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‘मुस्लिम कार्ड’ दिखा, और एक भी मुसलमान को टिकट न देने वाली बीजेपी का ‘हिंदू कार्ड ?’

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इस समय यूपी समेत 5 राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। सभी दल अपने उमीदवार घोषित कर रहे हैं। ख़बरची एक से एक रपटें दे रहे हैं, लेकिन एक अंतर साफ़ है। लिखा जा रहा है कि “मायावती ने मुस्लिम कार्ड खेला”, “अखिलेश ने भी मुस्लिमों पर दांव लगाया”, “कांग्रेस ने भी मुसलमानों को रिझाया” लेकिन कोई यह नहीं लिखता कि “बीजेपी ने हिन्दू कार्ड खेला !” ना यह हेडिंग कहीं दिखती है कि “बीजेपी ने फिर मुस्लिम विरोधी रवैया दिखाया” और न यह कि “बीजेपी की लिस्ट में एक भी मुस्लिम नहीं

बेजेपी टिकट बांटने में घोर हिंदूवादी रवैया अपनाती है। यूपी में बीजेपी ने 403 में से अपने 304 उमीदवारों की घोषणा कर दी है लेकिन उनमे एक भी मुसलमान नहीं। बाक़ी बची सीटों में भी कोई मुसलमान होगा कहना मुश्किल है। बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में भी लगभग यही रवैया अपनाया था, जबकि मोदी जी ने नारा दिया था: सबका साथ-सबका विकास। आज भी वह मंचों से यह नारा दोहराते हैं, लेकिन वह और उनकी पार्टी इस पर यक़ीन करती है, इसका उदाहरण नहीं मिलता। इसके बावजूद आपने किसी प्रेस कांफ्रेंस में अख़बार या टीवी के किसी पत्रकार को इस सम्बन्ध में सवाल पूछते नहीं देखा होगा। वैसे तो मोदी जी से मीडिया को बात करने का मौका कम ही मिलता है, क्योंकि वह एकतरफ़ा संवाद में ही विश्वास रखते हैं और जब कभी सवाल-जवाब की नौबत आए तो वह सवाल भी खुद तय करते हैं, लेकिन बीजेपी की प्रेस कांफ्रेस में भी ऐसे सवाल पूछने की हिम्मत पत्रकार नहीं दिखाते। इसका हमें कोई मलाल भी नहीं है क्योंकि ज़्यादातर पत्रकारों के दिमाग़ में वही ब्राह्मणवाद और सामंतवाद भरा है। हम यानी मीडियाकर्मी। हमारे बीच दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व लगभग न के बराबर हैं। मुसलमान भी ज़्यादा नहीं हैं और जो हैं भी, वे एहतियातन ऐसे सवाल नहीं पूछते, क्योंकि वह जानते हैं कि ऐसे सवाल सामने वाले के बजाय उनको ही परेशानी में डाल सकते हैं।

हाँ, अन्य दलों को लेकर हम काफ़ी निष्पक्ष और आक्रमक दिखना चाहते हैं। यही वजह है कि मायावती ने जब 403 में से 401 उम्मीदवार घोषित करते हुए 100 के करीब मुसलमानों को टिकट दिया, तो हमारे कान एकदम खड़े हो गए और हमने इसे मुस्लिम कार्ड बताया। जबकि यूपी की आबादी में प्रतिनिधित्व और पिछड़ेपन के हिसाब से देखें तो इससे ज्यादा ही मुसलमानों की हिस्सेदारी बनती है।

मुसलमानों के सन्दर्भ में हम लोगों में एक अलग ही ग्रंथि काम करती है, लेकिन जैसा मैंने कहा कि मीडिया में किस तरह ब्राह्मणवाद-जातिवाद हावी है इसका अंदाज़ा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि आपने कभी किसी अख़बार या न्यूज़ चैनल में ये हेडिंग-हेडलाइन या बहस-परिचर्चा नहीं देखी होगी कि “अमुक दल ने अगड़ो पर दांव खेला”। मीडिया में यह सवाल कभी नहीं उठता जबकि आबादी में अगड़ो का प्रतिशत बहुत कम है।

आप हिन्दू-मुस्लिम और अगड़ों-पिछड़ों को लेकर इस अंतर को इस तरह साफ-साफ पहचान सकते हैं की बीएसपी ने 401 सीट में से 113 पर अगड़ी जातियों के लोगों को टिकट दिया है (बीएसपी का उदाहरण इसलिए क्योंकि बीएसपी ही बिना छुपाए अपने उम्मीदवारों की जाति की भी घोषणा करती है), जो करीब 28% होता है, जबकि यूपी की आबादी में अगड़ों की आबादी करीब 18 प्रतिशत है। लेकिन “अगड़ों पर दांव लगाया”, “अगड़ा कार्ड खेला” यह हेडिंग नहीं बनी। मगर 97 मुस्लिमों को टिकट देने पर “मुस्लिम कार्ड” हेडिंग बनती है, जबकि यूपी की आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है।

इतना ही नहीं मीडिया ने किसी चुनाव में कभी यह सवाल नहीं पूछा कि किस दल ने दलितों को सामान्य सीट से भी टिकट दिया है ? और नहीं दिया है तो क्यों नहीं दिया ? क्या दलित सिर्फ़ अपनी आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ेगा, क्या आबादी और पिछड़ेपन के हिसाब से उसका ज़्यादा सीटों पर हक़ नहीं बनता? क्या उसे सामान्य सीट से भी मौका नहीं मिलना चाहिए? महिलाओं के सन्दर्भ में भी लगभग ऐसी ही सोच है। कुल मिलाकर इन उदाहरणों से ही साफ़ हो जाता है कि मीडिया का क्या चरित्र है और वह ख़बरों को किस तरह देखता और पेश करता है इसलिए आज के दौर में हर दर्शक या पाठक को ख़बरों से ख़बरदार रहने और उसे अपने तौर पर जांचने-परखने की ज़रूरत है।

हमारे शब्द हमारा आईना हैं। बहुत छुपाने के बाद भी हमारे शब्द हमारी पोल खोल देते हैं। शब्दों का चयन हमारी सोच, हमारी मानसिकता को सामने रख देता है। इस बात को मीडिया के सन्दर्भ में हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि हमारा तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया किस कदर ब्राह्मणवादी, जातिवादी और साथ ही मर्दवादी भी है। दलित, मुसलमान और महिलाओं के सन्दर्भ में हमारे मीडिया का रवैया बेहद संकीर्ण और आपत्तिजनक है। इस पर अगर विस्तार से बात की जाए तो एक किताब भी कम होगी।

 

 

 

 

 

  मुकुल सरल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)