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फ़र्ज़ी ख़बर ! फ़र्ज़ी तस्वीर ! इस आग लगाऊ पत्रकारिता से यूपी को बचाना है !

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‘इंडिया संवाद’ ने लगाया तीन महीने पुरानी खबर में भड़काऊ तड़का !

भाजपा को अवध में भी चाहिए एक कैराना, ‘हिंदूवादी’ पत्रकार जुटे काम पर !

                   (कृष्ण प्रताप सिंह)

‘इंडिया संवाद’ वेबसाइट की इस ख़बर को देखकर कोई भी ठिठकेगा। क्या तो तस्वीर है और क्या ही हेडलाइन! कोई भ्रम न रह जाये इसलिए हेडिंग में ही स्पष्ट कर दिया गया है कि फ़ैज़ाबाद उत्तर प्रदेश में है। साथ ही यह कि एक पुजारी की मंदिर में घुसकर पिटाई करने वाले ‘जिहादी’ हैं और यह सब हुआ ‘भजन बंद’ न करने के कारण ! अवध की तहज़ीब और तबीयत से वाक़िफ़ कोई भी शख्स इस ख़बर को देखते ही फ़र्ज़ी क़रार देगा। ख़बरों की दुनिया से थोड़ा बहुत ताल्लुक़ रखने वाला यह भी पूछ सकता है कि जिहादी इतने आराम से मारपीट का वीडियो क्यों बनने दे रहे थे ? और तस्वीर में दिख रहा कैमरामैन अचानक मारपीट वाले स्थान पर कैसे पहुँचा ? वीडियो कैमरा वैसा ही है जैसा कि चैनल वाले लेकर घूमते हैं…तो क्या किसी चैनल में ऐसी ख़बर दिखाई गयी ? तस्वीर में पिटता पुजारी क्यों नहीं दिख रहा है… क्या यह तस्वीर कहीं और की है..?

बहरहाल, कोई यूँ हो ती बेवफ़ा होता नहीं। ज़रा संदर्भ समझ लें। इस ख़बर का रिश्ता हिंदी मीडिया के एक बड़े हिस्से का ‘हिंदू मीडिया’ ही नहीं ‘दंगाई मीडिया’ में बदलते जाने से है। इसका रिश्ता यूपी को लेकर बीजेपी की ‘रणनीति’ से है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना कस्बे से हिन्दुओं के कथित पलायन को लेकर भाजपा सांसद हुकुम सिंह की सूची चाहे फ़र्जी साबित हुई है, वह अपनी रणनीति बदलने को तैयार नहीं है। उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा पूर्वांचल और अवध में भी कैराना की तलाश है। इस लिहाज से उसकी निगाहें फ़ैज़ाबाद ज़िले के दो मुस्लिम-बहुल कस्बों- ‘रुदौली’ और ‘भेलसर’-पर गड़ी हुई हैं। वह वहाँ के सामाजिक वातावरण में ज़हर घोलने का एक भी मौका गँवाने को तैयार नहीं। कोढ़ में खाज यह कि ‘हिन्दूवादी’ मीडिया उसके ताल से ताल मिलाता हुआ इन कस्बों में सदियों से जारी मेल-मिलाप की परंपरा में दरार डालने के लिए नये अंदेशे पैदा करने की साँठ-गाँठ में लगा रहता है।

आगे बढ़ने से पहले यह भी जान लेना चाहिए इन क़स्बों का ‘मुस्लिम-बहुल’ होना ही इनमें भाजपा या ‘हिन्दूवादी मीडिया’ की दिलचस्पी का एकमात्र कारण नहीं है। लखनऊ-फ़ैज़ाबाद राजमार्ग पर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से महज 90-95 किलोमीटर दूर स्थित ये कस्बे एक दूजे से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं और रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के कारण प्रायः संवेदनशील बने रहने वाले जुड़वा शहरों अयोध्या-फ़ैज़ाबाद से इनकी दूरी लखनऊ से दूरी की आधी भी नहीं है। इनकी इस अनूठी भौगोलिक स्थिति के कारण साम्प्रदायिकता के पैरोकारों व रणनीतिकारों को लगता है कि यहाँ से जो भी बात निकलेगी, दूर तलक जायेगी ही जायेगी। तिस पर उनकी सुविधा यह है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की लहर के बावजूद भाजपा ने साम्प्रदायिक विभाजन की मार्फत रुदौली विधानसभा सीट जीत ली थी और कभी समाजवादी पार्टी में ही रहे उसके विधायक रामचंद्र यादव, जो अब, 2012 में अपने चुने जाने के थोड़े ही दिनों बाद दुर्गाप्रतिमाओं के विसर्जन के वक्त हुए उपद्रवों के अभियुक्त हैं, उस अभियोग को माथे का चंदन बनाये घूम रहे हैं। उनकी सहयोगी ‘हिन्दूवादी’ मीडिया की कारस्तानियाँ तो उनसे भी ज़्यादा चिंतित करने वाली हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में ‘इंडिया संवाद’ की ख़बर पढ़िये। 25 जून को ‘इंडिया संवाद’ नाम की वेबसाइट रिपोर्टर अमित बाजपेयी की मयतस्वीर वाली बाईलाइन से ख़बर छपी है। ‘भजन न बंद करने पर मंदिर में घुसकर जिहादियों ने पुजारी को पीटा’ शीर्षक से लिखा गया है कि ‘फैजाबाद जिले के रुदौली {विधानसभा क्षेत्र} के भेलसर गाँव में बीते शुक्रवार को दर्जन भर अल्पसंख्यक मंदिर के बाहर इखट्टा होए {इकट्ठा होकर} मंदिर में भजन बंद करने की मांग करने लगे {और} भजन न बंद करने पर मंदिर में घुसकर जिहादियों ने पुजारी को पीटा।’ …..भाषा और व्याकरण की अनेक गलतियों से भरी और अल्पसंख्यकों के लिए जानबूझकर कहीं ‘मुस्लिम’ तो कहीं ‘जिहादी’ शब्द का इस्तेमाल करने वाली इस रिपोर्ट के साथ छपे फोटो के हेडिंग जैसे बेहद मोटे कैप्शन में पुजारी की कथित पिटाई को ‘मंदिर में घुसकर’ और ‘बर्बर तरीके से’ की गयी बताया गया है।

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ज़ाहिर है कि इरादा भावनाएँ भड़काना ही है। आगे और भी कड़े शब्दों में बेहद ऊलजलूल ढंग से लिखा गया है कि ‘मुस्लिमो ने पुजारी पर दबाब बनाया की मंदिर में बज रहा भजन बंद कर दो, इसके विरोध पर मुस्लिमो ने डंडों से मार-मार कर पुजारी को अधमरा कर दिया। पुजारी के चींख पुकार के बाद गॅाव बाले मौकाए वारदात पर आये तो जिहादी भाग गए, पुजारी को अधमरी अवस्था में अस्पाताल पहुंचाया गया। पुलिस को पुजारी उदयभान झा ने बताया की मंदिर में रोजाना की तरह भजन बज रहा था। शुक्रवार को मुस्लिम यहाँ आये और भजन बंद करने की मांग करने लगे। मैंने विरोध किया तो उन्होंने पीटा, गाँव की स्तिथि {स्थिति} देखते हुए वहां पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।’

‘इंडिया संवाद’ ने इसे 25 जून के तीन दिन पहले की ख़बर बताया है। लेकिन कस्बे के निवासी कई पत्रकारों ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि अमित बाजपेयी का कुत्सा से भरा यह झूठ तीन महीने पहले 1 अप्रैल को भेलसर के उक्त मंदिर में हुई मारपीट की एक बेहद सामान्य-सी घटना का रूप बदलकर उसके निहित स्वार्थी ‘नये इस्तेमाल’ से ज्यादा कुछ नहीं है। इन पत्रकारों में कस्बे के ही निवासी डॉ. अख्तियारुद्दीन भी शामिल हैं, जिन्होंने 2002 में भाजपा द्वारा गुजरात दंगों को गोधरा की प्रतिक्रिया बताये जाने के दिनों में फैज़ाबाद के दैनिक ‘जनमोर्चा’ में छपी अपनी चर्चित रिपोर्ट में गुजरात लौट रहे कारसेवक समूहों द्वारा गोधरा के घटित होने से पहले ही रुदौली रेलवे स्टेशन पर अल्पसंख्यकों पर किये गये उत्पाती हमलों का खुलासा कर उसकी पोल खोल डाली थी। उन्हें आज भी कस्बे में सौहार्द बनाये रखने के प्रयत्नों के लिए जाना जाता है।

खैर, तीन महीने पहले भी हुआ महज़ यह था कि भेलसर के मुंडा का पुरवा स्थित राम जानकी हनुमान मंदिर परिसर में पास ही रहने वाले गूजर परिवार का कोई मवेशी घुसा तो एक युवक उसे ढूंढ़ता हुआ वहां आया। पुजारी ने मवेशी के परिसर में घुसने को लेकर नाराजगी जतायी और आगे ऐसा न होने देने की चेतावनी दी तो पहले दोनों में कहासुनी हुई, फिर पकड़-धकड़, धकेला-धकेली और मार-पीट। बाद में इसमें कुछ और लोग भी शामिल हो गये। कई लोग कहते हैं कि इस सब में कुछ पुराने गैरधार्मिक गैरवाजिब ‘प्रसंगों’ में पुजारी की अवांछनीय लिप्तता से जन्मी खुन्नसों ने भी भूमिका निभाई, लेकिन मन्दिर के सामान्य क्रियाकलाप से उसका कोई वास्ता नहीं था।

बहरहाल, भाजपा तो जैसे इसी मौके की ताड़ में बैठी थी। क्षेत्रीय विधायक समेत उसके समर्थकों ने पुजारी को आयी ‘सांघातिक’ चोटों को साम्प्रदायिक रंग देकर ‘मुसलमानों के हमले’ और मंदिर में लाउडस्पीकर पर बज रहे भजन से जोड़ दिया। उन्होंने चार ज्ञात और आधा दर्जन अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करा दी और जी भरकर अफवाहें फैलायीं कि “सपा के राज में निरंकुश मुसलमान मन्दिर में भजन-कीर्तन रोकने तक की मनमानी पर उतर आये हैं, जिसे सहन नहीं किया जा सकता !”

लेकिन असलियत से वाक़िफ़ स्थानीय लोगों ने इसे कान नहीं दिया और आपसी सौहार्द कायम रखा। जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करायी गयी थी और जिन्हें ‘साज़िशन फ़रार’ व ‘जिहादी’ आदि जानें क्या-क्या बताया जा रहा था, उन्होंने ख़ुद थाने जाकर सच्चाई बताते हुए पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। बाद में भाईचारे के हिमायती बड़े-बुज़ुर्गों के हस्तक्षेप के बाद पुजारी ने भी मामले को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं दिखाई। सम्बन्धित मंन्दिर के पूजापाठ में वह अभी भी पहले जैसी ही भूमिका निभा रहा है और किसी भी तरह का कोई खतरा महसूस नहीं करता। रमजान के इस महीने में भी कोई उसके भजन कीर्तन में बाधा डालने नहीं जाता। इसके उलट मंदिर में आयोजित होने वाला कोई भी कार्यक्रम मुस्लिमों के सहयोग के बगैर पूरा नहीं होता और वहां जब भी कोई आयोजन होता है, गंगा जमुनी संस्कृति अपने पूरे रंग में दिखाई देती है।

काश, अमित बाजपेयी इस पुरानी खबर में नया तड़का लगाने से पहले एक बार खुद उस मन्दिर की चैखट तक हो आते! तब शायद एक और कैराना की तलाश से उनका नाम नहीं जुड़ता।

 

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(यह तस्वीर, इस टिप्पणी के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार कृष्णप्रताप सिंह की है। वे इन दिनों फ़ैज़ाबाद से प्रकाशित जनमोर्चा के संपादक हैं )