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पी.साईनाथ गिनाते रहे कॉरपोरेट मीडिया के ‘पाप’, सुनते रहे राहुल गाँधी चुपचाप !

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प्रख्यात पत्रकार पी.साईनाथ लगभग हर साल ही देश की राजधानी में कहीं न कहीं व्याख्यान देने आते ही हैं। मीडिया उनका पसंदीदा विषय है जिस पर कॉरपोरेट नियंत्रण के ख़तरे को लेकर उनके पास तमाम दिलचस्प आँकड़े होते हैं। हॉल खचाखच भरा रहता है। कुर्सी पर जगह नहीं मिलती तो लोग दीवारों से से सटकर या ज़मीन से लेकर मंच तक पर बैठकर उन्हें सुनते हैं।

हर बार, लगभग एक से चेहरे, साईनाथ से लगभग एक सी बातें सुनते हैं और चले जाते हैं। मीडिया की हालत पर रत्ती भर भी फ़र्क़ नहीं आता। उसका दंगाई, युद्धोन्मादी, ग़रीब विरोधी मिज़ाज ज्यो का त्यों बना रहता है।

(किसी पत्रकार या विचारक के दस साल पुराने नोट प्रासंगिक हों, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा)

लेकिन शनिवार 16 जून की शाम दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में प्रथम नीलाभ मिश्र स्मृति व्याख्यान देने के लिए आए प्रख्यात पत्रकार पी.साईनाथ ने श्रोताओं में एक बिलकुल नया चेहरा देखा, जो हालात बदल सकता था, या बदल सकता है। यह थे काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी। वे चुपचाप आए, श्रीनगर में शहीद हुए वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी के लिए सबके साथ दो मिनट का मौन रखा। क़रीब सवा घंटे का भाषण सुना और चले गए।

(राहुल गाँधी की सुरक्षा व्यवस्था के कारण, सभागार में खड़े होने या ज़मीन पर बैठकर भाषण सुनने की इजाज़त नहीं मिली। तमाम लोग बाहर ही खड़े रह गए। कुछ झुंझलाकर लौट गए तो कुछ ने लॉन में लगाई गई कुर्सियों पर बैठ, स्क्रीन पर भाषण का सीधा प्रसारण देखा-सुना।)

 

 

बहरहाल, हमेशा की तरह पी.साईनाथ कॉरपोरेट मीडिया के पाप गिनाते रहे। लोकतंत्र के सामने खड़े इस भीषण खतरे को लेकर आगाह करते रहे।

पता नहीं, श्रोताओं में बैठे राहुल गाँधी को इस ‘पाप में भागीदार’ होने का अहसास हुआ कि नहीं! पता नहीं, वे इस बात को समझ पाए कि नहीं कि यूपीए सरकार ने एक बड़ा अवसर गँवा दिया,वरना आज मीडिया पर ‘कॉरपोरेट एकाधिकार’ का ऐसा नंगा नाच न हो रहा होता। मीडिया के मौजूदा कारपोरेटी और जनवरिधी चेहरे के पीछे काँग्रेस का हाथ भी क्यों है, इस पर बात करने से पहले जान लें कि साईनाथ ने कहा क्या।

पूरा भाषण लिखने से बेहतर है कि कुछ प्वाइंट गिना दिए जाएँ। तो साईनाथ ने कहा-

 

. मीडिया, कॉरपोरेट दुनिया का ‘आयडियोलाजिकल आर्म’ है।

. मीडिया राजनीतिक रूप से आज़ाद है, लेकिन मुनाफ़े का क़ैदी है।

.आप देश में दलित चीफ़ जस्टिस और दलित चीफ़ मिनिस्टर देख सकते हैं, लेकिन दलित चीफ़ सब एडिटर ढूँढे नहीं मिलेगा।

.मीडिया में दलितों, वंचितों की भागीदारी न के बराबर है। वह उनकी समस्याओं से बेज़ार है। बहुसंख्यक जनता उसके दायरे से बाहर है।

. मीडिया की इस हालत के पीछे पत्रकारों के अच्छे या बुरे होने, या किसी के बिक जाने का मसला नहीं है। यह संरचनात्मक समस्या है। शिक्षा, स्वास्थ्य और दीगर बुनियादी क्षेत्रों में रोजाना तकलीफदेह खबरें आती हैं लेकिन शायद ही कभी संपादकीय लिखा जाता हो, या उन्हें क़ायदे से कवर किया जाता हो। क्योंकि मीडिया जिनके हाथ है, वह शिक्षा और स्वास्थ्य के धंधे में हैं और सरकार की कॉरपोरेटपरस्त नीतियों का सबसे ज़्यादा लाभ उठाते हैं।

. जब हम (पत्रकार) कहते हैं कि (पावर) सत्ता के सामने सच बोला जाए, तो ऐसा लगता है कि सत्ता कोई भोली और मासूम चीज़ है। अब समय आ गया है कि सत्ता के (असली चरित्र) बारे में बात की जाए। लोगों को बताया जाए।

. भारत में बीते ढाई दशकों में साढ़े तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है। यह केवल लोन का मामला नहीं है। लेकिन मीडिया के लिए यह मुद्दा नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर ‘कॉरपोरेट लूट’ निशाने पर आ जाएगी और कॉरपोरेट ही मीडिया का मालिक है।

.राडिया टेप मामले में पत्रकारो पर चर्चा होने लगी, जबकि असल मुद्दा यह था कि कॉरपोरेट का इस कदर सत्ता पर नियंत्रण हो गया है कि वे कैबिनेट मंत्री तय कर रहे हैं।

.पिछले 25 सालों में उदारीकरण और निजीकरण का फायदा उठाने वाली कारपोरेट कंपनियाँ वही हैं जो देश के ज़्यादातर मीडिया को नियंत्रित करती हैं। राजनीति, मीडिया और कॉरपोरेट का एक गठजोड़ बन गया है।

. 2008 से लेकर अब तक कम से कम दस हज़ार पत्रकारों की नौकरी गई है। तमाम काबिल पत्रकार नौकरी से बाहर हैं। कॉरपोरेट मीडिया में कंटेंट की जगह मुनाफ़ा लक्ष्य है। जो लोग अच्छी ख़बर कर सकते हैं, वे विज्ञापन विभाग से तय लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक नही हो पाते। जो विज्ञापन के लिए ख़बरें लिखते हैं, उनकी तरक्की होती है।

.भरत में जैसी ‘असमानता’ इस समय है, वैसी 1920 के दशक में भी नहीं थी, लेकिन मीडिया ख़मोश है क्योंकि समृद्धि के एक सिरे पर उसके मालिक खड़े हैं। इसलिए वह फोर्ड की लिस्ट में बढ़ते भारतीय अरबपतियों की बात करता है, मानव विकास सूचकांक में भारत के 131 वें नंबर पर होने की नहीं।

.भारत में पत्रकारिता की बुनियाद डालने वालों के पास जुनून और चंद रुपये थे। महात्मा गाँधी से लेकर भगत सिंह तक पत्रकार थे। उनकी जनता के बीच साख थी। लोकमान्य तिलक को जब राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो कपड़ा मज़दूरों ने बंबई में विशाल प्रदर्शन किया और 16 मज़दूर पुलिस की गोली से शहीद हो गए। आज जनता और मीडिया एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हैं।

.टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक थॉमस बेनेट ने अख़बार के ज़रिए अंग्रेज़ी सरकार को तिलक पर कार्रवाई के लिए मजबूर किया था, उनके नाम पर अब टाइम्स ग्रुप युनिवर्सिटी चला रहा है। कारपोरेट मीडिया ने नैतिक कसौटियाँ पूरी तरह बदल दी हैं। उनके लिए अख़बार भी साबुन की तरह एक प्रोडक्ट है और यह बात वे खुलकर स्वीकार करते हैं।

.यह सच है कि महानगरों मं अंग्रेज़ी पत्रकारिता करने वाले आमतौर पर सुरक्षित रहते हैं। कान्फ्लिक्ट जोन को छोड़ दें तो भाषाई अख़बारों में काम करने वाले छोटे शहरों के पत्रकार, जिन्हें वेतन तक नहीं मिलता, वे सबसे ज़्यादा खतरे में हैं। गौरी लंकेश, कलबुर्गी, नरेंद्र दाभोलकर और पनसारे अपनी ज़बानों में लिखकर जनता को जगा रहे थे, इसलिए मारे गए। ये सब पत्रकार थे।

.नीति आयोग ने पानी के संकट को स्वीकार करते हुए पानी की राशनिंग और उसके निजीकरण की वकालत की है। यह संयोग नहीं है कि नीति आयोग के मुखिया अमिताभ कांत और पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के सचिव परमेश्वर अय्यर के नाम से टाइम्स ऑफ इंडिया में कुछ दिन पहले ही लेख छपा, पानी के निजीकरण की वकालत करते हुए.

.जब बांबे हाईकोर्ट ने सूखे की वजह से आईपीएल पर बैन लगाया तो इन अखबारों ने न्यायपालिका की आलोचना की, लेकिन जनता के सवालों पर ये कभी मुँह नहीं खोलते। हकीकत है कि मराठावाड़ा क्षेत्र में लोगों को साफ पानी एक रुपये लीटर में खरीदना पड़ता है जबकि वहाँ लगी 24 बीयर कंपनियों के लिए यह दर चार पैसे प्रति लीटर है। कई मीडिया हाउस खुद आईपीएल में भागीदार हैं।

.’क्रास मीडिया होल्डिंग’ लोकतंत्र के लिए खतरा है। दुनिया में कहीं ऐसा नहीं कि एक ही समूह अखबार, टीवी, रेडियो, ऑनलाइन, यहाँ तक कि प्रसारण पर भी काबिज़ हो। वही मालिक सब जगह है।

.मीडिया को आज़ाद कराने की ज़रूरत है। कान्ट्रैक्ट सिस्टम ख़त्म होना चाहिए और यूनियनों को फिर ताकतवर बनाना होगा ताकि पत्रकार निर्भय होकर काम कर सके। जनता को चाहिए कि जो पत्रकार या पत्रकारों का समूह निजी स्तर पर प्रयास कर रहे हैं, उन्हें मदद दे।

.सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन इसे ‘रोमंटिसाइज़’ नहीं करना चाहिए। सोशल मीडिया खड़ा करने वाली कारपोरेट कंपनियों के भी अपने हित हैं। कारपोरेट डिजिटल डाटा ट्रैफकिंग का सबसे बड़ा अपराधी है।

गौर से देखिए, तो पी.साईनाथ ने मीडिया में हुए जो पाप गिनाए हैँ सबके सब कांग्रेस राज की देन हैं। टेलिकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) ने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में राजनीतिक और व्यापारिक घरानों की एंट्री पर रोक लगाने की सिफारिश की थी। पहली रिपोर्ट 2009 में आई थी और दूसरी 2012 में। लेकिन मनमोहन सरकार ने मीडिया में क्रासहोल्डिंग या एकाधिकार रोकने के सुझावों पर कान नहीं दिया।

यही नहीं, पत्रकारों को कान्ट्रैक्ट सिस्टम में लाकर श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम को बेअसर बनाने की कोशिश भी यूपीए काल मे हुई। राहुल गाँधी इस दौरान सांसद ही नहीं थे, सरकार पर दबाव डालकर कानून बदलवाने की हैसियत रखते थे।

पी.साईनाथ के सवा घंटे का भाषण सनने के बाद, वे ये नहीं कह सकते कि उन्हें मामले की जानकारी नहीं है। उनकी तारीफ़ की जानी चाहिए कि उन्होंने सबसे पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद एक पत्रकार के भाषण को चुपचाप बैठकर सुना। लेकिन इस मुद्दे पर उनका बाद में चुप रह जाना उन्हें कांग्रेस पार्टी की तरह, पाप का भागीदार बनाए रखेगा।

हम देखेंगे।

 

.बर्बरीक

 

नोट- नीलाभ मिश्र वरिष्ठ पत्रकार थे जिनका पिछले दिनों निधन हुआ। तमाम अख़बारों और पत्रिकाओं में काम करने के बाद उनकी अंतिम पारी नेशनल हेराल्ड के साथ थी जो काँग्रेस द्वारा स्थापित समूह है। 

तस्वीरें सोशल मीडिया से साभार।