Home पड़ताल चुनाव चर्चा:भाजपा के चुनावी ‘तारणहार’ मोदी जी ही हैं, विपक्ष अवाम भरोसे!

चुनाव चर्चा:भाजपा के चुनावी ‘तारणहार’ मोदी जी ही हैं, विपक्ष अवाम भरोसे!

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चंद्र प्रकाश झा 

17 वीं लोक सभा के  चुनाव में, केंद्र में सत्तारूढ़ नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस ( एनडीए ) का नेतृत्व कर रही भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा ) के चुनावी ‘तारणहार’   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही बने हुए हैं। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तथा अन्य नेताओं ने कह दिया है कि 2019 के आम चुनाव के बाद भी केंद्र में फिर एनडीए की सरकार बनेगी और मोदी जी ही प्रधानमन्त्री बनेंगे। भाजपा के प्रकाश जावड़ेकर जैसे कुछ नेताओं ने यहां तक कह दिया है कि मोदी जी का कोई विकल्प नहीं है और उनके प्रधानमंत्री नहीं रहने से देश में अराजकता की स्थिति आ जाएगी। विपक्षी दलों में से कांग्रेस समेत अधिकतर दलों ने कहा है कि उनकी जीत की स्थिति में प्रधानमत्री का चयन, चुनाव के बाद ही किया जाएगा। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ( माकपा ) के महासचिव सीताराम येचुरी के अनुसार मोदी जी जो कुछ भी कहते है मीडिया उसका ‘ नैरेटिव ‘ बना देती है , इसलिए यह गैर मुनासिब सवाल है कि विपक्ष मोदी जी के विकल्प के तौर पर किसे पेश कर रहा है।  उन्होंने जोर देकर कहा कि विपक्षी दलों  ने 1977 से हर बार प्रधानमन्त्री का चयन , चुनाव के बाद ही किया है और इस बार भी वही करेगी। माकपा कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन  यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस ( यूपीए ) का अभी हिस्सा नहीं है, लेकिन पश्चिम बंगाल समेत कुछेक राज्यों में उसके  यूपीए के घटक दलों से तालमेल करने की संभावना है।

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का 17 वीं लोक सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट से भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी होने की औपचारिक घोषणा ही बाकी रह गई है। केंद्रीय गृह मंत्री एवं प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने खुद लखनऊ से और मोदी जी के वाराणसी से ही चुनाव लड़ने की पुष्टि कर दी है। वाराणसी में मतदान सातवें एवं अंतिम चरण में 19 मई को होगा। कयास लगाए जा रहे थे कि मोदी जी इस बार ओडिसा की पुरी लोक सभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। मोदी जी अभी वाराणसी से ही लोकसभा सदस्य हैं, जहाँ वह 2014 के पिछले चुनाव में करीब 4 लाख मतों के अंतर से जीते थे। वह पिछली बार अपने गृह राज्य गुजरात की वड़ोदरा सीट से भी लड़े और जीते थे , जहां से उन्होंने इस्तीफा दे दिया। भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने  वाराणसी में मोदी जी का मुकाबला करने की घोषणा कर दी है। उन्होंने यह घोषणा बसपा के संस्थापक दिवंगत कांशीराम की जयन्ती के अवसर पर नई दिल्ली  के संसद मार्ग पर 15 मार्च को हुई हुंकार रैली में की। अगर आज़ाद , सभी दलों के सांझा  प्रत्याशी हो जाते हैं तो उन्हें क्षेत्र के मुस्लिम, दलित और अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों का समर्थन मिल सकता है.

प्रथम चरण का मतदान 11 अप्रैल को 20 राज्यों की 91 सीट, 18 अप्रैल को 13 राज्यों की 97 सीट , 23 अप्रैल को 14 राज्यों की 115 सीट , 29 अप्रैल को 9 राज्यों की 71 सीट , 6 मई को सात राज्यों की 51 सीट, 12 मई को सात राज्यों की 59 सीट और सातवें एवं अंतिम चरण का मतदान 19 मई को आठ राज्यों की 59 सीट पर  कराये जाएंगे। सभी सीटों पर मतगणना  23 मई को होगी. उसी दिन सबके परिणाम निकल जाने की आशा है. 2014 में पिछली 16वीं लोकसभा का चुनाव नौ चरण में कराया गया था.

निर्वाचन आयोग ने 9 मार्च की शाम नई दिल्ली के विज्ञान भवन में बुलाई  प्रेस कॉन्फ्रेंस में आम चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा कर दी जिसके तहत सभी सीटों के चुनावी  परिणाम 23 मई को सामने आ जायेंगे। लेकिन इस चुनाव के लिए विभिन्न दलों के बीच गठबंधन और तालमेल ही नहीं उन सबके प्रत्याशियों की तस्वीर भी साफ होने में समय लगना स्वाभाविक है। ऐसा होने का एक बड़ा कारण देश के 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों की कुल मिलाकर 543 सीटों पर सात चरणों में 11 अप्रैल से 19 मई तक कराये जाने वाले मतदान की दीर्घ अवधि तो है ही। दूसरा बड़ा कारण उन चरणों की सम्बद्ध सीटों के लिए जारी की जाने वाली पृथक औपचारिक  चुनाव अधिसूचना के दिन से नामांकन दाखिल करने, उनकी जांच और नामांकन पत्र  वापस लेने  की  लम्बी प्रक्रिया भी है।

लोक सभा के साथ ही चार राज्यों – आंध्र प्रदेश , ओड़ीसा , सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की विधान सभा के भी नए चुनाव कराये जाएंगे। निर्वाचन आयोग ने सुरक्षा कारणों से जम्मू -कश्मीर विधान सभा के नए चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा नहीं की है,  जो अभी भंग है। वहाँ  की सभी 6 लोकसभा सीटों के लिए मतदान  पांच चरणों में 11 अप्रैल, 18 अप्रैल, 23, अप्रैल,  29 अप्रैल और 6 मई को वोटिंग होगी। उन सबके नतीजे भी 23 मई को ही आएंगे।

नए वोटर

इंडियन एक्सप्रेस ने निर्वाचन आयोग से उपलब्ध डेटा का विश्लेषण कर कहा है कि लोक सभा की 543 में से उन 282 सीटों पर नए मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं जहां उनकी संख्या पिछली बार की जीत -हार के अंतर से ज्यादा है। ये नए वोटर 1997 और 2001 के बीच पैदा हुए थे। वे पिछली बार वोट देने के पात्र नहीं थे। इस विश्लेषण के अनुसार हर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र में औसतन 1.49 लाख नए मतदाता हैं. एक अन्य अध्ययन के अनुसार नए वोटरों में  पश्चिम बंगाल सबसे आगे है जहां उनकी संख्या 20, 01898 है।  नए वोटर वाले शीर्ष राज्यों में पश्चिम बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश ( 1675567 ) , मध्य प्रदेश ( 1360554 ) , राजस्थान ( 1282118 ) और तमिलनाडू ( 898759 ) है।  ऐसे में स्वाभाविक है कि ये नए वोटर चुनाव परिणाम में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

महिला आरक्षण

लोक सभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीट आरक्षित करने की व्यवस्था के लिए एक विधेयक 2010 में ही राज्य सभा ने पारित कर दिया था।  लेकिन इस विधेयक पर लोक सभा में कभी मतदान ही नहीं हो सका। परिणामस्वरूप वह विधेयक 15 वीं लोकसभा के 2014 में भंग होने के उपरान्त स्वतः निरस्त हो गया। हाल में बीजू जनता दल के अध्यक्ष एवं ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने मौजूदा लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के टिकट वितरण में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की है। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने  इस चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों के चयन में महिलाओं को 40 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कुछ कदम आगे बढ़ कर लोक सभा और विधान सभाओं समेत सभी विधायिका और सरकारी रोजगार में भी महिलाओं  को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की है.

चुनाव में महिला के सन्दर्भ में एक रोचक जानकारी यह है कि मतदान में महिलाएं पुरुषों की तुलना में अब 1.5 प्रतिशत ही पीछे रह गयी हैं।  प्राथम दो आम चुनाव के आंकड़े तत्काल उपलब्ध नहीं है। लेकिन 1962 में तीसरे आम चुनाव में कुल मतदाताओं में से 63 प्रतिशत पुरुषों और 46 प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाले थे। 2014 के चुनाव में कुल मतदाताओं में से 67. 09 प्रतिशत पुरुषों और 65. 63 प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाले थे। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की अध्यक्ष यामिनी ऐय्यर ने डॉ प्रणय रॉय और दोराब सोपारीवाला की हाल में प्रकाशित पुस्तक ‘ द वर्डिक्ट ‘ और निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के हवाले से एक अध्ययन में बताया कि वोटर लिस्ट में महिला मतदाताओं के नाम दर्ज करने में काफी वृद्धि हुई है।  भारत में महिला मतदाताओं की संख्या 2014 के 47 प्रतिशत से बढ़कर 48.13 प्रतिशत हो गई है। इसलिए 2019 के आम चुनाव में महिलाओं के मतदान का हिस्सा और भी बढ़ने की संभावना है। लेकिन महिला प्रत्याशियों की संख्या 1962 से लेकर 1996 के बीच कुल उम्मीदवारों का 5 प्रतिशत से अधिक नहीं थी।

लोक सभा के 2014 में हुए पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस ( एनडीए ) में शामिल  18 दलों ने 525 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किये थे। वह  इनमें से 336 पर जीतने में सफल रही।  भाजपा के 428 प्रत्याशियों में से 282 , शिव सेना के 20 में से 18 , तेलुगु देशम पार्टी ( टीडीपी ) के 30 में से 16 , अकाली दल के 10 में से चार , लोकजनशक्ति पार्टी के सात में से छह आरएलएसपी के 4 में से 3 , अपना दल के 2 में से 2 , पीएमके के 9 में से 1 , एआईएनआरसी के 1 में से 1 , नगा पीपुल्स फ्रंट के 2 में से 1 , एनपीपी के 7 में से 1 और स्वाभिमानी पक्ष के 2 उम्मीदवारों में से एक जीते।  लेकिन इस गठबंधन में शामिल 6 पार्टियां , हरियाणा जनहित कांग्रेस , राष्ट्रीय समाज पक्ष , केरला कांग्रेस नेशनलिस्ट , आरपीआई आठवले , डीएमडीके और एमडीएमके के कुल 27 प्रत्याशियों में से कोई नहीं जीत सका  . 11 दल –   मिज़ो नेशनल फ्रंट , नार्थ ईस्ट रीजनल फ्रंट , रिवोल्यूशनेरी सोशलिस्ट पार्टी ( बोल्शेविक ) ,  गोमांतक पार्टी , आई जे के ,  गोरखा जनमुक्ति मोर्चा , जन सेना , न्यू जस्टिस पार्टी , केडीएमके , झोराम नेशनलिस्ट पार्टी और मिज़ो पीपुल्स कॉन्फ्रेंस 2014 में चुनाव नहीं लड़े थे पर एनडीए के साथ थे। चुनाव के बाद कई और दल  एनडीए में शामिल हो गए। बाद में  उपरोक्त कुल 29 दलों में से 16 – हरियाणा जनहित कांग्रेस , तमिलनाडु की एमडीएमके , डीएमडीके और पीएमके , आंध्र प्रदेश की जन सेना , केरल की रिवोल्यूशनेरी सोशलिस्ट पार्टी ( बोल्शेविक ) , जनाधिपत्या राष्ट्रीय सभा , महाराष्ट्र के स्वाभिमानी पक्ष , बिहार के हिन्दुस्तानी अवामी मोर्चा , नागालैंड पीपुल्स फ्रंट  , कर्नाटक की केपीजेपी , आरएलएसपी ,  गोरखा जनमुक्ति मोर्चा , टीडीपी , जम्मू -कश्मीर की पीडीपी , असम गण परिषद् एनडीए से अलग हो गए. 2019 के लोक सभा चुनाव के ऐन पहले कुछ दल फिर एनडीए में लौट आये है जिनमें असम गण परिषद् प्रमुख है।  तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्ना द्रमुक भी औपचारिक रूप से एनडीए में शामिल हो चुकी है।  भाजपा का दावा है कि अभी एनडीए में 42 दल शामिल हैं जिनमें बिहार की जेडी  ( यू ) ,  पीएमके , एआईएनआर  कांग्रेस  , बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट , नागालैंड पीपुल्स फ्रंट ,  नेशनल पीपुल्स पार्टी , मिज़ो नेशनल फ्रंट , केएमडीके , सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट , गोवा फॉरवार्ड पार्टी , सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी आदि भी हैं। कांग्रेस का गठबंधन अधिकतर राज्यों में अभी पूरा नहीं हुआ है।  बहरहाल , विभिन्न दलों ने अपने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा शुरू कर दी है जो होली के बाद तेज होने की संभावना है।

(मीडिया विजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है।)

2 COMMENTS

  1. जब से मानव समाज वर्गों में बँटा अति अल्प संख्यक संपन्न ,ताकत वाले लोगों ने करोड़ों लोगों के ऊपर शासन किया। हर देश काल मे। गुलाम व्यवस्था हो चाहे उसके बाद की राजाओं सामन्त लोगों की व्यवस्था जिसमें किसानों, कारीगरों की मेहनत की लूट का सहारा ले समाज चला । इसके बाद आप बेहद सयाने ,शातिर लाला या पूंजीपति वर्ग को पाते है जिसने समानता, भाई चारे का नारा दिया और किसानो ,कारीगरो को इसके बाद अपने साथ में ले कर सामंती शासन के तख्ते को पलटने के बाद तीन अंगों— कार्य पालिका , न्याय पालिका , विधायिका वाली पूंजीवादी व्यवस्था बनाई।
    इसम भी करीब सौ साल तक मात्र 10% संपत्ति वाले लोगों को ही वोट का अधिकार था। किसानो, औरतो , गुलाम वैसे ही रहे।
    भारत में भी 13% के ही वोटों से 400 लोगों की संविधान सभा बनाने का तीर मारा जाता है।
    भगत सिंह के गुरु लेनिन के नेतृत्व मे 1917 मे रुस मे बोल्शेविकों ने 99% सर्वहारा की तानाशाही स्थापित की।। पूजीवादी लोकतंत्र या 1 % की यानि पूजीपतियों की तानाशाही के बरक्स अधिकतम सम्भव जनवाद ।
    रूस ने निजी संपत्ति को खत्म किया। न्यायपालिका , कार्य पालिका , विधायिका तीनों का चुनाव और वापसी की व्यवस्था।
    भारत के साथ पूरी दुनिया में 1/6 लोकतंत्र । मतलब केवल चुनाव ,वो भी केवल 1 अंग का । वो भी असली सरकार यानि थानेदार , एस . पी.,डी आई जी , तहसीलदार , डी एम , सचिव, मुख्य सचिव , डाक्टर , टीचर, लेबर कमिश्नर बिना चुने।
    अब समझे । क्यों कारपोरेट मीडिया दिन रात इस 1/6 लोकतंत्र के गुण गा रहा है।

  2. आपकी बात ग़लत नहीं है .चुनाव का ढकोसला ही सही .और कुछ नहीं जबतक चुनाव से भागना मुश्किल है

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