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काशी की धरती पर गांव-कस्‍बों से आई पुलिस यातना की शिकार जनता ने सुनाई अपनी आपबीती

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एक तरफ़ बनारस मंगलवार को बीएचयू परिसर के खुलने के कारण चर्चा में रहा तो दूसरी ओर शहर के बीचोबीच कुछ राज्‍यों के भीतरी इलाकों से आए यातना पीडि़तों ने अपने ऊपर हुए जुल्‍म की दास्‍तानों को सुनाकर लोगों को भावविभोर कर दिया। इस कार्यक्रम में मीडियाविजिल एक सक्रिय सह-आयोजक के रूप में उपस्थित था जिसे मानवाधिकार जन निगरानी समिति ने रामजी यादव के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘गांव के लोग’, संग्राम, जीवन ज्‍योति संस्‍थान, मुंशी प्रेमचंद युवा पंचायत और सावित्रीबाई फुले महिला पंचायत के संयुक्‍त तत्‍वावधान में संयुक्‍त राष्‍ट्र के यातना पीडि़त कोष के सहयोग से आयोजित किया।

 

कार्यक्रम का केंद्रीय विषय था ‘चुप्‍पी की संस्‍कृति और युवा” जिसमें सबसे पहले सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लेनिन रघुवंशी की पुस्‍तक ”आज़ाद भारत में दलित” का लोकार्पण किया गया। इसके बाद झारखण्‍ड के हज़ारीबाग के बड़कागांव गोलीकांड के शिकार लोगों, आंबेडकरनगर, सोनभद्र और बनारस से आए ग्रामीणों से अपने उपर जुल्‍म की कहानियां बयान कीं।

एक मंच पर कई घटनाओं के पीडि़तों का एक साथ अपने दुख साझा करना बहुत अहम रहा जिससे एक बात समझ में आई कि पूरे देश में पुलिस-प्रशासन लोकतंत्र की कैसे धज्जियां उड़ा रहा है और आम लोगों के मानवाधिकारों का कैसे हनन किया जा रहा है।

बड़कागांव गोलीकांड के पीडि़त शिवशंकर राय ने अपनी आपबीती सुनाते हुए एक अहम सवाल उठाया कि आखिर आम लोग अपने ऊपर हुए अत्‍याचारों की खबर मीडिया और सरोकारी लोगों तक कैसे पहुंचाएं, इस पर भी बात होनी चाहिए। नीचे सुनिए उनका पूरा बयान:

अंबेडकरनगर से आए राजेश वनवासी की कहानी बहुत दर्दनाक थी। गांव के कुछ दबंगों ने उनकी बेटी के साथ बलात्‍कार किया था और उसका हाथ काट दिया था। वे राजस्‍थान में काम करते हैं। घटना का पता लगने पर वे अपने गांव वापस आए और उन्‍होंने मुकदमा दजदर्ज करवाने की कोशिश की जो नाकाम रही। उन्‍होंने कहा, ”इस घटना पर जब मैं शिकायत लेकर एसपी कार्यालय गया तो वहां इस पर मीडियाबाजी होने लगी।” आखिरकार समिति के एक कार्यकर्ता की मदद से उनका मुकदमा दर्ज हो सका।

नीचे सुनिए वनवासी की व्‍यथा कथा:

सोनभद्र से आए सजाब खान की समस्‍या उनकी रिहाइश को लेकर थी। उन्‍होंने बताया कि 1952 से उन्‍हें आवंटित जमीन पर उन्‍हें रहने का अधिकार छीन लिया गया और उन्‍हीं की ज़मीन पर रहने के लिए उनसे पैसे मांगे गए।

 

गवाहों की सूची में इकलौती महिला करमा आदिवासियों के बीच से थीं जो सोनभद्र से आई थीं। उन्‍हें भी पुलिस उत्‍पीड़न का शिकार बनना पड़ा। पुलिस की मार से उनका प्रसव हो गया। उनके पति की पिटाई की गई। उन्‍होंने बहुत तफ़सील से अपनी कहानी सबके बीच खुलकर सुनायी:

इस कार्यक्रम का उद्देश्‍य आम लोगों के बीच फैली चुप्‍पी की संस्‍कृति को तोड़ना था। उन्‍हें यह बताना था कि वे जब तक अपने ऊपर हुए जुल्‍म को लोगों के बीच लेकर नहीं जाएंगे, तब तक उनका संघर्ष आगे नहीं बढ़ सकेगा। अलग-अलग क्षेत्रों से आए यातना पीडि़तों के संघर्षों के बीच ऐसी एकजुटता कायम करने का यह प्रयोग अनूठा था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय इलाके में होने के नाते राजनीतिक अहमियत रखता है।

 

1 COMMENT

  1. marne ke baad admi kuch nahi bolta, marne ke baad admi kuch nahi karta.kuch nahi bolne kuch nahi karne se admi mar jata hai(a poem)

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