Home पड़ताल मोदीयुग में ‘दिल्ली’ हार गये पत्रकार ! प्रसून के क़िस्सों में दिखा...

मोदीयुग में ‘दिल्ली’ हार गये पत्रकार ! प्रसून के क़िस्सों में दिखा मीडिया का मुर्दा !

SHARE

फ़िल्म जुनून में रुहेला सरदार बने नसीरुद्दीन शाह , अंग्रेजों से 1857 की जंग हारने की ख़बर कबूतर उड़ाते जावेद ख़ान यानी शशि कपूर को यूँ देते  हैं—”जावेद भाई, हम दिल्ली हार गये’..!”…कुछ नसीर का अंदाज़ और कुछ किस्से का दम कि यह डायलॉग सुनकर कलेजा मुँह को आा जाता है। दिल्ली हारने की यह कसक देर तक दर्शक को परेशान करती रहती है।

मोदीयुग में  पत्रकारिता  के साथ भी  ऐसा ही हुआ है। मशहूर पत्रकार और एंकर पुण्य प्रसून वाजयेपी ने ख़बर दी है कि पत्रकार अपनी ”दिल्ली” हार गये हैं ! दरअसल, उन्होंने अपने ब्लॉग पर दिल्ली के पत्रकारों और पत्रकारिता पर एक लेख लिखा है। उन्होंने इमरजेंसी, बोफोर्स और हवाला जैसे कांड की याद करते हुए बताया है कि देश में हमेशा कोई न कोई पत्रकारिता संस्थान ऐसा रहा है जिसने सत्ता से टकराते हुए सच लिखने का जोखिम उठाया। लेकिन यह पहली बार है कि पत्रकारिता पूरी तरह दंडवत है। सत्ता को परेशान करने वाली खबरों को छापने, दिखाने या उनकी पड़ताल को रोकने का बाक़ायदा निर्देश है। यानी अगर पत्रकारिता करनी है तो हर हाल में सरकार के पक्ष में खड़े होना होगा। उन्होंने तीन सच्ची कहानियाँ सुनाई हैं जिससे हालात की भयावहता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। प्रसून ने नाम तो नहीं लिखा, लेकिन उनकी एक कहानी में  ”दोनों” को छोड़कर लिखने की बात है। ये दोनों प्नधानमंत्री नरेंद् मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, यह समझने के लिए राजनीति विज्ञान का पंडित होने की ज़रूरत नहीं है। ”मीडिया विजिल” प्रसून के लेख का एक अंश यहाँ अभार सहित छाप रहा है क्योंकि कलेजा मुँह को आ रहा है— 

किन्हें नाज़ है मीडिया पर ……..
(Part 1)

“आपको जिसके खिलाफ लिखना है लिख लें, लेकिन इन दो को छोड़ना होगा”

“क्यों, तब तो बहुत ही मोटी लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी।”

” ये तो बेहद महीन लकीर खिंचने की बात है। बाकी तो आपको हर पर कलम चलाने की छूट है। अब आप लोग जो समझें। लेकिन हम झुकते नहीं हैं और हमारी पत्रकारीय धार का लोहा दुनिया मानती है। तो सोचिये धार भी बरकरार रहे और समझौता होते हुये भी ना लगे कि हमने कुछ छुपाया। ठीक है।”

“नहीं हम ऐसी खबरो के पीछे नहीं भाग सकते जिसे छापना मुश्किल हो । रिपोर्टरो को भी ऐसी खबरो के पिछे मत भगाइये । नहीं तो वह खबर ले कर आयेंगे । दस्तावेज जुगाड कर लायेंगे । उन दस्तावेजो को लेकर आप उन्हें लंबे वक्त तक जांच कर रहे हैं, कहकर भटका भी नहीं सकते है । तो इस रास्ते पर चले ही नहीं।”

“और अगर कोई भूले भटके ऐसी खबर ले आया जो हमारे अखबार के खांचे में सही नहीं बैठती है तो”

” ……तो क्या आप सिनियर है । आप संपादक है । अब ये हुनर तो आपके पास होना ही चाहिये ।”

“खबरों को आने से मत रोकिये । जो आ रही है आने दें । लेकिन कोई भी ऐसी खबर जो देश की हवा बिगाड दे उसे ना छापें। ना ही डिस्कस करें ।”

“लेकिन ऐसी खबरों का मतलब होगा क्या । देश की हवा का मतलब क्या है ? पाकिस्तान से युद्द का माहौल या आतंकवाद को लेकर कोई गलत पहल। ”

“ना ना ….देश की राजनीति को समझिये । इस दौर में देश संकट से भी गुजर रहा है और विकास की नई परिभाषा गढने के लिये मचल भी रहा है । तो हमें देश के साथ खडा होना होगा। जो देश के हक में निर्णय ले रहा है उसके हक में ।”

“तब तो विपक्ष की राजनीति का कोई मतलब ही नहीं होगा । और उनके कहे को कोई मतलब ही नहीं बचेगा।”

” सही । आपकी खबर ही ये तय कर देगी कि जो सही है आप वहीं खडे हैं ।”

“तो फिर गलत या सही-गलत के बीच फंसने की जरुरत ही क्या है ।”

अखबारी जगत के तीन मित्रो की तीन कहानियां। ये शॉर्टकट कहानी है। क्योंकि संपादकों को बीच मौजूदा दौर में कहे जाने वाले शब्द और अनकहे शब्दों के बीच रहकर आपको सही गलत का फैसला करना होगा । तो अपने अपने संस्धानों को लेकर पत्रकार मित्रो के बीच संपादकों की इस बैठक को कितना भी लंबा खींचें। इसी बीच मुझे एक दिन एक पुराने मित्र ने कॉफी पीने का ऐसा आंमत्रण दिया कि मैं चौक गया ।

”यार दो तीन घंटे। कॉफी पीते हुये बात करेंगे।”

”वह तो ठीक है। लेकिन शाम के वक्त दो तीन घंटे। बंधु शॉर्टकट में बतला देना।”

और आखिर में तय यही हुआ कि जहॉ मुझे लगेगा कि मै बोर हो रहा हू तो मैं चल दूगा । शाम छह बजे फिल्म सिटी के सीसीडी पहुंचा। मित्र इंतजार कर रहे थे। बिना भूमिका उसने नब्बे के दशक में हवाला रैकेट के दौर के दस्तावेजों और उस दौर की अखबार–मैग्जिन की रिपोर्टिंग दिखाते हुये पूछा कि क्या इस तरह के दस्तावेज अब कोई मायने रखते हैं?

”बिलकुल मायने रखते हैं। मायने से मेरा मतलब है कि अगर किसी दस्तावेज पर इसी तरह देश के तमाम राजनेताओ के नाम दर्ज हो तो क्या आज की तारीख में कोई मीडिया संस्धान छाप पायेगा। ये क्या मतलब हुआ। अरे यार कोई भी दस्तावेज जांचना चाहिये। गलत भी हो सकता है।”

मौजूदा दौर में जब सबकुछ सत्ता में जा सिमटा है तो फिर एक भी गलत खबर या कहें बिना जांचे परखे किसी दस्तावेज को सही कैसे कोई मान लेगा। और तुम खुद ही कह रहे हो कि राजनेताओं को कठघरे में खड़ा करने वाले दस्तावेज । जो भी सवाल मेरे जहन में उठे मैंने झटके में कह दिये। लेकिन मेरे ही सवालो को जबाब देकर मित्र ने फिर मुझे
कहा…..”यार खबर गलत होगी तो हम यहां क्यों बैठे होते । मैं चर्चा क्यों कर रहा होता। जरा कल्पना करो सिस्टम चल कैसे रहा है । आप संस्धानों को टटोलेंगे । आप अधिकारियो से पूछेंगे । आप खबरों की कड़ियो को पकडेंगे । तथ्यों को उनके साथ जोडेंगे । और अगर सब सही लगे तब किसी संपादक का क्यों रुख होना चाहिये। तुम ही बताओ कि अगर तुम होते तो क्या करते।”

जाहिर है लंबी बहस के बाद ये ऐसा सवाल था जिसका जबाब तुरंत मैं क्या दूं। मेरे जहन में तो मौजूदा दौर के सारे हालात उभरने लगे। मौजूदा हालातों से टकराते उस दौर के हालात भी टकराने लगे, जब सत्ता में एक खामोश पीएम हुआ करते थे । दिल्ली में पत्रकारिता का सुकून ये तो है कि आप सत्ता की चाकरी करने वालों से लेकर सत्ता से टकराते पत्रकारों को बखूबी जान समझ लेते हैं। एक दौर में राडिया। एक दौर में भक्ति। एक दौर में धंधा। एक दौर में संघी। तो क्या इस या उस दौर में पत्रकारिता उलझ चुकी है। या उलझी पत्रकारिता को पहली बार पत्रकार ही सत्ता की गोद में बैठ कर सुलझाने लगे हैं। लेकिन सवाल को खबर का है । और सवाल मुझसे मेरा मित्र क्यों पूछ रहा है मैंने थाह लेने की कोशिश की । क्यों ये सवाल तो कोई सवाल हुआ नहीं । मुझे अजीब सा लग रहा था ये कौन से हालात हैं।

मैंने जोर से उसकी बात काटते हुये कहा ,” यार तुम ये सब मुझे कह रहे हो जबकि तुम खुद जिस जगह काम करते हो……वहां के संपादक । वहा का प्रबंधन तो खबरों पर मिट जाने वाले हैं। और तुम तो भाग्यशाली हो कि ऐसी जगह काम करते हो जहां खबरों को लेकर कोई समझौता नहीं होता ।”

‘गुरु …सही कह रहे हो । लेकिन जरा सोचो हम कर क्या करें।”

मैंने भी भरोसा दिया,” रास्ता निकलेगा। और हम मिलकर रास्ता निकालेगें। हम दो चार दिन में फिर मिलते है । तुम मुझे भी वो दस्तावेज दिखाओ । मै भी देखता हूं”

…..”अरे यार तुम्हारे ये न्यूज चैनल कितने भी बड़े हो जाये..कितना भी कमा लें लेकिन एक चीज समझ लो देश की सुबह आज भी अखबारो से होती है।”

“‘अरे ठीक है यार रात तो चैनलों से होती है। तो तय रहा अगली मुलाकात में ”……लेकिन ये लिखते लिखते सोच रहा हूं अब अगली मुलाकात…..तो आप भी इंतजार कीजिए..

(जारी)