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कैराना उपचुनाव: तबस्सुम को “रावण” का सपोर्ट, देवर-भाभी का सियासी झगड़ा ख़त्म, BJP हलकान

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अजीत सिंह यादव 

चुनाव प्रचार ख़त्म होने से चौबीस घंटे पहले कैराना लोकसभा उपचुनाव अपने आखिरी चरण में बेहद दिलचस्प हो चला है। बीजेपी अपनी प्रत्याशी मृगांका सिंह के लिए सहानुभूति के वोट की उम्मीद कर रही है वहीं दूसरी ओर यूपी का नया महागठबंधन अपनी ताकत एकजुट होकर दिखा रहा है। बीजेपी के लिए महागठबंधन से मिलने वाली चुनौती पहले ही कम नहीं थी कि इस बीच ‘भीम आर्मी’ के रासुका में जेलबंद सेनापति चंद्रशेखर उर्फ रावण ने एक चिठ्ठी लिखकर अपने समर्थकों से उपचुनाव में महागठबंधन की उम्मीदवार तबस्सुम हसन को सपोर्ट करने की अपील की है। जेल में बंद चंद्रशेखर ने ये चिठ्ठी भीम आर्मी के ही मुजफ्फरनगर के जिलाध्यक्ष के मां के हाथ भिजवाई है, जो जेल में एक कैदी से मुलाकात करने गई थी।

ठीक एक दिन पहले 24 मई को कंवर हसन ने महागठबंधन की प्रत्याशी तबस्सुम हसन को सपोर्ट कर दिया. कंवर हसन का महागठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन से बहुत करीबी रिश्ता है। वो रिश्ते में तो तबस्सुम हसन के  देवर लगते हैं लेकिन आज़ाद उम्मीदवार के तौर पर मैदान में थे। घर की इस लड़ाई के सियासी मैदान में खुल जाने से महागठबंधन को अपने वोट कटने का डर था। कंवर हसन के अनुसार उनकी नाराज़गी की वजह राष्ट्रीय लोकदल का टिकट बंटवारा था जिसकी वजह से उन्होंने निर्दलीय ही चुनाव लड़ने की ठान ली।

दरअसल, कंवर हसन खुद भी लोकदल के टिकट से कैराना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, उनकी इसी ख्वाहिश ने महागठबंधन की नींद उड़ा रखी थी। इस सबके बीच आरएलडी ने कंवर हसन की भाभी तबस्सुम हसन को चुनाव लड़ाने का ऐलान कर दिया। झगड़ा यहीं से शुरू हुआ।कैराना उपचुनाव आरएलडी और जयंत चौधरी के राजनीतिक करियर के लिए इतना मायने रखता है कि कल चौधरी खुद ही कंवर हसन के घर पहुंच गए, गिले-शिकवे दूर हुए, सबने साथ हंसते हुए फोटो खिंचवाई और कंवर हसन मैदान से हट गये।

समर्थकों की मानें तो इलाके के बड़े नेता और अपने पिता हुकुम सिंह की मौत से उपजी सहानुभूति की लहर पर सवार मृगांका सिंह की चुनावी डगर इस सुलह ने और मुश्किल कर दी है। देवर-भाभी की घरेलू लड़ाई के सियासी हो जाने से बीजेपी जिन वोटों के बंटवारे की उम्मीद कर रही थी अब वह उम्मीद खत्म हो गई है।

हाल ही में गोरखपर और फूलपुर उपचुनाव में मिली करारी शिकस्त को सत्तारूढ़ बीजेपी भूल नहीं पाई है। भले ही हार के बाद बीजेपी के नेता सफाई देते रहे कि ये दोनों ही उपचुनाव सरकार के कामकाज के रिपोर्ट कार्ड नहीं हैं। अगर वाकई ऐसा है तो क्या वजह है कि बीजेपी ने वहां संगठन से लेकर सरकार तक को झोंक रखा है। कुछ न्यूज़ चैनलों की भाषा में कहें तो सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ वहां गरज भी चुके हैं, ये गर्जना कुछ तो कहती है। राजनीति के जानकारों, विश्लेषकों, चुनावी मैनेजरों को ध्यान से सुनें तो वे सपा और बसपा के प्रमुखों की कैराना में चुनावी रैली नहीं करने के फैसले को इन दलों की रहस्यमय चुप्पी बता रहे हैं।

बसपा का शांत समर्थन और सपा प्रमुख का रैली न करना इनकी उस रणनीति का हिस्सा है जिसमें वे वोटों के ध्रुवीकरण से बचना चाहते है। महागठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन को सपा, रालोद, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का समर्थन हासिल है। कोई चाहे या ना चाहे, बीजेपी जितनी शिद्दत से हर चुनाव लड़ती है उस वजह से हर चुवाव 2019 का सेमीफाइनल हो ही जाता है। इतना तो तय और साफ है कि 2019 के इतना नज़दीक हर जीत और हार के मायने ज़रूर होंगे। सरकार की सेहत पर न सही, कार्यकर्ताओं के मनोबल पर तो हार-जीत का फर्क स्वादानुसार पड़ता ही है।

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