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किसान आंदोलन के भीतर स्‍वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लेकर आलोचना के बिंदु

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शुक्रवार को दिल्ली में देश भर के किसान जुटे थे। समाजवादी जन परिषद के महामंत्री अफलातून ने इस मौके पर स्‍वामीनाथन आयोग के बारे में एक टिप्‍पणी करते हुए विवेकानंद माथने का एक आलोचनात्‍मक लेख फेसबुक पर पोस्‍ट किया था।
उन्‍होंने लिखा है: ‘’इनके (किसानों के) सब नेता स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की मांग करते हैं। इन नेताओं की इस मांग से बदनाम कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन (Great Gene Robbery ख्याति के) गदगद होकर ट्वीट कर रहे हैं। स्वामीनाथन ने उसी रिपोर्ट में सिफारिश कॉरपोरेट खेती की है जिसमें लागत से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य की बात कही है। साम्राज्यवादी हित के लिए इनकी सिफारिश को विवेकानंद माथने के लेख से समझ सकते हैं।‘’
स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर एक आलोचनात्‍क दृष्टि के लिए मीडियाविजिल अपने पाठकों के लिए यह लेख प्रकाशित कर रहा है
-संपादक

विवेकानंद माथने

कृषि फसलों को उत्पादन खर्च पर आधारित लाभकारी कीमत प्राप्त करने के लिये देश भर के किसान दशकों से संघर्ष करते आये है। वह संघर्ष आज भी जारी है लेकिन अचानक कुछ संगठनों द्वारा कुछ सालों से स्वामीनाथन आयोग (राष्ट्रीय किसान आयोग) लागू करो की मांग शुरू हुई। आयोग की सिफारिशें जिसे स्वामीनाथन स्वयं सदाबहार क्रांति कहते है, प्रथम हरित क्रांति की तरह उत्पादन केंद्रित है। प्रथम हरित क्रांति का अनुभव यह बताता है की उत्पादन वृद्धि के लिये केवल किसान ही नही पूरे समाज को बडी कीमत चुकानी पडी। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार लागत पर डेढ गुना एमएसपी देने की सिफारिश भी एक धोखा है। इसलिये केवल जुमलों को घेरने के लिये यह मांग करना नासमझी है। खासकर तब जब पूरे देश में किसानों में आक्रोश है और वह अपने अधिकार के लिये सड़कों पर उतर रहा है।

देश में कृषि उत्पादन बढाने की चुनौती हमेशा रही है। देश में बढती आबादी के खाद्यान्न पूर्ति के लिये डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में हरित क्रांति की शुरुवात की गई। खेती की देशी विधियों के माध्यम से उत्पादन बढाने का रास्ता अपनाने के बजाय उन्होंने रासायनिक खेती, संकर बीज और यांत्रिक खेती को बढावा दिया। क्रॉप पैटर्न बदलकर एकफसली पिक पद्धति को बढ़ावा देने से जैव विविधता, फसल विविधता पर बुरा असर पडा। देश के बडे हिस्से में बहुफसली खेती एकफसली खेती में परिवर्तित हो गयी। किसान को अपने खेती से पोषक आहार तत्व मिलना बंद हुआ तथा पूरे देश में रासायनिक खेती के कारण कृषि भूमि की उर्वरा शक्ति घटी व भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आने लगी तथा जमीन, पानी और खाद्यान्न जहरीले हुये। थाली में जहर पहुंचा।

हरित क्रांति से कृषि उत्पादन तो बढा लेकिन किसानों पर दुतरफा मार पडने से उनकी हालत तेजी से बिगडती गयी। बीज, खाद, कीटनाशक, यंत्र का बढता इस्तेमाल, सिंचाई, बिजली आदि के लिये किसान की बाजार पर निर्भरता बढने से लागत खर्च बढा। फसलों का उत्पादन बढने से फसलों की कीमत कम हुई। परिणामस्वरूप लागत और आय का अंतर इस तरह कम हुआ कि खेती घाटे का सौदा बनी और किसान कर्ज के जाल में फंसता चला गया। इस प्रकार प्रथम हरित क्रांति किसानों की लूट करने, थाली में जहर पहुंचाने और जैवविविधता को प्रभावित करने के लिये कारण बनी। किसानों के बर्बादी में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हरित क्रांति के जनक के नाते डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन किसान की दुर्दशा के लिये सबसे अधिक जिम्मेदार माने जा सकते हैं।

प्रथम हरित क्रांति का मूल उद्देश्‍य कृषि रसायनों और तथाकथित उन्नत संकर बीजों के व्यापार को प्रोत्साहित करना था जिसके द्वारा भारत में खाद, बीज, कीटनाशक और कृषि औजारों के बाजार का विस्तार किया गया। यह कहा जाता है कि उूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद बारुद बनाने वाली कंपनियों ने बारुद के घटक नायट्रोजन, पोटाश और फास्फेट का वैकल्पिक इस्तेमाल करने के लिये रासायनिक खाद का उत्पादन शुरु किया। हरित क्रांति ने उत्पादन वृद्धि के नामपर प्राकृतिक खेती करनेवाले किसान को रासायनिक खेती के झांसे में लाकर रासायनिक खेती को पूरे देश में फैलाने का काम किया। कंपनियों ने सरकारी मदद से रासायनिक खाद, बीज, कीटनाशक, कृषि उपकरण किसानों को बेचकर उनकी लूट की।

दूसरी हरित क्रांति के लिये यूपीए के तत्कालीन कृषि मंत्री ने कहा था कि उन्होने स्वामीनाथन आयोग की 17 में से 16 सिफारिशे लागू की थीं। एनडीए सरकार कह रही है कि उन्होंने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट नब्बे प्रतिशत लागू की है। अर्थमंत्री ने बजट पेश करते समय कहा कि सरकार पहले से स्वामीनाथन आयोग के अनुसार लागत के डेढ़ गुना कीमत दे रही है। अब सरकार ने सी2 पर पचास प्रतिशत मिलाकर एमएसपी देने की घोषणा कर दी है। स्वामीनाथन स्वयं कहते है कि एनडीए सरकार उनके रिपोर्ट पर अच्छा काम कर रही है। फिर भी किसान की हालत बिगडती जा रही है। तब स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर सवाल उठता है।

स्वामीनाथन आयोग को खेती की आर्थिक व्यवहार्यता में सुधार कर किसान की न्यूनतम शुद्ध आय निर्धारण का काम सौंपा गया था। तब वह किसानों की बिगडती हालात को सुधारने, उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिये बुनियादी सुझाव दे सकते थे। कृषि फसलों के शास्त्रीय पद्धति से मूल्यांकन करने और उसके आधार पर श्रम मूल्य देने या सभी कृषि उपज के दाम देने के लिये वैकल्पिक योजना सरकार को पेश कर सकते थे। लेकिन यह जानते हुये भी कि एमएसपी फसलों का उत्पादन मूल्य नही हैं उन्होने एमएसपी में उत्पादन की भारित औसत लागत से 50 प्रतिशत अधिक मूल्य देने की सिफारिश की।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार यह अनुमानित किया जा रहा है कि सी2 पर पचास प्रतिशत के आधार पर एमएसपी में सामान्यत: अधिकतम दो-तीन सौ रुपये तक की बढोतरी हो सकती है। यह बढोतरी भी तभी संभव है जब सरकार एमएसपी पर सभी फसलें खरिद करे या खुले बाजार में एमएसपी से निचे फसल की खरिदने पर निर्बंध लगाये। आज न तो सरकार के पास ऐसी व्यवस्था है न ही इसके लिये उन्होंने बजट में कोई प्रावधान किया है। स्वामीनाथन आयोग की आर्थिक सिफारिशें पूर्णता: लागू होने पर भी किसान के मासिक आय में अधिकतम 1000 रुपयों की बढोतरी संभव है। आज किसान की केवल खेती से प्राप्त मासिक आय औसतन 3000 रुपयें है। वह बढकर 4000 रुपये हो सकती है। अन्य मिलाकर कुल आय 6400 रुपये से 7400 रुपये हो सकती है जबकि सरकार कुल आय को दोगुना करने का दावा कर रही है। वेतन आयोग के अनुसार परिवार की बुनियादी आवश्यकताओं के लिये न्यूनतम मासिक आय 21 हजार रुपये होनी चाहिये। यह स्पष्ट है कि स्वामीनाथन आयोग के आधार पर एमएसपी में थोडी बढोतरी से किसानों को न्याय मिलना संभव नही है। किसानों के साथ फिर से धोखा किया जा रहा है।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों में कृषि उत्पादन बढाने के लिये जी.एम. बीज, सिंचाई की व्यवस्था, फसल बीमा, कृषि ऋण का विस्तार, समूह खेती, यांत्रिक खेती, गोदाम आदि की सिफारिश की गयी है। यह सारी व्यवस्थाएं किसानों को खेती से हटाकार कार्पोरेट खेती को बढावा देने के लिये की जा रही हैं। सरकार इसी रास्ते चलकर किसानों को खेती से हटाना चाहती है। वह खेती पर केवल 20 प्रतिशत किसान रखना चाहती है जो पूंजी और तकनीक का इस्तेमाल कर सके। कृषि, बीमा, बैंकिंग में एफडीआई, जी.एम. बीज, ठेके की खेती, ई-नाम, आधुनिक खेती पद्धति और इजराईल खेती, निर्यातोन्मुखी खेती आदि को बढावा देने की तैयारी इसी लिये की जा रही है। यह सदाबहार हरित क्रांति किसान को जड से उखाडने के लिये लाई गई है। नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से भारत की खेती पर कारपोरेटी कब्जा करने की शुरुआत हुई थी। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट किसान हित का नाटक कर कारपोरेट खेती की नींव को मजबूत करने का काम रही है। कारपोरेटी साजिशें किस तरह काम करती हैं इसका स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट उत्तम उदाहरण है।

कारपोरेट घराने किसान को लूटकर, खेती को घाटे का सौदा बनाकर भारत की खेती पर कब्जा करना चाहते हैं। उसके लिये वे किसान आंदोलन का भी उपयोग करना चाहते हैं। ‘’स्वामीनाथन आयोग लागू करो’’ की मांग के लिये स्वामीनाथन फाउंडेशन और इससे लाभान्वित होनेवाली कंपनियां काम कर रही हैं। वैश्विक तापमान वृद्धि से मुकाबला करने के लिये किसान परिवहन के लिये बैलशक्ति को बढावा देने और रासायनिक खेती से मुक्त नई प्राकृतिक खेती के लिये गाय बैलों की रक्षा करने की आवश्यकता है लेकिन उसे किसानों के लिये बोझ साबित कर गोवंश हत्याबंदी कानून हटाने की कोशिश हो रही है। सिंचाई का क्षेत्र बढाने के लिये नदी जोड योजना की मांग सरकार और कार्पोरेट द्वारा प्रायोजित है। कंपनियों को जमीन पर कब्जा करने का रास्ता खोलने के लिये किसान विरोधी कानून हटाने के नाम पर किसान का सुरक्षा कवच बने सीलिंग एक्ट हटाने की मांग की जा रही है। देश के किसानों और किसान संगठनों को अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करते हुये किसान विरोधी षडयंत्रों से सावधान रहने की आवश्यकता है।


लेखक ाष्‍ट्रीय किसान समन्‍वय समिति के संस्‍थापक सदस्‍य हैं और समाजवादी जन परिषद से संबद्ध हैं।

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