेफ्रिक हैं सभी।”

तो क्या मौत का सामान समेटे हुये हम पहाड़ पर आ रहे हैं और मौत समेटे जिन्दगी पहाड़ी जी रहा है? हो जो भी लेकिन शिमला के माल रोड पर चर्चा यही मिलेगी देश का बल्ब फ्यूज होने को है। त्योहारों या उत्सवों में चमकने वाली रोशनी समेटे छोटी छोटी लड़ियां ही अब खुद को सौ वाट का बल्ब मान चुकी हैं। आप भी मान लीजिये कि 70 बरस के लोकतंत्र की उम्र पूरी हो चली है। नहीं चेते तो उत्सव के साथ देश को वही सियासत दफ्न करेगी जिसे लोकतंत्र का जामा पहना कर नई नवेले दुल्हे की तरह हर पांच बरस में सजाया जाता है ।

“फिक्र है तो माल रोड पर तफरी में न घूमिये बल्कि देश के शहर दर शहर की सड़कों पर घूम-घूम कर बताइये कि हालात ऐसे क्यों हो चले हैं, और एक नयी फौज की जरुरत देश को क्यों है? प्रोफेशन कोई भी हो। डाक्टर बन कर क्या कर लीजियेगा? इंजिनियर हो जाइयेगा तो क्या होगा? पत्रकार ही बन जाइयेगा तो कौन सा कमाल कर लीजियेगा? फिल्मी सितारा होकर डरे या गुस्से में हैं, ये कहने भर से क्या होगा। अरे उतरिये मैदान में। भगाइये सत्ता-सेवकों को”- माल रोड पर अखरोट-बदाम बेचने वाला बुजर्ग की तल्खी इस एहसास को जगाने के लिये काफी थी कि पर्यटक चाहे नये बरस के इंतजार में पहाड़ों के सौन्दर्य के बीच पहुंच कर सुकून पा लें, लेकिन पहाड़ पर रहने वालो के मन तो दर्द से सुलग रहे हैं।

लेखक मशहूर टीवी पत्रकार हैं।

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