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भाेजपुरी संगीतः स्त्री-द्वेष की साझा ज़मीन पर पनपते जातिगत टकराव का नया ठिकाना

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जाति मूलतः और अंततः स्त्री विरोधी होती है। जाति के तत्व में भेदभाव, हिंसा, वर्चस्व की भावना, स्त्री-विरोध आदि शामिल है। वहां अक्सर संगठन, संस्कार, संस्कृति, देश बचाने की बात कही जाती है। तब वर्चस्व की भावना जन्म लेती है। फिर जातियां एक दूसरे से टकराने लगती हैं। इस तरह तमाम जातियां एक दूसरे पर भयानक और हिंसक छींटाकशी करते हुए स्त्री-विरोधी काम करती हैं। बीते लगभग दो दशक से भोजपुरी की लोकप्रिय गायकी में इस जातिगत टकरावों से पैदा हो रहे इस स्त्री-द्वेष को बड़ी आसानी से देखा जा सकता है। भोजपुरी के गीतों में स्त्रियों का प्रयोग एक वस्तु के तौर पर किया जाता है।

भोजपुरी के गायक रितेश पांडे ने एक बहुप्रचारित गीत गाया है- “तेरी पतली कमर, कमसिन है उमिर/ उद्घाटन तेरा कर देता हूं/ पांडे जी का बेटा हूं चुम्मा चिपक के लेता हूं।” इस गीत में चुम्मा लेने की योग्यता पांडे जी के बेटे में है। पांडे जी के बेटे ने चुम्मा लेने का एक नायाब तरीका ईजाद किया है। पांडे से मैंने इस गीत पर बात करने की कोशिश की तो उन्होंने बात करने से मना कर दिया।

पांडे की तर्ज़ पर लगभग सभी जाति के गायकों ने गाना बनाया है। ‘भूमिहरवा के गांव में’ गीत गाने वाले वाले सुजीत राय ‘पिंकू’ बताते है कि हमसे गलती हो गयी। पिंकू बलिया के निवासी है और उनका अलग धंधा भी है। वे भूमिहार जाति से ताल्लुक रखते हैं। वे किसी प्रश्न के जवाब में बस यही कहते हैं कि हमें थोड़ा लोकप्रिय होना था। अपनी जाति को दबंग दिखाना था। इसलिए ऐसे गीत गा दिए। अब नहीं गाता हूं।

सुजीत इन दिनों भोजपुरी फिल्म ‘तिरंगा’ की शूटिंग में व्यस्त है। जब मैंने यह पूछा कि यह गीत सुनते और गाते हुए आपके मन में इंटेशन क्या था? गीत में मरण जाति का प्रयोग करने के पीछे का इंटेंशन क्या है? इस सवाल के जवाब में पिंकू राय बताते हैं कि बस इतना चाहते थे कि लोग हमारे बारे में जाने समझें।

पिंकू बताते है कि एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था- नाचे न नाचे देबे, लगे जब आवे/चोली में हाथ डाले, लागे टोहीआवे/धई के लागे खूब दाबे, भूमिहरवा जब कट्टा सटावे।” इस गीत का मूल स्वर में स्त्री है और किसी दूसरी जाति पर कट्टा सटाया गया है। सुजीत राय पिंकू इस सवाल का जवाब नहीं दे पाते कि किस जाति की स्त्री को कट्टा सटाते हैं। चूंकी जाति है तो उसका विभिन्न किस्म से इस्तेमाल होगा ही।

यूट्यूब चैनल ‘अपना चैनल’ के प्रमुख राजेश राज कुशवाहा गोरखपुर के पिपरहिया के रहने वाले हैं। गुजरात के सूरत में काम करते हैं। मशीन चलाते हैं। जब मैं उनसे बात कर रहा था वे उस समय गोरखपुर स्टेशन पर सूरत जाने वाली ट्रेन का टिकट कटाकर गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने बताया कि सभी जातियों के लोगों ने गाया तो हम भी गाना गा दिए। कुशवाहा ने बताया कि उन्होंने कहीं से भी संगीत की शिक्षा नहीं ली है। ऐसे ही सुनते सुनते गाने का मन कर दिया और लगा कि जाति की दबंगई दिखाने वाला गीत गाना चाहिए तो लिखकर गा दिए।

वे बताते हैं कि नये गीत और संगीत के लिए स्टूडियो वाले 3500-4000 में काम कर देते हैं जबकि पुराने गीत-संगीत पर गाने में कम ख़र्चा होता है। एक हज़ार रुपया हो जाता है। राजेश राज कुशवाहा इसके आगे बात करने से मना कर देते हैं।

‘भतार पासवान चाही’ नामक एलबम निकालने वाले सन्नी सनेहिया पहले तो बात करने से साफ इनकार कर देते हैं। दोबारा कॉल करने पर कहते हैं कि यादव लोगों से भी पूछिये, भूमिहार और बाबूसाहब लोगों से पूछिए। बात समझाने के बाद वे कहते हैं कि हमारे समाज से कोई गीत नहीं गाता था, तो हम अपने चचेरे भाई के साथ मिलकर गाना लिखे और पटना के एक रंग स्टूडियों में जाकर गाना रिकॉर्ड करवा लिए।

सन्नी ने बताया कि वे पटना के पास बिहटा में रहते हैं। उनके भाई होमगार्ड में हैं। उनकी नौकरी बीएसएफ में लगने वाली है, इसलिए थोड़ा यह काम स्थगित कर दिया है। वे फिलहाल अपने ही समाज के एक गायक संजय सांवरिया को अपना यूट्यूब चैनल दे चुके हैं। शंकर उनके लिए ही गाने लिखते हैं। जब मैंने पूछा कि आपके गीत में जातीय दंभ और स्त्री विरोधी स्वर नज़र आता है, क्या इस पर आप ध्यान नहीं देते? इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि हम अपनी जाति को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। हमारी जाति सदियों से बहुत पीछे थीं। उसे आगे निकालना है। इसलिए गाना तो गाना ही पड़ेगा।

‘यादव जी आंख मारे’ के गायक चंदन यदुवंशी यह कहते हुए बात करने से इंकार कर देते हैं कि हमें जो मन हम कर रहे है, आप पूछने वाले कौन होते हैं। भोजपुरी पर लंबे समय से काम करने वाले नवीन कुमार बताते हैं कि भोजपुरी में स्त्री विरोधी गीत गाने वाले अधिकतर गायक सवर्ण समाज से ही आते हैं। सवर्ण जाति के गायकों को लगता है कि पिछड़ी और दलित जातियों को संवैधानिक अधिकार मिलने और राजनीतिक तौर पर चेतना संपन्न होते जाने के कारण सवर्ण जातियों की पकड़ ढीली पड़ रही है। इसलिए वे जातीय दंभ वाले स्त्री विरोधी गीत गा रहे हैं।

आलोचक सुधीर सुमन बताते हैं कि जाति एक सामंती मनोवृत्ति है। भाषा में कहीं प्रेम नहीं है। जाति एक सुरक्षित पनाह है। यही कारण है कि स्त्री इसका विरोध नहीं कर पाती है। इस तरह के गीत महिलाएं भी गाती हैं। असल में उपभोक्ता समाज अपने इस्तेमाल को समझ नहीं पाता है।

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