Home काॅलम चुनाव चर्चा: कितना कारगर है ‘वाम-रहित’ विपक्षी एकता का ममता मंत्र?

चुनाव चर्चा: कितना कारगर है ‘वाम-रहित’ विपक्षी एकता का ममता मंत्र?

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चंद्र प्रकाश झा 

भारत  के अन्य राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी आगामी 17 वीं लोक सभा चुनाव के लिए विभिन्न दलों की तैयारियां  तेज हो गई हैं,  जहां आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सरकार है और उसकी अध्यक्ष ममता बनर्जी मुख्यमंत्री हैं। उनसे पहले वहाँ 1977 से 34 वर्षों तक लगातार वाम मोर्चे की सरकार रही थी। राज्य में सत्ता से हटने के बाद वामपंथी दलों की ताकत लगातार कम होती गई है। वाम दलों का नेतृत्व कर रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी मौजूदा विधान सभा में टीएमसी ही नहीं, कांग्रेस से भी पीछे है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने टीएमसी की तरफ से मई 2019 तक संभावित नए लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों की एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए 19 जनवरी को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में विशाल रैली आयोजित की । उन्होंने इसके जरिये स्पष्ट सन्देश दे दिया कि भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता से हटाने की किसी भी मुहिम में उनको कमतर नहीं आंका जाना चाहिए।  उनके साथ इस रैली के मंच पर जुटे बीसेक दलों के नेताओं ने  मोदी सरकार को हटाने की हुंकार भरी।

ममता बनर्जी ने रैली में ‘बदल दो, बदल दो, दिल्ली की सरकार बदल दो’ का नारा देकर विश्वास व्यक्त किया कि ‘एकजुट विपक्ष’ लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करेगा। उन्होंने साफ कहा कि भाजपा की हार की स्थिति में प्रधानमंत्री कौन होगा, इस पर फैसला चुनाव के बाद होगा। हालांकि ‘एकजुट विपक्ष’ की चुनावी शक्ल अभी भी स्पष्ट नहीं है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस को उसकी पूरी कमान संभालने देने में अड़चन उत्तर प्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य में भी पसर सकती है जहां लोक सभा की 42 सीटें हैं। मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक़ ममता बनर्जी पहले ही  घोषणा कर चुकी हैं कि उनकी पार्टी इन सभी 42 सीटों पर अपने बूते चुनाव लड़ेंगी। अगर ऐसा ही होना है तो सवाल स्वाभाविक है कि उन्हें विपक्षी दलों की एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए यह रैली आयोजित करने की जरुरत क्यों पड़ी। स्पष्ट है कि यह रैली मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल की नहीं केंद्र की सत्ता में टीएमसी की हिस्सेदारी की दावेदारी प्रदर्शित करने के लिए आयोजित की गई थी। इसका यह सन्देश भी देना था कि भाजपा की आक्रामकता के सामने टीएमसी अलग-थलग नहीं है।

रैली में  कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और बसपा प्रमुख मायावती स्वयं नहीं थे लेकिन उनकी पार्टियों का उच्च स्तरीय प्रतिनिधित्व था। भाजपा और कांग्रेस , दोनों के खिलाफ क्षेत्रीय दलों का फ़ेडरल फ्रंट कायम करने में जुटे तेलंगाना के मुख्यमंत्री एवं तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के.सी.आर भी रैली में अनुपस्थित थे। केसीआर ने तेलंगाना विधान सभा के हालिया चुनाव में अपनी पार्टी की जीत के बाद फ़ेडरल फ्रंट के लिए उत्साहित होकर ओडिसा के मुख्यमंत्री एवं बीजू जनता दल अध्यक्ष नवीन पटनायक और ममता बनर्जी से भी भेंट की थी। लगता है वह भेंट औपचारिकता बनकर रह गई है। नवीन पटनायक भी टीएमसी की रैली में नहीं थे। टीएमसी की रैली में वामपंथी दलों की भी भागीदारी नहीं थी, जो बहुत अस्वाभाविक नहीं है। क्योंकि इन दलों का टीएमसी से लम्बे अर्से से जबरदस्त राजनीतिक टकराव रहा है। वामपंथी दलों का कहना है कि राज्य में साम्प्रदायिक सौहार्द में बिगाड़ और भाजपा के उभार के लिए टीएमसी जिम्मेवार है।

रैली में पूर्व प्रधानमंत्री एवं जनता दल सेकुलर के नेता एच.डी.देवेगौड़ा, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं तेलुगु देशम पार्टी के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू, लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व रक्षामंत्री एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच.डी.कुमारस्वामी, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश सिंह यादव, जम्मू -कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला, भाजपा से अलग हो चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी, बिहार विधान सभा में विपक्ष एवं राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव, गुजरात के युवा नेता हार्दिक पटेल एवं दलित नेता जिग्नेश मेवानी, द्रविड़ मुनेत्र कषगम के नेता एम.के.स्टालिन, लोकतांत्रिक जनता दल के नेता शरद यादव, राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष अजित सिंह और उनके पुत्र एवं पूर्व सांसद जयंत चौधरी समेत कई नेता उपस्थित  हुए। कांग्रेस की तरफ से उसके सांसद अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा रैली में कहा गया कि विपक्षी गठबंधन का मकसद भाजपा को हरा कर केंद्र में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाना है।

भारतीय जनता पार्टी ने इस रैली के जवाब में पश्चिम बंगाल की सभी 42 लोक सभा निर्वाचन क्षेत्रों में रैलियां करने की घोषणा की है जिसकी शुरुआत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 22 जनवरी को करेंगे।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 और 31 जनवरी के अलावा आठ फरवरी को भी रैली करेंगे। भाजपा की तरफ से केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सभाओं का कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा। इनका सिलसिला 8 फरवरी को थम जाएगा क्योंकि राज्य में नौ फरवरी से 13 मार्च तक बोर्ड परीक्षाओं की वजह से लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक रहेगी। भाजपा प्रदेश प्रमुख दिलीप घोष ने कोलकाता की विपक्षी रैली में उठे हर आरोप का जवाब देने के लिए प्रचार अभियान छेड़ने की घोषणा की है जिसके तहत सभी लोकसभा क्षेत्रों में बाइक और साइकिल रैली होगी।  उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष की नींद उड़ा दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सभी भ्रष्ट और नकार दिए गए नेता प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एकजुट हो रहे है।

गौरतलब है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की 42 में से 22 लोक सभा सीटों पर पार्टी की जीत का लक्ष्य निर्धारित किया है। अभी राज्य से भाजपा के दो लोक सभा सदस्य हैं। राज्य में भाजपा का सबसे अच्छा प्रदर्श  2014 के पिछले लोक सभा चुनाव में हुआ था जिसमें उसका वोट शेयर 4 सीट जीतने वाली कांग्रेस के करीब 10 प्रतिशत से ज्यादा करीब 16   प्रतिशत था। 34 सीटें जीतने वाली टीएमसी का वोट शेयर करीब 39 प्रतिशत था। वामपंथी दलों ने दो ही सीट जीती थी पर उनका वोट शेयर करीब 29 प्रतिशत था। राज्य की 295 सीटों वाली विधान सभा के 2016 में हुए पिछले चुनाव में टीएमसी ने 211 सीटें जीती थी। उसके पहले 2011 के विधान सभा चुनाव में टीएमसी ने कांग्रेस से गठबंधन कर बहुमत हासिल कर राज्य की सत्ता से वाम मोर्चा को बेदखल किया था। पश्चिम बंगाल में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा  ने 2009 और 2014 के लोक सभा चुनाव और फिर विधान सभा चुनाव में भी भाजपा का साथ दिया था। उसका  बिनय तमांग गुट मार्च 2018 में एनडीए से अलग हो गया। लेकिन गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का बिमल गुरुंग गुट , भाजपा  के साथ है।

माना जाता है कि भाजपा को अपने चुनावी लक्ष्य की पूर्ति के लिए टीएमसी से टक्कर लेनी होगी क्योंकि राज्य के मतदाताओं के बीच हाल में साम्प्रदायिक  ध्रुवीकरण होता नज़र आ रहा है। भाजपा आगामी लोक सभा चुनाव को राज्य  में ममता राज के अंत की शुरुआत कह रही है। भाजपा की चुनावी तैयारियों में जोर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और बढ़ाने पर लगता है। इसके तहत भाजपा ने राज्य के सभी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में  दिसंबर 2018 में ‘गणतंत्र बचाओ यात्रा’ निकालने की योजना बनायी थी। पहले कलकत्ता हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से यह योजना खटाई में पड़ गई। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का निर्णय पलटने से इंकार कर कहा कि भाजपा को तब तक इन रैलियों के आयोजन की अनुमति नहीं दी जा सकती है जब तक वह इनसे क़ानून एवं व्यवस्था के प्रति उत्पन्न होने वाले खतरों के बारे में राज्य सरकार की चिंताएं दूर नहीं कर देती है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा की  रथ यात्राओं को अमित शाह हरी झंडी दिखाने वाले थे। भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय के एक  ट्वीट में दावा किया गया था कि इन प्रस्तावित रथ यात्राओं को व्यापक समर्थन मिल रहा है और अब पश्चिम बंगाल को बचाने का समय आ गया है। भाजपा के प्रस्तावित कार्यक्रम को मंजूरी न मिलने से उसे झटका लगा है। लेकिन राजनीतिक बदलाव के लिए भाजपा और उसके समर्थक संगठनों द्वारा जी तोड़ कोशिश जारी है। वे हिंदुत्व के वर्चस्व का आह्वान कर ‘ मुल्‍लों और काजी’ को बाहर करने के लिए तत्पर  सरकार बनाने पर भी जोर दे रहे हैं। मीडिया की खबरों के मुताबिक़ बजरंग दल के एक शिविर में नारा लगाया गया, ‘ जागोतो इक बार हिंदू जागोतो…मार भगाएं सब मुल्‍ला काजी….पलट गए सरकार / जागोतो इक बार हिंदू जागोतो।‘ भाजपा ने आरोप लगाया है कि राज्‍य की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी घुसपैठियों को साथ लेकर राज्‍य में ‘भाषा के आधार पर ध्रुवीकरण ‘ करना चाहती हैं। भाजपा की नजर वर्ष 1971 के कट ऑफ डेट के बाद बिना कागज के बांग्‍लादेश से भारत आने वाले हिंदू प्रवासियों पर है। ‘हिंदू  जागरण अभियान’ के तहत विश्‍व हिंदू परिषद ने राज्‍य की सभी 42 लोकसभा सीटों पर धर्म सम्‍मेलन आयोजित करने की योजना बनाई है। 

बंगाल पर इस्लामी शासन 13 वीं सदी से प्रारंभ हुआ। 16 वीं सदी शताब्दी में मुग़ल शासन में बंगाल व्यापार एवं उद्योग का  केन्द्र बन चुका था। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का प्रादुर्भाव बंगाल से ही  हुआ था। 15 वीं  सदी के अंत तक यहाँ यूरोपीय व्यापारियों का आगमन हो चुका था। 18 सदी के अंत तक यह क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आ गया था। 1947 में भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही बंगाल के मुस्लिम बहुल  पूर्व बंगाल ( अभी बांग्लादेश ) तथा हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल में विभाजन  हुआ। बहरहाल , देखना यह है कि भाजपा की आक्रामकता को रोकने में ममता बनर्जी का सियासी करिश्मा और उनके प्रति ‘वाम-रहित’ विपक्षी एकजुटता कितना चुनावी रंग लाती है। 

(मीडिया विजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है।)

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