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एक मठ और तीन महंत: नाथ सम्प्रदाय से आधुनिक साम्प्रदायिकता तक की संक्षिप्त कथा

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प्रद्युम्न यादव 

नाथ सम्प्रदाय की परंपरा 

नाथ सम्प्रदाय की मठ परंपरा के संस्थापक गोरखनाथ माने जाते हैं। गोरखनाथ के गुरु थे मत्स्येंद्रनाथ जिनका संबंध मत्स्यि यानी मछुआरों से था।

गोरखनाथ के जन्म के बारे में तमाम कथाएं हैं जिनमें यह तय करना मुश्किल है कि कौन सी वाली सही है। जो सबसे प्रचलित कथा है उसके अनुसार उनका जन्म मत्स्येंद्रनाथ की कृपा से हुआ था। मत्स्येन्द्रनाथ ने एक निःसन्तान महिला को बच्चा होने के लिए भभूति दी। महिला ने भभूति गोबर के ढेर पर डाल दी और चलती बनी। 12 वर्ष बाद मत्स्येन्द्रनाथ को वो महिला मिल गई। बाबा ने उससे उसकी संतान के बारे में पूछा। झेंपकर उसने गोबर वाली बात बताई। मत्स्येन्द्रनाथ झल्ला उठे। उन्होंने गोबर के ढेर के पास आवाज़ लगाई और वहां से एक 12 वर्ष का लड़का सामने आया। मत्स्येन्द्रनाथ ने इस लड़के का नाम रखा गोरखनाथ। इन्हीं महंत गोरखनाथ के नाम पर गोरखपुर को उसका नाम मिला। इन्ही के नाम पर गोरखनाथ मठ की स्थापना हुई। इन्हीं के चेले थे राजा गोपीचंद और भर्तृहरि। जोगियों के अनुसार गोपीचंद ने सारंगी का अविष्कार किया तथा राजा भर्तृहरि वो व्यक्ति थे जिन्होंने गोरखनाथ के प्रभाव से राजपाठ छोड़ दिया। जोगी आज भी अपने गीतों में इनका उल्लेख करते हैं।

यहां यह ध्यान देने योग्य है कि इन कथाओं में गोरखनाथ के जन्म और जाति का उल्लेख नहीं है। कालान्तर में यही स्थिति कबीर की हुई जिन पर ब्राह्मणी की कोख से जन्म वाली कथा को थोपा गया। दूसरी बात जो सबसे अहम है, गोरखनाथ ने ब्राह्मणवाद, बौद्ध परम्परा में अतिभोगवाद व सहजयान में आई विकृतियों के खिलाफ विद्रोह किया। हिंदू-मुसलमान एकता की नींव रखी और ऊंच-नीच, भेदभाव, आडम्बरों का विरोध किया। यही कारण है कि नाथ सम्प्रदाय में बड़ी संख्या में सनातन धर्म से अलगाव की शिकार अस्पृश्य जातियां इसमें शामिल हुईं। नाथपंथियों में वर्णाश्रम व्यवस्था से विद्रोह करने वाले सबसे अधिक थे। हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग बल्कि कहीं-कहीं तो मुसलमान बड़ी संख्या में नाथ संप्रदाय में शामिल हुए। गोरखनाथ का प्रभाव कबीर, दादू, जायसी और मुल्ला दाऊद जैसे अस्पृश्य जातीय और गैर-हिन्दू कवियों पर भी माना जाता है। इससे इतना तो साफ़ है कि गोरखनाथ और उनके गुरु किसी ऊंची जाति से तो कतई नहीं थे।

तीसरी अहम बात। गोरखनाथ के बाद उनके उत्तराधिकारियों श्री वरद्नाथ तत्पश्चात परमेश्वर नाथ एवं गोरखनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करने वालों में प्रमुख बुद्ध नाथ जी (1708-1723 ई), बाबा रामचंद्र नाथ जी, महंत पियार नाथ जी, बाबा बालक नाथ जी, योगी मनसा नाथ जी, संतोष नाथ जी महाराज, मेहर नाथ जी महाराज, दिलावर नाथ जी, बाबा सुन्दर नाथ जी, सिद्ध पुरुष योगिराज गंभीरनाथ जी, बाबा ब्रह्मनाथ जी महाराज तक के इतिहास में आपको कुछ खास तथ्यात्मक नहीं मिलेगा। ये कौन थे, किस पृष्ठभूमि से थे, इसके बारे में आज भी पता लगाना मुश्किल है।

अब आते हैं अंतिम बात पर। आपको अचानक से गोरखपुर मठ का ज्ञात इतिहास राजस्थान के ठाकुर नान्हू सिंह यानी दिग्विजयनाथ से मिलना शुरू हो जाएगा। यह हिन्दू महासभा के सदस्य थे। इस महंत के मठ प्रमुख बनने के बाद मुस्लिम और अस्पृश्य जाति के जोगियों की संख्या में गिरावट आने लगी। दिग्विजयनाथ के बाद एक दूसरा ठाकुर अवैद्यनाथ यानी कृपाल सिंह बिष्ट (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड) महंत बनते हैं। इनके बाद तीसरा ठाकुर आदित्यनाथ यानी अजय सिंह बिष्ट (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड) मठ प्रमुख बनते हैं।

इन तीनों के महंत बनने के क्रम में तीन बातें देखने को मिलती हैं –

  1. मुस्लिम और अस्पृश्य जाति के जोगियों का सफाया हो जाता है।
  2. क्रमशः एक ही जाति (ठाकुर) के मठ प्रमुख बनने की परंपरा कायम होती है।
  3. नाथ सम्प्रदाय गोपीनाथ और भर्तृहरि के गीत गाना छोड़कर, हिन्दू मुस्लिम एकता, ऊंच नीच, आडंबरों का विरोध छोड़कर, क्षत्रिय राम की बात करने वाला हिन्दू सम्प्रदाय बन जाता है।

जार्ज वेस्टन ब्रिग्स की पुस्तक ‘गोरखनाथ एंड दि कनफटा योगीज’ में उल्लिखित 1891 की जनसंख्या रिपोर्ट और इसी वर्ष की पंजाब की जनसंख्या रिपोर्ट के अनुसार 28,816 गोरखनाथी और 78,387 योगी में 38,137 मुसलमान योगी थे। आज हालत ये है कि उत्तर भारत, खासकर पूर्वांचल से उनका पूरी तरह सफाया हो गया है। गोरखपुर में जो बचे खुचे मुसलमान जोगी थे वे भगवा वस्त्र पहनना और सारंगी बजा कर गीत गाना छोड़ चुके हैं।

इस तरह एक जाति के मठाधीशों ने नाथ सम्प्रदाय को उसके असल वारिसों से छीन लिया।

(इस बारे में पत्रकार इरफ़ान की बनाई एक फिल्म ज़रूर देखी जानी चाहिए जिसमें जोगियों के परम्परागत वस्त्र और पेशा छोड़ने का दर्द उकार के आया है- संपादक)

 


नाथ सम्प्रदाय की परंपरा का अवसान और आधुनिक साम्प्रदायिकता का युग

नाथ संप्रदाय में धार्मिक साम्प्रदायिकता के प्रवेश की शुरुआत होती है राजस्थान के राजपूत महंत दिग्विजय नाथ (नान्हू सिंह) से। गोरखनाथ मठ से राजनीति में भाग लेने वाला यह पहला महंत था। अपने शुरुआती दिनों में यह कांग्रेस में थे लेकिन असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद इन्होंने हिन्दू महासभा का दामन थाम लिया। इन्हें 1935 में गोरखनाथ मठ का महंत बनाया गया। उसके बाद 1935 से 1969 तक उत्तर भारत में साम्प्रदायिकता का प्रसार हुआ और हिन्दू बनाम मुस्लिम का विवाद केंद्रीय भूमिका में आ गया जिसमें मठ का भी योगदान रहा।

दिग्विजयनाथ राम मंदिर की संकल्पना को जन्म देने वाले पहले व्यक्ति थे। उससे पहले किसी ने भी राम मंदिर की संकल्पना प्रस्तुत नहीं की थी। इसी का परिणाम था कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर होने का दावा किया गया। दिग्विजयनाथ की इस संकल्पना और महत्वाकांक्षा को बल देने का काम हिन्दू महासभा ने किया। महासभा ने दिग्विजयनाथ को हिन्दू महासभा, यूनाइटेड प्रोविंस (अब का उत्तर प्रदेश) का अध्यक्ष बनाया।

30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हो गयी। इस हत्या में परोक्ष रूप से दिग्विजयनाथ की संलिप्तता के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा और नौ महीने तक जेल में रहना पड़ा। इस घटना से दिग्विजयनाथ और संगठन की बहुत बदनामी हुई। उनकी राजनीति फीकी पड़ने लगी।

अब दिग्विजयनाथ के लिए जरूरी था कि हिन्दू महासभा की राजनीति को जिंदा रखने के लिए कोई नया मुद्दा पकड़ा जाए- वह मुद्दा था अयोध्या का राम मंदिर मुद्दा। इसमें दिग्विजयनाथ का साथ दिया विनायक दामोदर सावरकर ने। ये दोनों ही अखिल भारतीय रामायण महासभा के सदस्य थे।

गांधी की हत्या के बाद अपने अस्तित्व को बचाने के लिए महासभा ने बाबरी मस्जिद के सामने नौ दिन तक रामचरितमानस के पाठ का कार्यक्रम करवाया। इसके आखिरी दिन बाबरी मस्जिद के अंदर चोरी-छिपे राम और सीता की मूर्ति पहुंचाई गई (Christophe Jeffrelot, 6 October 2014, The Other Saffron: संपादक)। इस ऐतिहासिक कदम से महंत को नई जान मिल गई। परिणामस्वरूप दिग्विजयनाथ को 1950 में हिंदू महासभा का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया। इससे उत्साहित होकर उन्होंने 1951 में होने वाले प्रथम आम चुनावों में भाग लिया जिसमें उन्हें कांग्रेस के नेता और स्वतंत्रता सेनानी सिंहासन सिंह ने बुरी तरह पराजित किया। आगे चलकर सिंहासन सिंह ने लगातार दो बार दिग्विजयनाथ को पराजित किया।

1967 में स्थितियां बदल गयीं। सिंहासन सिंह जो इंदिराजी से असंतुष्ट थे, चुनाव नहीं लड़े जिसका फायदा दिग्विजयनाथ को हुआ और वह चुनाव जीत गए। 1969 में दिग्विजयनाथ की मृत्यु हो गयी।

इसके बाद दिग्विजयनाथ का स्थान लिया मठ के दूसरे ठाकुर अवैद्यनाथ यानी कृपाल सिंह बिष्ट ने। उन्होंने विरासत में मिली राजनीति को अगले चरण में पहुंचाने का काम किया। वे 1970 से 1977 तक चुनावों में भाग लेते रहे लेकिन 1977 में इंदिरा विरोधी लहर आने के बाद अवैद्यनाथ ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया।

एक लंबे अंतराल के बाद वे राजनीति में दुबारा 1989 में प्रकट हुए। इससे पूर्व उन्होंने 1984 में श्रीरामजन्मभूमि यज्ञ समिति बनाई और गोरखपुर समेत देश के विभिन्न हिस्सों में अपने गुरु दिग्विजयनाथ के एजेंडे का विस्तार किया। नतीज़तन 1989 के चुनाव में उन्हें बड़ी जीत हासिल हुई। अवैद्यनाथ ने अपने गुरु की संकल्पना को आंदोलन का रूप दिया। जो काम गुरु नहीं कर पाए थे उस काम को अवैद्यनाथ ने अंजाम दिया।

1989 में ही विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने इलाहाबाद में जिस धर्म संसद का आयोजन किया, उसमें अवैद्यनाथ के भाषण ने ही राम मंदिर आंदोलन का आधार तैयार किया था। इस धर्म संसद के तीन साल बाद ही बाबरी ढांचा ढहा दिया गया। तब 1 फरवरी 1989 को स्टेट्समैन ने अपनी खबर में लिखा था:

‘गोरखपुर के महंत अवैद्यनाथ ने खास तौर पर उल्लेख किया है कि क़ुरान मुस्लिमों को दूसरों के धर्मस्थलों पर मस्जिद बनाने से रोकती है… और हमें किसी संघर्ष को टालने के लिए किसी दूसरी जगह पर राम मंदिर बनाने की सलाह दी जा रही है. यह सलाह ठीक वैसी ही है, जैसे रावण से युद्ध टालने के लिए भगवान राम को किसी दूसरी सीता से विवाह करने के लिए कह दिया जाए.’

राम मंदिर आंदोलन में अवैद्यनाथ की भूमिका कितनी थी, इसका अंदाजा लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। आयोग ने इस आंदोलन के जरिए देश में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश का जिन-जिन अहम लोगों को जिम्मेदार माना था, उनमें अवैद्यनाथ भी एक थे।

इसका फायदा विहिप और भाजपा दोनों को हुआ।

6 दिसंबर, 1992 को बाबरी विध्वंस के बाद पूरा देश दंगों की आग में जला। तमाम जगहों पर बम विस्फोट हुए। हज़ारों लोगों की जान गई। इन सब से उबरने में देश को दो दशक से भी ज्यादा समय लग गया।

इस बीच अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी आदित्यनाथ विरासत में मिली राजनीति को आगे बढ़ाते रहे। पूर्वांचल के कई जिलों में साम्प्रदायिक दंगों को अंजाम देने के मामलों में उनके ऊपर कानूनी मुक़दमे हुए जिनमें सबसे ज्यादा कुख्याति उन्हें 2007 के गोरखपुर दंगों में मिली।

2017 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यानाथ का बार-बार अयोध्या भाग कर जाना, दीपावली का भव्य आयोजन, बार-बार अयोध्या की बात करना, ये सब यूँ ही नहीं है। इसके पीछे विरासत में मिली राजनीति है जिसका सिरा गांधी हत्या से लेकर बाबरी विध्वंस तक जाता है। इस राजनीति की जड़ें गोरखपुर से निकलती हैं लेकिन इसकी हलचलों का केंद्र पहले भी अयोध्या था और आज भी है, जहाँ एक मंदिर बनाने का सपना आज भी जिंदा है।


लेखक प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व के शोधार्थी हैं जो फेसबुक पर नाथ सम्प्रदाय के बारे में किस्तों में लिख रहे हैं. प्रस्तुत लेख श्रृंखला में अब तक आए दो अध्यायों का संपादित संकलन है.