Home काॅलम चुनाव चर्चा: पाँच विधानसभा चुनावों में अलग-थलग पड़ी भाजपा

चुनाव चर्चा: पाँच विधानसभा चुनावों में अलग-थलग पड़ी भाजपा

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चंद्र प्रकाश झा 


तेलंगाना और राजस्थान में विधान सभा चुनाव के लिए वोटिंग सात दिसंबर को तय है। इन समेत भारत के जिन पांच राज्यों में नवम्बर-दिसंबर 2018 के विधान सभा चुनाव हो रहे हैं उनमें से तीन – छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और मिजोरम में वोटिंग हो चुकी है। सभी राज्यों में मतगणना एक ही दिन मंगलवार 11 दिसंबर को होगी। उसी दिन सारे परिणामों की घोषणा हो जाने की आशा है। ये चुनाव, 17वीं लोक सभा के मई 2019 से पहले निर्धारित आम चुनाव के पूर्व आखरी बड़े जनादेश होंगे। अगले बरस ही जम्मू -कश्मीर, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडीसा, अरुणांचल प्रदेश, हरियाणा, सिक्किम और झारखंड समेत कई राज्यों की विधान सभा के भी नए चुनाव निर्धारित हैं।

छत्तीसगढ़ में मतदान दो चरण में संपन्न हुए जिसमें 90 निर्वाचन क्षेत्रों में से ‘माओवाद-नक्सल’ प्रभावित 18 सीटों के लिए 12 नवम्बर को और शेष 72 सीटों के लिए 20 नवम्बर को वोटिंग हुई। वहाँ करीब 73 प्रतिशत मतदान हुआ। मिजोरम और मध्य प्रदेश में वोटिंग 28 नवंबर को पूरी हुई। मिजोरम में 80% और मध्य प्रदेश में रिकॉर्ड 75% मतदाताओं ने वोट डाले।

इन पाँच राज्यो में चुनाव से एक ख़ास बात यह उभर कर सामने आयी कि केंद्र में सत्तारूढ़ नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस ( एनडीए ) का नेतृत्व कर रही भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा ) के चुनावी ‘तारणहार’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही बने हुए हैं। भाजपा ने मोदी जी का कोई विकल्प नहीं दिया है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने ताल ठोंक कर कह दिया है कि 2019 के आम चुनाव के बाद भी मोदी जी ही प्रधानमन्त्री बनेंगे। उन्होंने यह भी कहा है कि नई लोकसभा के लिए चुनाव निर्धारित समय पर ही होंगे। उनका यह भी दावा है कि केंद्र में फिर एनडीए की ही सरकार बनेगी । हमारे पास यह मानने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है कि उन्होंने यह सब मोदी जी के निर्देश पर ही कहा होगा।

लेकिन हम यह रेखांकित कर ही सकते हैं कि इन पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा का कोई गठबंधन नहीं था। एनडीए में भाजपा के साथ रही सारी पार्टियां मिजोरम और तेलंगाना में छिटक गयीं हैं। इनमें आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी ( टीडीपी ) प्रमुख है। टीडीपी ने तेलंगाना में 2014  में हुए प्रथम विधान सभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन किया था। लेकिन इस बार उसने अपनी धुर प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस से पहली बार हाथ मिला लिया। आंध्र प्रदेश के मुख्य मंत्री एवं टीडीपी अध्यक्ष नारा चंद्राबाबू नायडू के अनुसार उनका कांग्रेस से  कोई वैचारिक मतभेद नहीं बल्कि राजनीतिक विरोध रहा है और उससे हाथ मिलाना भाजपा की चुनावी हार सुनिश्चित करने के लिए ‘लोकतांत्रिक विवशता’ है। तेलंगाना में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस ) और भाजपा को भी अलग -अलग चुनाव लड़ना पड़ा।

मिजोरम के चुनाव में भाजपा को उन दलों का भी चुनावी साथ नहीं मिला जिनके साथ वह पूर्वोत्तर के राज्यों में गठबंधन सरकार में शामिल है। मिजोरम की सभी सीटों पर खुद के दम पर चुनाव लड़ रहा दल, मिज़ो नेशनल फ्रंट ( एमएनएफ ) भाजपा के नेतृत्व में गठित ‘ नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस ‘ (नेडा) की घटक है। कांग्रेस का आरोप है कि एमएनएफ ने भाजपा से गुप्त समझौता कर रखा है और वे सरकार बनाने के लिये हाथ मिला लेंगे. एमएनएफ ने इस आरोप को गलत कहा है।

मेघालय राज्य में नेशनल पीपुल्स पार्टी ( एनपीपी ) के नेतृत्व वाली ‘मेघालय डेमोक्रेटिक अलायंस‘ ( एमडीए ) गठबंधन सरकार में भाजपा शामिल है। मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड सांगमा की अध्यक्षता वाली  एनपीपी ने भी मिजोरम  चुनाव में भाजपा से गठबंधन किये बगैर अपने प्रत्याशी खड़े किये। एनपीपी, केंद्र की नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस और पूर्वोत्तर क्षेत्रीय ‘नेडा’ के अलावा नगालैंड और मणिपुर की गठबंधन सरकार में भी भाजपा के साथ शामिल है। एनपीपी का गठन पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पी ए संगमा ने 2013 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से निष्काषित होने के बाद किया था। नेडा के केंद्रक एवं असम के स्वास्थ्य मंत्री हेमंत बिस्वा सर्मा ही मिज़ोरम के भाजपा प्रभारी हैं।

यह भी गौतलब है कि इन पाँचों राज्यों में खुद भाजपा के कुछेक सांसद , विधायक रहे निर्वाचित प्रतिनिधियों समेत कई नेताओं ने उसका साथ छोड़ दिया है । इनमें राजस्थान में मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे छह बार के पूर्व विधायक घनश्याम तिवाड़ी , राज्य के दौसा से मौजूदा लोकसभा में भाजपा के सदस्य रहे एवं  पूर्व पुलिस महानिदेशक हरीश मीणा , मध्य प्रदेश के पूर्व लोक निर्माण कार्य मंत्री सरताज सिंह , मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साले संजय सिंह मसानी भी शामिल हैं। संजय सिंह मसानी, वारासिवनी से कांग्रेस प्रत्याशी हैं.

इन चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विरासत को हथियाने की कोशिश की। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमण सिंह के खिलाफ राजनांदगाव सीट से दिवंगत  वाजपेयी की भांजी करुणा शुक्ला को उतारा। भाजपा ने दिवंगत वाजपेयी के भतीजा, अनूप मिश्रा को मध्य प्रदेश की मोरेना सीट से अपना प्रत्याशी बनाया. वह मौजूदा लोक सभा में भाजपा के सदस्य हैं.

राजनीति में परिवारवाद का असर इन चुनावों में यहीं तक सीमित नहीं रहा। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी का पूरा परिवार चुनाव मैदान में है। वह खुद मरवाही से चुनाव मैदान में हैं। उनकी पत्नी रेणु जोगी, पुत्र अमित जोगी और पुत्रवधु ऋचा जोगी भी प्रत्याशी हैं। पत्नी कोटा से, पुत्र मनेन्द्रगढ़ से जेसीसी के और पुत्रवधु अकलतरा से बसपा प्रत्याशी है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र आशीष विजयवर्गीय इंदौर की एक सीट से पार्टी प्रत्याशी हैं। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की बहन एवं मध्य प्रदेश सरकार की मंत्री यशोधरा राजे फिर से शिवपुरी सीट से भाजपा प्रत्याशी हैं. कांग्रेस ने राजस्थान की झालरपाटना सीट से वसुंधरा राजे  के खिलाफ पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के पुत्र, मानवेन्द्र सिंह को उतारा। इन चुनाव में वंशवाद और परिवारवाद के और भी अनेक उदाहरण हैं.

इन चुनाव की एक ख़ास बात यह रही कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ( माकपा ) ने राजस्थान और तेलांगाना में  भाजपा और कांग्रेस  के खिलाफ वामपंथी मोर्चा खड़ा कर दिया। राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा के बाद कोई ख़ास तीसरी राजनीतिक ताकत नहीं है. लेकिन इस बार माकपा ने कुछेक राजनीतिक समूहों और किसान संगठनों के समर्थन के सहारे  ‘राजस्थान लोकतांत्रिक  मोर्चा’ ( रालोमो ) का गठन किया। माकपा ने खुद  29  उम्मीदवार खड़े किये।  इनमें  मुख्यमंत्री पद के लिए इस मोर्चा के घोषित दावेदार अमराराम भी हैं, जो दांतारामगढ से माकपा के पूर्व विधायक और अखिल भारतीय किसान सभा के उपाध्यक्श हैं। कहा जाता  है  कि माकपा नेता अमराराम ने भाजपा से अलग होने वाले भारत वाहिनी पार्टी के अध्यक्ष घनश्याम तिवाड़ी, निवर्तमान निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल की बनायी नई पार्टी, समाजवादी पार्टी, जनता दल-सेक्यूलर समेत अन्य गैर-भाजपा , गैर-कांग्रेस दलों के भी नेताओं से सम्पर्क किया था। लेकिन ज्यादातर इस नये मोर्चा  में शामिल नहीं हुए. अलबत्ता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  ( भाकपा ) , भारत की कम्युनिस्ट पार्टी  (मार्क्सवादी -लेनिनवादी लिबरेशन) और मार्क्सिस्ट कम्युनिस्ट पार्टी जैसे कुछेक दल रालोमो में शामिल हैं।

लेकिन तेलंगाना में माकपा की पहल पर 28 छोटे दलों के बनाये ‘बहुजन लेफ्ट फ्रंट’ ( बीएलएफ ) नामक नए चुनावी मोर्चा में भाकपा,शामिल नहीं हुई। भाकपा ने तेलंगाना में  इस बार के चुनाव में कांग्रेस द्वारा बनाये गठबंधन, महाकुटुम्बी में शामिल होना ही श्रेयस्कर समझा, जिसमें टीडीपी और तेलंगाना जन समिति ( टीजेएस ) साथ हैं। भाकपा, तेलंगाना के पिछले विधान सभा चुनाव में भी कांग्रेस के साथ थी. भाकपा ने छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ पूर्व मुख्य्मंत्री अजित जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ( जे ) और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन का समर्थन किया है ।

इन पांच में से तीन राज्यों में सत्ता में भाजपा है.  इसलिए  दांव पर उसी का ज्यादा लगा है. वह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15  बरस से सत्ता में है। कांग्रेस सिर्फ मिज़ोरम में सत्ता मैं है। वहाँ कांग्रेस के ललथनहवला 10 बरस से मुख्यमंत्री हैं।  राजस्थान में भाजपा की यशोधरा राजे  पांच बरस से मुख्य मंत्री है।  वह पहले भी 2003 से 2008 तक मुख्यमंत्री  रही थीं।  तेलंगाना की सत्ता पर काबिज़ टीआरएस, एनडीए में तो  नहीं है पर वह भाजपा के प्रति मित्रवत रही  है।

इन राज्यों में संपन्न मतदान और राजस्थान और तेलंगाना में  होनी वाली वोटिंग के परिणाम जो भी निकले एक बात स्पष्ट हो गयी. केंद्रीय सत्ता बरकरार रखने के लिए भाजपा की दावेदारी में उसके गठबंधन का जोर इन पांच विधान सभा चुनाव में बिखर गया।

(मीडियाविजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है।)