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असम NRC: दुनिया के सबसे बड़े नागरिकता संकट में बस हफ्ते भर की देरी

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आगामी 31 अगस्त को असम के भारतीय नागरिकों के नाम एनआरसी के अंतिम ड्राफ़्ट में प्रकाशित किए जाएंगे आशंका है कि लगभग 15 लाख से अधिक असमी लोगों का नाम इस सूची में शामिल नहीं होगा। नागरिकता खत्म होने का अर्थ है व्यक्ति का पहचान, अधिकार और जीविका से पूरी तरह वंचित होना।

असम एनआरसी के प्रकाशन के साथ ही विश्व का सबसे बड़ा मानवीय संकट असम में पैदा होगा। यहां नागरिकता से वंचित होने वाले लोगों की तादाद दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में सबसे ज्यादा होगी। म्यांमार में 10 लाख रोहिंग्या लोग नागरिकता विहीन हैं, कोटे डी आइवर में 7 लाख, थाईलैंड में 5 लाख और सीरिया में 3.6 लाख लोग नागरिकताविहीन हैं।

बता दें कि 30 जुलाई 2018 को एनआरसी के अंतिम ड्राफ्ट के प्रकाशन के समय 40 लाख लोगों के नाम सूची में शामिल नहीं हुए थे। इनमें से 36 लाख लोगों ने फिर दावा किया है। इससे पहले 26 जून, 2019 को एक लाख लोगों के नाम ड्राफ्ट से काट दिए गए।

कौन होंगे ये 15 लाख नागरिकताविहीन लोग

जब पिछले साल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के संसद में ’40 लाख घुसपैठिये’ वाला बयान दिया था तो इस पर खुद भाजपा और संघ के लोगों ने ऐतराज़ जताया था क्योंकि समय बीतने के साथ-साथ ये साफ़ हो गया था कि एनआरसी से बाहर रखे गए 40 लाख लोगों में से ज़्यादातर संख्या हिंदुओं की थी।

जुलाई 2018 में जब एनआरसी का फाइनल ड्राफ्ट प्रकाशित हुआ था तो यूपी, मध्य प्रदेश और बिहार के कई हिंदी भाषियों को भी इसमें जगह नहीं मिली थी।

कभी कोई आधिकारिक आंकड़ा इसका नहीं आया लेकिन अनुमानतः ये संख्या 20-22 लाख तक बताई गई थी। खुद संघ नेता ओशीम दत्ता ने असम नागरिकता रजिस्टर से बाहर रह गए हिंदुओं की संख्या 30 लाख बताई थी। माना जा रहा है कि संशोधन प्रक्रिया में हिंदुओं को अंदर कर लिया जाएगा। नागरिकता से वंचित होने वालों को वर्षों अपनी नागरिकता साबित करने की कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है। गृह मंत्री अमित शाह जिस तरह बार-बार मुस्लिम शरणार्थियों की तुलना दीमक से करते हैं, उससे समझा जा सकता है कि अफसरों पर भारी दवाब है कि वे अधिक-से-अधिक मुसलमानों को संदिग्ध नागरिकता वाली सूची में रखें। अनुमान है कि फाइनल एनआरसी में 15 लाख मुसलमानों के नाम शामिल नहीं किए गए हैं।

हिंदू शरणार्थियों को भारतीय नागरिक होने का नैसर्गिक अधिकार और नागरिकता संशोधन बिल?

भाजपा घोषित हिंदू शरणार्थियों को सिर्फ शरणार्थी मानती है, घुसपैठिया नहीं। तभी तो वो नागरिकता संशोधन बिल के जरिए ईरान, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और बंग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने के लिए नागरिकता संबंधी शर्तों में रियायत देने जा रही है। केंद्र सरकार ने हर हिंदू को भारतीय होने का नैसर्गिक अधिकार देने का एक क़ानून भी पेश किया था जबकि असम के ज़्यादातर नागरिक ऐसी किसी भी रियायत के ख़िलाफ़ हैं। अगर सरकार राज्यसभा में भी विधेयक को पारित करा लेती है तो सूची से बाहर हुए हिंदू नागरिक अंतिम सूची में शामिल किए जाने का दावा करने के योग्य हो जाएंगे। ज्यादातर संघ नेताओं का कहना है कि अंतिम मसौदे में मुस्लिमों से ज्यादा हिंदू शामिल किए जाने से छूट गए हैं। ऐसे में यदि नागरिकता संशोधन विधेयक कानून में तब्दील हो जाता है तो 40 लाख में से बड़ी संख्या में लोग एनआरसी में शामिल होने के दावेदार बन जाएंगे।

एनआरसी की दोषपूर्ण प्रक्रिया और अपराधीकरण

एनआरसी की पूरी प्रक्रिया ही दोषपूर्ण रही है। किसी व्यक्तिको विदेशी साबित करने का काम प्रशासन को खुद ही करना चाहिए था जबकि एनआरसी प्रक्रिया में हर व्यक्ति को ही शक़ के दायरे में लाकर उन पर अपनी नागरिकता संबंधी निर्धारित दस्तावेजों को पेश करके अपनी नागरिकता साबित करने का भार थोप दिया गया। अखबारी विज्ञापनों को छोड़कर कोई जागरूकता पैदा करने का प्रयास नहीं किया गया। ग्रामीण इलाकों में जमीन के दस्तावेजों को संभालकर रखने वाले कम लोग ही होते हैं। इसी तरह निरक्षर लोगों के पास शैक्षणिक प्रमाणपत्र होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। हर साल आने वाली बाढ़ से उजड़ने वाले लोग अपने पुराने दस्तावेजों को गंवा चुके हैं। जाहिर है ऐसे में तमाम निरक्षर, भूमिहीन, अजागरुक, कागज विहीन लोग सरकारी सनक के चलते नागरिकता से वंचित होकर अपराधी करार देकर सज़ा के हकदार हो जाएंगे।

क्या एनआरसी में नाम न आने वाले सभी घुसपैठिये हैं?

इसका सीधा सा जवाब है नहीं। इनमें से अधिकांश चाय बग़ान के लिए, खेती के लिए लाए गए मजदूर हैं। कुछ तो स्वेच्छा से कामकाज की तलाश में पचासों वर्ष पूर्व आए, कई ऐसे हैं जिनके घर बार नदी के बाढ़ और भूकंप में तबाह हो गए हैं।

असम में तत्कालीन ब्रिटिश हुक़ूमत के दौरान झारखंड के संथाल परगना, सिंहभूम और छोटा नागपुर इलाक़े के आदिवासियों को बड़े पैमाने पर असम लाया गया ताकि वहाँ चाय के बगानों में इनसे मज़दूरी कराई जा सके।

इनके अलावा झारखंड, छत्तीसगढ़, बंगाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के खेतिहर मज़दूरों की भी बड़ी संख्या असम बुलाया गया और सदियों तक बँधुआ मजदूर बनाकर रखा गया। बाद के दिनों में ये लोग वहीं बस गए। इनमें से अधिकतर लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं हैं। इन आदिवासियों में से काफ़ी के पास वो दस्तावेज़ ही नहीं जो आवेदन के लिए ज़रूरी हैं, न इनके पास उन्हें जुटाने की समझ या आर्थिक सामर्थ्य है और न ही किसी तरह का संगठनात्मक सहयोग, तो बहुतों ने तो एनआरसी के लिए दरख्वास्त ही नहीं दिया, तो ज़ाहिर है, हज़ारों आदिवासियों के नाम एनआरसी में नहीं हैं।

इनके अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल जैसे सूबों से ‘ग्रो मोर फूड’ के नाम पर खेतिहर मज़दूर भी अंग्रेजों के दौर में ही लाया गया था और उसी समय ही बहुत सारे लोग वहां से भी असम आये जो पहले पूर्वी पाकिस्तान और अब बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है। एनआरसी की फाइनल सूची प्रकाशित होने के बाद आदिवासी और खेतिहर लोग अपने ही देश में नागरिकताविहीन होकर अपराधी बन जाएंगे।

बाढ़ और भूकंप में तबाह हुए कई घर

बेकी ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी है, लेकिन बरसात के मौसम में इस नदी का विस्तार तबाही लेकर आता है। ब्रह्मपुत्र की ही तरह बेकी के किनारे बसने वाले सैकड़ों परिवार हर साल यहां आने वाली बाढ़ की वजह से विस्थापित हो जाते हैं। बाढ़ और भूकंप से विस्थापित परिवारों के लिए पुश्तैनी ज़मीनों पर अपने मालिकाना हक़ के साथ-साथ एनआरसी में अपनी दावेदारी को साबित करना भी मुश्किल हो रहा है।

बेकी नदी के किनारे स्थित बरपेटा ज़िले के गामाड़ीगुरी गांव के नज़रुल नागरिकता साबित करने की अपनी लड़ाई के बारे कहते हैं, “मेरे दादाजी ने असम में 1913 में ज़मीन ली थी लेकिन आज उस ज़मीन पर नदी बह रही है। हमारे पास 1951 से लेकर अभी तक के सारे काग़ज़ हैं लेकिन फिर भी मेरा नाम एनआरसी लिस्ट में नहीं आया।बेकी में आने वाली बाढ़ की वजह से 2014 से अब तक मेरा घर तीन बार टूट चुका है। नदी हर साल हमारा घर-मिट्टी सब बहा के ले जाती है। इसके बाद जब हम नए गांव में रहने के लिए जाते हैं तो लोग हमें बंग्लादेशी समझकर हम पर शक करते हैं और एनआरसी के दफ़्तर में शिकायत कर देते हैं।”

नागरिकता छिन जाने के बाद

नागरिकताविहीन लोगों के साथ क्या सलूक किया जाएगा, इसे लेकर राज्य और केंद्र की बीजेपी सरकारों ने अब तक कोई कारगर योजना नहीं बनाई है। नियमतः ऐसे लोगों को उनकी संपत्ति, मत देने आदि के अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा और उन्हें डिटेन्शन कैंपों में रखना होगा। इस तरह के कैंप अलग से नहीं बनाए गए हैं। जिला जेलों के अंदर ही एक खास एरिया को डिटेन्शन कैंप मान लिया गया है।

लोकसभा में 16 जुलाई को सरकार की तरफ से एक प्रश्न के जवाब में कहा गया है कि 1 लाख 17 हजार 164 लोग अब तक विदेशी घोषित किए जा चुके हैं। इसमें अभी एनआरसी प्रक्रिया वाले लोगों की संख्या शामिल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में आदेश दिया कि इस तरह विदेशी या संदिग्ध नागरिकता घोषित किसी व्यक्ति को तीन साल से अधिक समय तक डिटेन्शन कैंप में नहीं रखा जा सकता। फिर भी, एनआरसी प्रक्रिया में 15 लाख की नागरिकता संदेहास्पद हो जाती है, तो उन्हें कैंपों में रखना होगा।

सरकार संसद में भले करीब सवा लाख विदेशियों की पहचान की बात कर रही हो, पर जमीनी स्थिति बिल्कुल उलट है। फरवरी 2019 में असम राज्य सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि 938 लोग ही डिटेन्शन कैंपों में हैं। इनमें से 823 लोग विदेशी हैं जबकि बाकी बचे 105 लोग संदिग्ध वोटर हैं। पहचाने गए करीब 75 हजार लोगों का कोई अता-पता नहीं है।

सरकारी अफसरों के अनुसार- डी वोटरों की संख्या अगर इतनी अधिक बढ़ गई, तो उन्हें कैंपों में रखने की समस्या होगी जबकि अभी पर्याप्त संख्या में विदेशी ट्रिब्यूनलों का गठन भी नहीं हो पाया है। असम में कहने को तो 100 विदेशी ट्रिब्यूनल हैं लेकिन वस्तुतः इनमें से 70 ही कार्यरत हैं। राज्य सरकार ने ऐसे 1,000 ट्रिब्यूनल गठित करने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था। केंद्र ने 400 ट्रिब्यूनल के गठन को मंजूरी दी है और सितंबर में 200 ट्रिब्यूनल के गठन की बात कही गई है।

प्रत्यर्पण के लिए दूसरे देश की सहमति जरूरी

बांग्लादेश के मंत्री हसनुल हक़ साफ़ तौर पर कह चुके हैं कि ये भारत का आंतरिक मामला है और बांग्लादेश का इससे कुछ लेना-देना नहीं, जबकि किसी भी देश से बड़ी संख्या में लोगों के प्रत्यर्पण के लिए यह जरूरी है कि दूसरा देश यह स्वीकार करे कि वे उसके नागरिक हैं और अवैध तरीके से उनके देश में घुस गए थे। भारत और बांग्लादेश की सरकारों के बीच विदेशी बांग्लादेशी ठहराए गए लोगों को वापस भेजने का कोई समझौता नहीं है, फिर उन लोगों का क्या होगा जो कई पीढ़ियों से भारत को अपना देश मानकर यहां रहते आए हैं?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2013 से फरवरी, 2019 तक महज 166 लोगों को बांग्लादेश प्रत्यर्पित किया जा सका था। एनआरसी का मामला सैकड़ों नहीं लाखों लोगों से जुड़ा है। इनमें बड़ी तादाद में लोग दशकों से असम में रह रहे हैं और वे खुद को भारतीय नागरिक के तौर पर पहचानते हैं।

लाखों लोगों का भविष्य संकट में

सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में आदेश दिया है कि इस तरह विदेशी या संदिग्ध नागरिकता घोषित किसी व्यक्ति को तीन साल से अधिक समय तक डिटेन्शन कैंप में नहीं रखा जा सकता। ऐसे में सवाल उठना लाजिम है कि भारतीय हो, बांग्लादेशी एनआरसी लिस्ट से बाहर होकर डिटेंशन सेंटर तक का सफ़र पूरा करने वाले लोगों का भविष्य क्या होगा? सरकार हो, अदालत हो या प्रशासन, इस सवाल का सुलझा हुआ जवाब फ़िलहाल किसी के पास नहीं है।

एनआरसी प्रक्रिया में 15 लाख की नागरिकता संदेहास्पद होने के बाद उनकी नागरिकता छीन ली जाएगी, उनको विदेशी ट्रिब्यूनल, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक अपनी नागरिकता साबित करने की कानूनी लड़ाई कई सालों साल लड़नी पड़ेगी। जाहिर है ऊंची अदालतों तक जाने का खर्च गरीब तबके के लोग उठा नहीं पाएंगे, अतः आर्थिक रूप से कमजोर लोग सीधे डिटेन्शन कैंप में बंदी बनकर जीने के लिए मजबूर होंगे। हो सकता है, कुछ लाख लोग इस तरह अपनी नागरिकता साबित करने में सफल भी हो जाएं लेकिन अधिकतर लोगों को नागरिकता विहीन अपराधी जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

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