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FRA के खिलाफ याचिका लगाने वाले कथित पर्यावरणविदों ने क्‍या SC को गुमराह किया है?

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सत्यम श्रीवास्तव

13 फरवरी 2019 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने वन अधिकार कानून 2006 को चुनौती देने 2008 में दायर की गयी एक याचिका (याचिका क्रमांक 109) और विभिन्न उच्च न्यायालयों में दायर की गयी याचिकाओं में एकतरफा आदेश जारी किया है। यह याचिकाएं मुख्य रूप से वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया मार्फत प्रवीण भार्गव (बैंगलुरु, कर्नाटक), नेचर कंजर्वेशन सोसायटी मार्फत किशोर रीठे (अमरावती, महाराष्ट्र), टाइगर रिसर्च कंजर्वेशन ट्रस्ट कंसर्वेशन मार्फत हर्षवर्धन धानवाटे, नागपुर (महाराष्ट्र) ने लगाईं थीं। वन अधिकार कानून पारित होने के साथ ही नेचर, कंजर्वेशन, टाइगर और जमींदारी बचाने के लिए मुखर इन संगठनों ने इस कानून की मुखालफ़त की थी। इन मुख्य याचिकाकर्ताओं के अलावा कुछ अवकाश प्राप्‍त वन अधिकारी व पूर्व जमींदार भी इस मामले में हस्तक्षेप करते रहे हैं। इन सभी का एक ही उद्देश्य रहा है कि जो कानून भारत की संसद ने ब्रिटिश काल से चले रहे ‘ऐतिहासिक अन्यायों’ को दुरुस्त करने और देश के जंगलो में सदियों से बसे आदिवासी व परंपरागत गैर आदिवासी समुदायों के अधिकारों को मान्यता देकर उन्हें गरिमामय जीवन जीने की संवैधानिक प्रतिबद्धता को निभाने के लिए लाया था उस कानून को कमजोर या खत्म किया जाये क्योंकि वह कानून इनकी नज़र में वन्य जीवों और पर्यावरण को नष्ट करने में योगदान देगा और इससे देश की पारिस्थितिकी को गंभीर क्षति होगी।

आदेश की मुख्य बातें क्या हैं?

  • राज्य सरकारों के मुख्य सचिव यह सुनिश्चित करेंगे कि जहां दावे खारिज/निरस्त किए जाने के आदेश किए जा चुके हैं उन दावेदारों को जंगल से बेदखल किए जाने की कार्यवाही इस मामले की अगली सुनवाई तक पूरी हो जाना चाहिए (अगली सुनवाई 27 जुलाई 2019 को तय है)। अगर बेदखली की कार्यवाही, जैसा कि आदेश में कहा गया है, पूरी नहीं होती है तो यह अदालत इसे गंभीरता से लेगी।  
  • यह निर्देशित किया जाता है कि जहां सत्यापन/पुनर्सत्यापन/ समीक्षा की प्रक्रिया लंबित है, वहाँ संबंधित राज्य सरकार आज से चार महीनों के अंदर आवश्‍यक कदम उठाएगी और उसकी रिपोर्ट इस अदालत को सौंपेगी।
  • फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया को एक उपग्रहीय सर्वे करने का आदेश दिया गया ताकि अतिक्रमण की और स्थितियों को रिकॉर्ड किया जा सके तथा बेदखली के बाद की स्थिति के बारे में भी बताने दिया जाये,जहां तक संभव हो।
  • आवश्यक हलफनामे 12 जुलाई 2019 तक जमा कर दिए जाएं क्‍योंकि मामले की अगली सुनवाई 24.07.2019 को होगी।  

गुरुवार को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में इन याचिकाकर्ताओं में से एक प्रवीण भार्गव ने सभी की तरफ से लिखा है कि ‘उनके उद्देश्यों और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए और वो परिप्रेक्ष्य यह है कि इस कानून के मुताबिक तय सीमा 13 दिसंबर 2005 के बाद कई अपात्र लोगों ने जंगल की ज़मीन पर अपने अधिकार हासिल करने के लिए जबरन कब्जा किया है और जो दावे विभिन्न राज्य सरकारों ने खारिज किए हैं वह इसी श्रेणी के हैं, अत: इन फर्जी दावेदारों को जंगल से बेदखल किया जाना न्यायोचित है।’

याचिकाकर्ताओं की ओर से जारी इस प्रेस विज्ञप्ति में प्रवीण भार्गव ने यह भी बताने की कोशिश की है कि वे केवल फर्जी दावेदारों के खिलाफ हैं और कानून के क्रियान्वयन में उचित पात्रों के खिलाफ नहीं गए हैं लेकिन हकीकत यह है कि याचिकार्ताओं की मंशा और इन संस्थाओं के आचरण शुरू से वंचितों के खिलाफ रहे हैं।  जंगल और आदिवासियों से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे जन संगठनों, पेशेवरों, अकादमिक जगत के लोगों की जानकारी के मुताबिक कभी भी इनके द्वारा वन भूमि के गैर-वन्‍य उपयोगों मसलन खनन, टूरिज़म, या विकास परियोजनाओं से नष्ट होने वाली पारिस्थितिकी की मुखालफ़त का रिकॉर्ड नहीं रहा है।

इस आदेश का तीसरा बिन्दु इसी परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है, हालांकि ज़मीन पर इस कानून के क्रियान्वयन में सक्रियता से काम कर रहे जन संगठनों ने  इस पर गंभीर आपत्ति की है। प्रतिष्‍ठा के साथ जीने के अधिकार अभियान (केंपेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी) ने अपने जारी किए वक्तव्य में कहा है कि “तथ्यात्मक रूप से कई आधिकारिक और स्वतंत्र रिपोर्ट्स में यह माना गया है कि बड़े पैमाने पर दावों को गलत ढंग से अमान्य/खारिज किया गया है और वन विभाग के अधिकारियों की  विशेष रूप से जो भूमिका रही है वो लोगों के हक़-अधिकारों को मान्यता न दिये जाने की दिशा में ही रही है।” केंद्र व राज्य सरकारों दोनों ने कई बार यह माना भी है लेकिन केंद्र सरकार ने कोर्ट के संज्ञान में इस बुनियादी तथ्य को नहीं रखने का चयन किया। इस कानून में जिन दावेदारों  के दावे खारिज हुए हैं उनकी बेदखली को लेकर कोई प्रावधान भी नहीं है बल्कि इसी कानून के अनुच्छेद 4(5) में बेदखली को तब तक के लिए विशेष रूप से रोका गया है जब तक पूरे क्षेत्र में इस कानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो जाती।  यह आदेश वन अधिकारियों को एक ऐसा हथियार मुहैया करा सकता है जिससे वो देश भर में लाखों की तादाद में जंगलों में रह रहे लोगों पर हमला कर सकते हैं।

खैर, इस आदेश ने एक बार फिर जंगल, जंगल की ज़मीन और जंगल में मौजूद संसाधनों पर नैसर्गिक दावेदारी और पारिस्थितिकी , पर्यावरण, जैव विविधता संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण व मानव समुदाय के नैसर्गिक और अन्योन्याश्रित संबंधों को लेकर एक देशव्यापी बहस तो छेड़ ही दी है। यह ठीक 2002-04 के दौरान की स्थिति की पुनरावृत्ति है जब इसी सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार वन भूमि को परिभाषित किया था और जिस वजह से देश का बड़ा भू-भाग रातों-रात जंगल में तब्दील हो गया था और स्वाभाविक रूप से वह देश के सबसे बड़े जमींदार यानी वन-विभाग की मिल्कियत बन गया था। इसी सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार देश में सबसे पुराने समुदाय, जो सदियों से एक खास भू-भाग में रहते आए थे, अतिक्रमणकारी मान लिए गए थे और जिन्हें तत्काल प्रभाव से जंगलों से बेदखल करने की मुहिम तमाम राज्यों के वन विभागों ने पूरी सक्रियता से चलाई थी।

यहाँ यह याद दिलाना ज़रूरी है कि उस समय भी केंद्र में एनडीए की सरकार थी और सर्वोच्च न्यायालय ने ठीक ऐसी ही भूमिका अपनायी थी। यह ‘इत्तेफाक़’ से कहीं ज़्यादा ‘राजनीति’ का मामला है कि ऐसा क्या हो जाता है कि आदिवासियों  और वंचितों के विरोध में जब केंद्र में सरकार बनती है तब न्याय के सबसे बड़े प्रतिष्ठान भी ठीक वंचित-विरोधी रवैये का मुजाहिरा करते हैं?

जंगल और उससे जुड़े मुद्दे बिलकुल जंगल जैसे ही पुराने हैं और विविध हैं। इसलिए जब ‘ऐतिहासिक अन्याय’ को दुरुस्त करने के लिए देश की सर्वोच्च संस्था संसद एक प्रगतिशील कानून बनाती है तो वह भी केवल ऐतिहासिक रूप से हुए अन्यायों का हवाला देकर आगे बढ़ जाती है उनका विस्तार से ज़िक्र नहीं करती और उन अन्यायों के लिए किसी संस्था की जवाबदेही तय नहीं करती। हालांकि संसद द्वारा 2006 में इस अन्याय को रिकार्ड में लाना भी सभ्यतागत रूप से बहुत ही जनतांत्रिक और प्रगतिशील कदम रहा है।

न्‍यायाधीश अरुण मिश्रा, नवीन सिन्‍हा और इंद्राणी बनर्जी द्वारा दिया गया यह आदेश न्याय के बुनियादी सिद्धान्त यानी प्राकृतिक न्याय, मानव अधिकारों और संविधान प्रदत्त मानवीय गरिमा के साथ जीने के मौलिक अधिकार से ऊपर देश में मौजूद कॉरपोरेट हितों, वन विभाग की निरंकुश/अबाध जमींदारी , टूरिस्ट व होटेलिंग व्यवसाय, खनन कंपनियों और कॉरपोरेट की घोषित चाकर भाजपा के बीच की दुरभिसंधि का एक बेमिसाल नमूना है। यह आदेश जिन याचिकाओं पर दिया गया और जिन दुराग्रहों पर लाखों लोगों को पुन: अतिक्रमणकरी करार दिया गया और उन्हें कभी भी ‘बेदखली’ के अंतहीन भंवर में उलझा दिया गया है, वे तर्क अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंजर्वेशन, नेचर, बायो-डायवर्सिटी, वन्य-जीव संरक्षण से जुड़े हल्कों में बेमानी तर्क माने जाते हैं।

इन याचिका कर्ताओं और प्रतिष्‍ठा से जीने के अधिकार नामक अभियान के बीच एक पत्राचार हुआ था जो संरक्षण की इनकी अवधारणा और मान्यताओं पर प्रकाश डालता है। इसमें इनका तर्क है कि ‘मनुष्य और वन्य जीवों के बीच नैसर्गिक और अन्योन्याश्रित संबंध एक मिथ है और यह वायवीय संकल्पना है। अगर ऐसा होता तो सदियों पहले ही घोड़ों, गधों और कुत्तों की तरह अन्य वन्य जीवों को भी पालतू बनाया जा सकता था’। गौरतलब है कि भारत के इन तथाकथित पर्यावरणवादियों की आलोचना भारत के शीर्ष पर्यावरणविदों व वैज्ञानिकों ने की है। ग्लोबल फॉरेस्ट कोलीशन ने दो दिन पहले ही भारत के पड़ोसी देश नेपाल में वनों की वृद्धि और उनकी गुणवत्ता में आए सुधार का श्रेय सामुदायिक प्रबंधन को दिया है, लेकिन भारत के इन पर्यावरणविदों और सर्वोच्च न्यायालय की नज़र इन सराहनीय पहलों पर नहीं गयी।

वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और नेचर कंजर्वेशन सोसायटी जिस अंतरराष्‍ट्रीय नेटवर्क के सदस्य हैं, खुद वह नेटवर्क भी इन दुराग्रहों को अपने आधिकारिक बयानों में खंडित करते आए हैं। उदाहरण के लिए आईयूसीएन (इन्टरनेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन ऑफ नेचर) ने अपने डरबन समझौते में लिखित में  “आरक्षित वनों और स्थानीय समुदायों के बीच के अंतर्निहित संबंधों को लेकर प्रतिबद्धता ज़ाहिर की और इन समुदायों के महिला व पुरुषों के अधिकारों को मान्यता देते हुए उनके हितों व आकांक्षाओं को पूरी तरह शामिल किए जाने की हिमायत की। इसके अलावा आरक्षित वनों में मूल निवासियों (इंडीजीनियस), स्थानीय समुदायों और घुमंतू समुदायों को वनों के संरक्षण, पुनरुत्पादन व प्रबंधन में सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देने की प्रतिबद्ध्तता प्रकट की।”  इसके अलावा  सीबीडी (कंजर्वेशन ऑफ बायलोजिकल डाइवर्सिटी) ने भी, जिसमें भारत सरकार ने भी हस्ताक्षर किए हैं, माना है कि “मूल निवासियों और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को मान्यता दी जाएगी।” अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह एक मानक बन चुका है कि बिना स्थानीय समुदायों, मूल निवासियों और घुमंतू समुदायों के अधिकारों को कंजर्वेशन, वन्य प्राणी संरक्षण और जैव-विविधता के संरक्षण के किसी भी प्रयास में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

तो क्या हम यह मान कर चलें कि याचिकाकर्ताओं ने देश की सबसे बड़ी अदालत को अपने भ्रमित तर्कों से आदेश देते समय दिग्भ्रमित किया या इस आदेश को तीन महत्वपूर्ण न्यायाधीशों के विवेक की उपज माने जिन्हें दुनिया में अपनाए जा रहे विचारों से कोई वास्ता नहीं है? सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ठीक ऐसा ही अविवेकी निर्णय सर्वोच्च न्यायालय ने वन भूमि परिभाषित करते वक़्त भी लिया था जिसमें हर उस भू-भाग को जंगल मान लिया गया था जहां पेड़ हैं। यह शब्दकोशीय व्याख्या थी और जिसने तत्कालीन न्यायाधीशों की समझ पर बुनियादी प्रश्न खड़े किए थे।

इस आदेश और दस साल से चल रहे इस मामले में कुछ गंभीर राजनैतिक दांव-पेंच भी हैं। 2016 तक भी इस कानून की संरक्षक संस्था आदिवासी मामलों के मंत्रालय (मिनिस्टरी ऑफ ट्राइबल अफेयर) ने इस कानून की मूल आत्मा, भावना और प्रावधानों को अक्षुण्ण रखने की कानूनी कोशिश की। काबिल सलाहकारों और काबिल वकीलों की टीम ने मंत्रालय की ओर से इन कुतर्कों और दुराग्रहों को जोरदार ढंग से अदालत के अंदर काटा। फली नरीमन और नसिंम्हन जैसे पेशेवर क्षमताओं से युक्त वकीलों ने इस मामले में जंगल में निवासरत समुदायों व पर्यावरण संरक्षण के लिए अपरिहार्य पारिस्थितिकी के अन्योन्यश्रित सम्बन्धों की पुरजोर पैरवी की जिसके परिणामस्वरूप यह कानून अक्षुण्ण बना रहा। बाद में एनडीए की  मौजूदा अढ़ाई लोगों की सरकार ने इस मंत्रालय के पर कतर दिये और हालत यह हुई कि जिस दिन यह प्रतिगामी आदेश जारी हुआ उस दिन मंत्रालय की ओर से एक वकील भी बहस के लिए अदालत में खड़ा नहीं किया गया।

जंगल, जंगल ज़मीन और जंगल के संसाधनों पर सामुदायिक अधिकारों का मुद्दा मूलत: कानूनी मुद्दा है और यह अनिवार्य तौर पर देश का प्रमुख राजनैतिक मुद्दा है। इस आदेश में सत्तासीन राजनैतिक दल और कानून की सर्वोच्च संस्था के गठजोड़ ने लाखों आदिवासियों की ज़िंदगियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है और इन समुदायों के संवैधानिक हितों के लिए संघर्षरत जन संगठनों और कानूनी तौर पर सक्रिय पेशेवरों को निराश किया है। वर्षों से चल रहे संघर्ष को एक बार फिर उसी  मुहाने पर ला खड़ा कर दिया गया है जहां इस कानून को बनाने के लिए देश भर के आदिवासी व परंपरागत रूप से जंगलों में रह रहे समुदायों ने दिल्ली कूच किया था। इस एक तर्कहीन आदेश ने हालांकि राजनीति में वंचितों में हक में खड़े होने और खड़े दिखने के अवसर भी देश के राजनैतिक दलों को दिये हैं। गौरतलब है कि जहां केंद्र सरकार ने इस पूरे मामले में चुप्पी का चयन किया और पुलवामा कांड से पैदा हुई छद्म राष्ट्रवाद की ओट लेकर इस पूरे मामले से किनारा किया वहीं विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पूरे मामले पर अपनी नज़रें बनाई रखीं और समय समय पर विभिन्न राज्यों में अपनी सरकारों को सकारात्मक हस्तक्षेप करने की समझाइश दी और समानान्तर रूप से केंद्र सरकार की आलोचना भी की।

( क्रमश:)

2 COMMENTS

  1. एक जरूरी हस्तक्षेप है यह आलेख, धन्यवाद.

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