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राष्ट्रीय नेताओं के दंगल के ख़िलाफ़ साझा विरासत की अलख जगाएगा राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट

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राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रन्ट का दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर संपन्न

 

 

तय कीजिए: गलत करेंगे नहीं, गलत सहेंगे नहीं

वरिष्ठ गांधीवादियों समेत प्रख्यात इतिहासकार, पत्रकार और कार्यकर्ताओं ने की चर्चा

देश भर में वैचारिक-सांस्कृतिक जागरण और रचनात्मक कार्यक्रमों के विस्तार का अभियान

 

 

दिल्ली: भारतीय स्वाधीनता संघर्ष की सभी धाराओं को गाँधी के नेतृत्व में फिर से एकजुट करने के लिए समर्पित स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट ने देश के कई राज्यों से अपने कस्टोडियन नामक कार्यकर्ताओं के लिए दो दिवसीय योजना एवं प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया। यह शिविर राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट नेतृत्व के कस्टोडियन नामक चुनिन्दा सदस्यों के लिए दिल्ली के किंग्सवे कैंप स्थित गाँधी आश्रम में दिनांक 15 और 16 जुलाई को आयोजित हुआ।

राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट का मानना है कि आज़ादी के सभी नायकों को एकजुट करके उनकी साझा विरासत के सहारे ही आज के समय की गहन चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। इसकी स्थापना सन 2015 को नयी दिल्ली से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुयी थी और आज फ्रंट के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि राज्यों में फैले हैं।

आज़ादी के बाद वैचारिक-सांस्कृतिक जागरण के साथ-साथ देश भर में रचनात्मक और सेवा कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू हुआ यह एक विरल प्रयास है। इस प्रयास में बुद्धिजीवी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी, छात्र-छात्राएं सभी वर्ग शामिल हैं। राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट गाँधी, नेहरु, भगत सिंह, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, खान अब्दुल गफ्फार खान, अम्बेडकर सहित तमाम क्रांतिकारी, समाजवादी, किसान और आदिवासी नेताओं को अपनी प्रेरणा मानता है। फ्रंट का नारा है कि देश को बनाने और सजाने का काम करने के लिए निःस्वार्थ सेवकों की एक ऐसी पीढी तैयार करनी है जो देश भर में अपने महानायकों के सपने का भारत बनाने का अभियान छेड़ दे। इसलिए अतीत की बुनियाद पर वर्तमान के निर्माण की इस मुहीम का नारा है— देश है तो हम हैं देश नहीं तो हम कहाँ?

जहाँ एक तरफ मृदुला मुख़र्जी, आदित्य मुख़र्जी जैसे कई प्रख्यात बुद्धिजीवी फ्रंट के साथ हैं वहीं वयोवृद्ध गाँधीवादी जैसे पूर्व सांसद रामजी सिंह, गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष रामचंद्र राही, सर्वसेवा संघ के पूर्व अध्यक्ष अमरनाथ भाई आदि भी फ्रंट को समर्थन देने पहुँचे।

आजादी के मूल्यों को समर्पित संगठन फ्रंट का यह पहला दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर सोमवार (16 जुलाई) को दिल्ली में संपन्न हो गया। शिविर के पहले दिन जहां दो सत्रों में वक्ताओं ने स्वाधीनता संघर्ष के विविध आयामों से लेकर आज की चुनौतियों और इतिहास का परिप्रेक्ष्य विषय पर बात की वहीं फ्रंट के सांस्कृतिक दल ने क्रांतिकारी गीत पेश किए। देश के विभिन्न राज्यों से आए संगठन के कस्टोडियन्स ने आपसी परिचय व संवाद के साथ कामकाज के तरीके और कामों के विभाजन आदि अनेक पहलुओं पर विचार किया।

दिल्ली स्थित गांधी आश्रम, हरिजन सेवक संघ में दो दिवसीय शिविर में देश के विभिन्न राज्यों से आए सदस्यों को संबोधित करते हुए इतिहासकार प्रो मृदुला मुखर्जी ने कहा कि गांधीजी सहित आज़ादी की लड़ाई को लेकर जो झूठ प्रचारित किया जा रहा है, उसका मुकाबला करने के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट आज के समय की जरूरत है। उन्होंने जातिवाद, दलित राजनीति, छुआछूत आदि मसलों का जिक्र करते हुए गांधी के काम को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत पर बल दिया। प्रो मृदुला मुखर्जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन के कामों की सराहना करते हुए कहा कि रचनात्मक कार्यों का बहुत महत्त्व है क्योंकि आम लोग यह देखते हैं कौन है जो सेवा कर रहा है। इसी को ध्यान में रखकर लोग तय करते हैं कि उसके साथ खड़े होना है या नहीं।

 

इतिहासकार आदित्य मुखर्जी ने कहा कि अभी तक गरीब के पास एक ही रास्ता रहता था कि वह अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर रोजी रोटी में लगा दे। लेकिन सरकार शिक्षा का बजट लगातार घटा रही है। वह जान बूझकर सार्वजनिक शिक्षा को खत्म कर रही है। उन्होंने एक निजी यूनिवर्सिटी का हवाला देते हुए कहा कि वहां बीए करने के लिए तीन साल में बच्चे को 21 लाख रुपए देने पड़ रहे हैं। यानी अब गरीब के लिए शिक्षा नहीं रहेगी वहीं दूसरी ओर जिस संस्थान का अभी अस्तित्व ही नहीं है उसे देश के उम्दा संस्थानों में शामिल किया जा रहा है और उसे बड़े पैमाने पर धन भी देने की तैयारी है।

मुखर्जी की बात को आगे बढ़ाते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक नेता आदित्य नारायण मिश्रा का कहना था कि जब अडानी- अम्बानी के हाथ में शिक्षा व्यवस्था चली जाएगी तो देश की शिक्षा व्यवस्था का गला दब जाएगा। उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडितजवाहर लाल नेहरू के शिक्षा क्षेत्र में किए गए योगदान को मौजूदा प्रधानमंत्री से तुलना की। साथ ही बताया कि मौजूदा प्रधानमंत्री की प्राथमिकता में शिक्षा व्यवस्था है ही नहीं। इसके लिए उन्होंने गुजरात में लागू किए गए उच्च शिक्षा बिल का हवाला दिया जिसमें अधिकांश अधिकार सरकार के पास हैं।

गांधीवादी मूल्यों में अटूट विश्वास रखने वाले पूर्व सांसद रामजी सिंह ने कहा कि यह ऐसा समय है। जिसमें गांधीवादी मूल्यों को खारिज करने का प्रयास हो रहा है। उनको बचाने और आगे बढ़ाने के लिए फ्रन्ट से जुड़े युवाओं को बड़े पैमाने पर आगे आना होगा। गांधीवादी रामचन्द्र राही ने कहा कि मौजूदा समय में फासीवादी नीतियों से ज्यादा सरकार के कथित विकासवादी एजेंडे से लड़ने की जरूरत है। वह ज्यादा हानिकारक है। हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष शंकर सान्याल ने गांधी की नीतियों को बढ़ाने पर जोर दिया। इसी के साथ पहले सत्र का समापन हो गया।

दूसरे सत्र में हमारे काम से जुड़ी चुनौतियां और इतिहास का सही परिप्रेक्ष्य विषय पर बोलते हुए इतिहासकार सुचेता महाजन ने कहा कि आज फासीवादी ताकतें राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों को अपने पाले में कर रही हैं। पटेल को वह अपना नायक मानने का ढ़ोंग कर रही हैं और गांधी को भी अपने पाले में लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। नेहरू को खारिज करने की मुहिम के जोरदार मुक़ाबले की सलाह देते हुए उन्होनें कहा कि ऐसे समय में हम सभी को एकजुट रहने की जरूरत है।

 

 

पत्रकार व लेखक अरुण त्रिपाठी का कहना था कि ऐसा लग रहा है जैसे आज हमारे महापुरुषों का दंगल कराया जा रहा है। इसमें गांधी को सबसे बड़ा अन्यायी साबित करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के सभी नेताओं के शत्रु के तौर पर बताया जा रहा है। अंग्रेजों के तो वह शत्रु थे ही। रही-सही कसर सफाई अभियान में सीमित कर उन्हें निपटाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि एक बात ध्यान रखिए कि सत्य का मार्ग कठिन है लेकिन किसी को तो हलाहल पीना पड़ेगा।

गांधीवादी लेखिका और राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट की कस्टोडियन सुजाता चौधरी ने कहा कि जिन लोगों ने आंदोलन में सब कुछ कुर्बान कर दिया उन लोगों को आज बदनाम किया जा रहा है। इसकी नींव किसी संगठन या राजनीतिक दल ने नहीं बल्कि अंग्रेजों ने डाली थी। उनका कहना था कि हम लोगों को इंतजार नहीं करना है कि किसकी सत्ता है या वह कब तक रहेगी, हमें तो बस लगातार दशकों तक काम करना है। ध्यान रखिए राजनीति या सेवा में जो लोग आगे जाएंगे उनके लिए यह राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रन्ट प्रशिक्षण की भट्ठी का काम करेगा।

इतिहासकार आलोक बाजपेयी का कहना था कि गांधी को विरोधियों ने तो नुकसान पहुंचाया ही लेकिन उनके समर्थकों ने भी उन्हें समझने का पूरा प्रयास नहीं किया। उन्होंने कहा कि हमने अपनी संवाद की जुबान खो दी है। उन्होंने फ्रंट को आम लोगों से बातचीत अथवा संवाद उन्हीं की भाषा में करने पर जोर दिया।

वयोवृद्ध गांधीवादी अमरनाथ भाई ने शहरों से लेकर गांवों तक के लोगों को जोड़ने की बात कही। साथ ही विमर्श के केंद्र में गांधी को लाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इंदिरा के समय आपातकाल लगा था लेकिन आज आफतकाल लगा है। ऐसे में अपनी रचनात्मकता से ही कुछ करना संभव है। उनकी सलाह थी कि जब यह तय कर लिया है कि हम गलत करेंगे नहीं और हम गलत सहेंगे नहीं तो ही देश का निर्माण संभव है।

युवा संवाद से जुड़े अशोक भारत ने कहा कि झूठ का तंत्र सत्य के सामपने टिकता नहीं है। फ्रंट का आह्वान करते हुए उन्होनें कहा कि अहिंसक संघर्ष के सैनिक पैदा कीजिए, युवाओं के बीच जाइए। उनसे आज के सन्दर्भ में बातें कीजिए तभी बात बनेगी।

दोनों सत्रों का सफल संचालन संस्कृतिकर्मी और फ्रंट के कस्टोडियन वागीश झा ने किया तो इससे पहले फ्रन्ट के उद्देश्यों के बारे में कस्टोडियन सौरभ बाजपेयी ने विस्तार के साथ प्रकाश डाला। देर शाम वागीश झा और जुगनू सांस्कृतिक मंच के नेतृत्व में फ्रन्ट की सांस्कृतिक टीम ने आज़ादी की लड़ाई के दौरान प्रतिबंधित गीतों के साथ-साथ क्रान्तिकारी गीत पेश किए।

 

शिविर के दूसरे दिन पहले सत्र में आपसी परिचय हुआ तो दूसरे सत्र में कार्यों का विभाजन किया गया। संगठन की सह समितियों के गठन के साथ काम करने की रणनीति पर विचार विमर्श हुआ। अंत में सदस्यों को एक प्रार्थना देश के नाम की शपथ दिलाई गई और सभी कस्टोडियंस ने एक-दूसरे की कलाई पर खादी का बना तिरंगा रक्षा सूत्र बाँधा. शिविर का अंत संगठन के जोशीले नारों के साथ हुआ और अगले शिविर में फिर इकठ्ठा होने का वादा किया गया। प्रशिक्षण शिविर में दिल्ली सहित गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।

 

अटल तिवारी

 

प्रेस विज्ञप्ति पर आधारिित