Home आयोजन डिजिटल मीडिया में गंभीर काम का रास्‍ता चंदे से होकर गुज़रता है

डिजिटल मीडिया में गंभीर काम का रास्‍ता चंदे से होकर गुज़रता है

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रोहिन वर्मा

अंग्रेजी की एक प्रतिष्ठित वेबसाइट न्‍यूज़लॉन्‍ड्री ने डिजिटल मीडिया की संभावनाओं और चुनौतियों पर दो दिवसीय एक सेमिनार का आयोजन दिल्‍ली में पिछले दिनों करवाया- The Media Rumble. इंडिया गेट के समीप बीकानेर हाउस में डिजिटल मीडिया की दशा-दिशा पर चिंता जताई गई। उसमें दो से ढाई सौ लोग मौजूद रहे। उसमें भी नब्बे फीसदी लोग मीडिया से ही जुड़े थे। दिल्ली में पिछले तीन साल से सेमिनार में उपस्थिति दर्ज कराते हुए एक बात महसूस हुई है कि मोटे तौर पर इतनी ही भीड़ और कमोबेश यही चेहरे मीडिया के अंग्रेजी और हिंदी के कार्यक्रमों में आते हैं।

एक चर्चा ‘हिंदी मीडियम’ नाम से हिंदी पत्रकारिता की पर भी की गई लेकिन चर्चा सिर्फ़  हिंदी और अंग्रेजी के भेदभाव पर ही टिकी रह गई। कार्यक्रम के अंत में एक महिला ने वक्ताओं से कहा भी कि हिंदी भी बाकी भाषाओं की तरह एक क्षेत्रीय भाषा ही है। हिंदी वालों ने भी क्षेत्रीय भाषाओं को दरकिनार किया है। क्षेत्रीय भाषाओं में काम करने वालों को आप भी वैसे ही ठग रहे हैं जैसे इंग्लिश ने हिंदी को ठगा है।

चूंकि मीडिया का विस्तार अब डिजिटल में भी हो रहा है लिहाजा एक जरुरी चर्चा डिजिटल मीडिया की व्यावसायिक चुनौतियों पर भी हुई। अख़बार और टीवी के बारे में अक्सर कहा जाता है कि ये दोनों माध्यम विज्ञापन और पूंजीपतियों के पैसों से चलते हैं। नतीजतन होता यह है कि पत्रकारिता दबाव और दखल के कारण अपने स्वतंत्र रूप को साकार कर पाने में संभव नहीं हो पाती है। डिजिटल माध्यम के आने से वैकल्पिक स्वरूप की अवधारणा का विस्तार हुआ। वितरण और उत्पादन मूल्य में बेतहाशा कमी आई लेकिन व्यावसायिक स्तर पर इसकी चुनौतियां कुछ और हैं। आज प्रतिष्ठित अखबारों और टीवी चैनलों के भी डिजिटल प्लेटफार्म जिस तरह की ओछी ख़बरें वेबसाइट पर प्रकाशित करते हैं- जैसे सेक्स करने की विधियां, अभिनेत्रियों की ‘हॉट’ तस्वीरें आदि- वे इसे प्रिंट में छापने की जुर्रत नहीं कर सकते। तो फिर डिजिटल पर ही क्यों? क्योंकि इससे मिलती है ट्रैफिक। ट्रैफिक से आता है इम्प्रेशन काउंट। क्लिकबेट्स की होड़ और गूगल से विज्ञापन लेने के चक्कर में गुणवत्‍तापूर्ण कंटेंट व स्टोरी को वरीयता नहीं दी जाती।

मतलब प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक के बाद डिजिटल भी पूंजी के स्तर पर मजबूर ही दिखता है। सेमिनार में आए कुछ विदेशी और बिज़नेस पत्रकारों ने अपने देशों के अनुभव साझा किए। यूरोप से आए रॉबर्ट वीनबर्ग ने बताया कि उनकी वेबसाइट का व्यावसायिक प्रारूप सब्सक्रिप्शन (चंदा) आधारित है। करीब अस्सी हजार लोग उनकी वेबसाइट को नियमित चंदा देते हैं। अर्थात खबरों और सूचनाओं के महत्त्व का बोध वहां के दर्शकों और पाठकों को है जो उन्हें चंदा देने को प्रेरित करता है। उसी तरह एक बिजनेस वेबसाइट के संपादक ने बताया कि उनकी वेबसाइट भी जनता के चंदे से चलती है। दिन भर में सिर्फ एक लेख ही छापा जाता है क्योंकि उनका मानना है कि स्टोरी की गुणवत्ता में मेहनत और संसाधन लगता है। उनका जोर ख़बरों की संख्या से ज्यादा गुणवत्ता पर है।

भारत में भी स्वतंत्र मीडिया के प्रारूप में कुछ वेबसाइटें पिछले वर्षों के दौरान शुरू की गईं हैं। उनकी अपील भी होती है कि पाठक उन्हें चंदा दे जिससे वे स्वतंत्र रूप से काम कर सकें, लेकिन कुछ लोग ही उनकी मदद करते हैं क्योंकि न इन वेबसाइटों की पहुंच देश भर में है न ही भारतीय दर्शक और पाठक को खबरों और सूचनाओं के महत्त्व का बोध है।

जब मैं सेमिनार हॉल से बाहर आया, तो भारतीय पाठक का अनुभव स्वत: हो आया जब मेरा ध्यान सेमिनार के पास पर गया। मैं भी वहां बतौर सब्सक्राइबर ही आया था। चूंकि वेबसाइट मीडिया के आलोचनात्मक पक्ष को रखती है इसलिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार छोटी सी रकम नियमित रूप से देता हूं वरना आठ सौ की टिकट देकर कौन और कितने लोग सेमिनार देखने आया करते हैं? अभी हमारे यहां दर्शकों को ऐसा एहसास भी कहां है कि क्वालिटी खबर में मेहनत और संसाधन लगते हैं और इसके लिए पैसे देने चाहिए। ये भी सच है कि जिस देश में दो जून की रोटी के जुगाड़ में लोगों की जिंदगी कट रही हो, वहां क्या सब्सक्राइबर न पाने के एवज में उसे सूचना से महरूम कर देना है?

सूचना और ख़बरें देने से इतर मीडिया का एक काम यह भी है कि पाठकों और दर्शकों को शिक्षित करे। उसे मनोरंजन के विस्तार के तौर पर आगे नहीं बढ़ना था। उन्माद को रोकना था न कि उसे मीडिया के व्यावसायिक ढांचेचे के रूप में ढाल देना था। इस परिस्थिति में स्वतंत्र मीडिया के क्रियान्वयन का तर्क ये होता है कि अमीरों से लिया जाए और सब तक तक पंहुचाने की कोशिश की जाए। मोटे तौर पर इसे ‘फिलैन्थ्रॉपी’ मॉडल के नाम से जाना जाता है। मतलब अमीर और सामर्थ्यवान लोग स्वतंत्र मीडिया चलाने के लिए पैसा दें। ऐसे में यह चुनौती बनी रहती है कि पूंजी लगाने वाले का हस्तक्षेप पत्रकारिता को समृद्ध करने के लिए होना चाहिए न कि उसके काम में अवरोध और दबाव उत्पन्न करने के लिए।

हमें डिजिटल मीडिया के व्यावसायिक पक्ष को भारत के विशिष्‍ट सन्दर्भ में समझना होगा। जनता को सूचना और खबरों के महत्त्व का बोध कराना होगा, गुणवत्ता बनाए रखनी होगी, नए रचनात्मक तरीके अपनाने होंगे और सबसे अहम यह है कि सरल भाषा में उनके बीच पहुंच बनानी होगी।

 

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