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जेएनयू में वंदे मातरम् कार्यशाला: जंगे आज़ादी के समय मुखबिरी करने वाले सिखा रहे हैं राष्ट्रवाद !

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जेएनयू में राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट द्वारा वंदे मातरम् कार्यशाला का आयोजन

आरएसएस-भाजपा के छद्म राष्ट्रवाद को बेनकाब करने के लिए कार्यशाला

 सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राओं ने की शिरकत

हाल ही में वंदे मातरम पर आरएसएस-बीजेपी द्वारा खड़े किए गए विवाद का जवाब देने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट ने वंदे मातरम् कार्यशाला का आयोजन किया। जेएनयू के साबरमती ढाबे पर आयोजित इस कार्यशाला में सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज की। कार्यक्रम की शुरुआत ऋचा राज ने राष्ट्रीय आंदोलन परंपरा से गीत प्रस्तुत किए। बिरसा मुंडा पर लिखे गए गीतों से होते हुए यह सिलसिला बिस्मिल अज़ीमाबादी, रामप्रसाद बिस्मिल, अकबर इलाहाबादी, जोश मलीहाबादी, अली सरदार जाफ़री, साहिर लुधियानवी और श्यामलाल गुप्त पार्षद से होते हुए इन्क़लाब ज़िंदाबाद जैसे क्रांतिकारी गीतों के साथ संपन्न हुआ।

इस संगीतमय कार्यशाला में प्रख्यात संगीतकार शुभेंदु घोष की उपस्थिति ने इसे जनवादी स्वर प्रदान किया। शुभेंद घोष जेएनयू के’प्रतिध्वनि’ नाम से प्रसिद्ध एक संगीत समूह के संस्थापक रहे हैं। इसके अतिरिक्त प्रख्यात संगीतकार काजल घोष ने इस वर्कशॉप में ‘डोला हो डोला’ जैसे अति लोकप्रिय गीतों से कार्यक्रम की नई ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया। काजल घोष ने जेएनयू के दिनों में ‘परचम’ नाम से एक समूह का संचालन करते थे जिसकी अपनी एक गौरवशाली परंपरा रही है। इसके अतिरिक्त प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी वागीश झा ने अंग्रेजी राज में ज़ब्तशुदा तरानों की प्रस्तुति से लोगों को आज़ादी की लड़ाई के विविध आयामों से परिचित कराया। वागीश झा भी जेएनयू के दिनों में ‘परचम’ नाम से एक समूह के संस्थापक रहे हैं। राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट की अनु वाजपेयी ने वंदे मातरम से कार्यक्रम की शुरुआत करने के अतिरिक्त करने के अतिरिक्त अंत में लोगों को वंदे मातरम् का सस्वर पाठ करने का प्रशिक्षण दिया।

इस बीच अकादमिक सत्र में ‘वंदे मातरम्: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान राजनीति’ विषय पर आयोजित पैनल डिस्कशन में प्रख्यात इतिहासकार मृदुला मुखर्जी और आदित्य मुखर्जी के अलावा एनडीटीवी से जुड़ी रहीं और हाल में द वायर से संबद्ध आरफ़ा ख़ानम शेरवानी तथा राष्ट्रीय आंदोलन फ़्रंट के महासचिव सौरभ वाजपेयी शामिल हुए। कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रीय आंदोलन फ़्रंट के संचिव और दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रवक्ता सुबीर डे ने किया। प्रो.मृदुला मुखर्जी ने वंदे मातरम गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस गीत को 1905 के बंगाल विभाजन के समय गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने लोकप्रिय बनाया था। उन्होंने यह भी बताया कि इसके बाद इस गीत को तमाम भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। तमिल अनुवाद सुब्रमण्यम भारती जैसे प्रख्यात कवि ने किया। लेकिन किसी ने उनसे ज़ोर-ज़बरदस्ती नही की थी कि वो इस गीत का अनुवाद करें। किसी भी चीज़ को ताक़त के बल पर लोकप्रिय नहीं बनाया जा सकता।

प्रो.आदित्य मुखर्जी ने हाल ही में नगरपालिकाओं में वंदे मातरम् को अनिवार्य किए जाने पर कहा कि आज़ादी की पूरी लड़ाई खुद में ही प्रतिरोध है। लेकिन आज हमें यह बताया जा रहा है कि राज्य ही राष्ट्र है। जबकि राष्ट्रवाद हमेशा लोगों का होता है जो तमाम बार अपनी सरकार के ख़िलाफ़ भी लड़ता है। गाँधीजी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि गाँधी जी का राष्ट्रवाद कहता है कि हमें समाज के आखिरी आदमी के भी आँसू पोंछने हैं। उन्होंने कहा कि आरएसएस का राष्ट्रवाद यूरोप से प्रेरणा लेता है जबकि हमारा राष्ट्रवाद आज़ादी की लड़ाई से निकला है।

आरफ़ा ख़ानम शेरवानी ने कहा कि आज के समय दोनों तरह का कट्टरपंथ इतना बढ़ गया है कि मुझे हिंदू कट्टरपंथी मुस्लिम के रूप में देखते हैं तो मुल्ले मुझे मुसलमान नहीं मानते क्योंकि उनके मुताबिक मैं मुसलमान की तरह दिखती नहीं हूँ।यह कठिन समय है जब लोग हर वक़्त आपसे पूछते रहते हैं  कि आप पहले मुस्लिम हैं या पहले हिंदुस्तानी हैं। उन्होंने दो टूक कहा कि अगर हिंदुत्व के लोग मुझे ज़बरदस्ती वंदे मातरम्  गाने के लिए कहेंगे तो मैं नहीं गाऊँगी, लेकिन अगरकट्टरपंथी मुल्ले मुझे जबरदस्ती वंदेमातरम न गाने को कहेंगे तो मैं जरूर गाऊंगी।

राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के संयोजक सौरभ वाजपेयी ने कहा कि देशद्रोह-देशप्रेम के इस नए खेल में आरएसएस-भाजपा हमारे प्रतीक चुराने की कोशिश कर रही है। जब पूरा देश वंदे मातरम् गाते हुए आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, उस वक्त ये लोग या तो माफीनामे लिख रहे थे या मुखबिरी कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम गीत को विवादित करने का श्रेय जिन पार्टियों को जाता है, वो हैं मुस्लिम लीग और आरएसएस-हिदू महासभा। पहले ने देश का बँटवारा कराया था और दूसरी तरह के लोग देश को अंदर से तोड़ने की साजिश रच रहे हैं। उन्होंने धूमिल की कविता की पंक्तियाँ ‘मेरे भीतर का भय चीखता है दिग्विजय-दिग्विजय’ को उद्धृत करते हुए कहा कि आरएसएस और भाजपा के दिल में आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा न लेने का भय है जो इन्हें आक्रामक बनाता है।

कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट की जेएनयू युनिट के संयोजक सनी धीमान ने आमंत्रित अतिथियों और श्रोताओं का कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए हार्दिक धन्यवाद दिया। इसके अलावा इस कार्यक्रम में फ्रंट के राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के उपाध्यक्ष अटल तिवारी और हृषिकेश बेहेरा, सुधा तिवारी, अमन सिंह, प्राजल्या प्रसाद आदि उपस्थित रहे।

(राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट की प्रेस विज्ञप्ति )