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बहस: रामनाथ कोविंद के साथ जगन्नाथ पुरी में हुई धक्का-मुक्की जातिवाद का खात्मा है!

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जितेन्द्र कुमार 

आज के सभी अखबारों ने उस खबर को किसी न किसी रूप में छापा है कि जब दलित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अपनी पत्नी के साथ 18 मार्च को जगन्नाथपुरी मंदिर में पूजा-अर्चना करने गए तो ‘गैर-जातिवादी’ पंडों ने ‘बड़े प्यार से’ कोविंद दंपत्ति से बदतमीजी की और उनकी पत्नी को धक्का भी दिया! 

निजी तौर पर मेरा मानना है कि कोविंद जी को मंदिर जाना ही नहीं चाहिए था क्योंकि वह जगह दलितों, पिछड़ों और बहुसंख्य मजलूमों के लिए नहीं है। मेरा यह भी मानना है कि जो लोग मेहनतकश हैं, उन्हें ‘ईश्वरीय शक्ति और चमत्कार’ पर विश्वास करने की जरूरत नहीं है। ईश्वर पर तो विश्वास वो करे जो कामचोर है। लेकिन कोविंद जी को मैं कामचोर नहीं कह सकता हूं (आरएसएस में बने रहने के लिए उन्होंने इतनी मेहनत की है)! हां, उनके मंदिर जाने पर मेरा सवाल जस का तस बना हुआ है।

लेकिन कोविंद जी भी क्या करें, इतने वर्षों से संघ की ट्रेनिंग रही है, गलत-सही का भेद उनके दिमाग से पूरी तरह मिट गया है। इसलिए सिर्फ मंदिरों पर ही उनका विश्वास रह गया है! वही मंदिर और उसी मंदिर के पुजारी जो उनके समाज का हजारों वर्षों से शोषण करते आ रहा है। दूसरी बात, कोविंद जी कोई स्कॉलर आदमी भी नहीं हैं कि उनसे समाज को किसी तरह की कोई अपेक्षा है। फिर भी, क्या पुरी के उन पंडों को ‘राष्ट्र के पति- राष्ट्रपति’ के साथ धक्का-मुक्की करनी चाहिए थी? आखिर उन पंडों में इतना (कॉंफिडेंस) विश्वास कैसे आया कि देश के सबसे शीर्ष व संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से धक्का-मुक्की करें? यह कॉंफिडेंस पंडों में इसलिए आया क्योंकि वे पंडे जानते थे और जानते हैं कि श्रेष्ठ वे हैं और जो राष्ट्रपति हैं, वह दलित हैं इसलिए देश के सबसे दीन-हीन व्यक्ति हैं, जिनके साथ बदतमीजी करने पर भी वे पूरी तरह महफूज रह सकते हैं!

और हद देखिएः श्री जगन्नाथ टेंपल एडमिनिस्ट्रेशन (एसजेटीए) के मुख्य प्रशासक, आईएएस अधिकारी प्रदीप्तो कुमार महापात्रा (जो खुद ब्राह्मण हैं) का कहना है कि मामले को तूल मत दीजिए, यह घटना हमारे संज्ञान में लाई गई है- यह छोटी-मोटी बात है (मतलब यह सब तो होता ही रहता है)! 

इसका एक अलग सिरा आज दिल्ली के सभी अखबारों में उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा दिए गए छपे विज्ञापन में भी पकड़ा जा सकता है।

कल (28 जून को प्रातः 9.30 बजे) संत कबीर नगर में 24 करोड़ की लागत से बने संत कबीर अकादमी का प्रधानसेवक जी शिलान्यास करने वाले हैं जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी होंगे। वहां डॉक्टर महेश शर्मा (ब्राह्मण), शिव प्रताप शुक्ला (ब्राह्मण), महेन्द्र नाथ पांडे (ब्राह्मण), रीता बहुगुणा जोशी (ब्राह्णण) और शरद त्रिपाठी (ब्राह्णण) भी होंगे और एक लक्ष्मी नारायण चौधरी (जाट) भी होंगे। यह शिलान्यास का कार्यक्रम ‘पूरी तरह गैरजातिवादी’ होगा क्योंकि वह बीजेपी की सरकार द्वारा किया जा रहा है!

वैसे देश के सारे ‘बड़े लोग’ मानते हैं कि जाति ख़तम हो गयी है (क्योंकि सारे बड़े लोग सवर्ण हैं)। हां, अगर थोड़ा-बहुत बची हुई है तो उसे लालू, मुलायम और मायावती ने ही अपने लाभ के लिए बचा कर रख छोड़ा है। अर्थात वही लोग (दलित-पिछड़े) जातिवाद को पकड़ कर बैठे रहते हैं और उसे अपने लाभ के लिए फैलाते रहते हैं!

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