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अयोध्या की ‘धर्म सभा’ और बनारस की ‘धर्म संसद’ के बीच फँसी सियासत !

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पुण्य प्रसून वाजपेयी


इधर अयोध्या, उधर बनारस। अयोध्या में विश्व हिन्दु परिषद ने धर्म सभा लगायी तो बनारस में शारदा ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती ने धर्म संसद बैठा दी। अयोध्या में विहिप के नेता-कार्यकत्ता 28 बरस पहले का जुनुन देखने को बैचेन लगे तो बनारस की हवा में 1992 के बरक्स सौहार्द की नई हवा बहाने की कोशिश शुरु हुई। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का नारा लेकर विहिप संघ और साधु संतो की एक खास टोली ही नजर आई तो बनारस में सनातनी परंपरा की दिशा तय करने के लिये उग्र हिन्दुत्व को ठेंगा दिखाया गया और चार मठो के शंकराचार्यो के प्रतिनिधियों के साथ 13 अखाडो के संत भी पहुंचे। 108 धर्माचार्यो की कतार में 8 अन्य धर्म के के लोग भी दिखायी दिये।

अयोध्या में खुले आसमान तले पांच घंटे की धर्म सभा महज तीन घंटे पचास मिनट के बाद ही नारो के शोर तले खत्म हो गई  तो बनारस में गंगा की साफ-अविरलता और गौ रक्षा के साथ राम मंदिर निर्माण का भी सवाल उठा। धर्म संसद 25 को शुरु होकर 27 तक चलेगी। अयोध्या में राम को महापुरुष के तौर पर रखकर राम मंदिर निर्माण की तत्काल मांग कर दी गई तो बनारस में राम को ‘ब्रह्म’ मान कर किसी भी धर्म को आहत ना करने की कोशिशें दिखाई दीं। अयोध्या की गलियो में मुस्लिम सिमटा दिखायी दिया। कुछ को 1992 याद आया तो राशन पानी भी जमा कर लिया। बनारस में मुस्लिमो को तरजीह दी गई । 1992 को याद बनारस में भी किया गया पर पहली बार राम मंदिर के नाम पर हालात और ना बिगडने देने की खुली वकालत हुई। अयोध्या के पांजीटोला, मुगलपुरा जैसे कुछ मोहल्ले की मुस्लिम बस्तियों के लोगों ने बातचीत में आशंका जताई कि बढ़ती भीड़ को लेकर उनमें थोड़ा भय का माहौल बना तो बनारस ने गंगा जमुनी तहजीब के साथ हिन्दू संसाकृतिक मूल्यो की विवेचना की। बुलानाला मोहल्ला हो या दालमण्डी का इलाका, चर्चा पहली बार यही सुनाई दी कि राम मंदिर पर बीजेपी की सियासत ने और संघ की खामोशी ने हिन्दुओ को बांट दिया। कुछ सियासत के टंटे समझने लगे तो कुछ सियासी लाभ की खोज में फिर से 1992 के हालात को टटोलने लगे।

ये लकीर जब अयोध्या और बनारस के बीच साफ खिंची हुई दिखायी देने लगी तो राजनीतिक बिसात पर तीन सवाल उभरे। पहला, बीजेपी के पक्ष में राम मंदिर के नाम पर जिस तरह समूचा संत समाज पहले एक साथ दिखायी देता था,अब वह बँट चुका है। दूसरा, जब बीजेपी की ही सत्ता है और प्रचारक से प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी के पास बहुमत का भंडार है तो फिर विहिप कोई भी नारा कैसे अपनी ही सत्ता के खिलाफ लगा सकती है? तीसरा, राम मंदिर को लेकर कांग्रेस की सोच के साथ संत समाज खड़ा दिखायी देना लगा। यानी ये भी पहली बार हो रहा है कि ढाई दशक पहले के शब्दो को निगलने में स्वयसेवको की सत्ता को ही परेशानी हो रही है। और 1992 के हालात के बार राममंदिर बनाने के नाम पर सिर्फ हवा बनाने के खेल को और कोई नहीं बीजेपी के अपने सहयोगी ही उसे घेरने से नहीं चूक रहे हैं।

दरअसल अपने ही एंजेडे तले सामाजिक हार और अपनी ही सियासत तले राजनीतिक हार के दो फ्रंट एक साथ मोदी सत्ता को घेर रहे है । महत्वपूर्ण ये नहीं है कि शिवसेना के तेवर विहिप से ज्यादा तीखे है। महत्वपूर्ण तो ये है कि शिवसेना ने पहली बार महाराष्ट्र की लक्ष्मण रेखा पार की है और बीजेपी के हिन्दू गढ़ में खुद को ज्यादा बडा हिन्दूवादी बताने की खुली चुनौती बीजेपी को दे दी है । यानी जो बीजेपी कल तक महाराष्ट्र में शिवसेना का हाथ पकड़कर चलते हुये उसे ही पटकनी देने की स्थिति में आ गई उसी बीजेपी के घर में घुस कर शिवसेना ने अब 2019 के रास्ते जुदा होने के मुद्दे की तालाश कर ली है। तो सवाल दो हैं, पहला, क्या बीजेपी अपने ही बनाये घेरे में फंस रही है या फिर दूसरा कि बीजेपी चाहती है कि ये घेरा और बड़ा हो जिससे एक वक्त के बाद आर्डिनेंस लाकर वह राम मंदिर निर्माण की दिशा में बढ़ जाये। लेकिन ये काम अगर मोदी सत्ता कर देती है तो उसके सामने 1992 के हालात हैं। जब बीजेपी राम मय हो गई थी और उसे लगने लगा था कि सत्ता उसके पास आने से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन 1996 के चुनाव में बीजेपी राममय होकर भी सत्ता तक पहुंच नहीं पायी और 13 दिन की वाजपेयी सरकार तब दूसरे राजनीतिक दलो से इसलिये गठबंधन कर नहीं पायी क्योकि बाबरी मस्जिद का दाग लेकर चलने की स्थिति में कोई दूसरी पार्टी थी नहीं। याद कर लीजिये तब का संसद में वाजपेयी का भाषण जिसमें वह बीजेपी को राजनीतिक अछूत बनाने की सोच पर प्रहार करते हैं। बीजेपी को चाल चरित्र के तौर पर तमाम राजनीतिक दलो से एकदम अलग पेश करते हैं। और संसद में ये कहने से भी नहीं चूके, ” दूसरे दलो के मेरे सांसद साथी ये कहने से नहीं चुकते कि वाजपेयी तो ठीक है लेकिन पार्टी ठीक नहीं है। ”

इसका असर ये हुआ कि 1998 में वाजपेयी ने अयोध्या मुद्दे पर खामोशी बरती और प्रचारक से प्रधानमंत्री का ठोस सफर शुरु किया। 1999 में अयोध्या के साथ साथ धारा 370 और कामन सिविल कोड को भी ताले में जड़ दिया गया। ध्यान दें तो नरेन्द्र मोदी भी 2019 के लिये इसी रास्ते पर चल रहे हैं जो 60 में से 54 महीने बीतने के बाद भी अयोध्या कभी नहीं गये, और सबका साथ सबका विकास का नारा ही बुंलद कर अपनी उपोयगिता को काग्रेस या दूसरे विपक्षी पार्टियो से एक कदम आगे खडा करने में सफल रहे । लेकिन यहाँ प्रधानमंत्री मोदी ये भूल कर रहे हैं कि आखिर वह स्वयसेवक भी हैं। और स्वयंसेवक के पास पूर्ण बहुमत है जो कानून बनाकर राम मंदिर निर्माण की दिशा में बढ़ सकते हैं।  क्योकि बीते 70 बरस से अयोध्या का मामला किसी ना किसी तरह अदालत की चौखट पर झूलता रहा है और संघ अपने स्वयंसेवको को समझाता आया है कि जिस दिन संसद में उनकी चलेगी उस दिन राम मंदिर का निर्माण कानून बनाकर होगा। ऐसे हालात में अगर नरेन्द्र मोदी की साख बरकरार रहेगी तो विहिप के चंपतराय और सरसंघचालक मोहन भागवत की मटियामेट होगी। चंपतराय वही शख्स हैं जिनहोने 6 दिसबंर 1992 की व्यूह रचना की थी और तब सरसंघचालक देवरस हुआ करते थे जो 1992 के बाद बीजेपी को समझाते भी रहे कि धर्म की आग से वह बच कर रहे और राम मंदिर निर्माण की दिशा में राजनीति को ना ले जाये।

लेकिन अब हालात उल्टे हैं। सरसंघचालक भागवत अपनी साख के लिये राम मंदिर का उद्घोष नागपुर से ही कर रहे है। और चंपतराय के पास प्रवीण तोगडिया जैसे उग्र हिन्दुत्व की पोटली बांधे कोई है नहीं। उन्हे इसका भी अहसास है कि जब तोगडिया निकाले जा सकते हैं और विहिप की कुर्सी पर ऐसे शख्स बैठा दिया जाता है जिसे पता ही नहीं है कि अयोध्या आंदोलन खडा कैसे हुआ। और कैसे सिर पर कफन बांध कर स्वयसेवक तक निकले थे। और नरेन्द्र मोदी की पहचान भी 1990 वाली ही है जो सोमनाथ से निकली आडवाणी की रथयात्रा में गुजरात की सीमा तक नजर आये थे। यानी ढाई दशक में जब सबकुछ बदल चुका है तो फिर अय़ोध्या की गूंज का असर कितना होगा। और बनारस में अगर सर्व धर्म सम्माव के साथ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत ही तमाम धर्मो के साथ सहमति कर राम मंदिर का रास्ता खोजा जा रहा है तो फिर क्या ये संकेत 2019 की दिशा को तय कर रहे हैं। क्योकि अयोध्या हो या बनारस दोनो जगहो पर मुस्लिम फुसफुसाहट में ही सही पर ये कहने से नहीं चुक रहा है कि राम मंदिर बनाने से रोका किसने है। सत्ता आपकी । जनादेश आपके पास । तमाम संवैधानिक संस्थान आपके इशारे पर । तो फिर मंदिर को लेकर इतना हंगामा क्यों । और चाहे अनचाहे अब तो हिन्दू भी पूछ रहा है आंदोलन किसके खिलाफ ह , जब शहर तुम्हारा, तुम्ही मुद्दई , तुम्ही मुंसिफ तो फिर मुस्लिम कसूरवार कैसे ….?

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।