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बुलेट ट्रेन यानी बेवजह क़र्ज़ का दुष्चक्र ! मनमोहन ने रोका था, लेकिन मोदी को चइये ही चइये !

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गिरीश मालवीय

अपने राजनीतिक फायदे के लिए मोदी जी बुलेट ट्रेन की योजना को अपने तय समय से पहले ही शुरू करवाने की जुगत में लग गए है इस रेल लाइन का शिलान्यास अगले साल के शुरुआत में करने की योजना थी, लेकिन इसे तय समय से करीब तीन महीने पहले किया जा रहा है।

जब 2015 में यह योजना आयी थी तो इसमें लगभग 6 वर्ष का समय लगेगा, ये बिल्कुल स्पष्ट रूप से कह दिया गया था लेकिन अब कहा जा रहा है कि इसे 2022 में ही पूर्ण कर लिया जायेगा। वैसे भी अब लग रहा है कि 2022 जादुई वर्ष है भारत 2022 में स्वर्णयुग में प्रवेश करने जा रहा है लेकिन भारत का आम आदमी को क्या वाकई उस रुट पर बुलेट ट्रेन की जरूरत है जिस पर इसे चलाने की बात की जा रही है ?

अहमदाबाद से मुंबई की दूरी 524 किलोमीटर है और इसे पूरी करने के लिए दिन भर दर्जनों ट्रेनें जाती हैं। अहमदाबाद में एक एयरपोर्ट हैं और यहां से हर दिन 10 उड़ानें हैं। 6 लेन की एक्सप्रेसवे के साथ अहमदाबाद और मुंबई स्वर्णिम चुतर्भुज राजमार्ग नेटवर्क का हिस्सा है। ट्रेन के मुक़ाबले रोड के जरिए अहमदाबाद से मुंबई कम समय में पहुंचा जा सकता है। शायद भारत का यह सबसे बेहतर रूट है। कहाँ तो एक आम नागरिक रेलवे की बुनियादी सुविधाओं को तरस रहा है, सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल है,  लेकिन मोदीजी को इनसे मतलब नही है।  उन्हें अपने गृहनगर से मुंबई के बीच बुलेट ट्रेन चलानी है।

चीन, जहाँ  बुलेट ट्रेन चलाई जा रही हैं वहाँ के अर्थशास्त्री के टीवी इंटरव्यू मे ये बात सामने आई कि वहां की ज्यादातर मध्यमवर्गीय जनता बुलेट ट्रेन में यात्रा करने से परहेज करती है, कारण है ट्रेन का महंगा किराया।  बड़े बड़े अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ इस बात से हैरान हैं की भारत में बुलेट ट्रेन को क्यों विकास के पैमाने के तौर पर लोगों के सामने परोसा जा रहा है ? इस बुलेट ट्रेन परियोजना की अनुमानित लागत 98,805 करोड़ रुपए है, जिसमें 2017 से 2023 के बीच सात साल के निर्माण काल के दौरान मूल्य और ब्याज वृद्धि भी शामिल है।

इस कर्ज का अधिकांश हिस्सा जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीए) के जरिए कम ब्याज वाले लोन से आएगा । यानी कि मोटा मोटा 1 लाख करोड़ रुपये। 10000 करोड़ अतिरिक्त लागत का भी अनुमान है। 10 हजार करोड़ की अतिरिक्त रकम एलवेटिड कॉरिडोर के लिए है। यह रेलवे क़र्ज़ समझौता भारत को इंडोनेशिया से भी बड़ा क़र्ज़दार बना सकता है। लागत की जो रकम है वह भारत के स्वास्थ्य बज़ट की तीन गुनी है और भारत में हर साल शिक्षा पर खर्च होने वाले बजट की रकम से भी ज़्यादा है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने  2015 में अपने फेसबुक पर इस सिलसिले में कुछ गंभीर जानकारियाँ दी थीं। उन्होंने लिखा था कि- ‘जापानियों ने अप्रैल 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जुनिशीरो कोइजुमी की भारत यात्रा से पहले भी बुलेट ट्रेन तकनीक हमें बेचने की जबर्दस्त बेताबी दिखाई थी। उनके इस प्रस्तावपर रेलवे बोर्ड और विदेश मंत्रालय के भीतर आश्चर्यजनक रूप से बड़ा समर्थन भी मिला था। तत्कालीन रेलवे बोर्ड के चेयरमैन आरके सिंह और विदेश मंत्रालय के सचिव राजीव सीकरी इस योजना के प्रबल समर्थकों में शामिल थे।  इस मसले को प्रधानमंत्रियों के बीच होने वाल बातचीत के एजेंडे में शामिल करने से पहले पीएमओ की मंजूरी लेना आवश्यक था।  उस वक्त मैं पीएमओ में ज्वाइंट सेक्रेटरी के पद पर तैनात था और आर्थिक मामलों को देखा करता था। दोनों देशों के बीच प्रस्तावित मुद्‌दों को तय करने के लिए पीएमओ में हुई बैठकों का भी मैं हिस्सा था । आरके सिंह और सिकरी ने पुरजोर शब्दों में बुलेट ट्रेन की पैरवी की। उनका तर्क था कि बुलेट ट्रेन तकनीक के ट्रांसफर से भारत को बहुत फायदा होगा। मैंने यह कह कर इसका विरोध किया कि देश में और भी तमाम महत्वपूर्ण रेलवे परियोजनाएं लटकी हुई हैं, ऐसे में 50,000 करोड़ (उस समय अनुमानित लागत) की बुलेट ट्रेन परियोजना की शुरुआत अपने सीमित संसाधनों को गलत दिशा में लगाने जैसा होगा। भारत बुलेट ट्रेन के लिए बड़े कर्ज पर बेहद महंगी टेक्नोलॉजी खरीद रहा है। पहले रेल लाइनों के विस्तार की जरूरत है। उस वक्त स्थिति तनावपूर्ण हो गई जब मैंने आरके सिंह से पूछा कि अगर इस योजना का पैसा जेआईसीए से लोन के रूप में मिलने की बजाय, रेल बजट से मुहैया कराना होता तब भी वे इसकी पैरवी करते ?  उनका जवाब चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में वह इस प्रोजेक्ट पर आगे नहीं बढ़ते। यह बात उसी समय साबित हो गई कि बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की पैरवी रेलवे के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने के लिए नहीं की जा रही थी। बल्कि इसके पीछे जापान द्वारा आसानी से उपलब्ध करवाया जा रहा लोन था। उस समय तत्कालीन विदेश सचिव राकेश मोहन ने मेरा साथ देते हुए कहा कि अगर जापान कर्ज की बजाय अनुदान के रूप में यह पैसा देता तब भी वे इस प्रोजेक्ट को आगे नहीं बढ़ाते। अंतरराष्ट्रीय अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन अपनी परिचालन लागत निकाल पाने की हालत में भी नहीं होगा, और फिर हमेशा के लिए इसे सब्सिडी देकर चलाना होगा।  जापान की तरफ से बुलेट ट्रेन को आगे बढ़ाने की कोशिश 2005 में कामयाब नहीं हो पाई। पीएमओ ने इस पर अपनी सहमति नहीं दी थी ।मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन अपनी परिचालन लागत निकाल पाने की हालत में भी नहीं होगा।’

आगे जावेद उस्मानी साहब लिखते हैं – ‘जेआईसीए का कर्ज चाहे जितनी आसान शर्त पर दी जाय, अंत में इसे लौटाना ही होगा. हम एक बड़े कर्ज पर बेहद महंगी टेक्नोलॉजी खरीद रहे हैं. एक ऐसे प्रोजेक्ट के लिए जो सिर्फ दो शहरों के बीच महज 500 किलोमीटर की दूरी तय करेगी जबकि भारत में रेलवे का कुल नेटवर्क 63000 किलोमीटर से अधिक है।’

अब एक बात पर और गौर करिये की इस ट्रेन का किराया कितना होगा ?  गिरी से गिरी हालत में इस ट्रेन का किराया 3000 रु से कम बिल्कुल भी नही होगा ! यानी कि साफ है कि सरकार अमीरों के ट्रांसपोर्ट पर खर्च करना चाहती है। बुलेट ट्रेन भारत की पहले से कर्ज में चल रही अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा बोझ साबित होगी, इसमें शक की कोई गुंजाइश नही है ।

यह परियोजना,सीधे तौर पर पैसे की बर्बादी है जिसका इस्तेमाल स्वास्थ्य और शिक्षा पर किया जा सकता था। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान स्थिति में देश बुलेट ट्रेन के लिए तैयार नहीं है। अगर सरकार कुछ करना चाहती है तो इतना करे कि जो हालत अभी रेलवे की है, इसी में कुछ सुधार कर के नागरिकों को रेलवे की मूलभूत सुविधाएँ दे । केवल इतना ही कर दें तो मोदीजी की बहुत कृपा होगी।

 



लेखक इंदौर (मध्यप्रदेश )से हैं , ओर सोशल मीडिया में सम-सामयिक विषयों पर अपनी क़लम चलाते रहते हैं ।



 


3 COMMENTS

  1. I am yet to talk those who know political economy fundamentals. But as far as I know Japanese economy is facing DEFLATION. So even an interest free loan is protecting Japanese economy. And as a Congress man said loan is in dollars which is most strong currency of world. So after 50 years dollars repayment will be very.

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