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“बदले हुए गांव के आईने में प्रेमचंद एक एक्टिविस्ट लेखक नज़र आते हैं”!

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आगरा, 01 अगस्त, 2018। हिंदी कथाकार एवं उपन्यास लेखक प्रेमचंद की 138वीं जयंती पर एक गोष्ठी का आयोजन भगत सिंह स्टडी सर्किल, आगरा द्वारा नागरी प्रचारिणी सभा के सभागार में किया गया। गोष्ठी में “प्रेमचंद और आज के किसान” विषय पर बात रखने के लिए प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव व सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी को आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम की शुरुआत प्रेमचंद की कहानी “सवा सेर गेहूं” और “रंगभूमि” के उपन्यास अंश के पाठ से हुई जिसे युवा साथी अनल झा और डॉ विजय द्वारा पढ़ा गया।

डॉ प्रेमशंकर ने अपने पर्चे “प्रेमचंद और अक्टूबर क्रांति” को पढ़ा और प्रेमचंद की दूरदर्शिता और साहित्यकारों के उनके प्रति नज़रिये को प्रस्तुत किया।डॉ. ज्योत्स्ना रघुवंशी ने विडम्बना व्यक्त करते  हुए कहा कि “इतने समय के बाद भी प्रेमचंद के पात्र प्रासंगिक बने हुए हैं जिससे पता लगता है कि किसानों की बेहतरी के लिए ना के बराबर काम किया गया है.” आलोचक डॉ प्रियम अंकित ने प्रेमचंद के किसान की आर्थिक विवशताओं को मार्मिक ढंग से सामने रख किसानों और सरकारी ऋण के पंजे के संघर्ष पर बात रखी. संचालन करते हुए डॉ बृजराज सिंह ने आज के वर्तमान हालात पर तीखी टिप्पणी करते हुए सरकार और उनके दलालों को किसान का शोषक बताया।

किसानों की वर्तमान स्थिति के सन्दर्भ  में अपनी बात रखते हुए विनीत तिवारी ने कहा कि “आज हालात ये है कि चार बार ईदगाह पढ़ चुके आदमी से भी आप ये उम्मीद नहीं कर सकते कि वो साम्प्रदायिक नहीं होगा क्योंकि साम्प्रदायिकता केवल भावनात्मक स्तर पर ही लोगों के साथ नहीं खेलती वो उनको आर्थिक स्तर पर भी लाभ पहुंचाती है इसलिए जब गांव में लोग बिना प्रेमचंद को पढ़े भी शक्कर-रोटी का सम्बंध रख सद्भाव से रह रहे होते हैं तो वहां भी मॉब-लिंचिंग और ऑनर-किलिंग जैसे मुद्दे उठा कर खेती और किसानी की मूल समस्या से दो चार होते लोगों को आपस में लड़ने पर मजबूर कर दिया जाता है। प्रेमचंद के किसान को केवल चरित्र चित्रण पढ़कर नहीं, उसकी समस्याओं के निराकरण के साथ समझना जरूरी है। उसके आर्थिक पहलू को किसानों के साथ काम करके और उनके साथ संवाद कायम करके जानना पड़ेगा। उसके लिए आपको निकट के गांव और किसान से सम्बन्ध बनाना पड़ेगा और सही समझ और दिशा के साथ लेखन को एक्टिविज्म में बदलना पड़ेगा जैसा प्रेमचंद ने अपने लेखन से किया।”
वर्तमान कृषि संकट के विषय में उन्होंने कहा कि “आज 70 फीसदी आबादी गाँवों में है उनमें से 50 प्रतिशत खेती पर सीधे तौर पर निर्भर है जबकि जीडीपी में उनकी भागीदारी क़रीब 11 प्रतिशत ही बची है। हमें एक ऐसे रोज़गार ढाँचे की ज़रूरत है जो रचनात्मक और मानवीय सोच के साथ खेती पर आबादी के दबाव को कम करके उनके लिए उपयुक्त रोज़गार सृजन करे। ऐसा जनोन्मुखी रोज़गार ढाँचा सहकारिता के आधार पर ही खड़ा किया सकता है, बाज़ार या बाज़ार की ग़ुलाम सरकार के भरोसे नहीं। सरकारें, कॉरपोरेट और ज़मीन के सौदागरों ने मिलकर पिछले 25 सालों में खेती की ज़मीन मे से क़रीब 3 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन चुरा ली है और उसे गैर कृषि उपयोग में बदल दिया है। ये बहुत खतरनाक स्थिति है। आज जब हम किसान की बात करते हैं तो ये भूल जाते हैं कि अब कॉर्पोरेट भी अपनी किसानी कर रहा है जिसको सरकार सब्सिडी दे रही है और जिसके आगे प्रेमचंद के किसानों की कोई औकात नहीं। कॉर्पोरेट्स के अंतर्राष्ट्रीय बाजार के सामने आम किसान का अनाज खरीदना बेचना भी दुष्कर है। जो काम प्रेमचंद ने रंगभूमि लिख कर किया, मंगलसूत्र लिखकर किया वही काम हमें आज के किसान की वास्तविक स्थिति को जानते-समझते हुए करना होगा तभी हम सही मायनों में अपने आपको प्रेमचंद का उत्तराधिकारी कह सकते हैं। प्रेमचंद के समय के ग्रामीण समाज का वर्ग विभाजन आज बहुत अलग शक्ल ले चुका है और मध्यम किसानों की एक बड़ी तादात अस्तित्व में आ चुकी है. खेती पर आधारित पूरे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक ही वर्ग का मानना गलत निष्कर्षों पर ले जाता है. हमें अपने समय के ग्रामीण समाज की वर्गीय समझ को विकसित करना होगा तभी हम आज के किसान समुदाय की व्यथा का सही चित्रण साहित्य के ज़रिये कर सकेंगे।”
गोष्ठी में डॉ नसरीन बेगम, अमीर अहमद साब, डॉ अर्चना प्रसाद, श्रीमती भावना रघुवंशी, डॉ भुवनेश श्रोत्रिय, दिलीप रघुवंशी, विशाल रियाज़, एम पी दीक्षित, फ़ैज़ अली शाह, नीतीश अग्रवाल, मुदित शर्मा, अभिषेक वैद, आलोक भाई, आनंन्द बंसल ,काजल शर्मा, अंतरा मुखर्जी, जर्नी टू रूट से इरम आत्मीय और असीम खान के साथ अनेक छात्र व छात्राएं भी उपस्थित रहे.