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इतिहास के आईने में अनुच्छेद 370 और 35A पर पुनर्विचार : भाग एक

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अनुच्छेद 370 और 35अ के इर्दगिर्द बुने तमाम कानूनों, संवैधानिक प्रावधानों, राष्ट्रपति के आदेशों, राजनीतिक इतिहास और कानूनी दाँव-पेंचों के जाल-ताल की वजह से इसको रद्द किए जाने की जो बहसें हाल-फिलहाल चल रहीं हैं उनको समझ पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा है। वकील व कानूनी शोधकर्ता श्रीमोई नन्दिनी घोष के तीन लेखों की इस शृंखला में इस मामले की पेंचीदगी को समझने के लिए कुछ सरल से सवालों के जवाब ढूँढने की कोशिश की गई है। ये सवाल हैं,

  • अनुच्छेद 370 और 35अ क्या है/था?
  • उनके साथ अचानक क्या किया गया?
  • अंतरराष्ट्रीय कानून, संवैधानिक कानून, और जम्मू व कश्मीर के लोगों के बराबरी, ज़मीन व आज़ादी के अधिकारों के संदर्भ में इन सब का क्या मतलब है?
  • इन बदलावों से क्या वाकई कोई फर्क पड़ता है? किसे और क्यों?

श्रीमोई इन सवालों के कानूनी निहितार्थों व नतीजों की पड़ताल के लिए इनको तीन क्षेत्राधिकारों की कसौटी पर रखेंगी। ये हैं: (i) अंतर्राष्ट्रीय, (ii) घरेलू (या संवैधानिक), और (iii) रोज़मर्रा के कानूनी दाँव पेंच – खासतौर पर उन मामलों में जिन पर जम्मू व कश्मीर राज्य को भंग किए जाने का सीधा प्रभाव पड़ा है। शृंखला के पहले आलेख में श्रीमोई ने 370, 35अ जैसे शब्दों और इनको इतिहास बनाने के लिए जो तिकड़में की गईं उनका कानूनी-ऐतिहासिक ब्यौरा दिया है। अगले दो आलेखों में इन तब्दीलियों के मतलब व उनके मायने पर नज़र डाली जाएगी।

जम्मू व कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने की कार्यवाही को एक तरह का संवैधानिक सर्जिकल स्ट्राइक कहा जा रहा है – किस तरह एक ही झटके में एक बेहद जटिल कानूनी उलझन को निपटा दिया गया। हमें बताया जा रहा है कि यह नियति के साथ बहुत समय से टल रही हमारी एक और मुलाक़ात है और वह नियति उस राष्ट्र की है जो आखिरकार एक संविधान और एक झंडे तले एक हो गया है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? इसका जवाब खोजने के लिए हमें अपने सवालों में से पहले दो से जूझना होगा जो आसान दिख ज़रूर रहे हैं लेकिन जिनके जवाब आसान नहीं हैं। पहला सवाल है कि अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A की यह जटिल उलझन थी क्या बला? और दूसरा सवाल है कि उनके साथ ठीक-ठीक क्या किया गया है?

एक जटिल उलझन : अनुच्छेद 370 क्या है?

अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान के इक्कीसवें भाग में दिए गए अस्थायी, संक्रमणकालीन व विशेष प्रावधानों  में से एक प्रावधान है। इस भाग के प्रावधान विभिन्न किस्म के संवैधानिक अधिकारों और भारतीय संघ के विभिन्न राज्यों (मिसाल के लिए, जिसमें गुजरात, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, सिक्किम व नगालैंड शामिल हैं) के नागरिकों के लिए सुरक्षा और आज़ादी से पहले के संवैधानिक कानूनों व संस्थाओं (जैसे कि न्यायपालिका) को आज़ादी के बाद भी बरकरार रखने से जुड़े हुए हैं। 5 अगस्त 2019 व 6 अगस्त 2019 के संवैधानिक आदेशों (क्रमशः सीओ 272 व सीओ 273) के ज़रिए समूचे अनुच्छेद 370 को लगभग रद्द करते हुए उसका नया पाठ रचा गया है जो स्वशासन, क्षेत्रीय अखंडता और ज़मीन व जीविका पर सामूहिक अधिकारों के मामले में पुराने अनुच्छेद से मिली सीमित सुरक्षा को खत्म कर देता है।

दक्षिण एशिया का संयुक्त राष्ट्र का नक्शा

मूल अनुच्छेद 370 में जम्मू-कश्मीर की स्वतंत्र रियासत के शासक महाराजा हरि सिंह और भारतीय संघ के बीच अक्टूबर 1947 में कश्मीर की पहली लड़ाई की शुरुआत के समय हुई प्रवेश सन्धि (Instrument of Accession) [इस लेख में प्रवेश सन्धियानी भारतीय संघ में प्रवेश करने की सन्धि और विलयन सन्धि‘ (Instrument of Merger) यानी भारतीय संघ में विलय की सन्धि में फर्क किया गया है – अनुवादक] के प्रावधानों को ही थोड़े बदले स्वरूप में शामिल किया गया था। यह सन्धि हिन्दुस्तान में शामिल हुए दूसरे 140 रियासतों के साथ की गई सन्धियों जैसी ही थी। लेकिन जम्मू-कश्मीर का मामला दूसरों से अलग था क्योंकि यह एकमात्र रियासत थी जिसने विलयन की शर्तों में फेरबदल और अपनी संप्रभुता को बनाए रखने की कोशिश की। यह कोशिश उसने हिन्दुस्तानी संविधान के लिखे जाने की प्रक्रिया में शामिल होकर और उसके बाद भारतीय राज्य और जम्मू-कश्मीर राज्य के बीच एक समझौते के ज़रिए की। यह 1952 का दिल्ली समझौता कहलाता है जिसे हिन्दुस्तानी संसद ने मंज़ूरी दी। गौरतलब है कि महाराजा ने  प्रवेश सन्धि पर दस्तखत किया था जो कानून बनाने की उनकी कुछ ताकत को अस्थायी तौर पर भारत को देता था। दूसरी रियासतों के हुक्मरानों की तरह उन्होंने विलयन सन्धि (Instrument of Merger) पर दस्तखत नहीं किया था (और न कभी बाद में ऐसा किया) जो रियासत को पूरी तरह हिन्दुस्तान में मिला दे। बाद के आलेखों में हम इस दौर की कुछ असाधारण राजनीतिक घटनाओं की तरफ नज़र डालेंगे – कत्लेआम, विद्रोह, और ज़्यादा कत्लेआम, युद्ध, युद्ध विराम, अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति, ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना, चुनावों में दखलंदाज़ी, साजिश और तख्तापलट वगैरह वगैरह – ये सब उस कानूनी इतिहास के नाटक के अलग-अलग दृश्य हैं जिसका विराम प्रवेश सन्धि पर दस्तखत और जम्मू-कश्मीर के संविधान (1948-1957) के साथ हुआ। लेकिन फिलहाल हम अनुच्छेद 370 की तरफ चलते हैं।

कश्मीर के इलाके का संयुक्त राष्ट्र का नक्शा. ‘भारतीय गणराज्य और सीमा के इलाके’ के संयुक्त राष्ट्र के नक्शे में जम्मू-कश्मीर का विवादित इलाका शामिल नहीं है। आधिकारिक तौर पर जम्मू-कश्मीर का संघ से “एकीकरण” उसी के संविधान द्वारा 1957 में हो गया था। हिन्दुस्तान की सरकार किसी भी ऐसे नक्शे के प्रकाशन पर पाबंदी लगा देती है जिसमें समूचे जम्मू-कश्मीर को हिन्दुस्तान में न दिखाया गया हो।

संविधान सभा में कश्मीरी नुमाइंदों को शरीक किए जाने पर हुई बहसों, और अनुच्छेद 370 के मसौदे को तैयार किए जाने व उस पर हुई टिप्पणियों से यह ज़ाहिर है कि यह जम्मू-कश्मीर और हिन्दुस्तान के सम्बन्धों को तय करने के लिए एक संक्रमणकालीन उपाय था जिसे जम्मू-कश्मीर की कानूनी स्थिति के साफ होने तक बना रहना था। अक्टूबर 1949 में जब ये अनुच्छेद लिखा जा रहा था उस समय तक संयुक्त राष्ट्र (UN) कश्मीर विवाद में सक्रिय दखल दे रहा था। गौरतलब है कि हिन्दुस्तान ने जनवरी 1948 में पहली बार पहले कश्मीर युद्ध के समय यह विवाद इस अंतर्राष्ट्रीय संस्था के सामने पेश किया था। संविधान की ड्राफ़्टिंग कमेटी के सदस्य और बाद में कश्मीर मामलों के मंत्री एन गोपालस्वामी अय्यंगर ने संविधान सभा के सामने कहा: “[भारत सरकार] इस बात पर प्रतिबद्ध है कि [जम्मू व कश्मीर] राज्य के लोगों को यह फैसला करने का मौका दिया जाएगा कि वे इस गणतंत्र में रहना चाहते हैं या उससे बाहर जाना चाहते हैं। वह लोगों की इच्छा को एक रायशुमारी के ज़रिए तय करने को लेकर भी प्रतिबद्ध है बशर्ते अमन व व्यवस्था कायम हो और रायशुमारी की निष्पक्षता की गारंटी हो। हम इस बात पर भी सहमत हैं कि राज्य का संविधान और राज्य के ऊपर संघ के अधिकार-क्षेत्र का निर्णय लोगों की इच्छा के अनुसार संविधान सभा के ज़रिए किया जाएगा।”

किसी ने इस वक्तव्य के इस अंतरविरोध पर ध्यान नहीं दिया कि अगर वाकई राज्य के लोग भारतीय गणराज्य से बाहर जाने का फैसला करते हैं तो राज्य का भावी संविधान, उसको लिखने की प्रक्रिया और राज्य पर “संघ के अधिकार-क्षेत्र” जैसे मामलों में भारतीय गणराज्य का कोई इख्तियार नहीं होगा। लेकिन इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं क्योंकि यह मान्यता बड़ी व्यापक थी कि संयुक्त राष्ट्र में “उलझना” (ये अय्यंगर के ही शब्द हैं) एक गलती थी और संविधान सभा के सदस्यों की बड़ी संख्या का, जिसमें उसके अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद भी शामिल थे, यह मानना था कि जम्मू-कश्मीर के भारत में शामिल होने को “बिना शर्त व पूर्ण” माना जाना चाहिए।

अनुच्छेद 370 का जो अन्तिम रूप 1950 में भारतीय संविधान में शामिल किया गया उसमें न तो संयुक्त राष्ट्र में चल रही प्रक्रिया का ज़िक्र था और न ही जम्मू-कश्मीर की विभाजित व विवादित स्थिति का जहाँ उसका दो बटे पाँचवा हिस्सा पाकिस्तान के कब्ज़े में था यानी उस पर न तो हिन्दुस्तान का और न ही महाराजा का सम्प्रभु नियंत्रण था। इसकी बजाय उसमें सिर्फ जम्मू-कश्मीर के लिए एक संविधान सभा का ज़िक्र किया गया है जो भारत के साथ राज्य के सम्बन्ध को तय करेगी, इस अनुच्छेद के तहत राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए आदेशों को मन्ज़ूरी देगी और साथ ही, इस अनुच्छेद को भविष्य में रद्द करने का फैसला लेगी। (अगले लेख में मैं प्रवेश सन्धि और जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की कानूनी स्थिति के बारे में फिर बात करूँगी)।

संविधान सभा में 1949 में शपथ लेते शेख अब्दुल्लाह। नवंबर 1949 में हिन्दुस्तानी सभा के कार्यकाल के खत्म होने के कुछ ही समय पहले जुलाई 1949 में जम्मू-कश्मीर के प्रतिनिधि मंडल को इसमें शामिल किया गया। इस प्रतिनिधि मंडल की भागीदारी को लेकर तमाम वजहों से विवाद हुए जिसमें से एक वजह यह थी कि यह सब 20 जून 1949 को महाराज हरि सिंह के पद छोड़ने के कुछ ही समय बाद हुआ। (स्रोत: द हिन्दू)

इस तरह, किसी विवाद का ज़िक्र किए बगैर अनुच्छेद 370 यह कहता है कि जम्मू व कश्मीर (भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 और पहली अनुसूची के अंतर्गत) भारतीय संघ की एक बुनियादी इकाई है।  प्रवेश सन्धि की शर्तों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान का कोई भी प्रावधान नहीं लागू होगा सिवाय अनुच्छेद 370 के जिसके बारे में समझ यह थी कि ये प्रवेश सन्धि का ही संवैधानिक रूप है। संविधान के पाठ में लाया गया यह प्रावधान भले ही खुद संविधान के दायरे को सीमित करने के लिए लाया गया हो लेकिन फिर भी इसने दो सम्प्रभु ताकतों – हिन्दुस्तान व जम्मू-कश्मीर के बीच हुए एक कानूनी समझौते को अनिवार्यतः भारतीय संविधानवाद की शक्ति संरचना में घसीट लिया। और ऐसा करते हुए इसने एक ऐसा मूल्यगत खाका बनाया जो आज भी हिन्दुस्तानी मानस में कश्मीर की कानूनी स्थिति की समझ पर हावी है चाहे वह किसी भी राजनीतिक धारा से प्रभावित हो।

अनुच्छेद 370 ने (i) हिन्दुस्तान की कानून बनाने की ताकत  (सिवाय विदेशी मामलों, प्रतिरक्षा व संचार के तीन मामलों के), व (ii) भारतीय संविधान के प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर पर अस्थायी रूप से लागू करने का तरीका और (iii)  इसे आंशिक या पूर्ण रूप से निष्क्रिय बनाने का तरीका भी निर्धारित किया। यह तीनो काम राष्ट्रपति की घोषणाओं या आदेशों (Presidential Declaration or Orders) यानी कार्यकारी निर्णय (executive decree) से किए जा सकते थे। इससे राष्ट्रपति या दूसरे अर्थ में संघीय कार्यपालिका (यानी केन्द्र सरकार) को एक राज्य के ऊपर कानून बनाने और उसका संविधान तय करने की असाधारण ताकत मिल गई भले ही यह अस्थायी रही हो। यह शक्ति के विभाजन (division of power) और संघवाद (federalism) के बुनियादी संवैधानिक उसूलों के खिलाफ़ था।

इस अनुच्छेद में कहा गया था कि:

  • हिन्दुस्तानी संसद के कानून बनाने की ताकत को राष्ट्रपति के आदेश से जम्मू-कश्मीर में लागू किया जा सकता है। प्रवेश सन्धि में दिए तीन निश्चित विषयों के मामले में राष्ट्रपति ऐसा आदेश राज्य सरकार से सलाह करने के बाद पारित कर सकते हैं और बाकी सभी वैधानिक विषयों के मामले में राज्य सरकार की सहमति लेने के बाद वे ऐसा आदेश दे सकते हैं।
  • अनुच्छेद 1 और अनुच्छेद 370 को छोड़ कर भारतीय संविधान के बाकी सभी प्रावधान, और साथ ही उनके अपवाद व संशोधन राष्ट्रपति के आदेश से जम्मू-कश्मीर पर लागू किए जा सकते थे (अनुच्छेद 1 और 370 खुद अनुच्छेद 370 के अंतर्गत ही राज्य में लागू थे, इनके लिए आदेश की ज़रूरत नहीं थी)। इस मामले में भी उन तीन विषयों पर राज्य सरकार से सलाह करना और बाकी विषयों पर उसकी सहमति लेना ज़रूरी था।
  • खुद अनुच्छेद 370को जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा द्वारा सिर्फ राष्ट्रपति के आदेश से पूर्ण या आंशिक तौर पर रद्द किया जा सकता है या बदला जा सकता है।

अनुच्छेद 370 में आगे यह भी कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के अस्तित्व में आने से पहले राज्य सरकार की सहमति से भारतीय संसद के कानून बनाने की ताकत को जितनी बार जम्मू-कश्मीर में इस्तेमाल किया गया है, और भारतीय संविधान के प्रावधानों को जितनी बार जम्मू-कश्मीर में लगाया गया है (यानी, प्रवेश सन्धि में जिन विषयों का ज़िक्र नहीं है उनसे जुड़े राष्ट्रपति के जो आदेश जारी हुए हैं), उनको जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा से मंज़ूरी लेनी होगी, एक बार यह काम करना शुरू कर दे। अनुच्छेद 370 में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के भंग होने की स्थिति में क्या होगा। हो सकता है कि उस समय यह माना गया कि जम्मू-कश्मीर के भावी संविधान में जम्मू-कश्मीर व हिन्दुस्तान के भावी सम्बन्धों (जिसमें इस अनुच्छेद का सम्भावित खात्मा शामिल था) को तय किया जाएगा और इस मामले में भारतीय कार्यपालिका द्वारा किसी तरह के संक्रमणकालीन, असाधारण कार्यकारी ताकत के इस्तेमाल की ज़रूरत नहीं होगी।

प्रेमनाथ कौल मामले में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस अनुच्छेद के ‘अस्थायी’ चरित्र को स्वीकार किया। इस मामले में शेख अब्दुल्लाह के नेतृत्व में अंतरिम प्रशासन द्वारा लाए गए उन दूरगामी भूमि सुधारों को चुनौती दी गई थी जिसे युवराज कर्ण सिंह की घोषणा पर अक्टूबर 1950 में लागू किया गया। अपीलकर्ता एक ज़मींदार था जिसकी ज़मीने ज़ब्त कर ली गई थीं। उसका कहना था कि भूमि सुधारों को लागू करने वाला राजकीय आदेश अवैध था क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 ने सम्प्रभु ताकत के रूप में जम्मू-कश्मीर के लिए कानून बनाने की महाराज की वैधानिक हैसियत को खत्म कर दिया था। कोर्ट ने यह माना कि जम्मू-कश्मीर व भारत के सम्बन्ध का अन्तिम फैसला जम्मू-कश्मीर की विधान सभा लेगी। और जब तक वह ऐसा कोई फैसला लेती है तब तक महाराजा और (उनके मार्फत युवराज) एक सम्प्रभु राजा है जिसके पास 1939 के जम्मू-कश्मीर के संविधान के तहत कानून बनाने की ताकत है। लेकिन संविधान सभा के भंग किए जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने राय बदलते हुए यह माना कि चूँकि जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा ने खुद को 1957 में भंग करने से पहले अनुच्छेद 370 को रद्द करने या बदलने का कोई सुझाव नहीं दिया था और चूँकि उस अनुच्छेद में किसी और निकाय या संस्था को यह इसे बदलने या रद्द करने की शक्ति नहीं दी गई है इसलिए हिन्दुस्तान व कश्मीर के संवैधानिक सम्बन्धों के मामले में यह अनुच्छेद अब स्थायी हो चुका है। कोर्ट के इस नज़रिेए ने हिन्दुस्तान-कश्मीर के सम्प्रभु संवैधानिक सम्बन्धों में भारी बदलाव लाने और उसे पूरी तरह उलटने के लिए संवैधानिक आदेशों के लगातार इस्तेमाल को वैधता दी है। इसकी वजह से केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के कुछ प्रमुख मामलों में, मिसाल के लिए, आपातकाल की घोषणा, या कानून बनाने की केन्द्र की ताकत में जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता बाकी राज्यों से भी सीमित हो गई।

अनुच्छेद 35अ क्या है?

अनुच्छेद 35अ एक विशेष प्रावधान था जो सिर्फ जम्मू-कश्मीर पर लागू था। अनुच्छेद 370 में दी गई संविधान संशोधन की प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हुए इसे 1954 में राष्ट्रपति के आदेश (संवैधानिक (जम्मू-कश्मीर में अनुप्रयोग) आदेश, 1954)  से संविधान में शामिल किया गया था। इस आदेश को अक्सर बुनियादी आदेश (Basic Order) भी कहा जाता है और इस में 35अ के अलावा संविधान के ढेरों दूसरे प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर में लागू किया गया। इसमें नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र, और संविधान के भाग तीन में दिए मौलिक अधिकारों को (कुछ बड़े बदलावों के साथ) जम्मू-कश्मीर में लागू करना शामिल था। जम्मू-कश्मीर और हिन्दुस्तान के बीच के कानूनी सम्बन्ध को स्थापित करने में इस आदेश की बड़ी भूमिका रही। हालाँकि यह माना जाता है कि इसे 1952 के दिल्ली समझौता को कानूनी स्वरूप देने के लिए लागू किया गया, लेकिन यह उस समझौते की शर्तों से कहीं आगे जाता है। यह आदेश 1953 में शेख अब्दुल्लाह की गिरफ्तारी और जम्मू-कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री के पद से हटाए जाने के छह महीने के भीतर पारित किया गया। इसके बाद के जितने भी राष्ट्रपति के आदेश पारित हुए (2019 के आदेशों तक) वे इस बेसिक ऑर्डर में संशोधन की तरह ही पारित किए गए हैं, शायद इसलिए ताकि उनकी संवैधानिक स्थिति को कोई चुनौती न दी जा सके क्योंकि वे सभी 1956 में जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के भंग किए जाने के बाद पारित किए गए और अनुच्छेद 370 के मूल पाठ में ऐसी स्थिति का अनुमान नहीं लगाया गया था। साथ ही, इस अनुच्छेद में राष्ट्रपति के आदेश के संशोधन की कोई प्रक्रिया भी नहीं बनाई गई। 2019 के संवैधानिक आदेश (सी.ओ. 272) के साथ ही बेसिक ऑर्डर और उसके सभी संशोधनों को रद्द कर दिया गया है, और इसके साथ ही अनुच्छेद 35अ में वहाँ के स्थायी निवासियों से जुड़े कानूनी प्रावधान भी पूरी तरह खारिज हो गए हैं।

अनुच्छेद 35अ जम्मू-कश्मीर के ‘स्थायी निवासियों’ को एक किस्म का शुरुआती नागरिकता अधिकार देता था। उसमें लिखा था कि जम्मू-कश्मीर की विधानसभा द्वारा कुछ खास विषयों पर बनाए गए कानूनों को हिन्दुस्तानी संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे दूसरे हिन्दुस्तानी नागरिकों के अधिकारों (मसलन, बराबरी के अधिकार, या मुक्त होकर कहीं भी आने-जाने के अधिकार) पर पाबन्दी लगाते हैं। इस तरह, जम्मू-कश्मीर की विधान सभा के पास कुछ खास विषयों पर कानून बनाने की विशिष्ट ताकत थी और ऐसे कानूनों या नियमों को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। ये विषय निम्नलिखित थे –

(i)    ‘स्थायी निवासी’ की परिभाषा;

(ii)  जम्मू-कश्मीर में अचल सम्पत्ति के स्वामित्व के अधिकार;

(iii) जम्मू-कश्मीर में बसने के अधिकार;

(iv) राज्य सरकार के अधीन रोज़गार का अधिकार;

(v)  तालीम के लिए छात्रवृत्ति और सरकारी अनुदान पाने का अधिकार।

अनुच्छेद 35A और जम्मू-कश्मीर के 1957 के संविधान में स्थायी निवासी की अवधारणा काफी हद तक20वीं सदी के पहले तीन दशकों में डोगरा राजाओं द्वारा जारी आदेशों व नियमों पर आधारित है। ये आदेश तब पारित हुए थे जब वहाँ के लोगों ने अपने नागरिक अधिकारों और पंजाब और दूसरी जगहों से आने वाले विदेशियों से अपनी ज़मीने, तालीम व आजीविका के साधनों की सुरक्षा के लिए संघर्ष किए। 1957 का जम्मू-कश्मीर का संविधान उन हिन्दुस्तानी नागरिकों को राज्य का स्थायी निवासी मानता है जो 14 मई 1954 को राज्य की प्रजा थे, या जो दस साल तक राज्य में रह रहे हों, और “कानूनी रूप से राज्य में अचल सम्पत्ति” हासिल की हो। इस प्रावधान में ‘हिन्दुस्तान के नागरिक’ इसलिए लिखा गया है क्योंकि राज्य का कानून जम्मू-कश्मीर में रहने वाले सभी लोगों पर लागू होता था जिसमें आज़ाद कश्मीर, गिलगिट और बाल्टिस्तान भी शामिल हैं। कश्मीर के संविधान में स्थायी निवासियों से जुड़े और भी कई प्रावधान थे जो संविधान के लागू होने से पहले की सेवा शर्तों और पदों को बरकरार रखते हैं, और जो गैर-स्थायी निवासियों को राज्य की विधानसभा का सदस्य बनने से, या सरकारी नौकरियों में नियुक्ति से रोकते हैं।

राज्य की विधान सभा और कार्यपालिका ने इन दशकों में कई कानून, उप-कानून और आदेश पारित किए हैं जो सम्पत्ति खरीदने, बेचने और सम्पत्ति पर स्वामित्व बनाने के स्थायी नागरिकों के विशिष्ट अधिकारों को सुरक्षित करते हैं; और जो अस्थायी नागरिकों के हाथ में ज़मीन जाने पर रोक लगाते हैं; और जो सरकारी नौकरियों, स्वास्थ्य सेवाओं, उच्च शिक्षा, राज्य द्वारा भरपाई पाने की योजनाओं, वोट देने और चुनाव में खड़े होने के मामलों से जुड़े हुए हैं। जम्मू-कश्मीर की विधानसभा के पास यह अधिकार है कि वह स्थायी निवासी की परिभाषा या उनको मिले विशेषाधिकारों को दो-तिहाई बहुमत से पारित कानून से बदल दे।  अनुच्छेद 35अ में और 1957 के जम्मू-कश्मीर के संविधान में स्थायी निवासियों के लिंग का कोई ज़िक्र नहीं किया गया है और न ही इस बात का कि वहाँ की स्थाई निवासी महिलाएँ अगर किसी अस्थायी निवासी से शादी कर लेती हैं तो वे कानूनी तौर पर किन्हीं विशेषाधिकारों से वंचित हो जाएँगी। हालाँकि अनुच्छेद 35A को हटाने के पीछे यह भी एक बड़ी वजह के तौर पर दिखाया गया है और सर्वोच्च न्यायालय में इसी आधार पर उसे चुनौती भी दी गई थी। इन संशोधनों के समर्थकों ने ‘बराबरी’ का जो तर्क दिया है उस पर और लैंगिक व जातिगत भेदभावों के बारे में मैं इस शृंखला के तीसरे लेख में बात करूँगी। फिलहाल इतना कहना काफी है कि इन तमाम कानूनों को अनुच्छेद 35A से जो संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई थी वह इसके रद्द हो जाने से खत्म हो गई है।

1948 में नेहरू ने अमन कायम करने के लिए कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र के सामने रखा। उनको उम्मीद थी कि संयुक्त राष्ट्र विलय को कानूनी व अंतिम मान कर हिन्दुस्तान का पक्ष लेगा, पाकिस्तानी नियंत्रण के इलाके को वापस हिन्दुस्तान के हवाले करवाएगा और पाकिस्तानी “हमले” की आलोचना करेगा। लेकिन 1948 के मध्य तक भारत-पाकिस्तान के मसले पर संयुक्त राष्ट्र आयोग के बनने तक यह साफ हो गया कि संयुक्त राष्ट्र एक तरह का बीच-बचाव करना चाहता है जिसमें किसी तीसरे पक्ष द्वारा आयोजित रायशुमारी भी शामिल थी। इसके अलावा, शेख अब्दुल्लाह की आपातकालीन सरकार को समूचे इलाके की एकमात्र वैध सत्ता मान कर वह हिन्दुस्तान का पक्ष लेने को भी तैयार नहीं दिख रहा था। इन कार्टूनों की पहली कड़ी “UNO-pathic treatment” (“संरा-वेदना”?), जो ‘शंकर्स वीकली’ में प्रकाशित हुई थी (11 जुलाई 1948), में दिखाया गया है कि परेशान हिन्दुस्तान अपने बच्चे कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र के पास ले गया है, लेकिन डॉक्टर बच्चे की बजाय उसे ही जबरन दवा खिला रहा है। दूसरे कार्टून ‘परछाई को पकड़ना’ में (25 जुलाई 1948) में कश्मीर कोई बच्चा नहीं बल्कि बेकाबू बैल है जिसको संयुक्त राष्ट्र आयोग के लोग काबू में करने की कोशिश कर रहे हैं और हताश नेहरू देख रहे हैं। इसमें टोपी पहने शख्स संभवतः चेस्टर निमिट्ज़ हैं जो पूर्व अमरीकी कमांडर थे और जिनको संयुक्त राष्ट्र ने रायशुमारी के प्रशासक के तौर पर नियुक्त किया था।

औचक हमला

चूँकि अनुच्छेद 370 से जुड़ी प्रक्रियागत सुरक्षाओं के चलते इसे सीधे-सीधे संशोधित करना या रद्द करना खासा मुश्किल था इसलिए हिन्दुस्तान की सरकार ने अपने मकसद को हासिल करने के लिए तीन चरणों का एक घुमावदार रास्ता अपनाया। कुछ संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह ‘पिछले दरवाज़े’ का इस्तेमाल करने की बजाय संसद को अनुच्छेद 368 में दी गई संशोधन की सामान्य प्रक्रिया को अपनाना चाहिए था। लेकिन इस तरह नज़रिए में इस तथ्य को ध्यान में नहीं रखा गया कि 1954 के बेसिक ऑर्डर में यह प्रावधान था कि हिन्दुस्तानी संविधान में हुए संवैधानिक संशोधन जम्मू-कश्मीर में तब तक नहीं लागू होंगे जब तक कि राष्ट्रपति के आदेश से ऐसा नहीं किया जाए। अनुच्छेद 370 को सीधे-सीधे पूरी तरह खारिज कर देना कानूनी तौर पर उतना सही नहीं होता क्योंकि सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसकी बुनियाद पर ही जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ से जुड़ा हुआ है। इस सम्बन्ध के लिए नई बुनियाद बनाए बिना इसे पूरी तरह रद्द कर देने का मतलब होगा इस सम्बन्ध को ही रद्द कर देना। यही वजह है कि अनुच्छेद का नया पाठ इसमें दी गई सुरक्षाओं व प्रक्रियाओं को खत्म करता है और हिन्दुस्तान के संविधान को जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह लागू कर देता है।

पहला कदम

केन्द्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को सीओ 272 पारित करने के लिए अनुच्छेद 370(1)(d) का इस्तेमाल किया जो संविधान संशोधन/क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रपति के आदेश से जुड़ा हुआ है। चूँकि जम्मू-कश्मीर पर उस समय राष्ट्रपति शासन लागू था इसलिए यह मान लिया गया कि अनुच्छेद 370 में राज्य सरकार की सहमति की जो शर्त है उसके लिए राज्यपाल की सहमति लेना काफी है। संविधान के प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर में लागू करने के लिए पहले भी कई बार ऐसा किया जा चुका है। इसकी सबसे ताज़ा मिसाल है मार्च 2019 की जब सीमा के पास रहने वाले निवासियों के लिए सरकारी पदों में आरक्षण देने से जुड़ा एक अध्यादेश लागू करने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया। यह सी.ओ. ये तीन काम करता है,

  • ये 1954 के संवैधानिक आदेश (बेसिक ऑर्डर) और उसके सभी संशोधनों को रद्द कर देता है;
  • ये हिन्दुस्तानी संविधान के सभी प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर पर लागू कर देता है;
  • ये अनुच्छेद 367 को भी संशोधित करता है। यह व्याख्या से जुड़ा प्रावधान है जो अर्थों को लेकर किसी दुविधा को सुलझाने में मदद करता है। इसमें नया जोड़ा गया 367(4) दो बाते कहता है:

(क) जहाँ तक जम्मू-कश्मीर का मामला है “यह संविधान” का मतलब होगा “यह संविधान जैसा कि जम्मू-कश्मीर में लागू किया गया है”।

(ख) “सदर-ए-रियासत” (जम्मू-कश्मीर के संविधान के तहत अप्रत्यक्ष तौर पर चुना गया संवैधानिक मुखिया जिसे हिन्दुस्तानी संविधान में भी मान्यता दी गई थी) का मतलब होगा राज्यपाल और सरकार का उल्लेख होने पर मतलब होगा मंत्रीमंडल की सलाह पर काम कर रहा राज्यपाल। यह सब 1965 के संवैधानिक आदेश में बदला गया था लेकिन चूँकि बेसिक ऑर्डर और उसके सभी संशोधनों को रद्द कर दिया गया है इसलिए अनुच्छेद का पाठ अपने मूल स्वरूप में चला गया है।

(ग) सबसे बड़ी बात यह है कि अनुच्छेद 370(3), जो अनुच्छेद 370 के प्रभाव के खात्मे से जुड़ा हुआ है, उसमें “संविधान सभा” का मतलब होगा “राज्य की विधान सभा”।

दूसरा कदम

इसके बाद केन्द्र सरकार ने अनुच्छेद  370 को खत्म करने के लिए 370(3) में दिए गए “संविधान सभा” के नए अर्थ का इस्तेमाल किया एक वैधानिक संसदीय प्रस्ताव पारित करने के लिए। इस प्रस्ताव में राष्ट्रपति को एक सार्वजनिक अधिसूचना जारी की सलाह दी गई जिसमें तत्कालीन अनुच्छेद 370 के पाठ को बदल कर उसमें नया पाठ जोड़ा गया जिसके अनुसार हिन्दुस्तानी संविधान जम्मू-कश्मीर पर पूरी तरह लागू होगा और कोई भी “कानून, दस्तावेज़, कोर्ट के फैसले, अध्यादेश, आदेश, उप-नियम, नियम, अधिनियम, अधिसूचना, परम्परा/रिवाज या व्यवहार […] या कोई कानूनी प्रपत्र, सन्धि या समझौता” इसमें रुकावट नहीं बनेगा। इस तरह अनुच्छेद 370 को व्यवहारिक तौर पर पूरी तरह से खत्म ही कर दिया गया। राज्य सभा में अपने भाषण में गृह मंत्री अमित शाह ने समझाया कि चूँकि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 356 (संवैधानिक आदेशों के तहत संशोधित रूप में जम्मू-कश्मीर में लागू) के तहत राष्ट्रपति शासन लागू है इसलिए राज्य की विधानसभा की सभी शक्तियाँ इस समय संसद के पास हैं। इसके मद्देनज़र और चूँकि (सी.ओ. 272) के ज़रिए संविधान सभा की जगह राज्य विधानसभा ने ले ली है इसलिए केन्द्रीय संसद ऐसा प्रस्ताव पारित कर सकती है।

इस वैधानिक प्रस्ताव के साथ-साथ गृह मंत्री ने जम्मू-कश्मीर (पुनर्गठन) बिल, 2019 भी संसद में पेश किया जिसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया गया। इसके तहत 31 अक्टूबर 2019 से जम्मू-कश्मीर के पास विधान सभा होगी मगर लद्दाख के पास नहीं। पहले की स्थिति में यह कानून बेसिक ऑर्डर के खिलाफ़ जाता जो जम्मू-कश्मीर में हिन्दुस्तानी संविधान के अनुच्छेद 3 के क्रियानवयन को प्रतिबंधित करता था और इस तरह उसकी क्षेत्रीय अखंडता को बरकरार रखे हुए था। गौरतलब है कि अनुच्छेद 3 केन्द्र सरकार को किसी भी राज्य की सीमा को बदलने की ताकत देता है।

इसके अलावा गृह मंत्री ने जम्मू-कश्मीर आरक्षण (दूसरा संशोधन) बिल 2019 भी पेश किया जो जम्मू-कश्मीर आरक्षण कानून 2004 को संशोधित करके सीमा से लगे इलाकों के निवासियों को आरक्षण देता है। इस बाबत इसी साल मार्च में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने एक अध्यादेश पारित किया था। दोनो बिल संसद में निर्विरोध पारित हो गए।

दो झंडे

तीसरा चरण

इसके बाद केन्द्र सरकार ने 6 अगस्त 2019 को एक और संवैधानिक आदेश पारित किया (सी.ओ. 273), जो असल में एक सार्वजनिक अधिसूचना थी जो संसदीय प्रस्ताव में पारित बदलावों को औपचारिक रूप से लागू करती है। इसके साथ ही वह मूल अनुच्छेद 370 और बेसिक ऑर्डर के क्रियान्वयन को प्रतिबन्धित करती है। इसमें यह आदेश दिया गया कि अब जम्मू-कश्मीर हिन्दुस्तानी संविधान के प्रावधानों के अनुसार शासित होगा और किसी कानून, सन्धि या कानूनी उपकरण या दस्तावेज़ से इसमें कोई रुकावट नहीं आएगी। और इस तरह इस काम को अन्जाम दिया गया।

मौजूदा हालत

हिन्दुस्तान-कश्मीर के बीच के संवैधानिक सम्बन्धों में किए गए इस उलटफेर के क्या नतीजे होंगे इसका पता तो आने वाले दिनों में चलेगा, जैसे-जैसे कानून के अनजान मोड़ सामने आएँगे। मिसाल के लिए, हालाँकि इन बदलावों से वहाँ के मौजूदा कानूनों और1957 के संविधान को रद्द करने, या कोर्ट में इस आधार पर चुनौती देने के रास्ते खुल गए हैं कि ये हिन्दुस्तानी संविधान के प्रावधानों के खिलाफ़ हैं, लेकिन जब तक कि इनको विधान सभा सीधे तौर पर खारिज न करे और इनकी जगह दूसरे कानून न लाए या कोर्ट इनको रद्द न कर दे तब तक ये लागू रहेंगे। जैसा कि कारवाँ  पत्रिका में बताया गया अभी हाल तक वहाँ के राज्य सचिवालय पर दो झन्डे फहरा रहे थे। कश्मीर हाई कोर्ट ने 2015 के अपने एक फैसले में इसे कानूनी रूप से सही ठहराया था और यह फैसला अभी भी एक कानून है। इस तरह भले ही दो झंडों के अस्तित्व से हंगामा बरपा हुआ था और कश्मीर के झंडे को झुकाने की कवायद को टीवी पर बड़े ज़ोर-शोर से दिखाया गया लेकिन झंडा हटाने की कार्यवाही का कोई कानूनी आधार नहीं है। जम्मू-कश्मीर का संविधान, जो झंडे को मान्यता देता है (धारा 144), वह चाहे इन संवैधानिक बदलावों से बेमानी हो गया हो लेकिन वह अभी भी एक कानून है जब तक कि उसे औपचारिक तौर पर आंशिक या पूर्ण रूप से कोर्ट या संसद द्वारा खारिज न कर दिया जाए। नए अनुच्छेद 370 के आधार पर संसद या कोर्ट इस तरह की विधाई शक्ति का इस्तेमाल कर सकती है या नहीं, वह भी तब जबकि जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा भंग हो चुकी है, इस पर बड़ा संवैधानिक सवाल है और इस तरह की कार्यवाही को चुनौती दी जा सकती है।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि कुछ बदला ही नहीं है। जम्मू-कश्मीर (पुनर्गठन) कानून की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत 106 केन्द्रीय कानून दो नवगठित केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू होंगे। राज्य की विधानसभा व राज्यपाल द्वारा पारित कुल 330 कानूनों में 164 लागू रहेंगे जबकि 166 को हटा दिया जाएगा। सात कानूनों में संशोधन किया जाएगा (ये प्रमुख रूप से ज़मीन से जुड़े कानून हैं)। 1957 का जम्मू-कश्मीर का संविधान निरस्त नहीं किया गया है और ये अब भी वैध कानून है। नई व्यवस्था में पुलिस और कानून-व्यवस्था केन्द्र का विषय होगा। जम्मू-कश्मीर सशस्त्र सैन्य बल विशेषाधिकार कानून 1990 (Jammu & Kashmir Armed Forces Special Powers Act) और सार्वजनिक सुरक्षा कानून 1978 (Public Safety Act) उन कानूनों की अनुसूची में शामिल किए गए हैं जो अब भी लागू हैं। इसके अलावा, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून 1980 भी अब जम्मू-कश्मीर में लागू होगा। इस तरह राज्य की ताकत को बढ़ाने वाले निवारक कानूनों में और इजाफा ही होगा। सम्पत्ति के लेन-देन का कानून (जम्मू-कश्मीर ट्रान्सफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट 1920) और ज़मीन की खरीद-बिक्री का कानून (जम्मू-कश्मीर लैंड एलिएनेशन एक्ट 1930) को हटा दिया गया है। जम्मू-कश्मीर लैंड ग्रान्ट्स एक्ट 1960 के तहत राज्य की ज़मीनों को गैर-निवासी लोगों को देने पर लगी रोक को खत्म कर दिया गया है। इसी तरह, जम्मू-कश्मीर बिग लैंडेड एस्टेट्स एबॉलिशन एक्ट 2007 के तहत निजी ज़मीनों को गैर-निवासियों को देने पर लगी रोक को भी हटा दिया गया है। जम्मू-कश्मीर भूमि अधिग्रहण कानून को हटा कर उसकी जगह केन्द्रीय भूमि अधिग्रहण कानून लागू कर दिया है। जम्मू-कश्मीर की 2004 की औद्योगिक नीति के तहत पहले ही औद्योगिक सम्पत्ति को 90 साल के लिए लीज़ पर देने का प्रावधान था। नए बदलावों से निजी व सार्वजनिक निकाय ज़मीन पर मालिकान हक बना सकेंगे। अब केन्द्रीय शत्रु सम्पत्ति कानून 1968 भी यहाँ लागू होगा जिससे जम्मू-कश्मीर कस्टोडियन ऑफ़ प्रॉपर्टीज़ (सम्पत्ति का संरक्षण करने वाला निकाय) के पास जो ज़मीनें हैं इनकी बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त होगी। यह ज़मीनें उन लोगों की हैं जो कश्मीर के अधूरे और अंतहीन विभाजन से विस्थापित हुए हैं और इस नए कदम के चलते इन लोगों की वापसी के सभी रास्ते भी बन्द हो जाएँगे। स्थानीय निकाय (पंचायत वगैरह) के चुनाव, जो पहले से ही विद्रोह के खिलाफ़ हिन्दुस्तान के युद्ध के केन्द्र में स्थित सैन्यीकृत शासन व विकास की “जन-केन्द्रित” नीतियों के प्रमुख औजार रहे हैं उनका और भी ज़्यादा इस्तेमाल इस तरह की नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए किया जाएगा। इन सबके चलते ज़मीन के मालिकाने और इस्तेमाल, आबादी के स्वरूप और साथ ही लोगों पर निगरानी व नियंत्रण के तन्त्र के चरित्र, उसके ढाँचे और गहनता में भारी बदलाव होने के आसार हैं।

जैसा कि अक्सर कहा जाता है, यह सही है कि अनुच्छेद 370 जिस विधायी स्वायत्तता की संवैधानिक गारंटी देता था उसे धीरे-धीरे लगभग खोखला ही कर दिया गया था। 1957 का जम्मू-कश्मीर का संविधान, जो भारतीय राज्य के अनुसार कश्मीरी अवाम के लोकप्रिय मत का जीवंत स्वरूप है और जिसके चलते वहाँ रायशुमारी की ज़रूरत ही नहीं रही, वह संविधान एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसमें अधिकारों का कोई ज़िक्र ही नहीं है। यह संविधान एक ऐसी संविधान सभा ने बनाया था जिसके चुनावों में धांधली हुई थी, जिसकी वैधता पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने सवाल खड़ा किया था, जिसके नेता शेख अब्दुल्लाह को संविधान का मसौदा बनाने के बीच में ही उनके पद से हटा कर जेल में डाल दिया गया था। इस संविधान में हिन्दुस्तानी न्यायपालिका, विधायिका व कार्यपालिका के अतिक्रमण से बचाने के लिए दिए गए सुरक्षा के उपायों को अक्सर राजनीतिक तख्तापलट के बीच में पारित राष्ट्रपति के आदेशों, संविधान संशोधनों और कोर्ट के फैसलों से धीरे-धीरे खत्म कर दिया गया था।  वहाँ के स्थायी निवासियों को दिए गए अधिकारों व सुरक्षा को छोड़ कर यह अधिकारों के नाम पर जम्मू-कश्मीर के लोगों को बमुश्किल ही कुछ देता है। यहाँ तक की शेख अब्दुल्लाह के ‘नया कश्मीर मेनिफेस्टो’ (नए कश्मीर का घोषणापत्र) में लैंगिक बराबरी, काम और तालीम के अधिकार के जो क्रान्तिकारी आदर्श हैं उनको भी राज्य के नीति निर्देशक तत्वों की श्रेणी में डाल दिया गया है जिनको लागू कराने के लिए कोर्ट के दरवाज़े नहीं खटखटाए जा सकते हैं।

इसकी बजाय जम्मू-कश्मीर के संविधान की प्रस्तावना और धारा 3 में लिखा है कि जम्मू-कश्मीर हिन्दुस्तान का अभिन्न हिस्सा है और हमेशा रहेगा। इसमें इसके क्षेत्र में उन सभी इलाकों को शामिल किया गया है जो 15 अगस्त 1947 महाराजा की सम्प्रभुता या शासन के अंतर्गत थे। इस तरह इस समस्या से कन्नी काट ली गई है कि अक्टूबर 1947 में प्रवेश सन्धि पर दस्तखत करते समय महाराजा का अपने राज्य के समूचे इलाके पर नियंत्रण नहीं था। और साथ ही इसमें हिन्दुस्तान के साथ अनंत काल के एकीकरण की बात की गई है जो न तो प्रवेश सन्धि में है और न ही हिन्दुस्तानी संविधान में। हिन्दुस्तान के तमाम केन्द्रीय कानूनों को जम्मू-कश्मीर में लागू करने वाले विभिन्न कानूनों के अंतर्गत सीबीआई और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) जैसी केन्द्रीय एजेंसियों को जम्मू-कश्मीर में काम करने की छूट दी गई है। इसके अलावा, सूचना के अधिकार, आरक्षण, बाल यौन शोषण के रोकथाम जैसे विषयों पर केन्द्र से मिलते-जुलते कानून ही वहाँ की विधान सभा ने बनाए हैं जिसके चलते जम्मू-कश्मीर और बाकी राज्यों के कानूनी ताने-बाने में बहुत कम अंतर है। अंतर सिर्फ वहाँ है जहाँ पुलिस व सशस्त्र बलों द्वारा बेलगाम ताकत के इस्तेमाल से जुड़े खास कानूनों का सवाल आता है।

अनुच्छेद 370 समाप्त किए जाने के बाद जश्न

इतनी चोटों के बावजूद अनुच्छेद 370 और 35A की वजह से इतनी जगह तो बन ही गई थी कि उच्च शिक्षा, प्रशासनिक सेवाओं, बिजली कानूनों, कृषि सम्पत्ति, विस्थापितों की सम्पत्ति, ज़मीन का लगान, बँटाई, सरकारी योजनाओं, अनुकम्पा नियुक्तियों, विद्रोही गतिविधियों से जुड़ी मौतों वगैरह के मामलों में तमाम तरह के कानून, उप-कानून और नियम बनाए गए थे। विधाई या न्यायिक प्रक्रिया से इनको रद्द करने और इनकी जगह नए कानून लाने का काम आसान नहीं होगा बल्कि हो सकता है इसमें सालों लग जाए। और अगर वाकई ऐसा होता है तो उस समय तक जम्मू-कश्मीर का प्रशासन उन्हीं संवैधानिक प्रावधानों और कानूनों से चलेगा जो नई व्यवस्था में सीधे-सीधे असंवैधानिक हैं। पिछले सालों में राज्य की न्यायपालिका ने कश्मीर में हिन्दुस्तानी फौजों की ज़्यादतियों की अनदेखी करके उनके मनमानेपन को सामान्य बनाने का काम किया है लेकिन जहाँ तक राज्य के संविधान और स्थायी निवास के अधिकारों की सुरक्षा का सवाल है इसमें वहाँ की न्यायपालिका ने कड़ा रुख अपनाया है। मिसाल के लिए, वहाँ के उच्च न्यायालय ने यह माना कि हिन्दुस्तानी संविधान के वे संशोधन जो जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक ढाँचों को बिना उसकी सहमति के एकतरफा बदलते हैं वे अवैध हैं। कोर्ट ने कहा कि जहाँ तक स्थायी निवासियों के सम्पत्ति के अधिकार का सवाल है जम्मू-कश्मीर का संविधान इस मामले में एक तरह की सम्प्रभु सुरक्षा प्रदान करता है। अब जो बदलाव हुए हैं उनसे कुछ अभूतपूर्व और असम्भव किस्म की कानूनी उलझने, असंगतियाँ, व कानूनी टकराव पैदा होने के आसार हैं। खासतौर से इसलिए कि जम्मू-कश्मीर के संविधान में उसका जो क्षेत्र है वह अब दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बँट चुका है – एक के पास विधानसभा होगी जबकि दूसरे के पास नहीं। दोनों के ऊपर केन्द्र का सीधा शासन होगा, लेकिन दोनों के पास अपना (एकीकृत) संविधान भी होगा।

सच तो यह है कि ज़मीन के मालिकाने और रोज़गार सुरक्षा से जुड़े नियमों-कानूनों के ढाँचे को, या दूसरे शब्दों में जम्मू-कश्मीर के संविधान और अनुच्छेद 35अ में जिन अधिकारों की गारंटी दी गई थी उनको खत्म करने की निरर्थकता खुद इस सरकार को भी तेजी से समझ में आ रही है। एक वरिष्ठ हिन्दुस्तानी अधिकारी ने हाल ही में कहा कि जम्मू-कश्मीर की चुनी हुई सरकार वहाँ की भूमि नीति पर फैसला करेगी। जम्मू-कश्मीर में भाजपा नेता निर्मल सिंह ने कह ही दिया है कि पार्टी रोज़गार के अधिकार के मामले में निवासियों को सुरक्षा देने की माँग उठाएगी। दूसरे लफ्ज़ों में, यह सही है भारी संवैधानिक उथल-पुथल हुआ है जो आज की तारीख में लगता है कि अब उलटा नहीं जा सकता लेकिन जहाँ तक रोज़मर्रा के दायरे की बात है तो जम्मू-कश्मीर पर फतह न तो पूर्ण है और न ही वैसी अविवादित जैसा कि लड्डू बाँटने वाली पब्लिक सोचती है।


www.raiot.com पर प्रकाशित 3 लेखों की इस श्रृंखला में अधिवक्ता और शोधकर्ता श्रीमोई नन्दिनी घोष कश्मीर के वैधिक इतिहास और कानूनी संदर्भ पर विस्तार से चर्चा करेंगी।  यह इस शृंखला का पहला भाग है (http://www.raiot.in/dismantling-370-in-kashmir-part-1/) । इसका अनुवाद कश्मीर ख़बर (https://www.facebook.com/kashmirkhabar1/)  के लिए लोकेश मालती प्रकाश ने किया है

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