Home पड़ताल अटल को उन्‍हीं के पाले में खड़े होकर देखना..!

अटल को उन्‍हीं के पाले में खड़े होकर देखना..!

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अभिषेक श्रीवास्‍तव

आदमी चला गया। हिकारत और तिजारत के दो पाले खींच गया। अब अंधेरा चढ़ रहा है। दिन भर लतीफ़ों से खेलने के बाद जब शाम पांच बजे अटलजी के निधन की आधिकारिक पुष्टि हुई, तब से मैं सोच रहा था कि दिन बीतते-बीतते ऐसा क्‍या लिख दिया जाए जिसमें खुद को छलना न पड़े। अटलजी पर स्‍मृतिशेष जैसा कुछ लिखने की सलाहियत मुझमें नहीं है, न ही इतना तजर्बा है। मृत्‍यु की दौड़ में हमारी पीढ़ी के लोग चालीसा पढ़ रहे हैं, फिर भी हम बहुत बाद की पीढ़ी के हैं। बाबरी विध्‍वंस के बाद हम जवान हुए, सदी के अवसान पर हमने सायास एक वैचारिक पाला चुना और नई सदी की पहली सांप्रदायिक करवट ने 2002 में हमें एक स्‍थायी चश्‍मा पहना दिया। तब वे शीर्ष पर थे। सामने उन्‍हें ढलते देखा। इस बीच चुने हुए पाले की मिट्टी को उखड़ते देखा, तो दूसरे पाले की सड़ांध भी देखी। अब हमारी स्थिति टोबाटेक सिंह जैसी है। कब मारे जाएं, किसके हाथों, पता नहीं। दूसरे पाले से कब कौन देशद्रोही कह दे, अपने पाले से कब कौन पतित कह दे, कोई भरोसा नहीं। फिर भी, कुछ न कहने से कुछ कह देना हमेशा बेहतर होता है।

विचारधाराएं अपनी पालना के लिए हैं। अपना चश्‍मा हैं। हर किसी को अपने चश्‍मे से दुनिया को देखने और बरतने की इजाज़त है। मैं अपने चश्‍मे से देखूं तो जो मौजूदा निज़ाम है, उसकी जड़ इंदिरा गांधी तक जाती है। अटल इस विकासक्रम में एक कड़ी भर हैं। इस फ्रेम में अटल का मूल्‍यांकन करना मुमकिन नहीं। यह ज्‍यादती होगी। उन्‍हें समझने के लिए मुझे उनके पाले में खड़ा होना होगा। अपने पाले में खड़े होकर दूसरे पाले वाला दुश्‍मन ही नज़र आएगा। बोले तो हमारा गुंडा कामरेड, तुम्‍हारा कामरेड गुंडा। यह सबसे आसान काम है। ऐसे बात नहीं बनती। इसलिए यदि मैं भारतीय दक्षिणपंथ के आईने में अटल बिहारी वाजपेयी का अक्‍स देखने की कोशिश करता हूं तो दो मोटी बातें समझ में आती हैं।

पहली, वे अनिवार्यत: संघ के समर्पित कार्यकर्ता थे और अनिवार्यत: एक सनातनी ब्राह्मण थे। इसमें मैं खानपान आदि निजी चीज़ों को कसौटी नहीं मान रहा। अब मेरे सामने सवाल उठता है कि उन्‍होंने अपनी (मने संघ की) विचारधारा को कितना जिया? आज जैसी प्रचुर प्रतिक्रियाएं उनके विरोध और समर्थन में आई हैं, वे इसे नापने का फौरी पैमाना हो सकती हैं। दोनों की भावभूमि एक ही है कि वे समर्पित संघी और सनातनी रहे। अपनी विचारधारा के प्रति ईमानदार कोई भी शख्‍स सम्‍मान योग्‍य होना चाहिए, भले हम विरोधी विचारधारा के हों। कमिटमेंट एक मूल्‍य है, चाहें दाएं हो या बाएं।

दूसरी बात, उनकी पीढ़ी के लालकृष्‍ण आडवाणी को छोड़ दें तो क्‍या उनके बाद भाजपा में उभरी नेताओं की पीढ़ी में से आप किसी को भी विचारधारा का सच्‍चा वाहक मान सकते हैं? नरेंद्र मोदी का इकलौता उदाहरण काफी होगा। क्‍या मोदी आरएसएस के सच्‍चे कार्यकर्ता हैं? मेरा जवाब नहीं में है। ढेरों कारण गिना सकता हूं। अव्‍वल तो यही कि आरएसएस वाले उनके विराट हो चुके व्‍यक्तित्‍व से बहुत घबराते हैं। सत्‍ता में रहने की एक व्‍यावहारिक विवशता है जो संघ और भाजपा को कदमताल करने दे रही है अब तक वरना संघ जिस मजबूरी में और जितना रिफॉर्म हुआ है इस बीच, वह अप्रत्‍याशित है। वाल्‍टर एंडर्सन और श्रीधर दामले की एक किताब आई है आरएसएस पर। ज़रूर पढि़एगा। संघ के लोगों से बात करिए। संघ का एक विचार-पारायण काडर मोदी से नफ़रत करता है। मोदी ने संघ को दीवार से सटा दिया है। अंदरखाने संघ छोटी-छोटी साजि़शों का अड्डा बन चुका है। उधर मोदी के आभामंडल में भाजपा का संगठन छुछुक के छुहारा हो गया है। ऐसा अटल के दौर में क्‍या, जन्‍म के नब्‍बे साल में कभी नहीं हुआ कि आरएसएस एक सांस्‍कृतिक संगठन से राजनीतिक संगठन में तब्‍दील हो जाए और बाद में शिखर पर बैठे व्‍यक्ति का रेहन बनकर रह जाए।

इसी नैरेटिव के बीच अटल विशिष्‍ट होकर उभरते हैं। अटल ने अपने संगठन और उसकी विचारधारा को अंत तक थामे रखा। मोदी अपने संगठन और उसकी विचारधारा से इतना वृहत्‍तर हो गए कि उन्‍होंने ऐतिहासिक विश्‍वासघात कर डाला। तमाम वैचारिक चेहरों को मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया। आडवाणी जैसे विचार-पुरुष को अपने सामने झुकने को विवश कर दिया। सनातन धर्म की विरोधी नाथ परंपरा के ऐसे महंत को सबसे बड़े सूबे की कमान थमा दी जो उस परंपरा का भी नहीं हुआ जिसमें वह दीक्षित है। नतीजा- आज बनारस में मंदिर तोड़े जा रहे हैं। यह सनातन की पीठ में भोंका गया ज़हर बुझा छुरा है। आप ध्‍यान से देखिए, पाएंगे कि जितने भी लोग सत्‍ता के शीर्ष पर बैठे हैं, सब के सब अपनी वैचारिक परंपरा के विश्‍वासघाती हैं। अपने संगठन के भितरघाती हैं। सत्‍ता के प्रेम में पितृहंता और भ्रातृहंता भी बनने में उन्‍हें कोई संकोच नहीं।

अटल ने ऐसे ही राजधर्म की बात नहीं की थी। मुखौटे में रहना एक शासक का आपद्धर्म है। अटल जानते थे कि बगैर मुखौटे के वे न तो विचार को बचा पाएंगे, न संगठन को और न सत्‍ता को। इतना पानी उनकी भी आंख में रहा। आज जो मुखौटा हम देखते हैं राजा के चेहरे पर, वह दरअसल उसके चेहरे से भी ज्‍यादा खालिस है। असली है। मुखौटे और चेहरे के बीच का झीना परदा फट चुका है। कौन असली है और कौन नकली, जान पाना मुश्किल है। यह बाइपोलर सिन्‍ड्रोम है, पाखंड है, जो हमें अटल के यहां नहीं मिलता। जो एक स्‍तर पर पाखंड रचता है, वह हर स्‍तर पर पाखंड रचता है। वह संगठन, विचारधारा और सहोदरों-परिजनों के प्रति भी पाखंडी होता है। अटल जो थे, कम से कम पाखंडी नहीं थे। अखण्‍ड थे।

मैं फिर कहूंगा कि दक्षिणपंथ और आरएसएस की राजनीति से हमारी वैचारिक असहमति एक बात है, लेकिन अपनी विचारधारा के प्रति ईमानदारी बिलकुल दूसरी बात है। लोकतंत्र है। हर तरह के विचार रहेंगे। रहने भी चाहिए। असल बात यह नहीं कि अटल हमारे वैचारिक विरोधी थे। असल बात यह है कि वे अपनी (यानी संघ की) विचारधारा के ‘अटल’ वाहक थे, जो उनके बाद भाजपा में कोई नहीं हुआ। हर वो शख्‍स सम्‍मान का पात्र है जो अपने विचारों से दगा नहीं करता। हर वो शख्‍स तिरस्‍कार का पात्र है जो अपने विचारों से दगा करता है।

इस देश में बचे-खुचे, खुरदुरे और विकृत हो चुके वैचारिक दक्षिणपंथ के सच्‍चे वाहक का इस तरह अनंत में चले जाना हिंदुस्‍तान नाम के विविधतापूर्ण वैचारिक संगमन के लिए एक दुर्भाग्‍यपूर्ण स्थिति है। एक ऐसे समय में जब हर किस्‍म के राज्‍य-प्रयोजित या स्‍वतंत्र अपराध को एक विचारधारा विशेष की चादर ओढ़ा दी जा रही हो, ज़रूरी है कि अटल बिहारी वाजपेयी के अवसान के बहाने कुछ चीज़ों पर नए सिरे से विमर्श हो। मसलन, राष्‍ट्रवाद क्‍या है। हिंदुत्‍व क्‍या है। सनातन धर्म क्‍या है। मौजूदा निज़ाम नरेंद्र मोदी और उनके लघु संस्‍करणों के नेतृत्‍व में जो कुछ भी कर रहा है, क्‍या उसे दक्षिणपंथी राजनीति की संज्ञा दी जा सकती है अथवा वे कृत्‍य विशुद्ध अपराध की श्रेणी में आते हैं। क्‍या नरेंद्र मोदी आरएसएस के विचारों के वाहक हैं? क्‍या आज का आरएसएस और भाजपा सनातन धर्म के रक्षक हैं अथवा विरोधी? क्‍या खुद को हिंदू हित रक्षक कहने वाली सरकार वाकई हिंदू हित रक्षक है या हिंदू विरोधी? हिंदुत्‍व क्‍या हिंदू धर्म है या कुछ और? इन सवालों पर अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी की राजनीति में क्‍या और कितना फ़र्क है?

अटल का जाना पाले खींचकर फूल चढ़ाने या चप्‍पल मारने का अवसर नहीं बनना चाहिए। ऐसा किसी के साथ नहीं होना चाहिए। अंधश्रद्धा और अंधविरोध दोनों घातक हैं। व्‍यक्ति का मूल्‍यांकन उसके खित्‍ते में उसकी अवस्थिति से होना चाहिए। यह काम कौन करेगा, इसका जवाब मेरे पास नहीं है लेकिन एक आखिरी बात कहना चाहूंगा- अटलजी के अवसान पर हमें यह सवाल उनके वसुधैव कुटुम्‍ब से जरूर पूछना चाहिए कि अब कुटुम्‍ब के मुखिया को राजधर्म की याद कौन दिलाएगा? कोई है?


लेखक मीडियाविजिल के कार्यकारी संपादक हैं

8 COMMENTS

  1. अभिषेक गुरु की लिखावट है मे समझ गया मे यही कहूंगा की मैं उनके मरने पे उतना ही दुखी हूं, जितना उनके जीने पे.. मे इस बात से अवगत हु की आप मौत पर राजनीती के खिलाफ है मगर ये पहलू देखिएः अगर अटल जी का देहांत अगर 2019 मे चुनाव के समीप होता तो क्या नज़ारा होता क्या वही नज़ारा होता जो इंदिरा की हत्या के बाद कांग्रेस ने उठाया या राजीव की हत्या के बाद कांग्रेस ने उठाया था जबकि मोदी का कद आजके दौर मे अटल से बड़ा हो गया हो पर अटल हर किसी के जहन मे है क्युकी अटल जब सत्ता मे आये 1996 से लेकर 2005 हम सब उस समय 18 -35 आयु के लोग होंगे आज जो मोदी को पसंद कर रहे है या भक्त गण बने हुए है वो भी आयु के वो अधिकांश लोग है 15 से 35 ke बीच के हमे अटल जी पसंद भी आये और कई बातो मे नापसंद और आज हमे मोदी हमे इसलिए पसंद नहीं आते क्युकी अब राजनीती की समझ रखने वाली पीढ़ी हो गए है

  2. बीजेपी को इस समय खुद ये लग रहा है की फायदा कैसे उठाया जाये मगर ये किस्सा कल शाम तक ख़तम हो जायेगा… मोदी जी ने संघ की बैंड बजायी है ये पराम् सत्य है मगर क्या अटल ने बैंड नहीं बजाय संघ का… वो हमेशा से अपने आपको हिन्दू मुस्लिम हितेषी घोषित हुए जब की यही घटना संघ विरोधी जाती है… लेख बहुत सटीक जगह चोट करता है मगर मुझे ये जरू लगा “गुरु आज आपके लेखनी मौत के आवेश मे कमज़ोर हुई ” आप वो पुण्य सत्य नहीं लिख पाए जिसको आप अपने दिल से लिखना चाहते थे मगर आपने चोट paunchai है मे आखिरी मे यही कहूंगा की तोडा और लिख देते खुलके क्युकी काफी कम मिलता है आपका ऐसे मुद्दों मे लिखना

  3. What’s mediavigil Mr executive editor? Is it not for doing a class politics specifically Proletariat instead of the Bourgeois one? Atal like nehru indira modi served their bourgeois class. Is not it? It is high time we mourn suicides rather brutal murder of the 250000 farmers in last 20years by Atal Manmohan Modi.

  4. It was probably uma sharma kathak in kamani auditorium. I was sitting on one of front rows when a man entered and sat down some rows behind me. It was bajpayee who was later requested to come to front row. He was probably ex foreign minister then. I think he possessed some more qualities which are very personal. But he can’t evaluated for these qualities

  5. Bajpayee second gift for corporate was formation of disinvestment ministry. Now maruti is owned by master of Indian government, judiciary Japanese Osamu Suzuki.

  6. Home पड़ताल जितना उन्‍होंने बचा लिया था, हम सब मिलकर उतना भी नहीं बचा…
    जितना उन्‍होंने बचा लिया था, हम सब मिलकर उतना भी नहीं बचा पाए!
    By MediaVigil – August 17, 2018

    Indian Prime Minister Atal Behari Vajpayee gestures as he talks to news photographers at his residence in New Delhi March 25, 2004. Vajpayee on Thursday hosted a tea party for the news photographers working for local, national and international newspapers and news agencies. REUTERS/Desmond Boylan AH/ – RP4DRIAXIBAA
    व्‍यालोक

    कल से काफी धूल बैठ चुकी है। इस क्षणजीवी समय में फटाफट फैसला सुनाने की आदत है, लेकिन कुछ लोगों को इंतजार भी करना होगा ताकि वे ओल्ड-फैशंड कहलाने का ख़तरा उठाते हुए भी स्थितियों और चीजों का ठहरकर, सम्यक मूल्याकंन कर सकें।

    आज नेपोलियन की एक कथा याद आती है। वह एक बार अपने कार्यालय आया और उसने खूंटी पर अपना कोट टांगना चाहा। खूंटी उसके कद से थोड़ा ऊंची थी। उसके सहायक ने कहा, लाइए सर… मैं टांग देता हूं, आपसे लंबा हूं।’ नेपोलियन ने उसे मुड़कर देखा, मुस्कुराया और कहा- ‘हां, तुम मुझसे लंबे हो, पर ऊंचे नहीं हो।’ कहानी यह अधिक है, इतिहास कम। इतिहास कम इसलिए कि नेपोलियन यूरोप के हिसाब से भले नाटा हो, हमारे भारतीय संदर्भों में तो वह भी खासा लंबा आदमी था।

    कथा की याद इसलिए आयी कि हमारा युग लगातार छीजते, लगातार बौने होते लोगों और समय का है। कुछ व्यक्ति अपने कद से भी ऊंचे हो जाते हैं। वह व्यक्ति मूल्यों के लगातार क्षरण वाले युग में भी उन मूल्यों के साथ नज़र आया, इसलिए उसका कद और बढ़ गया। उन्होंने कोई नए या ऐतिहासिक मूल्य नहीं बना दिए, एकमात्र सिफत उनकी यह रही कि अवमूल्यन वाले इस समय में जब सिद्धांतों और आदर्शों को क्लिशे मान लिया गया, उन्हें रुकावट की तरह समझा जाने लगा, तब भी वे उन सिद्धांतों के साथ खड़े रहे।

    हमारे मन में हूक रहती होगी गांधी या सुभाष बनने की, पर हम बन पाते हैं नेहरू। उसके बाद इंदिरा गांधी तक की यात्रा होती है, जो भारतीय राजनीति में पतनकाल की सम्यक शुरुआत है। अटल परिस्थिति की निर्मिति अधिक थे, खुद की कम। लोहिया ने जिस गैर-कांग्रेसवाद की बुनियाद रखी, बलराज मधोक, नानाजी देशमुख, दीनदयाल उपाध्याय और श्यामाप्रसाद मुखर्जी इत्यादि ने जिस जनसंघ को कांग्रेस-विरोध के लिए प्रासंगिक बनाया, वह जनसंघ जब 1980 में टूटा और 1996 में भाजपा कई बैसाखियों के सहारे पहली बार सत्ता में आयी, अटल प्रधानमंत्री बने, तब तक गंगा औऱ यमुना में काफी पानी बहा था।

    अटलजी महामानव नहीं थे, वह एक आम आदमी की कमजोरियों-खूबियों से लैस एक राजनेता भर थे, न इससे अधिक, न इससे कम। हां, वह सही वक्त पर सही जगह मौजूद जरूर थे। साथ ही, यह भी कि उन्होंने राजनीति की रपटीली राहों पर खुद को फिसलने तो दिया, काजल की कोठरी में एकाध दाग तो लगे, लेकिन वह गिरे नहीं, वह काजल में सने नहीं।

    इस लेखक की पीढ़ी वाले जरा याद करें। किस दौर में भाजपा की राजनीति पूरे उरूज पर पहुंची, उसमें भी वाजपेयी कहां खड़े थे, क्यों वह मुखौटा बने, क्यों वह दूसरे दलों को भी पसंद रहे? 1984 में भारत की कमान अभूतपूर्व बहुमत के साथ एक नौसिखिए के हाथों में वंशवादी परंपरा के तहत सौंप दी गयी। राजीव गांधी इस कदर नौसिखिए थे कि उन्होंने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटकर मौलानाओं को खुश किया, तो उसके संभावित कुपरिणाम से बचने के लिए अयोध्या में ताला खुलवा दिया, शिलान्यास करवा दिया। इंदिरा गांधी को उनकी तानाशाही और एकछत्र राज करनेवाली प्रवृत्तियों ने पहले ही हल्‍का बना दिया था, हालांकि कम साक्षरता, सूचनाओं के कम प्रसार और अल्पज्ञ भारतीयों की वजह से इंदिरा कई वर्षों तक माई बनकर देश पर राज करती रहीं।

    राजीव ने सारा कुछ डुबो दिया। उनके बाद का काल तो लगभग ढाई वर्षों की प्रसव पीड़ा ही थी इस देश के लिए, पूरी सियासत के लिए। बोफोर्स से राजीव की राजनीति बुझी, तो मंडल के जवाब में भाजपा ने रथयात्रा निकाल दी। सनद रहे कि रथयात्रा को नेतृत्व आडवाणी दे रहे थे, यह दीगर बात है कि बाबरी ढांचा टूटने के एक दिन पहले वाजपेयी ने कारसेवा के दौरान जमीन को समतल करने की बात कही थी। उस वीडियो में जब वह कहते हैं कि उन्हें पता नहीं कल क्या होगा, वह तो आदेशानुसार दिल्ली जा रहे हैं, तो उनके चेहरे की भंगिमा देखने लायक है।

    वाजपेयी आदर्श नहीं थे, वह व्यवहार हैं। वह राम नहीं थे, वह कृष्ण थे। चाहना उनकी जो भी हो। उनका संपूर्ण जीवन और राजनीति इसी का द्वंद्व है। व्यवहार और सिद्धांत, राजनीति और राजनय (पॉलिटिक्स एंड स्टेट्समैनशिप) की दो चक्कियों के बीच पिसते एक मानव का संघर्ष है, राजनेता की कहानी है। वह राजधर्म निभाने की सलाह देते हैं, लेकिन जीवन के सांध्यकाल में गोवा अधिवेशन में यह भी कहते हैं कि गोधरा में हिंदू न मारे जाते, तो गुजरात का इतना बड़ा दंगा नहीं होता।

    सनातनी हिंदू और संघ का व्रती होना उनका आदर्श रहा होगा, पर अच्छे खानपान का शौकीन होना व्यवहार रहा होगा। कांग्रेसमुक्त भारत उनका आदर्श रहा होगा, पर सभी दलों के नेताओं के साथ गलबंहियां देना, यारबाशी करना उनका व्यवहार था। वह अब हैं नहीं, वरना उनसे पूछा जाना चाहिए था कि भाजपा की वर्तमान बढ़त और धमक को देखकर वह कितने उदास हैं? इस लेखक को लगता है कि अटलजी इसका उत्तर शायद ही देते।

    मानवीय विवशता अजीब है। आदर्श हमें लुभाते हैं, व्यवहार में कठिनाई होती है। हम रामराज्य की बात करते हैं, व्यवहार में अपनाना पड़े तो सारा भारतवर्ष सूना हो जाए। जीवन इसीलिए विरोधों का समंजन है, सामंजस्य का नाम है और व्यावहारिकता के नाम पर रोजाना आदर्शों का दम घोंटते जाने का जलवा है। बावजूद इसके, आदर्शों के प्रति हमारा अचेतन तो आकर्षित, बल्कि ‘आक्रांत’ रहता ही है। आक्रांत कहना ही सही होगा, क्योंकि जिनको अपनाने की हम में कुव्‍व्‍त नहीं होती, लेकिन आदर भरपूर होता है, उनसे हम शायद आक्रांत ही रहते हैं। आदर्शों के प्रति यह ललक ही शायद उस व्यक्ति को महामानव बना देते हैं, क्योंकि हम सब मिलकर उतना भी नहीं बचा पाए जितना उस व्यक्ति ने बचा लिया था।

    कई बार व्यक्ति खुद के बड़प्पन से इतना बड़ा नहीं बनता, जितना दूसरों के छोटेपन से वह ऊंचा लगने और दिखने लगता है। भारत-रत्न अटल बिहारी के साथ यही बात थी। वह दरअसल उस दौर में उभरे, जब राजनीति में पिग्मी और बौने हो रहे थे। इन सबके बावजूद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तथाकथित अजातशत्रु को भी उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर चौतरफा अभिशाप और गालियां तक मिल रही हैं। भारतीय परंपरा में मौत के बाद सबको माफ करने का चलन रहा है, वर्तमान पीढ़ी ने उसे भी नकार दिया है और ख़तरनाक बात तो यह है कि इसकी शुरुआत अटल जैसे कद्दावर नेता से हुई है। यह सोचकर ही रोमांच हो जाता है कि आज के विवादित, असम्मानित और आरोपित नेता जब मरेंगे, तो उनके साथ यह पीढ़ी क्या करेगी?

    यही शायद पोएटिक जस्टिस है, यही शायद नियति का विधान है।

    लेखक दक्षिणपंथ के प्रखर टिप्‍पणीकार हैं

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    मोदी जी का राष्ट्र संबोधन उर्फ़ चुनावी नगाड़ा!
    2 COMMENTS
    Anonymous August 17, 2018 at 5:16 pm
    First Time ever corporate was gifted Pro corporate labour commission. It was constituted in 1998. Gave its report in 2002. (second labour commission report. Even British labor commission was Pro labor)

  7. Greatest ever bourgeois leader of india whose every breath was dedicated to the benefits of bourgeoisie. Millions of salute from the assocham, ficci, Osamu Suzuki of Maruti…

  8. Shiv Kumar Shukla

    आलोचना तो राजनीति की परम्परा में है पर आलोचना करने का भी एक समय निर्धारित है। किसी की मौत के तुरन्त बाद उस व्यक्ति के गुण धर्म का विन्यास करना मेरे विचार से महापतित का ही कार्य हो सकता है।
    आपका लेख वामपंथी विचारधारा से ओत प्रोत और मुख्य विषय से भटक कर मोधी विरोध पर सीमित हो गया है। आप दर असल बोलना तो वाजपेई जी पर चाहते थे पर आप की असलियत सामने आ ही गई और आपने वही लिखा जो आप वास्तव में हो।
    आप जैसे आलोचक ही मोदी समर्थकों को संजीवनी देते रहे हैं।
    धन्यवाद!

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