Home पड़ताल रिलायंस जियो: ‘राष्ट्रवादी डेटागिरी’ यानी ‘सूचना इजारेदारी’ का दाँव!

रिलायंस जियो: ‘राष्ट्रवादी डेटागिरी’ यानी ‘सूचना इजारेदारी’ का दाँव!

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विनीत कुमार 

 

GAS JIO (1)

 

रिलायंस इन्डस्ट्रीज ने 4 जी आर जियो मोबाइल सेवा में तकरीबन 21 बिलियन डॉलर निवेश करके हिन्दुस्तान को एक नए युग में ले जाने की घोषणा की है. रोमिंग चार्ज हटाकर और वॉयस कॉलिंग मुफ्त करके वो चाहती है कि यहां के उपभोक्ता-नागरिक कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, गुजरात से लेकर नगालैंड तक, जहां कहीं भी इस मोबाइल के साथ जाएं, पूरे देश से अभिन्न रूप से जुड़ाव महसूस कर सकें. बहुमत में आई राजनीतिक पार्टी सालों से जिस अखंड भारत के सपने देखती आई है, रिलायंस इन्डस्ट्रीज उस सपने को साकार करने में समर्पण भाव से जुट गई है. ये एक तरह से धीरूबाई अंबानी की “कर लो दुनिया मुठ्ठी में” के गांधीगिरी सपने का मुकेश अंबानी के दौर की डेटागिरी है.

book-newदिलचस्प है कि अपनी नई मोबाइल सेवा और दावे के साथ रिलायंस इन्डस्ट्रीज बाजार में नहीं, लोगों के दिल में उतरनाचाहती है. वो इस देश को संचार क्रांति के क्षेत्र में पूरी दुनिया के आगे पहले पायदान पर खड़ा देखना चाहती है. शायद यही कारण है कि इस मोबाइल सेवा के लिए रिलायंस इन्डस्ट्रीज के मुखिया मुकेश अंबानी से लेकर विज्ञापन और उनका अनुसरण करते मुख्यधारा मीडिया ने जिस भाषा, शब्दावली और तर्कों का इस्तेमाल किया है, वो बाजार और धंधे से नहीं, विशुद्ध रूप से लोकतंत्र और राष्ट्रभक्ति के दरवाजे से होकर आए हैं. यहां तक कि बीते गुरूवार मुकेश अंबानी की ओर से इस सेवा की औपचारिक लांचिंग के ठीक अगले दिन देश भर के सैकड़ों समाचारपत्रों में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की भव्य तस्वीर के साथ जो विज्ञापन प्रकाशित हुए, उनमे “जियो मूवमेंट” के साथ जुड़ने का आह्वान किया गया. इस हिसाब से एक नए उत्पाद का उपभोक्ता बनने की प्रक्रिया बाजार का नहीं, आंदोलन का हिस्सा है. इधर आधार कार्ड के साथ जियो सिम कार्ड मुफ्त योजना से गुजरने के बाद कहीं कोई शंका नहीं रह जाती कि रिलायंस इन्डस्ट्रीज की ये सेवा बिजनेस नहीं, उसकी डेमोक्रेटिक प्रोजेक्ट का हिस्सा है. माननीय प्रधानमंत्री ने जिस डिजिटल इंडिया का सपना देखा है, उसे पूरा करने की जरूरी कोशिश है.

फिलहाल, रिलायंस इन्डस्ट्रीज की इस पूरी स्ट्रैटजी पर बिना शक किए, इसे नए किस्म का बिजनेस पैटर्न करार दिए बिना भी सिर्फ इस सिरे से विचार करें कि इस सेवा से जो “सेलफोन नेशन” बनने जा रहा है वो जीते-जागते राष्ट्र से बेहतर होगा ? खुद मुकेश अंबानी ने घोषणा की है कि हम चाहते हैं कि यहां के लोग डेटागिरी करें. डेटागिरी का मतलब ज्यादा से ज्यादा इंटरनेट का, मोबाइल फोन का और 4 जी की रफ्तार से मिलनेवाली मीडिया सामग्री का इस्तेमाल.

इसमे कोई दो राय नहीं कि आर जियो में डेटा पैक के चार्ज किसी दूसरी कंपनी की मोबाइल सेवा के मुकाबले नब्बे फीसदी जब कम है तो इसके उपभोक्ता r.chomsky debateज्यादा सर्फिंग कर सकेंगे, इंटरनेट की सामग्री के ज्यादा बड़े उपभोक्ता बन सकेंगे और यहां तक कि मनोरंजन की दुनिया के ज्यादा करीब होंगे. ये पूरी स्थिति सत्तर के आखिरी दशक के उन तर्कों का दोहराव है जो दूरदर्शन और संचार के संसाधनों के प्रसार के दौरान दिए गए थे. तब भारत सरकार ने अमेरिका के नासा की मदद से जिस साइट (1975-76) कार्यक्रम को इस काम में लगाया और एक साल बाद नतीजे बहुत संतोषजनक नहीं रहे. इन सबके बावजूद संचार के संसाधनों को विस्तार दिए जाने का काम उससे कहीं ज्यादा आक्रामक अंदाज में होता रहा जबकि इसके जरिए सामाजिक जागरूकता और संवेदनशील समाज के सपने बहुत पीछे छूट गए. इस पूरे मसले को लेकर 1982 में पूरनचंद जोशी कमेटी गठित की गई जिसकी रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया कि जिसे सूचना क्रांति बताकर विस्तार दिया जा रहा है, वो महज संचार क्रांति है. कमेटी ने ये भी जोड़ा कि जब तक सूचना के स्तर पर, सामग्री के स्तर पर, विचार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के स्तर पर लोगों को मजबूत नहीं किया जाता, संचार क्रांति के विस्तार के बावजूद सामाजिक विकास का एजेंड़ा पिछड़ता चला जाएगा.

इतना ही नहीं, नेहरू युग में जिस आकाशवाणी को सामाजिक विकास का माध्यम के दावे के साथ विस्तार दिया गया, एक के बाद एक स्टेशन खोले गए, उसकी आलोचना खुद आकाशवाणी के अनुभवी लोगों ने की. केशवचंद्र वर्मा जिन्होंने लगभग तीन दशक तक आकाशवाणी में अपनी सेवाएं दी, लिखा- नेहरू के जिस गुलाबी समाजवाद के प्रभाव से घर-घर रेडियो पहुंचाने का काम किया जा रहा है, सच्चाई तो ये है कि उसके जरिए साइकिलऔर घड़ी पहुंचाने का काम ज्यादा हो रहा है. उस वक्त साइकिल और घड़ी दहेज सामग्री के तौर पर लोकप्रिय रहे हैं.

नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी से होते हुए अब जो संचार क्रांति डिजिटल इंडिया के दौर में आकर सरकार और रिलायंस इन्डस्ट्रीज की जुगलबंदी के साथ आगे बढ़ने जा रहा है, इन सबमे एक सवाल पहले की ही तरह बरकरार है. सवाल ये कि संचार के विस्तार की चर्चा जो कि व्यावहारिक स्तर पर व्यवसाय का विस्तार है, सामाजिक विकास के तौर पर प्रोजेक्ट किया जाना किस हद तक तर्कसंगत है? एक रेडियो, टेलिविजन, मोबाइल फोन का उपभोक्ता क्या उसी स्तर का जागरूक नागरिक होगा जिसकी अपेक्षा सेलफोन नेशन से इतर वास्तविक दुनिया में होती है?

r.chomskyसाल 2013 में रॉबिन जेफ्री और ऐशा डोरॉन ने जब मोबाइल फोन के जरिए बनने वाले इस सेलफोन नेशन भारत का गहन अध्ययन किया तो इसके प्रयोग से आम जनजीवन में आई सहूलियतों के साथ-साथ उन पेचीदगियों और दुश्वारियों को भी शामिल किया जो कि दावे से कहीं ज्यादा स्याह और गहरे हैं. इस लिहाज से आर जियो पहला ऐसा मोबाइल नहीं है जो हिन्दुस्तान को जोड़ने के दावे पेश कर रहा है. नोकिया की पूरी ब्रांडिंग कनेक्टिंग इंडिया की पंचलाइन पर टिकी रही है. लेकिन डेटागिरी की मुकेश अंबानी की इस शुभेच्छा के बीच क्या इस सिरे के सवाल छोड़ देने चाहिए कि मौजूदा दौर में मोबाइल फोन सिर्फ बातचीत करने भर तक के संसाधन नहीं है. ये एक 360 डिग्री एक ऐसा मीडिया प्लेटफॉर्म है जहां प्रिंट, रेडियो, टेलिविजन और वेबसाइट के खिलाड़ियों का जमावड़ा हुआ करता है. ये वो दुनिया है जिसके विस्तार से बाकी के परंपरागत माध्यमों की सेहत बननी-बिगड़नी शुरू हो गई है. ऐसे में रिलायंस इन्डस्ट्रीज जिस नए भारत का नक्शा अपनी इस नई मोबाइल सेवा के जरिए तैयार करने जा रहा है, उसके साथ एक सवाल गहरे स्तर पर जुड़ा है- इस डेटागिरी के जनतंत्र की नागरिकता की क्या-क्या शर्तें होंगी?

न्यूज नेटवर्किंग और मीडिया खिलाड़ियों के शामिल होने के स्तर पर ये जनतंत्र कितना वैश्विक है और साथ ही वैचारिक स्तर पर अपने नागरिकों को इस बात की r.chomsky techकितनी छूट देता है कि उससे असहमत होकर भी कोई इसमे बरकरार रहे. अपने शुरूआती दौर में ही ये खबर आने लगी है कि देश की प्रमुख वेबसाइट ने अपनी संपादकीय नीति में बदलाव से मना कर दिया तो इस जनतंत्र में घुसने के रास्ते बंद हो गए. इस घटना को थोड़ा और पीछे ले जाकर समझने की कोशिश करें जब साल 2012 के पहले सप्ताह में रिलायंस इन्डस्ट्रीज ने एक ट्रस्ट बनाकर नेटवर्क 18 मे तकरीबन 1700 करोड़ रूपये का निवेश किया. इस निवेश के साथ ही ईटीवी का टीवी 18 में विलय हो गया और जो ईटीवी सालों से क्षेत्रीय समाचारों और मुद्दों को उठाने का सबसे जरूरी मंच रहा है, वो देखते ही देखते इस समूह की कबाड़ सामग्री का प्रसारक बन गया. इस पर पूरी तरह रिलायंस इन्डस्ट्रीज की इजारेदारी होने की वजह से इस कॉर्पोरेट घराने के खिलाफ एक लाइन की भी स्टोरी प्रसारित होना बंद हो गई.

modi lastफिलहाल वस्तुस्थिति ये है कि जियो का ये लोकतंत्र, बहुमत की सरकार से संचालित लोकतंत्र के बीच इस कदर घुलमिल गया है कि किसी एक से असहमति में बोलने का अर्थ विकास के विरोध में बोलने जैसा है. फिर उपभोक्ता के स्तर पर जब देश के नागरिक दूसरी मोबाइल कंपनियों की मनमानी और जकड़बंदी से मुक्त महसूस कर रहे हों तो ऐसे में इन बारीकियों में जाकर सोचने का प्रतिकूल समय जान पड़ता है. लेकिन फर्ज कीजिए कि यही 360 डिग्री मीडिया मंच से आपकी-हमारी जिंदगी के वो सारे बड़े फैसले तय होने लगेंगे जो कि स्वाभाविक ही है जो अब तक संसद, कोर्ट-कटहरी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बीच से तय होते रहें हैं तो आजाद उपभोक्ता होकर भी आजाद नागरिक बने रहने के दावे किए जा सकेंगे? सामग्री के स्तर की इजारेदारी जब सीधे-सीधे जिंदगी से जुड़ने लगे तो फिर मुफ्त और उदार डेटागिरी के लोकतंत्र की आस्था कहां जाकर पनाह मांगेगी?

 

 

(लेखक मीडिया विश्लेषक हैं)

29 COMMENTS

  1. भाई, पढ़ा, पर कुछ सवाल शेष रह गए. पहला तो यही कि ‘राष्ट्रवादी डेटागिरी’ टर्म क्या सिर्फ लोगों के ध्यान ख़ींचने के लिए है, या इसका संचार के क्षेत्र में कोई नया अर्थ है, जैसा कि print capitalism?

    ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’ निस्संदेह मोबाइल विज्ञापन के लिए एक बेहतरीन कॉपी थी. क्या मैनुएल कैसल्स भी इस सदी के पहले दशक में नेटवर्क सोसाइटी के संदर्भ में -Mobile communication is not about mobility but about autonomy, नहीं कहते हैं!

    मुकेश अंबानी मोदी के अखंड भारत का सपना नहीं देख रहे हैं. बरसों पहले मैंने ऑस्ट्रेलिया के अखबारों में रिलांयस का विज्ञापन देखा था. आवारा पूंजी के लिए क्या दिल्ली और क्या टिंबकटू. शायद एनडीटीवी, इंडिया टुडे टीवी आदि भी सरकार के विभिन्न परियोजानाओं में हिस्सेदार है. हां, इस बात पर अस्पष्टता है कि मोदी की तस्वीर के इस्तेमाल का क्या संदर्भ था, शर्त क्या थी. 

    क्या जियो 4 जी से पहले ‘सेलफोन नेशन’ हमारा भारत नहीं था? आप खुद जैफ्री और डोरोन की किताब (2013) का हवाला देते हैं. जिस दौर में हम-आप लिख रहे हैं, बात कर रहे हैं वह दौर सूचना क्रांति का है . इसकी तुलना नेहरू और राजीव गाँधी के दौर के संचार क्रांति से नहीं की जा सकती है. भूमंडलीकरण का रथ संचार के इन्हीं तकनीकी के सहारे तो भारत में उतरा है. समाज के बदलाव से संचार तकनीकी का बदलाव भी जुड़ा है…टेलीग्राफ, रेडियो, टीवी, इंटरनेट, मोबाइल उदाहरण हैं. जाहिर है 4 जी अपने तई सामाजिक बदलाव लेकर आएगा जैसा कि 2 या 3 जी लेकर आया. नागरिकता की शर्त कैसे बदल जाएगी 4 जी के आने के बाद, समझा नहीं. 

    और 4 जी की सुविधा उपभोक्ताओँ को सिर्फ रिलांयस से ही मिलेगा क्या? अभी बाज़ार में मॉनोपाली या अलिगोपॉली नहीं है. प्रतिस्पर्धा से उपोभक्ता को तो फायदा होना ही है. बाय द वे, आश्चर्यजनक रूप से इसी नेटवर्क 18 पर मैंने मोदी सरकार की आलोचना, खरी-खोटी की खबरें देखी सुनी है….

    प्रोपोगेंडा की भाषा और विश्लेषण की भाषा में अंतर तो होना ही चाहिए—“फिलहाल वस्तुस्थिति ये है कि जियो का ये लोकतंत्र, बहुमत की सरकार से संचालित लोकतंत्र के बीच इस कदर घुलमिल गया है कि किसी एक से असहमति में बोलने का अर्थ विकास के विरोध में बोलने जैसा है.” 

    हम-आप विरोध में बोल रहे हैं, यही लोकतंत्र है. और देखिए रिलांयस के नेटवर्क का इस्तेमाल कर यह सब लिख-बोल रहे हैं!

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